भोजन की तलाश ने आदि मानवता को शिकारी वर्ग बना दिया लेकिन उस समाज को वर्ग विहीन (आदि साम्यवाद) कहा गया क्योंकि सबने सबके लिए काम किया। ना कोई मालिक, ना कोई मज़दूर और ना कोई किए गए शिकार की दुकान। जब इंसान ने इंसान को बेचा, तो समाज पहली बार, दासों और मालिकों के बीच वर्ग विभाजित कहलाया। बंधुआ मजदूर और ज़मींदार, वर्ग विभाजन का दूसरा संस्करण सामने आया। अब हम, वर्ग विभाजन के तीसरे चरण में हैं जहां पूंजीवाद ने समाज को दो प्रतिद्वन्द्वी वर्गों, सर्वहारा और पूँजीपति में बांट दिया है।

भारत के कुछ वाम दलों की, वर्ग विभाजन और क्रांति के चरण को लेकर भूमिका (श्रोत दस्तावेजों के अंश):


उपरोक्त का सारांश

सत्ताधारी वर्ग
सभी पांचों पार्टियां इस बात पर एकमत हैं कि भारत में पूंजीपति वर्ग ही राज कर रहा है। पांच में से चार का मानना है कि पूंजीपति वर्ग, जमींदार वर्ग के साथ मिलकर राज कर रहा है। इन चार में से तीन का मानना है कि पूंजीपति वर्ग, विदेशी पूंजी का दलाल है।
यह जानने का प्रयास करते हैं कि क्या जमींदार वर्ग, आज भी सत्ता में साझेदार है:

भारत में ज़मींदार वर्ग का मतलब है बड़े किसान जो भूमिहीन मज़दूरों को काम पर रखते हैं। उनका रूझान पूंजी लगाकर नकदी फसलों की पैदावार पर होता है। उन्हें ग्रामीण पूंजीपति कहा जा सकता है। पूंजीवाद ने देहात के आर्थिक ताने-बाने को अपने नियंत्रण में ले लिया है।
क्रांतिकारी वर्ग
क्रांतिकारी वर्ग पर सबकी एक राय है। मज़दूर और किसान ही पूंजीवाद को दफ्न करेंगे। वे मौजूदा व्यवस्था के सबसे बड़े शिकार हैं। मज़दूर, जमीन से बेदखल हो चुके हैं और किसान बेदखल हो रहे हैं। वर्चस्व के लिए नहीं, बल्कि ज़िंदा रहने के लिए, उन्हें पूंजीवाद के खिलाफ़ मोर्चा संभालना होगा। पूंजीवाद में वे कभी भी शांति से नहीं जी सकते। सिर्फ़ मानवीय सम्मान पाने के लिए भी, उन्हें समाजवाद की ओर कूच करना होगा जहाँ उन्हें किसी पूंजीपति के लिए काम करते करते अपनी ज़िन्दगी खपाने की कोई मजबूरी नहीं होगी। पांच में से चार पार्टियां, पूंजीपति या उसके किसी हिस्से को क्रांतिकारी वर्ग का साथी मानती हैं। छोटे पूंजीपति का देर-सवेर सर्वहारा बनना लगभग तय है, इसलिए वो पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने के प्रयास में मज़दूरों और किसानों के साथ आ सकता है। क्योंकि, हालात से सोच बनती है, सोच से हालात नहीं बनते।
क्रांति का चरण
सभी पांचों पार्टियां क्रांति के चरण को “जनवादी” मानती हैं। पांच में से चार, पूंजीपति को क्रांतिकारी मज़दूर वर्ग का साथी और ज़मींदार को शासक वर्ग का साथी मानती हैं। जैसे ही हम, भारत को पूंजीवादी देश मानते हैं, सारा समीकरण बदल जाता है। ज़मींदार सत्ता से बाहर हो जाता है और पूंजीपति प्रतिक्रियावादी हो जाता है। तब, क्रान्ति का चरण भी जनवादी की जगह समाजवादी हो जाता है। मूल बात यह है कि आज भी भारत को एक अर्ध सामंती अर्ध पूंजीवादी देश माना जा रहा है। पिछड़ा रूस 1917 में समाजवादी क्रांति के चरण में प्रवेश कर गया था लेकिन हम आज 2026 में भी सामंतवाद के अवशेष ढूंढ रहे हैं।
सत्ताधारी वर्ग, लोकतंत्र को संकुचित करने के लिए 'एक राष्ट्र एक चुनाव' की ओर बढ़ रहा है, लेकिन हम अपने प्रभाव को और व्यापक बनाने के लिए "एक राष्ट्र एक मार्क्सवाद" नहीं कर पा रहे। दैत्याकार वित्तीय पूंजी, नरसंहारी निजामों को ताकतवर बना रही है और मज़दूरों को उनके अधिकारों से वंचित कर रही है। राजशाही से मित्रता निभा रही है और राष्ट्रपतियों को अगवा कर रही है। ना झुकने वाले देशों पर बम बरसाए जा रहे हैं। न्यूनतम मज़दूरी मांगने पर अधिकतम दमन किया जा रहा है। यहां तक कि वकीलों को भी हिरासत में लिया जा रहा है और मज़दूरों का समर्थन करने वालों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया जा रहा है।
इन फासीवादी हालात में भी, हम सामंतवाद – पूंजीवाद के निर्धारण पर अटके हैं। हमारे व्याख्यात्मक मतभेद आज संस्थागत हो गए हैं और उनमें काफी जड़ता आ गई है। एक देश में, एक मार्क्सवाद के नाम पर हम सौ पार्टियाँ चला रहे हैं। पूर्वी और पश्चिमी मिलकर एक जर्मनी बन गए। उत्तरी और दक्षिणी मिलकर एक वियतनाम हो गए। गलाकाट प्रतियोगिता के बावजूद हर साल सैंकड़ों कंपनियां विलय का रास्ता चुन रही हैं। लेकिन, हम मार्क्सवादी ये ललकारने का साहस नहीं कर पा रहे कि “भारत के कम्युनिस्टो एक हो”। हमें चुनाव हारना मंजूर है। हमें हास्यास्पद स्थिति में पहुँचना मंजूर है। लेकिन, हम अपनी मूल राजनीतिक भूमिका से समझौता नहीं कर सकते।
हम बड़े सोच समझकर सौ कदम पीछे हटे हैं, अब हम किसी उत्साह में आकर एक लंबी छलांग नहीं मार सकते।