छात्र-युवा आंदोलन ने देश की फिजा बदली है. इसे क्रांतिकारी दिशा देने के लिए मजदूर वर्ग राजनीति को इसके लायक बनना होगा

संपादक मंडल

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मजदूरों, किसानों, बेरोजगारों, अग्निवीर विरोधियों, ट्रक ड्राइवरों, आदि के आंदोलनों की श्रृंखला में पिछले दिनों हुए छात्रों-युवाओं के शक्तिशाली आंदोलन और इसे मिले व्यापक जन समर्थन ने देश की फिजा बदलने में कामयाबी पाई है। मोदी सरकार के दमन, कुप्रचार, आईटी सेल व अंधभक्तों की ट्रोलिंग, एंटी नेशनल और पाकिस्तानी करार दिए जाने, जेल में डाले जाने, वगैरह का डर बहुत हद तक मिट गया। जो सरकार दावा करती थी कि उसका कोई मंत्री इस्तीफा नहीं देगा, उस सरकार के शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दे दिया है। देश में चल रहे छात्र-नौजवान आंदोलन की यह सबसे बड़ी मांग थी। यह मांग मनवा कर देश के छात्र-नौजवान आंदोलन ने फासीवादी भाजपा का घमंड चकनाचूर कर दिया है और मोदी-शाह जोड़ी का 'ऑरा' और अकड़ को मिट्टी में मिला दिया है। इस आंदोलन पर बर्बर दमन ने समाज के बड़े हिस्से में ऐसी घृणा पैदा की है कि दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ, RAF के नियंत्रक गृह मंत्री अमित शाह को टीवी से संसद तक इस पर सामने आकर बोलने की हिम्मत नहीं है। बस स्रोतों के ज़रिए गोदी मीडिया में खबरें प्लांट कर विदेशी, आतंकी, अपराधिक साजिशों की अफवाहें फैलाईं जा रही हैं। युवाओं के वालंटरी प्रचार ने सोशल मीडिया प्रोपेगंडा में भारी पैसा लगाकर कायम किए गए बीजेपी आईटी सेल के वर्चस्व को भी ध्वस्त कर दिया। इस आंदोलन ने छात्रों और नौजवानों में नई चेतना पैदा की है। सत्ता का असली चेहरा उनके सामने बेनकाब हुआ है। तथाकथित जनतंत्र का भ्रम टूटा है। सत्ता का खौफ उनके दिलों से निकला है। सिर्फ राजनीतिक सरकार ही नहीं, संसद, कार्यपालिका, पुलिस, न्यायपालिका, मीडिया, आदि राजसत्ता के सभी अंगों का जनविरोधी, तानाशाही, दमनकारी चेहरा जनता के सामने खुलकर आ गया है। यह एक फासिस्ट सत्ता के सामने इस आंदोलन की बड़ी कामयाबी है।

आंदोलन अपने सुधारवादी नेतृत्व से बहुत आगे निकल गया

निश्चित रूप से यह एक सुधारवादी आंदोलन था। इसकी ओर से सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था छोड़ें, शिक्षा प्रणाली तक में कोई बुनियादी परिवर्तन की मांग नहीं उठाई गई थी। इसका नेतृत्व करने वाले इसी व्यवस्था में आस्था रखने वाले थे। हालांकि हम अन्य के बीजेपी-संघ से जुड़े होने का कोई दावा नहीं करते, किंतु सोनम-गीतांजलि वांगचुक संघ से जुड़े हुए हैं और उनको लद्दाख के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने ही कॉक्रोच जनता पार्टी में शामिल होने को कहा था, यह सार्वजनिक जानकारी है। उन्हें इस आंदोलन में एक ‘संत’ की अगुआ भूमिका निभाने के लिए आगे लाने का बीजेपी सरकार का मकसद विपक्षी पार्टियों तथा छात्र संगठनों द्वारा नीट पेपर लीक तथा परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा करने के प्रयास को एक समानांतर आंदोलन द्वारा दिग्भ्रमित करना था।

