ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट जैसे समानता व न्याय आधारित समाज के समाधान भी धर्मों की तरह एक आधुनिक रासायनिक नुस्खे वाली अफ़ीम हैं जिनका मकसद मजदूरों को शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति के संघर्ष से विमुख करना है।
बद से बदतर होती जा रही आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों में, दिन रात संविधान को बचाने की रट से ज़्यादा महत्वपूर्ण और आवश्यक है- व्यवस्था परिवर्तन के लिए वर्ग चेतना पर आधारित वर्ग संघर्षों की
इसकी सबसे बड़ी खूबी इस बात में है कि यह अस्मिता के भावनात्मक प्रश्न से परे, जनता के भौतिक अस्तित्व के मुद्दों से जुड़ी है। इस मंच पर हर शोषित वर्ग को अपने पहचान से ऊपर उठकर एकजुट होने की जरूरत है।
उपरोक्त प्रश्न पर दो आलेख हमें प्राप्त हुए हैं. इन साथियों के व्यक्तिगत विचारों बतौर हम इन्हें प्रकाशित कर रहे हैं
प्रत्येक पीड़ित-शोषित स्त्री और पुरुष को व्यवस्था परिवर्तन के लिए मिलकर संघर्ष करना होगा
जब तक समाज में घोर आर्थिक असमानताएं मौजूद हैं जब तक मनुष्य द्वारा मनुष्य के दमन शोषण को नहीं रोका जा सकता है
हमारे व्याख्यात्मक मतभेद आज संस्थागत हो गए हैं और उनमें काफी जड़ता आ गई है।
मार्क्सवाद किसी जाति विशेष, वर्ग विशेष या किसी देश विशेष की बपौती नहीं है, न हो हो सकता है। मार्क्सवाद तो दुनिया के तमाम दलितों, शोषितों और पीड़ितों की मुक्ति का दर्शन है
आप अपनी जाति को स्वीकार कर लें और उस पर गर्व करें, यही तो ब्राह्मणवाद चाहता है और यही ब्राह्मणवाद का लक्ष्य भी है।