मज़दूर आक्रोश आंदोलनों की मौजूदा लहर की अंतरिम समीक्षा

सत्यवीर सिंह

· 32 min read
Thumbnail

अपनी श्रम शक्ति बेचकर जिंदा रहने की ज़द्दोज़हद में हर रोज़ हजारों मज़दूर पानीपत रिफाइनरी के इस गेट पर लाइन लगाते हैं

“मज़दूर वर्ग की मुक्ति की जंग स्वयं मज़दूर वर्ग द्वारा ही जीती जानी चाहिए ("The emancipation of the working classes must be conquered by the working classes themselves."). मज़दूर आंदोलन में अक्सर उद्धृत होने वाला, कार्ल मार्क्स का यह वाक्य, 28 सितंबर 1864 को बने पहले कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के नियमों में दर्ज़ है. कार्ल मार्क्स के इस कथन का संदर्भ क़ाबिल-ए-गौर है. वे, दरअसल, उन काल्पनिक समाजवादियों, बुर्जुआ सुधारवादियों तथा उदारवादी बुद्धिजीवियों को झिड़क रहे थे, जो कहते थे कि वे मज़दूरों को उनकी मुक्ति का ‘तोहफ़ा’ दे सकते हैं, क्योंकि उनके अनुसार मज़दूरों की मुक्ति ऊपर से शुरू होकर नीचे की विधि (top down method) से आएगी. 2026 के पहले महीने में, बरौनी इंडियन आयल रिफाइनरी से शुरू होकर पूरे देश में फैली मज़दूर आक्रोश की मौजूदा शानदार लहर में शायद ही किसी मज़दूर ने मार्क्स की यह लाइन पढ़ी हो, लेकिन उन्होंने हमें इसे याद करा दिया. विज्ञान की ख़ासियत है कि यह हर किसी पर लागू होता है, भले उसे उसका पता हो या ना हो.

हम, मज़दूर कार्यकर्ता, मज़दूरों को सिखाने के साथ-साथ, उनसे सीखने की भी आदत डालें, यह भी मज़दूरों ने दीवार पर लिख दिया है. इस ऐतिहासिक आक्रोश लहर की यह अंतरिम समीक्षा है क्योंकि लहर अभी थमी नहीं है. पूरी तरह तो शायद अब कभी भी ना थमे. विज्ञान की एक और सीख भी उतनी ही महत्वपूर्ण है; बिना कारक (cause) के प्रभाव (effect) नहीं होता, अर्थात हर प्रभाव की कोई ठोस वज़ह होती है. वह वज़ह जब तक मौजूद है, तब तक उसका प्रभाव नहीं रोका जा सकता. क्या मज़दूर आक्रोश की वज़ह दूर होने की उम्मीद नज़र आ रही है? क्या उनकी श्रम शक्ति के वाज़िब दाम मिलने की उम्मीद बची है? 7 मज़दूर जब चाहें, अपनी यूनियन बना लें, अपनी परेशानियां प्रबंधन के सामने रख सकें, उन पर आमने सामने बैठकर विचार हो, निश्चित समयावधि में मज़दूरों को वाज़िब वेतन बढ़ोत्तरी मिले, बोनस, चिकित्सा सुविधाएं, आवास सुविधाएं, दुर्घटना होने पर समुचित मुआवज़ा मिले, कार्य स्थल पर कैंटीन, पीने का स्वच्छ पानी, शौच आदि की समुचित व्यवस्था हो, क्या ऐसे आसार नज़र आ रहे हैं? उत्तर है, ‘नहीं’. इसका मतलब हुआ कि आक्रोश का ‘कारण’ उसी तरह मौजूद रहेगा; झांसे देकर, डंडा घुमाकर, ‘राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून’ लगाकर, सरकार उसका प्रभाव रोक देगी!! ऐसा नहीं होता. हवाएं किसी के हुक्म की मोहताज़ नहीं होतीं. तूफ़ान को आने के लिए दिल्ली से इज़ाज़त नहीं लेनी होती!! कुछ दिन भले सतह पर ‘शांति’ बनी रहे, लेकिन सतह के नीचे धधक रही ज्वाला शांत नहीं होगी और सतह के नीचे जो है, उसका अंकुर एक दिन फूटना तय है.