किंतु इस आंदोलन का सुधारवादी चरित्र और बुनियादी परिवर्तन की मांगों के बजाय सिर्फ शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की सरल मांग ही इसकी ताकत और इसे मिलने वाले व्यापक जनसमर्थन का कारण बन गई। न सिर्फ पेपर लीक व परीक्षाओं में धांधली से परेशान छात्र, बल्कि भारी बेरोजगारी से जूझते बेरोजगार, उनके माता-पिता, शिक्षा प्रणाली के निजीकरण तथा महंगा किए जाने से त्रस्त जनता, आर्थिक परेशानियों से जूझते मजदूर तथा मेहनतकश किसान, मोदी सरकार की पूंजीपरस्त आर्थिक नीतियों से त्रस्त गरीब जनता, जातिगत तथा सांप्रदायिक नफरत को बढ़ावा दिए जाने से आक्रोशित दलित-अल्पसंख्यक, अभिव्यक्ति की आजादी तथा जनवादी अधिकारों के हनन के विरोधी, कुल मिलाकर कहें तो जनता की आवाज को बिल्कुल भी सुनने से इंकार करने वाली, आंशिक छोटी साधारण सुधारों की मांग उठाने पर देशद्रोही, आतंकी, पाकिस्तानी साजिश करार दे निर्मम दमन और कठोर कानूनों में जेल का इस्तेमाल करने वाली फासीवादी मोदी सरकार के गुरूर को तोड़ने की इच्छा रखने वाली व्यापक जनता के बड़े हिस्सों का समर्थन इस मांग को हासिल हो गया ताकि किसी एक बात पर तो इस सरकार को झुकने के लिए मजबूर किया जा सके। यहां तक कि एक सर्वेक्षण के मुताबिक खुद बीजेपी सरकार के समर्थकों में से 40% ने भी शिक्षा-परीक्षा व्यवस्था में मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ अपनी राय व्यक्त की। इसीलिए आंदोलन अपने नेतृत्व की उम्मीदों और तैयारी से कहीं बहुत बड़ा हो गया और छात्र-नौजवान ही नहीं, जनता के विभिन्न हिस्से नेतृत्व के आरंभिक सुरताल व शब्दावली से आगे जाकर सरकार के खिलाफ रोष जाहिर करने के लिए जंतर-मंतर पहुंचने लगे, या अपने स्थानों पर इसके समर्थन में जुटने लगे। इससे आंदोलन के नेतृत्व के लिए किसी प्रकार के समझौते के दरवाजे बंद हो गए, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से पीछे हटने का कोई विकल्प उनके पास नहीं बचा। सरकार की ओर से इस काम के लिए ही प्लांट किए गए सोनम वांगचुक का आंदोलन पर प्रभाव समाप्त हो गया।

मोदी सरकार की फासीवादी अकड़ बड़े टकराव का कारण बनी

मोदी सरकार नीत्शे के फासीवादी विचार की अनुयायी है जिसके अनुसार जो अवाम की बहुसंख्या को अपनी शक्ति से कुचल दे, वही महामानव है और उसके ऊपर नैतिकता तथा सदाचार के कोई सामान्य औपचारिक नियम लागू नहीं होते। इस सरकार ने राजसत्ता की दमनकारी ताकत और फासीवादी लंपट गुंडा गिरोहों से अपने विरोधियों और असहमति की हर आवाज को कुचला है, मीडिया को पालतू गोदी मीडिया में बदल दिया है, सुप्रीम कोर्ट को अपनी मनमर्जी के अधीन कर लिया है और चुनाव आयोग को बीजेपी का एक पार्टी विभाग जैसा बना चुनावों को मेनेज करने की पूरी व्यवस्था तैयार कर ली है। नाजियों की तरह उसका दावा भी अब हज़ार साल तक राज करने का है। इस गुरूर में चूर मोदी सरकार का मानना है कि उसके नेता-मंत्री जो भी दुराचार, चोरी, लूट, भ्रष्टाचार, बलात्कार, रिश्वतखोरी करें, वही नैतिकता है, आम लोगों पर लागू होने वाले नैतिकता के साधारण नियम उन पर लागू नहीं होते। चुनांचे इस सरकार के मंत्री जो करते हैं वही नैतिक है। किसी अपराध और दुराचार के इल्जाम लगने पर उनके इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता, राजनाथ सिंह इसका ऐलान कर ही चुके थे क्योंकि फासिस्टों के लिए जनभावना के समक्ष झुकना ‘महामानव’ के ‘ऑरा’ पर चोट करता है। अतः इधर से भी समझौते का रास्ता बंद था।

सरकार ने पहले जंतर-मंतर पर पहुंचने वालों को रोकने का प्रयास किया। आसपास के मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए। टैक्सी-ऑटो रोके गए। खास तौर पर नाम, कपड़ों, आइडेंटिटी पता कर दिल्ली पुलिस ने मुस्लिम नौजवानों को थानों में रोका। ऑर्डर पर खाने के पार्सल जंतर मंतर डिलीवरी करने वाले कामगारों, डिलीवरी एप्प प्रबंधकों, रेस्टोरेंट्स को ऐसा करने के लिए धमकाया गया, पुलिस द्वारा ऑर्डर लेने से मना किया गया। जंतर-मंतर पर भोजन की व्यवस्था में जुटे जुनैद के तो पूरे परिवार तथा रिश्तेदारों को पुलिस के कहर का सामना करना पड़ा। लेकिन इससे भी जंतर-मंतर पर आने वालों की संख्या कम नहीं हुई। यह सरकार के लिए बड़ा सिर दर्द बन गया।

