संविधान और मनुस्मृति में मौलिक फ़र्क़ क्या है?

अशोक कुमार

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मनुस्मृति सामंती युग का संविधान थी और वर्तमान संविधान पूंजीवादी युग की मनुस्मृति है। इन दोनों विधानों में कोई मौलिक भेद नहीं है, क्योंकि दोनों ही व्यवस्थाएं श्रम के शोषण और निजी संपत्ति पर आधारित व्यवस्थाएं रही हैं। सामंतवाद और पूंजीवाद दोनों ही व्यवस्थाओं में भेद सिर्फ़ शोषण और दमन के तौर-तरीक़ों को लेकर ही रहा है। सामंती व्यवस्था में दलित-शोषित श्रमिकवर्ग का शोषण और दमन क्रूर और बर्बर क़िस्म का रहा था, और पूंजीवादी व्यवस्था में शोषण और दमन के रूप ज़रा परिष्कृत और आधुनिक क़िस्म के हो गए हैं । लेकिन श्रमिकवर्ग के शोषण और दमन की प्रक्रिया और उसका स्वरूप एक जैसा ही है, उसमें किंचित मात्र भी मौलिक बदलाव दृष्टिगोचर नहीं हुआ है । इसीलिए आज भी, अतीत के सड़ेगले और मरणशील सामंती मूल्यों और पूंजीवाद के शोषणकारी चरित्र के बीच चोली-दामन का सा साथ बना हुआ है, और सत्ता पर क़ाबिज़ होने के लिए वे एकदूसरे के लिए बेहद मददगार साबित हो रहे हैं ।

याद रहे, भारत में वर्णव्यवस्था और जातिवाद का मूल आधार श्रम का शोषण और निजी संपत्ति का अधिकार ही रहा है, और मनुस्मृति और वर्तमान संविधान दोनों ही श्रम के शोषण और निजी संपत्ति के अधिकार को संवैधानिक, क़ानूनी और सामाजिक मान्यता प्रदान करते हैं । इसीलिए इस सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था में, जिसे शासकवर्ग लोकतंत्र कहकर प्रचारित करता है, वह वास्तविक अर्थों में लोकतंत्र वग़ैरह कुछ नहीं होता । यह कथित लोकतंत्र दलित-शोषित श्रमिकवर्ग के ऊपर शासकवर्ग यानी शोषकवर्ग की तानाशाही का ही दूसरा नाम होता है । वास्तविक लोकतंत्र यानी समानता, स्वतंत्रता, न्याय, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और बंधुता जैसे मानवीय मूल्य तो आर्थिक जनतंत्र की स्थापना के बाद ही फलीभूत हो सकते हैं ।

समाज के व्यवहारिक जीवन में आर्थिक जनतंत्र की स्थापना के बग़ैर इन शब्दों का कोई मूल्य और महत्व नहीं रह जाता । लेकिन वर्तमान संविधान आर्थिक जनतंत्र की स्थापना किये बग़ैर ही, 'एक व्यक्ति एक मूल्य' के पूंजीवादी सिद्धांत को ही लोकतंत्र घोषित करता है । लेकिन 'एक व्यक्ति एक मूल्य' पर आधारित सिद्धांत 'पूंजीवादी समानता' का पुराना और भ्रांतिमूलक सिद्धांत रहा है, जो लोकतंत्र के नाम पर दलित-शोषित श्रमिकवर्ग की आंखों में धूल झोंकने का काम करता रहा है । इस देश में ग़रीब और संपत्तिहीन लोगों के वोट की क़ीमत ही क्या होती है ? चुनाव जितने के लिए उनके वोट शासकवर्ग और पूंजीपतियों के द्वारा लोभ लालच देकर कौड़ियों के दाम खरीद लिए जाते हैं । अभी हाल ही में पांच राज्यों में संपन्न हुए चुनावों में पूंजीपतिवर्ग द्वारा मेहनतकश जनता के वोट मात्र एक किलो नमक और पांच किलो अनाज देकर खरीदकर लिए गए और चुनाव जीत लिया गया । पूंजीवादी लोकतंत्र के संबंध में विश्वविख्यात साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास गोदान में कहा था, "जिसे हम डेमोक्रेसी कहते हैं, वह व्यवहार में बड़े-बड़े व्यापारियों और ज़मींदारों का राज्य है, और कुछ नहीं । चुनाव में वही बाज़ी मार ले जाता है जिसके पास रुपये हैं ।" इसीलिए वास्तविक लोकतंत्र तो तभी संभव हो सकता है, जब आर्थिक जनतंत्र के मूलभूत लक्ष्यों को हासिल कर लिया गया हो ।

आर्थिक जनतंत्र के मूलभूत लक्ष्य क्या हैं ? देश के प्रत्येक नागरिक को रोज़गार, निशुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास का अधिकार, बिना किसी भेदभाव के संवैधानिक और क़ानूनी रूप से प्राप्त करने की गारंटी प्राप्त हो, किसी भी मनुष्य को दूसरों के श्रम का शोषण करना दंडनीय अपराध घोषित हो, शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच सभी तरह के भेदों का उन्मूलन हो, निजी संपत्ति का अधिकार क़ानूनी और संवैधानिक रूप से अवैध घोषित हो, किसी भी नागरिक को उत्पादन की प्रक्रिया में भाग लिए बिना यानी श्रम किए बिना रोटी खाने का कोई अधिकार न हो इत्यादि । संक्षेप में, आर्थिक जनतंत्र का यही आत्यंतिक लक्ष्य और वास्तविक अर्थ होता है ।