  1. इस आंदोलन की ‘मास्टरमाइंड’ सरकारें हैं

मज़दूरों के तेवर देखकर हरियाणा सरकार ने न्यूनतम वेतन बढ़ाने में काफ़ी फुर्ती दिखाई. जाने कितने ‘मोर्चा-सभा-ज्ञापन’ हो लिए, 11 साल तक उसे यह याद नहीं आया. अकुशल, अर्द्धकुशल, कुशल एवं उच्च कुशल के लिए घोषित न्यूनतम वेतन क्रमश: 15,220.71, 16,780.74, 18,500.81 तथा 19,425.85, पानीपत का नज़ारा देखते ही घोषित हो गया, जो 1 अप्रैल से लागू है. बढ़ा हुआ यह वेतन बहुत कम है, उससे भी बहुत कम है, जितने के लिए हरियाणा सरकार ख़ुद राज़ी हो गई थी. मज़दूरों के साथ बेईमानी करने से, सरकार अब भी बाज़ नहीं आई. इसी हरियाणा सरकार द्वारा 2025 में गठित ‘न्यूनतम वेतन कमेटी’ ने, अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त ‘डॉ वालेस आयाक्रोइड मापदंड’ के अनुसार मेहनतक़श मज़दूर को प्रति दिन कम से कम 2,700 कैलोरी उर्ज़ा मतलब कार्बोहायड्रेट, 65 ग्राम प्रोटीन तथा 50 ग्राम फैट की ज़रूरत के मद्देनज़र 2025 के बाज़ार भाव से इस ज़रूरत तथा कपड़े की न्यूनतम ज़रूरत की ख़रीदी के लिए कम से कम 23,196/ मासिक न्यूनतम वेतन घोषित किया था, जिसका ऐलान 29 दिसंबर 2025 को चंडीगढ़ में धूमधाम से हुआ था. पत्रकारों ने भी तालियां बजाई थीं. मोदी सरकार में जैसा दस्तूर बन गया है, यह रिपोर्ट और उसकी सिफ़ारिशें ठंडे बस्ते में चली गईं. सरकार ने अपना वादा पूरा किया होता, अपनी बनाई कमेटी की सिफ़ारिशें मानी होतीं तो एक भी मज़दूर सड़क पर नज़र ना आता. अभी भी देर नहीं हुई है, सरकार को तुरंत कमेटी की सिफारिशें मानकर न्यूनतम वेतन रु 23,196/ घोषित कर देना चाहिए.

मज़दूरों के संबंध में बनने वाली तथा पहले से मौजूद सरकारी कमेटियों की सार्थकता का मूल्यांकन भी मज़दूर वर्गीय नज़रिए से होना ज़रूरी हो गया है. न्यूनतम वेतन पुनर्निर्धारण का दबाव बनता देख, हरियाणा सरकार ने 2025 के शुरू में संयुक्त श्रम आयुक्त परमजीत सिंह ढल के नेतृत्व में 13 सदस्यीय कमेटी गठित की थी, जिनमें 5 प्रतिनिधि पूंजीपतियों के, 2 तकनीकी विशेज्ञ जो मोदी काल में सरकारी चाटुकार ही होते हैं और 5 प्रतिनिधि मज़दूरों के (बीएमएस, सीटू, एटक) भी थे. साल भर माथापच्ची कर 29 दिसंबर को विधिवत ऐलान हुआ, हरियाणा में न्यूनतम वेतन 23,196/ दिया जाएगा. उसके बाद कुछ नहीं हुआ और 23 फ़रवरी को पानीपत में मज़दूरों प्रचंड आक्रोश ना फूटा होता, तो उस रिपोर्ट का पता भी मज़दूरों को ना चलता. मज़दूर कल्याण बोर्ड, पीएफ़ और ईएसआईसी के प्रशासनिक बोर्ड में भी मज़दूरों के प्रतिनिधि बैठते हैं, जो इन विभागों के फ़ैसलों पर दस्तखत कर, एक तरह से, सरकार द्वारा मज़दूरों के साथ की जा रही ठगी, झांसेबाज़ी को वैधता प्रदान करने का काम ही करते हैं. घोर फ़ासीवादी भाजपा के एजेंडे को समझते हुए, जिसमें किसी भी कमेटी की आज कोई मर्यादा नहीं रही, एक मात्र सड़क पर उतरकर ही मज़दूरों की लड़ाई लड़ी जा सकती है. यह बात समझ आ जाने के बाद भी मज़दूरों के ये प्रतिनिधि इन कमेटियों में क्यों बने हुए हैं?