यही तनाव व टकराव की वह स्थिति थी जिसमें 20 जुलाई के संसद मार्च को अभूतपूर्व समर्थन मिला और घमंड में चूर सरकार ने निर्मम दमन से आंदोलन को कुचल देने का निर्णय किया। एक दिन पहले ही पुलिस ने पत्थरों से भरा ट्रक वहां लाकर खड़ा कर दिया था, ताकि पत्थरबाजी करवाकर पुलिस हिंसा के लिए बहाना तैयार किया जा सके। सादे कपड़ों में लाठियां लिए गिरोह वहां मौजूद थे - पुलिस या संघी गुंडे, यह तो निष्पक्ष जांच का विषय है। पुलिस और सादे कपड़ों वाले गिरोहों द्वारा भारी लाठीचार्ज, पेलेट गन, लाइव राउंड फायरिंग, लड़के-लड़कियों को अकेले घेरकर कई-कई पुलिसियों द्वारा लाठियों से निर्दय पिटाई, युवतियों ही नहीं छोटी बच्चियों तक के साथ पुलिस ने बेशर्मी से कपड़े फाड़ने और यौन हिंसा को अंजाम दिया, आदि। यह सब कई घंटे जारी रहा, और पूरे देश ने देखा। आंदोलन का मंच भी पुलिस द्वारा तोड़ डाला गया। छात्रों-नौजवानों को बार-बार खदेड़ा और दूर-दूर तक दौड़ाया जाता रहा। हर तरह से आंदोलन को दमन से खत्म कर देने का प्रयास हुआ। अगले दिन बिहार में तो सामान्य ही नहीं एके-47 गनों तक से गोलीबारी भी की गई। साफ है कि यह फैसला किसी निचले स्तर के अधिकारी का नहीं प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के स्तर से आंदोलन को दमन से ध्वस्त कर फासिस्ट सत्ता के बिना चुनौती आतंक राज को स्थापित करने का था।

(पेलेट गन मूलतः ब्रिटिश साम्राज्यवाद का हथियार था जिसे उसने हांगकांग से लेकर आयरलैंड तक अपने उपनिवेशों में मुक्ति संघर्षों को कुचलने में निर्दयतापूर्वक इस्तेमाल किया। इजरायल ने इंतिफादाह में फलस्तीनियों पर इसका इस्तेमाल किया। फिर आंखों की रोशनी छीनने और चेहरे पर नृशंस दमन के निशान बना देने वाला यह अस्त्र चिली से फ्रांस, अमरीका से ईरान, एवं भारत तक जन संघर्षों को कुचलने में दमनकारी सत्ताओं का प्रिय हथियार बन गया। फासिस्ट बीजेपी सरकार पहले इसका इस्तेमाल कश्मीर और लद्दाख में कर चुकी थी। अब जंतर-मंतर पर छात्रों पर इसका इस्तेमाल हुआ। इसे 7 बार फायर किया गया और एक पत्रकार तथा 4 आंदोलनकारी शिकार बने।)

किंतु पेपर लीक व परीक्षा धांधली के जिम्मेदार मंत्री के इस्तीफे की इस मांग (किसी को सजा तक की मांग नहीं थी!) पर इस भयानक प्रतिशोध से संचालित दमन ने आंदोलन की ताकत व इसके जन समर्थन को कई गुना बढ़ा दिया। हालांकि मुख्य औपचारिक मांग अब भी मंत्री का इस्तीफा ही रही लेकिन आंदोलन में जुटने वाले लोगों के रोष का निशाना अब नरेंद्र मोदी सरकार की सारी जनविरोधी और उसके तमाम नृशंस-अपराधिक कृत्य बन चुके थे। इस स्थिति में किसी राजनीतिक शक्ति द्वारा हस्तक्षेप से आंदोलन को अगले उच्चतर चरण में ले जाना संभव बन गया जिसके साथ सरलता से समझौता इस सरकार के लिए और भी मुश्किल होता। विपक्षी पार्टियों से लेकर संयुक्त किसान मोर्चा, ट्रेड यूनियनों, वकीलों, आदि तक का समर्थन आंदोलन को मिलने लगा। बीजेपी सरकार की राजनीतिक ताकत और इसके मीडिया दुष्प्रचार के समस्त नुस्खे जब नाकाम हो गए तब खुद ‘महामानव’ को होने वाले गहरे राजनीतिक नुकसान के डर से सरकार को मंत्री की बलि देना मजबूरी बन गया। खुद नरेंद्र मोदी को सामने आना पड़ा और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ। किंतु बीजेपी ने अब भी किसी गलती या अपराध की जिम्मेदारी को स्वीकार नहीं किया है। यह इस्तीफा मात्र रणकौशलात्मक चाल है, इस्तीफे पश्चात धर्मेंद्र प्रधान के स्वागत और सम्मान के तमाशे से ही यह साफ जाहिर हो जाता है।

