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मज़दूर आंदोलन की चुनौतियां और हमारे कार्यभार

उत्पादनकर्ता और निर्माता होने की वज़ह से सर्वहारा वर्ग ही अपना और बाक़ी सभी का वेतन तय करेगा. सामाजिक उत्पादन का मालिकाना भी सामाजिक होगा.

संपादक मंडल

फासिस्ट हिंदुत्व सियासत का विकृत-विद्रूप चेहरा - मंदिर के चढ़ावे में ‘रामनामी’ गबन व हेराफेरी

फासीवाद का उभार स्वयं ही पैदा किए गए आर्थिक संकट से सड़ते हुए पूंजीवाद द्वारा अपनी हिफाजत हेतु की गई अग्रिम हमलावर कार्रवाई है।

मुकेश असीम

आखिर चमार, महार या वाल्मीकि होने में क्या गौरव हो सकता है?

आप अपनी जाति को स्वीकार कर लें और उस पर गर्व करें, यही तो ब्राह्मणवाद चाहता है और यही ब्राह्मणवाद का लक्ष्य भी है।

अशोक कुमार

अपनी बस्ती बचाने का संघर्ष कर रहे नेहरू कॉलोनी फरीदाबाद के मेहनतकश मज़दूरों का साथ दीजिए

सभी क्रांतिकारी संगठनों को एक मंच पर लाकर, संघर्ष को व्यापकतम विस्तार देने की ज़रूरत है. फ़ासीवाद को टुकड़ों में नहीं मुक़म्मल तौर पर हराया जाता है.

सत्यवीर सिंह

‘तेल कंपनियों को घाटा हो रहा है, इसलिए पेट्रोल, डीज़ल, गैस के दाम बढ़ाने पड़ रहे हैं’ यह सरकारी बयान झूठा है

कुल मिलकर वित्तीय पूंजी के इन गिरोहों की थाह पाना बहुत ही कठिन है. ये वित्तीय पूंजी का सबसे वीभत्स दौर है.

सत्यवीर सिंह

हम हैं ठेका मज़दूर

हम, यूनियन नहीं बना सकते। हम, बनी बनाई यूनियन में भी शामिल नहीं हो सकते। अगर हम शामिल हुए तो उस यूनियन की मान्यता रद्द हो जाएगी। यानि, हमारा न्यूनतम स्तर बरकरार रखने के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।

रणवीर सिंह
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