मज़दूरों के जीवन को नर्क और कार्य के वातावरण को दमघोटू बनाने में सरकार की सबसे प्रिय नीति, ‘व्यवसाय की सुगमता’ का बहुत बड़ा हाथ है. सरकार ने एक तरह से कारखानेदारों को मज़दूरों का खून चूसने की खुली छूट ही दे दी थी. कहीं भी श्रम क़ानून लागू नहीं थे. कितने ही मालिक तो मज़दूरों के वेतन से होने वाली पीएफ़ और ईएसआईसी की कटौती भी खा जाते थे. श्रम विभाग को, सरकारी निर्देश थे, मालिक जो करें, करने दो, तुम बीच में मत आओ. मज़दूरों को हर रोज़ ज़लील किया जाता था; ‘इतना ही मिलेगा, करना है तो कर, नहीं तो भाग, तेरे जैसे बहुत आते हैं’!! ‘मास्टरमाइंड कौन हुआ?

बरौनी, पानीपत रिफाइनरी में मज़दूरों ने हड़ताल का बिगुल क्यों फूंका? इस बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न पर, 24 मार्च 2026 को प्रकाशित अनुमेहा यादव की शानदार रिपोर्ट, “The anatomy of a protest: Why workers across refineries in India are striking work?” ज़रूर पढ़ी जानी चाहिए. ‘इंडियन आयल कंपनी लिमिटेड’ के बड़े बोर्ड की आड़ में इन रिफाइनरी में बहुत दिनों से 12 घंटे की शिफ्ट लागू कर दी गई थी और ठेकेदार, मज़दूरों को कब वेतन देते हैं, कितना देते हैं, देते भी हैं या नहीं, इस बात से रिफाइनरी प्रबंधन ने पल्ला झाड़ लिया था. 12 घंटे की शिफ्ट में बस एक छोटा सा ब्रेक होता था, जिसमें मज़दूर जल्दी-जल्दी भोजन के नाम पर चाय/ पार्ले जी से काम चलाते थे. कितने ही मज़दूर भूखे पेट काम करने को मज़बूर थे. यहां अक्सर होने वाली दुर्घटनाओं को भी दबाया जाता था. 23 फरवरी को 11 बजे पानीपत रिफाइनरी में हुई भयानक दुर्घटना ने मज़दूरों के क्रोध में चिंगारी लगाने का काम किया. गुस्से में तमतमाए हज़ारों मज़दूर काम छोड़कर गेट न 4 की ओर बढ़े, जहां पहुंचते ही CISF के सुरक्षा गार्डों ने उन पर डंडे बरसाने शुरू कर दी. रौला सुनकर जो मज़दूर काम कर रहे थे, वे भी बाहर आ गए. 35-40 हज़ार मज़दूरों की भयंकर आक्रोशित फौज देखकर उन वर्दीधारी गार्ड के हाथ-पांव फूल गए. बाक़ी कहानी तो इतिहास बन चुकी है. पूरे 5 दिन मज़दूर एक इंच पीछे नहीं हटे. हड़ताल के अगले दिन ही बोर्ड पर नोटिस लग गया था, ‘7 तारीख तक वेतन भुगतान, महीने में 26 दिन काम और दुर्घटना होने पर समुचित ईलाज सुनिश्चित किया जाएगा’.