"खून की बू अब भी आ रही है,

सारे अरबी इत्र मिलकर भी खूनी हाथ में से खुशबू नहीं ला सकते"

सिर्फ मंत्री के इस्तीफे से इस सरकार के दो घाघ मंत्रियों ने आंदोलन के राजनीतिक रूप से गैर तजुर्बेकार नेतृत्व से आंदोलन की वापसी की घोषणा कराकर रातों-रात जंतर-मंतर खाली करा लिया ताकि इसके बाद वो फिर से अपनी साजिशी चालों को चल सकें। इसके बाद आंदोलन में अपराधियों के होने, विदेशी फंडिंग, सियासी साजिश, आतंकी कार्रवाई, आदि की अफवाहें बीजेपी के सोशल व मेनस्ट्रीम मीडिया कार्यकर्ताओं की ओर से चलाई जानें लगीं। पुलिस एक के बाद एक FIR दर्ज करने लगी। दिल्ली से बिहार, बंगाल तक हजारों छात्र-नौजवानों की कठोर अपराधिक कानूनी धाराओं में गिरफ्तारियां की जानें लगीं। संघी गुंडा गिरोह सोशल मीडिया से पहचाने गए छात्र-नौजवानों को ढूंढ़कर उन पर हमले व मारपीट करने लगे।

किंतु अभी भी मोदी सरकार को ऐसा कुछ चाहिए था जिससे वह समाज में आंदोलन के प्रति नफ़रती प्रतिक्रिया पैदा कर सके, जनता के एक हिस्से को आंदोलन के विरुद्ध खड़ा कर सके। इसके लिए युवा लड़कियों द्वारा प्रधानमंत्री की निंदा में अश्लील भाषा के प्रयोग और गालियों का ‘मुद्दा’ सृजित कर भारी अभियान चलाया गया। युवा लड़कियों को पहचानकर परिवार सहित उन पर गुंडों के हमलों व बलात्कार एवं कानूनी कार्रवाई की धमकियों द्वारा उन्हें डरा कर माफी मांगने का दबाव बनाया गया। पुलिस और संघी गुंडे उनके घरों पर जाने लगे, मेसेज भेजने लगे, उनके हर सोशल मीडिया पोस्ट पर अश्लील व धमकी भरे कमेंट करने लगे। इसके बाद नरेंद्र मोदी ने एक रील जारी कर इन युवा लड़कियों की भाषा पर कल्चरल शॉक का इजहार कर उन्हें ‘माफ’ करने का अपना मास्टरस्ट्रोक अस्त्र भी चला दिया! लेकिन सवाल है कि आखिर उनका जुर्म क्या था? क्या सरकार व प्रधानमंत्री की आलोचना अपराध है? अपराध यह है कि ये युवा सत्ता की पूंजीपरस्त नीतियों और दमन पर विरोध व असहमति का अपना जनतांत्रिक अधिकार इस्तेमाल कर रहे थे और जनता की आवाज सुनने से इंकार करने वाली सरकार पर उनका गुस्सा पूरी तरह जायज़ था। इसे ही यह फासीवादी सत्ता अपराध की तरह स्थापित कर समाज के एक हिस्से को इन युवाओं के खिलाफ, उनके अपने बच्चों के खिलाफ खड़ा कर देना चाहती है। किंतु मोदी-शाह की जोड़ी और संघ-बीजेपी की सरकार के खून से सने हाथ इससे साफ तो नहीं हो जाएँगे।

विरोध के बुनियादी जनवादी अधिकार पर फासिस्ट दमन बंद करो, पेपर लीक व छात्रों पर बर्बर हिंसा के दोषियों को दंडित करो

मुख़्तसर में कहें तो मोदी सरकार की 12 साल की पूंजीपरस्त नीतियों से अधिकांश जनता बेहद त्रस्त हो चुकी है। एक के बाद एक तबके के लोग रोष जाहिर करने के लिए आंदोलनों में उत्तर रहे हैं। छात्र-युवा आक्रोशित हैं, क्योंकि पहले तो शिक्षा को मुनाफे के लिए बिकने वाला बेहद महंगा माल बना गरीब मेहनतकश लोगों को इससे वंचित कर दिया गया, और अब कॉलेजों में प्रवेश से लेकर रोजगार तक सभी प्रतियोगी परीक्षाओं को सरकार संरक्षित अपराधी गिरोहों के हाथ सौंप दिया गया है। नतीजा है कि शिक्षा व रोजगार की सभी परीक्षाओं में पेपर लीक तथा परिणामों में धांधली मोदी सरकार में स्थाई परिघटना बन चुकी है। छात्र-युवा इस पर काफी अरसे से अपना गुस्सा जाहिर कर रहे थे। विरोध की किसी भी आवाज को न सुनने की जिद पर अड़ी फासिस्ट सत्ता ने इस असंतोष पर किसी सुनवाई से पूरी तरह से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने तो आवाज उठाते युवाओं को हिकारत से कॉकरोच कह उन्हें सख्ती से कुचलने का इरादा जाहिर कर दिया। इससे भड़का गुस्सा ही कॉक्रोच जनता पार्टी, जंतर-मंतर आंदोलन और और 20 जुलाई को भारी तादाद में छात्रों-युवाओं के संसद मार्च में अभिव्यक्त हुआ।

