27 फ़रवरी 2026 को श्याम बिहारी जी एक दुर्घटना के शिकार हुए और उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई. वे ईएसआईसी के बीमाधारक मज़दूर परिवार से थे. उन्हें तत्काल मेडिकल कॉलेज फ़रीदाबाद ले जाया गया, जहाँ वही हुआ जो अक्सर होता है. उनका तुरंत ऑपरेशन होना था, डॉक्टर ने उसकी सिफ़ारिश भी की, लेकिन सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं, इसलिए उन्हें लारे-लप्पे दिए जाते रहे और पूरे 9 दिन तक उसी तरह बेहद दर्द की हालत में ऑपरेशन के लिए इंतज़ार की अवस्था में रखा गया. आख़िर उन्हें बिना ऑपरेशन किए ही 7 मार्च को, उसी अवस्था में डिस्चार्ज कर, मतलब टरकाकर घर भेज दिया गया. अमानवीयता और क्रूरता की ऐसी मिसाल शायद ही कहीं मिले!!
कूल्हे की हड्डी का फ्रैक्चर, मतलब जटिल फ्रैक्चर, अपने आप कैसे ठीक होता. श्याम बिहारी जी की हालत गंभीर रूप से बिगड़ने लगी, तो उनका परिवार 23.03.26 को उन्हें लेकर फिर मेडिकल कॉलेज पहुंचा. उन्हें आईसीयू में भर्ती तो कर लिया गया, लेकिन हॉल के बाहर ‘आईसीयू’ की पट्टी लगाने मात्र से वह आईसीयू नहीं बन जाता, वहां आवश्यक सुविधाएं मिलने से बनता है. फिर से पूरे 5 दिन तड़पने के बाद उनके ऑपरेशन का नंबर 28.03.26 को आया. 27 फरवारी से 28 मार्च तक कूल्हे की हड्डी टूट चुके मज़दूर का शरीर तब तक लगभग जवाब दे गया था. ऑपरेशन के बाद हड्डी तो जुड़ गई, लेकिन शरीर टूट गया. वे आई सी यू में रहे लेकिन वहां भी उन्हें वैसा इलाज नहीं मिला, जैसे की ज़रूरत थी. आख़िर 26.04.2026 को श्याम बिहारी जिंदगी की जंग हार गए, मौत जीत गई.
श्याम बिहारी जी की मौत के लिए ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज, फ़रीदाबाद पूरी तरह ज़िम्मेदार है. इसलिए हम चंडीगढ़ उच्च न्यायलय के क़ाबिल वकील गौरव अरोड़ा द्वारा मेडिकल कॉलेज के उच्च प्रबंधन, डीन, मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट तथा डायरेक्टर जनरल को भेजे गए क़ानूनी नोटिस का समर्थन करते हैं, उनके साथ हैं. मृतक मज़दूर श्री श्याम बिहारी के परिवार को रु 50 लाख मुआवज़ा तो तत्काल मिलना ही चाहिए, उसके साथ, इस संस्थागत मौत की व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी भी तय होनी चाहिए, सभी क़सूरवार अधिकारियों को कठोर दंड मिलना ज़रूरी है, जिससे ऐसी भयानक वारदात जो ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज फ़रीदाबाद में हर रोज़ की बात हो गई हैं, फिर से ना हों.
हमारी मांगें -
- मज़दूरों की खून पसीने की कमाई से हुई कटौती से तामीर हुए इस महत्वपूर्ण संसथान की उच्च स्तरीय ऑडिट होनी चाहिए, जिसमें मज़दूरों के प्रतिनिधि भी शामिल रहें, जिससे पता चल सके कि यहां की स्वास्थ्य सुविधाएं, जैसे बेड की संख्या, डॉक्टर, सहायक मेडिकल स्टाफ, नर्स आदि, टेस्ट सुविधाएँ, दवाईयों, व्हील चेयर आदि की वास्तव में ज़रूरत कितनी है और उपलब्धता की क्या स्थिति है.
- यहाँ के प्रबंधन ने मेडिकल सुविधाएँ बढ़ाने के लिए समुचित प्रयास किए या नहीं; किए तो अड़ंगा किसने लगाया, यह भी तय होना चाहिए. पिछले वर्षों का रिकॉर्ड चेक किया जाए.
- ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज फ़रीदाबाद में पिछले साल के दौरान हुई सभी मौतों की भी जाँच होनी चाहिए.
- मरीज़ों की शिकायत निवारण की समुचित व्यवस्था हो और उस कमेटी में मज़दूरों के प्रतिनिधि ज़रूर रहें.
- जब तक पर्याप्त चिकित्सा, टेस्ट, बेड आफी की सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होतीं और मरीज़ों को इंतज़ार करने के लिए मज़बूर होना पड़ता है, तब तक गंभीर मरीज़ों का ईलाज, निगम, निजी हॉस्पिटल में कराए. साथ ही हर सुविधा के लिए वेटिंग रजिस्टर रखा जाए और उसके अनुसार मरीज़ अपने नंबर का इंतज़ार करें. इस मामले में प्रबंधन अपनी मनमर्ज़ी से फैसला लेता है. यह बहुत ही पीड़ादायक हक़ीक़त है. मरीज़ों के आक्रोश का यह बहुत अहम कारण है.
- हम पिछले कई साल से ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज फ़रीदाबाद में चिकित्सा सुविधाओं, ईलाज के दिनों की छुट्टियों आदि के बारे में, तथा मज़दूरों को ख़ुद या उनके परिवार वालों को जो मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं, उनके निवारण के लिए संघर्षरत हैं. 2024 में तत्कालीन डीन ने हमारे ज्ञापन को फाड़कर फेंक दिया था और हमारे ऊपर सुरक्षा गार्ड्स से हमला कराया था, महिलाओं समेत कई मज़दूर गंभीर रूप से ज़ख़्मी हुए थे, लेकिन हम उस संघर्ष से पीछे नहीं हटे. उसके बाद भी हम बीमार मरीज़ों की मदद के लिए, मेडिकल कॉलेज के गेट के बाहर, सड़क किनारे ‘हेल्प डेस्क’ लगाकर बैठते थे. उसी डीन ने वह भी नहीं चलाने दिया. हम बहुत दुःख के साथ कह रहे हैं कि यहाँ का उच्च प्रबंधन ग़रीब मेहनतक़श मज़दूरों के प्रति पूरी तरह संवेदनहीन और गैरज़िम्मेदार है. जब कि यह मेडिकल कॉलेज और वहां के डीन आदि को भारी भरकम वेतन, कोठियां, घोड़े-गाड़ी इन मज़दूरों की वज़ह से ही है, जो 10-12 हज़ार रु में अपने पूरे परिवार का पूरे महीने का गुजारा चलाने को मज़बूर हैं.
- ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज फ़रीदाबाद में मरीज़ों की मौतों, मुसीबतों एक जड़ में एक बहुत ही पीड़ादायक सच्चाई और भी मौजूद है, जिसे उजागर करना हम अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं. इस संस्थान का सालाना खर्च 600 करोड़ रु है. आवश्यकता यहाँ की सुविधाओं को कई गुना बढ़ाने की है. निगम का मुख्यालय कहता है, मतलब मोदी सरकार कहती है कि इस 600 करोड़ के सालाना खर्च को आधा, मतलब 300 करोड़ सालाना पर लाओ! मेडिकल कॉलेज प्रबंधन में ना साहस है और ना इच्छा है कि वह अपने मुख्यालय से कहे कि ऐसा करना उन मज़दूरों का गला घोंटना है, जिनके किसी तरह जिंदा रहने लायक़ वेतन में से हुई कटौती से यह संस्थान और यहाँ कि भूरे हाथी, उच्च अधिकारीयों, डीन वगैरह के खर्च, वेतन, भत्ते आदि चल रहे हैं. उलटा ‘यस सर’ कहने की आदि यह ज़मात खर्च को कम करने पर पिल पड़ी है और कुल सालाना खर्च को 600 करोड़ से घटाकर 450 करोड़ तक ले आए हैं. स्टाफ को कम कर के और दवाईयों की ख़रीदी कम करके ही यह किया जा रहा है. कुछ दिन पहले रखरखाव कर्मियों को थोक में निकाला जा चुका है. डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ की तादाद काफ़ी कम की जा चुकी है. इसी ‘किफ़ायत’ का नतीज़ा है कि रात में, ऑपरेशन से पहले, मरीज को बेहोश करने के लिए बस एक ही डॉक्टर मौजूद रहता है. मतलब एक से ज्यादा ऑपरेशन हो ही नहीं सकते. इन परिस्थितियों में टेस्ट आदि कोई भी सुविधा बढ़ाए जाने का तो सवाल ही नहीं आता. डॉक्टर, नर्स आदि को दिन-रात लगातार भी काम करने को मज़बूर किया जाता है. डॉक्टर का काम पड़चून दुकानदार जैसा तो है नहीं. तनावग्रस्त, नींद मारकर सर्जन को अगर ऑपरेशन करना पड़ रहा है तो खामियाज़ा मरीज़ को ही उठाना होगा.