बहुत ज़िल्लत झेली है, मज़दूरों ने. जब तक उन्होंने इकट्ठे होकर, मुट्ठी भींचकर हुंकार नहीं भरी, उन्हें इंसान ही नहीं समझा गया. इन आंदोलनों का ‘मास्टरमाइंड’ कौन हुआ? जिन मज़दूर कार्यकर्ताओं को ‘मास्टरमाइंड’ बताकर क्रूर यातनाएं दी गईं, जेलों में डाल दिया गया, वे सब बेक़सूर हैं, उनसे राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई ख़तरा नहीं है. उन्हें तत्काल रिहा किया जाए. ये सभी गिरफ्तारियां राजनीतिक हैं. इसीलिए उनकी रिहाई के लिए देश भर में संयुक्त प्रतिरोध आंदोलन चलाए जाने ज़रूरी हैं.

फ़रीदाबाद की कई कंपनियों से मज़दूर बता रहे हैं कि मालिकों ने, आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाले मज़दूरों की लिस्ट बना ली है. तथा उन्हें एक साथ, एक झटके में नहीं बल्कि कोई ना कोई बहाना ढूंढ़कर काम से निकाला जा रहा है. मालिकों की यह हिमाक़त बहुत अन्यायपूर्ण है, जो निश्चित रूप से आक्रोश में तब्दील होगी. सरकार को श्रम विभाग को सख्त निर्देश देने चाहिएं कि इस अन्याय के विरुद्ध वे सख्त कार्यवाही करें.

2. आंदोलन स्वत:स्फूर्त हैं, लेकिन स्वत:स्फूर्तता इतनी संगठित और अनुशासित कभी नहीं देखी गई

मज़दूर आक्रोश की यह प्रचंड लहर, निसंदेह, स्वत:स्फूर्त है, लेकिन ऐसी संगठित और अनुशासित स्वत:स्फूर्तता अभी तक कभी नहीं देखी गई. कई मायने में यह आंदोलन संगठित से भी ज्यादा संगठित है. संगठित क्षेत्रों में होने वाली योजनाबद्ध हड़तालों में भी मज़दूरों की उपस्थिति 100% कभी नहीं रहती, लेकिन 2 फ़रवरी को इंडियन आयल रिफाइनरी बरौनी ज़िला बेगुसराय से उठी मौजूदा लहर में, जो आज उत्तर भारत के सभी औद्योगिक क्षेत्रों में फ़ैल गई है, 100% ठेका मज़दूरों ने भाग लिया है. एक भी मज़दूर काम पर नहीं रहा, काम पूरी तरह ठप्प रहा. इसीलिए हर जगह मज़दूरों की जीत हुई. क़ामयाब हड़ताल का यही पैमाना है. बहुत दिन बाद, मालिकों को असली आंच पहुंची. एसी में भी उन्हें पसीने छूट गए, कुर्सी पर बैठना मुश्किल हो गया. हाथ-पैर फूलना किसे कहते हैं, हड़ताल के पहले एक घंटे में ही समझ आ गया. कुल वर्क फ़ोर्स के महज़ 10-15% पक्के मज़दूर, जिन्होंने अपने वर्गीय साथी, ठेका मज़दूरों का साथ नहीं दिया, कारख़ानों में कुछ भी करने की स्थिति में नहीं थे.