मौजूदा पूंजीवादी संवैधानिक जनतंत्र के अपने कायदों से हर नागरिक को अपनी बात कहने और विरोध करने का मूलभूत अधिकार है। किंतु पिछले कई दशकों से सुदूर क्षेत्रों में ही नहीं राजधानी दिल्ली में भी विरोध प्रदर्शन, जुलूस, सभा, आदि के मूल नागरिक अधिकार को लगभग समाप्त कर दिया गया है। अब सिर्फ़ दोनों और से पुलिस बैरिकेड में जेलनुमा बना दिए गए जंतर मंतर के पास के एक छोटे से हिस्से में भी लगभग प्रतीकात्मक विरोध की ही ‘आजादी’ बाक़ी है। यह विरोध भी कुछ सौ से बड़ा और कुछ घंटों से लंबा होते ही पुलिस बल द्वारा रोक दिया जाता है।

मोदी सरकार ने इससे पूर्व किसानों, सीएए-एनआरसी विरोधी, न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की मांग करते मजदूरों, आदि हर आंदोलन की तरह इस आंदोलन को भी निर्मम दमन से रौंदने की कोशिश की। हर बार की तरह इस आंदोलन के पीछे भी पाकिस्तानी हाथ बताया गया, देशद्रोही कहा गया, उनके साथ किसी भी वार्ता से इंकार किया गया। अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को सादे कपड़ों व डॉक्टरों के वेश में आई पुलिस द्वारा गुंडों के तरीके से अपहरण कर प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने की कोशिश की गई। 20 जुलाई को संसद मार्च में शामिल छात्रों को पुलिस द्वारा बेरहमी से पीटा गया। एक-एक छात्र, छोटी बच्चियों तक को कई-कई पुलिस द्वारा घेरकर लाठियों से निर्मम पिटाई के दृश्य पूरे देश ने देखे। पुलिस के साथ ही सादे कपड़ों में मौजूदा गिरोहों ने भी प्रदर्शनकारियों पर लट्ठ बरसाए।

सच्चाई यह है कि रोजगार व उच्च शिक्षा में प्रवेश की प्रतियोगी परीक्षाओं और स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं में निरंतर जारी हेराफेरी व धांधली के खिलाफ जनरोष इतना है और विरोध करने वालों को ‘न्याय के मंदिर के उच्च पुरोहित’ चीफ जस्टिस द्वारा कॉकरोच कह अपमानित किए जाने से समाज के जनवाद पसंद लोगों में ही नहीं, इस सरकार के समर्थक रहे मध्यम व संपन्न वर्ग तक के बड़े हिस्से तक में पहले ही जो गुस्सा फैला था, उसके कारण ही किसी भी विरोध को बर्दाश्त न करने वाली यह सरकार जंतर मंतर पर विरोध को कुछ अरसे तक चलने देने के लिए मजबूर हुई। वरना अप्रैल महीने में न्यूनतम मजदूरी मांगने के अपराध में नोएडा में 1200 से ज़्यादा मज़दूरों की गिरफ्तारी हुई और 8 कार्यकर्ता NSA समेत गंभीर धाराओं में जेल में हैं। मानेसर में 66 वर्कर और एक वामपंथी संगठन के 6 कार्यकर्ता 2 महीने जेल काटकर लौटे हैं। देहरादून में 13 मज़दूर जेल गए, हरिद्वार में एक वामपंथी संगठन के 21 लोगों पर गंभीर धाराओं में मुकदमे हैं और 2 कार्यकर्ताओं पर गुंडा एक्ट लगाकर जिला बदर की तैयारी है, रुद्रपुर में भी एक मज़दूर कार्यकर्ता को गुंडा एक्ट में जिला बदर का नोटिस मिला है। कुछ समय पहले हमने यौन हिंसा के विरुद्ध महिला पहलवानों के आंदोलन पर निर्मम पुलिस दमन भी देखा था।