- फ़ासिस्ट मोदी सरकार का घोर मज़दूर विरोधी और कॉर्पोरेटपरस्त चरित्र देश के मेहनतक़शों के लिए दमघोटू माहौल तैयार कर रहा है. यह किसी विशेष विभाग की नहीं, हर विभाग, हर क्षेत्र की हक़ीक़त है. मज़दूरों के वेतन से हर महीने लगातार हो रही 4% ईएसआईसी कटौती से सरकार ना सिर्फ़ निगम के सभी मेडिकल कॉलेज और और हॉस्पिटल चला रही है, बल्कि उस खर्च के बाद भी इस कोष में 1.8 लाख करोड़ रु की धन राशि मौजूद है, जिससे मेडिकल कॉलेज फ़रीदाबाद जैसे कई सौ मेडिकल कॉलेज खुल सकते हैं, सभी मज़दूरों और उनके परिवारों का समुचित इलाज हो सकता है लेकिन सरकार का लक्ष्य वह है ही नहीं. इस बहुमूल्य कोष की निगरानी (portfolio management) मोदी सरकार ने उसकी सबसे चहेते धन्नासेठ मुकेश अंबानी की कंपनी ‘रिलायंस निप्पन लाइफ’ को दी हुई है. ग़रीब मज़दूरों के इस कोष को सरकार खर्च करने की बजाए बढ़ाना चाहती है. ऐसे में सरकार की नीयत क्या है, अंदाज़ लगाना ज़रा भी मुश्किल नहीं. मज़दूरों का यह बहुमूल्य कोष ख़तरे में है.
- एक मांग मज़दूरों और ईएसआईसी स्टाफ से भी: जीवनावश्यक इलाज सुविधाएं ना मिलने से मज़दूरों की मौतें और मुसीबतें बेइंतेहा बढ़ रही हैं, मेडिकल कॉलेज स्टाफ़ तनावग्रस्त हैं और मज़दूरों के बहुमूल्य कोष को मुकेश अंबानी द्वारा हड़प लिए जाने की ज़मीन तैयार की जा रही है. सबसे अहम, मोदी सरकार की असली नीयत उजागर हो चुकी है. क्या किया जाए? इससे क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सभी को हताश होने की बजाए, इकट्ठे होकर सड़क पर आना चाहिए, जन आंदोलन छेड़ने चाहिएं. सरकार या निगम को गुहार लगाने से तो कोई राहत तब मिल सकती थी, जब उनका लक्ष्य ग़रीब मज़दूरों को चिकित्सा सुविधा पहुँचाने का होता. सोए हुए व्यक्ति को जगाया जाता है, जो सोने का ढोंग करके चद्दर ताने पड़ा है, उसे नहीं!! ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा फ़रीदाबाद’ इस अन्याय और ना-इंसाफ़ी के ख़िलाफ़ पहले भी लड़ा है, आगे भी लड़ेगा. हम सभी मज़दूरों का आह्वान करते हैं कि ‘कर्मचारी राज्य बीमा निगम’ आपकी संस्था है, आपके पैसे से चल रही है, आप इसके मालिक हैं, इसे तबाह होने से बचाना आपकी ज़िम्मेदारी है. इसे बचाने के संघर्ष में हमारा साथ दीजिए.