स्वत:स्फूर्त आंदोलनों में पाई जाने वाली अराजकता, रास्ता रोक देना, हिंसा कहीं नज़र नहीं आई. सभी आंदोलन अनुशासित और शांतिपूर्ण रहे हैं. मज़दूर जानते हैं कि मालिक को पुलिस बुलाने के लिए श्रम विभाग या दूसरे सरकारी महकमे, अदालत से आदेश लेने की ज़रूरत आजकल नहीं रहती. मालिक के फ़ोन करते ही नज़दीक के थाने का पुलिस अमला बिना वक़्त गंवाए कारख़ाने में हाज़िर हो जाता है और तुरंत मज़दूरों पर डंडे बरसाने की मुद्रा में आ जाता है. पानीपत रिफाइनरी में मज़दूर सबसे ज्यादा आक्रोशित और उद्वेलित थे, क्योंकि वहां मज़दूरों के जीवन-मरण की मांगों के अलावा, 2 निर्माण मज़दूर निर्माणाधीन बिल्डिंग से गिरकर मर गए थे, वहां तादाद भी विशाल थी, लगभग 35,000, लेकिन उन्होंने रिफाइनरी के किसी भी अधिकारी पर ना हमला किया और ना ही सड़क जाम की जो वे आसानी से कर सकते थे. मज़दूर जानते थे कि शांतिपूर्ण और अनुशासित आंदोलन ही उन्हें जीत दिला सकते हैं.

3. स्वत:स्फूर्त नेतृत्व का उभरना सुखद है लेकिन पर्याप्त नहीं

स्वत:स्फूर्त ज़रूर है, लेकिन आक्रोश आंदोलन, नेतृत्व विहीन नहीं है. 9 अप्रैल को फ़रीदाबाद की कंपनी ‘भारत गियर लि’ में हड़ताल की ख़बर मिलते ही हम कंपनी पहुंचे तो देखा, मज़दूर काम छोड़कर बाहर सड़क और रेलवे लाइन के बीच खाली जगह में पार्क में मौजूद थे. हमें लगा वहां अराजक माहौल होगा क्योंकि मज़दूर आक्रोशित तो भयंकर हैं लेकिन संगठित नहीं हैं. वैसा लेकिन बिलकुल नहीं था. रोड या रेल पटरी पर कोई अवरोध पैदा नहीं किया गया था. जैसे ही हमने बात करनी शुरू की तो वे हमें अपने साथियों के पास ले गए और बोले, ‘इनसे बात कीजिए, हमरी ओर से ये बात करेंगे’. ‘आप इस हड़ताल के लीडर हैं, आपसे बात करना चाहते हैं?’ जवाब आया, लीडर-वीडर तो नहीं हैं, लेकिन इन लोगों ने बना दिया, ये कहते हैं, इसलिए लीडरी करनी पड़ रही है!!’ लीडर ऊपर से नहीं थोपे गए थे, मज़दूरों में से उभर कर आए थे. जिस तरह उन्होंने (नाम नहीं दे रहे, हालाँकि उन्होंने मना नहीं किया) हमें उनकी तक़लीफें सिलसिलेवार बताईं , उससे समझ आ गया, मज़दूरों ने सही नेता चुने हैं. उन नेताओं को मालिक और कारखाने की स्थिति की अच्छी जानकारी थी. वे खुछ भी, अगड़म-बगड़म नहीं बोल रहे थे. आंदोलन की वज़ह बहुत सिलसिलेवार ढंग से समझा रहे थे. बिलकुल आश्वस्त थे, जब तक हम नहीं चाहेंगे, कारखाने की मशीनें नहीं घूमेंगी. बिना मांगें मनवाए हम अंदर नहीं जाने वाले. बहुत हो गया, अब और सहन नहीं होगा. ‘उनसे डबल-ट्रिपल काम करते हैं और हमें मिलते हैं 11,000/ जबकि वे उठाते हैं 80,000/’, पक्के मज़दूरों की ओर इशारा करके यह कहते हुए, उनके चेहरे तमतमा रहे थे. पक्के साथियों के बारे में वे इसलिए भी बहुत खफ़ा थे क्योंकि वे भी नहीं चाहते थे कि ठेका मज़दूर, कैंटीन में उनके साथ बैठकर खाना खाएं. मालिक ने पक्के मज़दूरों को उन ठेका मज़दूरों की हड़ताल तोड़ने के काम में लगाया हुआ था.