हम अपने अधिकारों के लिए आंदोलनरत छात्र-युवाओं पर इस पुलिस बर्बरता का सख़्त विरोध करते हुए मांग करते हैं कि इसकी निष्पक्ष जांच कराकर दोषी पुलिस या गैर पुलिस सभी जिम्मेदार तत्वों की पहचान कर उन्हें दंडित किया जाए। आंदोलनों पर बर्बर पुलिस बल प्रयोग द्वारा दमन का प्रबल प्रतिरोध जरूरी है ताकि न सिर्फ़ विरोध प्रदर्शन की बची खुची आजादी की हिफाजत की जाए, बल्कि इस आजादी को और भी विस्तृत किया जा सके। इसके लिए समाज के सभी शोषित उत्पीड़ित तबकों एवं जनवाद पसंद हिस्सों को आंदोलनों पर दमन का एकजुट सख्त विरोध करना चाहिए। वरना इस आंदोलन के बाद ‘संविधान के रक्षक’ सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने तो सरकार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को ही पूरी तरह रोकने की सलाह दे डाली है।

शिक्षा व रोजगार मूल अधिकार - इन्हें बाजार का माल बनाना और परीक्षाओं में धांधली नहीं चलेगी

जहां तक इस आंदोलन का बुनियादी मुद्दा है, उसे सिर्फ़ एक मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली से विस्तृत कर शिक्षा एवं रोजगार के बुनियादी अधिकार तक ले जाना होगा। जब तक शिक्षा बाजार का माल बनी हुई है जिसे बड़े-बड़े पूंजीपतियों और कारोबारी नेता-अफ़सर-ठेकेदारों के मालिकाने में सुपर मुनाफे की लूट के लिए चलाया जा रहा है तब तक इन परीक्षाओं में धांधली-हेराफेरी को नहीं रोका जा सकता। सिर्फ़ परीक्षाओं में धांधली ही क्यों, आज शिक्षा व्यवस्था छात्रों खास तौर पर महिलाओं तथा वंचित तबकों से आने वाले छात्रों के साथ घोर उत्पीड़न का अड्डा बन गई है और आईआईटी-इंजीनियरिंग-मेडिकल कॉलेजों तक में सैंकड़ों की संख्या में आत्महत्या से हो रही युवाओं की मृत्यु हमारे समाज के लिए बेहद लज्जा और पीड़ा का विषय है। दरअसल मजदूरों-मेहनतकशों, निम्न मध्य वर्गीय परिवारों के लिए तो उच्च व पेशेवर शिक्षा के दरवाज़े ही बंद हो चुके हैं। कहां तो सभी के लिए समान शिक्षा की व्यवस्था का सवाल था, और कहां शिक्षा को निजी व बेहद महंगा कर छोटे से अमीर तबके के लिए पूरी तरह आरक्षित कर दिया गया है। उसमें गरीब-मेहनतकश परिवारों के बच्चों-युवाओं के लिए जरा भी मौका बचा ही नहीं है।

दरअसल यह समस्या सरकारों की पूंजीपरस्त नीतियों ने पैदा की है। भारत में छात्रों की असली समस्या वह शिक्षा व्यवस्था है जिसे पूंजीवादी सरकारों ने, और खास तौर पर मोदी सरकार ने, निजीकरण एवं व्यवसायीकरण द्वारा बाजार के उस बिकाऊ माल में बदल दिया है जिसका मकसद छात्रों को शिक्षित व्यक्ति एवं नागरिक बनाना नहीं, शिक्षा के कारोबार में निजी पूंजी लगाने वालों को सुपर मुनाफा लूटने का मौक़ा देना है।

एक जनतांत्रिक देश में सभी के लिए समान व सुलभ सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था करने से इंकार कर भारत की केंद्र व राज्य सरकारों ने जो खरीद सकते हैं उनके लिए प्राइमरी क्या, पूर्व प्राइमरी स्तर से ही ऊंची फीस वाली शिक्षा की दुकानें खोलने को बढ़ावा दिया है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दशक में हर दिन 25 और कुल 94 हजार प्राथमिक स्कूल बंद कर 2.26 करोड़ बच्चों को सरकारी से निजी स्कूली दुकानों में धकेल दिया गया है। 2005 में 71% बच्चे सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढ़ते थे, 2025 में यह संख्या 49% ही रह गई है।

यही काम कॉलेज यूनिवर्सिटियों के निजीकरण तक जारी है। दूसरी ओर देश की अधिकांश गरीब मेहनतकश जनता के बच्चों के लिए बिना इमारत, बिना शिक्षक, बिना पेयजल-शौचालय, बिना किताबों के इंतजाम वाले कुछ स्कूल हैं। लेकिन सच यह है कि महंगी कीमत देकर भी इन निजी स्कूलों में शिक्षा नहीं मिलती। प्राइवेट ट्यूशन और कोचिंग जरूरी हो गए हैं। मेडिकल-इंजीनियरिंग में जाने के लिए प्रवेश परीक्षाओं को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि अलग से महंगी कोचिंग करनी पड़ती है।