नेहरू हालांकि शासकवर्ग के सर्वमान्य नेता और पूंजीवाद के ही प्रवक्ता थे, लेकिन फिर भी आर्थिक जनतंत्र और समाजवाद के संबंध में उनके विचार बड़े ही सुस्पष्ट थे । उनका मानना था कि "समाजवाद जनतंत्र का अपरिहार्य परिणाम है । राजनीतिक जनतंत्र में यदि आर्थिक जनतंत्र शामिल नहीं है, तो वह निरर्थक है । आर्थिक जनतंत्र और कुछ नहीं, समाजवाद है ।" (जून 1963 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के जयपुर अधिवेशन में घोषणा)

लेकिन भारतीय संविधान में ऐसे किसी बुनियादी लक्ष्य की घोषणा नहीं की गई है । भारतीय संविधान में, हालांकि समानता स्वतंत्रता, न्याय, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और बंधुता जैसे अच्छे-अच्छे शब्दों का खूब उल्लेख किया गया है, लेकिन आर्थिक समानता के बग़ैर इन अच्छे-अच्छे शब्दों का मूल्य दो कौड़ी से ज़्यादा नहीं हो सकता, क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था में, व्यक्ति और विभिन्न समूहों की सामाजिक हैसियतें मूलतः धनसंपत्ति पर उनके स्वामित्व की मात्रा के आधार पर ही तय होती है । इसीलिए देश में मौजूद भयावह सम्पत्तिगत असमानताओं के चलते, एक ग़रीब मेहनतकश आम नागरिक और अंबानी-अडाणी, टाटा-बिड़ला जैसे धनकुबेरों के बीच समानता और मैत्री के भाव कैसे फलीभूत हो सकते हैं ? वास्तविक समानता और बंधुता के भाव तो समान के तल पर ही घटित हो सकते हैं । भारी संपत्तिगत असमानताओं की मौजूदगी में तो उनके बीच स्वभावगत रूप से कलहपूर्ण संबंध ही अस्तित्व में हो सकते हैं । संपत्तिगत समानता के अभाव में जो संबंध अस्तित्व में होते हैं, वे प्रायः दूसरों की दया और सहानुभूति पर आधारित होते हैं, और सशर्त होते हैं । इसीलिए सहानुभूति और दया में समानता का भाव निहित नहीं होता, बल्कि इनके मूल में मालिक और नौकर, दास और स्वामी, ग़रीब और अमीर जैसे अपमानजनक भाव ही छदम रूप में विद्यमान रहते हैं । ऐसे संबंधों में समानता भ्रांतिमूलक और दिग्भ्रमित करने वाली ही साबित होती है ।

इसीलिए संविधान प्रदत्त 'एक व्यक्ति एक मूल्य' जैसे पूंजीवादी सिद्धांत की मौजूदगी के बावजूद, आज भी यह देश, व्यक्ति, समाज और विभिन्न समूहों के बीच आपसी कलह, वैमनस्य, हिंसा, और आतंक का अखाड़ा बना हुआ है । इन सभी उपद्रवों की जड़ में मूलतः भयानक आर्थिक और संपत्तिगत असमानताओं की मौजूदगी ही रही है । इस सच्चाई पर पर्दा डालने के लिए ही शासकवर्ग, जाति, वर्ण, धर्म, मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम, हिंदुस्तान-पाकिस्तान, गाय-गोबर, राष्ट्रवाद, जैसे अर्थहीन मुद्दों को हवा देने का काम कर रहा है ।

दरअसल, 'एक व्यक्ति एक मूल्य' का सिद्धांत यथास्थिति को बरक़रार रखने वाला पूंजीवादी फ़िकरा ही साबित हुआ है । वास्तविकता यह है कि पूंजीवादी संसदीय लोकतंत्र के अंतर्गत सत्तापरिवर्तन के ज़रिए केवल शोषकों के चेहरे ही बदलते रहे हैं, और जड़ हो गई व्यवस्था में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन संभव नहीं हो पा रहा है । कथित आज़ादी के बाद, सत्तर वर्षों का अनुभव इस तथ्य की पुष्टि स्वयं करता है । आज इस देश में, अनेकों संविधान और संवैधानिक प्रावधानों की मौजूदगी के बावजूद जातीय उन्माद, सांप्रदायिकता हिंसा, धार्मिक असहिष्णुता जैसे दलित-शोषित श्रमिकवर्ग विरोधी रुझान, सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था के आत्यंतिक परिणामों के रूप में अपने चरम पर है ।

इसीलिए आज की बद से बदतर होती जा रही आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों में, दिनरात संविधान को बचाने की रट लगाए रखने से ज़्यादा महत्वपूर्ण और आवश्यक है- व्यवस्था परिवर्तन के लिए वर्गचेतना पर आधारित वर्गसंघर्षों की । लेकिन दलित नेता, दलित विचारक और दलित बुद्धिजीवी न जाने कब इस तथ्य को समझेंगे ?

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