कुल मिलाकर हर स्तर पर शिक्षा को धनवानों के लिए रिजर्व कर दिया गया है। हालांकि अमीरों के लिए शिक्षा के इस असली आरक्षण को छिपाने के लिए समाज में ऐतिहासिक रूप से वंचित तबकों को मिले कुछ आरक्षण के ख़िलाफ हल्ला मचाकर जातिगत नफरत फैलायी जाती है ताकि असल सवाल की ओर हमारा ध्यान न जाए। असल सवाल है कि दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र होने का दावा करने वाले देश की सरकारों ने सभी के लिए समान व सर्वसुलभ सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था क्यों नहीं की जिससे शिक्षा के क्षेत्र में धन, जाति, धर्म-संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र, समुदाय, आदि के आधार पर भेदभाव की बुनियाद ही मिट जाती?

परीक्षाओं में पेपर लीक व धांधली का कारण अत्यंत असमान, बेहद महंगी तथा सीमित अवसरों वाली बिकाऊ माल बन चुकी शिक्षा प्रणाली एवं अच्छे रोजगारों का अकाल है

सख्त कानून का लॉलीपॉप नहीं, सबके लिए समान, सर्वसुलभ, सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था तथा रोजगार को मूल अधिकार बनाते हुए रोजगारों का व्यापक सृजन ही इसका समाधान

पेपर लीक सहित परीक्षाओं में धांधली-हेराफेरी का मूल कारण क्या है? दरअसल पूंजीवादी सरकारों द्वारा सबके लिए समान सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था के बजाय इसे निजीकरण के द्वारा बाजार का माल बना दिया गया है जिससे शिक्षा अत्यंत महंगी एवं गरीबों की पहुंच से तो बाहर ही हो गई है। NEET का उदाहरण लें। 22 लाख उम्मीदवारों के लिए सार्वजनिक मेडिकल कॉलेजों में कुछ हज़ार सीट ही हैं जहां दसेक लाख रू तक खर्च कर एमबीबीएस किया जा सकता है। गरीब तो इतना खर्च भी वहन नहीं कर सकते, लेकिन मध्यम वर्ग इन सीटों को पाने की जीवन-मरण वाली जद्दोजहद में बच्चों को 5-10 साल जिंदगी से ही वंचित कर देता है। अगर इनमें सिलेक्शन न हो तो इनके लिए रोजगार के अन्य अच्छे विकल्प भी नहीं हैं। उधर निजी कॉलेजों में एमबीबीएस के लिए 80 लाख, 1 करोड़ रू या इससे भी अधिक खर्च होता है।

रोजगारों की भी यही स्थिति है। पूंजीवादी आर्थिक नीतियों से बेरोजगारी चरम पर है। चंद संख्या में बेहतर वेतन तथा सुरक्षा वाले सरकारी रोजगार हैं, जो मिल जायें तो जिंदगी बन जाती महसूस होती है। जो युवा प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु तैयारी के लिए जिंदगी के सबसे बेहतरीन कई साल लगाते हैं उनमें से मात्र 1% के लिए ही नौकरियां उपलब्ध हैं। जिन 99% को नहीं मिलती, उनकी जिंदगी में 15-25 हज़ार रू मासिक वाले रोजगारों या बेरोजगारी का अंधेरा छा जाता है। सो इन थोड़े से सरकारी रोजगारों में भर्ती वास्ते बेहद मारामारी है, एक-एक मौके के लिए कई-कई हजार प्रतियोगी हैं।

चुनांचे इन थोड़ी सी सीटों के लिए जबरदस्त मारामारी है और यही वह भौतिक परिस्थिति है जिसमें शासक दल तथा उच्च अधिकारियों के संरक्षण वाले अपराधियों को पेपर लीक कर उसे लाखों रुपये में बेचने का मौका मिल जाता है क्योंकि इन मेडिकल सीटों या सरकारी रोजगारों को पाने के लिए कई लोग संपत्ति बेचने या सूद पर कर्ज तक लेने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसका समाधान किए बगैर पेपर लीक, धांधली-हेराफेरी रोकना नामुमकिन है। इसीलिए पिछले चंद सालों में पेपर लीक की 152 घटनाएं हो चुकी हैं।

किंतु सरकार सख़्त कानून, फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट, लंबी सजा, भारी जुर्माने का लॉलीपॉप दिखा रही है। यह कोई समाधान नहीं है। वैसे भी सरकार, उसकी पुलिस-सीबीआई आदि एजेंसियों तथा नीचे से ऊंचे कोर्ट में ‘न्याय’ की हकीकत जगजाहिर है। 2025 की पेपर लीक के मास्टरमाइंड बताए जाने वाले आरोपी के खिलाफ सीबीआई ने चार्जशीट ही पेश नहीं की है। परीक्षाओं में धांधली के 158 केस पहले ही अदालतों में लंबित हैं कुछ तो दशकों से। फ़ास्ट ट्रैक अदालतें कितनी फ़ास्ट चलती हैं उस संबंध में भी रिपोर्टों की कोई कमी नहीं है। जिस न्यायपालिका का चीफ जस्टिस बेरोजगारों को कॉकरोच बताए, उसमें इंसाफ ढूंढना हद दर्जे की नासमझी व भोलापन है और सिर्फ़ धूर्त ही इसके जरिए किसी समस्या के समाधान का भ्रम दिखाते हैं।

जब तक शिक्षा को बाजार का महंगा माल बनाने के बजाय सबके लिए समान सर्वसुलभ सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था नहीं की जाती और पूंजी पक्षीय नीतियों के बजाय मजदूर व जनपक्षीय आर्थिक नीतियों के जरिए बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन नहीं किया जाता, तब तक इस प्रकार की पेपर लीक एवं हेराफेरी बढ़ती ही रहेंगी। सरकार द्वारा दिखाया जा रहा सख़्त कानून, सजा तथा जुर्माने का लॉलीपॉप इसका समाधान नहीं है।

इसका समाधान व्यक्तिगत स्तर पर संभव नहीं। खुदगर्ज़ी की इस अंधी प्रतिस्पर्धा के बजाय सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठाना, मौजूदा सामाजिक व्यवस्था में इन समस्याओं के कारणों को तलाशना और उनके समाधान के लिए सचेत संगठित आवाज उठाना ही इसका हल है। यह समस्या मुनाफे की पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा जनित संकट है जिससे अकेले-अकेले एवं परस्पर होड़ द्वारा नहीं निपटा जा सकता। इससे निपटने के लिए सामूहिक रूप से एक न्यायसंगत सामाजिक व्यवस्था हेतु, सबके लिए समान सर्वसुलभ सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था हेतु, सबके लिए रोजगार की गारंटी हेतु एकजुट संघर्ष चलाना ही एकमात्र विकल्प है। हम शिक्षा व्यवस्था, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं के इस संकट से जूझ रहे सभी छात्रों-युवाओं तथ आम जनता से अपील करते हैं कि वे सांप्रदायिक-जातिगत राजनीति के उन्माद से मुक्त होकर अपने सामूहिक हितों के लिए निम्न मांगों पर संघर्ष को आगे बढ़ायें।

  1. 20 जुलाई को छात्रों पर बर्बर हिंसा की जांच करा दोषियों को दंडित करो
  2. पेपर लीक व धांधली के अपराधियों को सजा दो
  3. युवाओं को रोजगार न देने वाली, परीक्षाओं में धांधली कराने वाली मोदी सरकार इस्तीफा दो
  4. शिक्षा के निजीकरण-व्यवसायीकरण पर पूर्ण रोक
  5. सभी निजी शिक्षा संस्थानों का राष्ट्रीयकरण - स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को सरकार अपने हाथ में ले
  6. सभी के लिए समान सर्वसुलभ सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था
  7. सबके लिये रोजगार का मूल अधिकार तथा ⁠छात्रों की डिग्री को ही रोज़गार का आधार माना जाए। नौकरी के लिए टेस्टों की शर्त खत्म की जाए।

निश्चय ही हालिया छात्र-नौजवान आंदोलन ने एक बड़ी जीत हासिल की है, लेकिन फिर भी जितना बड़ा यह आंदोलन था, अपने व्यापक प्रसार और व्यापक सामाजिक समर्थन के बावजूद यह कोई बुनियादी मांग उठाने और मनवाने में कामयाब नहीं हो सका। इसकी मुख्य वजह इसका सुधारवादी नेतृत्व था। जो लोग इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, वे इसी व्यवस्था में आस्था रखने वाले हैं। अतः अपनी वास्तविक मांगों के लिए छात्रों और नौजवानों को आगे भी लड़ते रहना होगा। इन मांगों पर आंदोलन के साथ-साथ छात्रों और नौजवानों को देश की मेहनतकश जनता के साथ हाथ मिलाकर, देश की लुटेरी व्यवस्था के खात्मे और समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के लिए संघर्ष का हिस्सा बनना होगा। दरअसल, समाजवादी व्यवस्था में ही छात्रों, नौजवानों और मेहनतकशों के जीवन के समस्त मुद्दे हल हो सकते हैं। लेकिन समाजवाद की लड़ाई के नेतृत्वकारी तथा अगुआ मजदूर वर्ग की राजनीति को इस लायक बनना होगा कि अपनी तात्कालिक मांगों के लिए संघर्ष के मैदान में उत्तर रहे समाज के विभिन्न तबकों-हिस्सों को उनकी मुक्ति के सामूहिक प्रश्न पर एक शोषणहीन समाज बनाने के संघर्ष में एकजुट कर सके।

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