मज़दूरों ने अपने बीच में से अपने नेता चुन लिए थे. दूसरी नोट करने वाली बात यह समझ आई कि उन्हें नेताओं की ज़रूरत भी नहीं थी. वे, दरअसल, नेता नहीं, प्रचारक ढूंढ रहे थे, जो उनकी बात को सोशल मीडिया के माध्यम से फैला सकें. उन्हें ज्ञान ग्रहण करने की बिलकुल भूख नहीं थी. ट्रेड यूनियनों. हम लोग किस संगठन से हैं, यह जानने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी. वे यह फैसला कर चुके नज़र आ रहे थे कि उनकी लड़ाई उन्हें स्वयं ही लड़नी है. कोई दूसरा उनकी लड़ाई नहीं लड़ने वाला. सभी क्रांतिकारी मज़दूर संगठन भी ‘कोई दूसरे’ में ही शामिल हैं. यह समझ राजनीतिक समझदारी की कमी से बनी है.

4. मज़दूर संगठनों की आपसी प्रतिस्पर्धा मज़दूरों को बिलकुल पसंद नहीं

क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा से हम दो लोग 9 अप्रैल को ‘भारत गियर लिमिटेड’ में सुबह 10 बजे पहुँच गए थे. मज़दूरों ने बहुत उत्साह से सारी बात बताई और सुबह 9 बजे लेबर ऑफिस के पास सेंट्रल पार्क में मीटिंग करने और फिर मोर्चे के साथ उप-श्रमायुक्त को ज्ञापन देने लेबर ऑफिस चलने की बात पक्की हो गई थी. हम वहां से निकल ही रहे थे कि दूसरे मज़दूर संगठन के कार्यकर्ता वहां पहुँच गए, उन्होंने भी उनसे वही बातें कीं. साथ ही, मज़दूरों का ज्ञानवर्धन करते हुए कहा कि वे पहले वाले संगठन, मतलब ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ से कहीं ज्यादा क्रांतिकारी हैं, मज़दूरों को नेतृत्व प्रदान करने में उनसे कहीं ज्यादा सक्षम हैं. वे जब वहां से निकल रहे थे, तब एक तीसरे मज़दूर संगठन के कार्यकर्ता भी वहीं पहुँच गए. उन्होंने भी उन मज़दूरों से बिलकुल वही बातें कीं. वे भी मज़दूरों के बिना मांगे, उन्हें यह ज्ञान देने से नहीं चूके कि वे पहले दोनों संगठनों से कहीं ज्यादा बड़े क्रांतिकारी हैं, उनके झंडे का रंग ज्यादा लाल है जो कि उनके आंदोलन की क़ामयाबी के लिए ज़रूरी है!! इतना ही नहीं, दूसरे नंबर वाले संगठन को पहले नंबर वाले, यानी क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा के अगले दिन 10 अप्रैल को सेंट्रल पार्क वाली मीटिंग और लेबर ऑफिस के ज्ञापन वाले कार्यक्रम का भी पता चल गया था, इसलिए अगले दिन सुबह 8 बजे ही उनके दो कार्यकर्ता फैक्ट्री पहुँच गए और दिन भर वहीं डटे रहे जिससे मज़दूर उस मीटिंग और मोर्चे में ना जाने पाएं!! मोर्चा और मीटिंग का तय कार्यक्रम नहीं हुआ, दूसरा संगठन इसे अपनी बड़ी उपलब्धि मानकर खुश है, चलो वह कार्यक्रम तो नहीं ही होने दिया!!

मज़दूर संगठनों के बीच यह संकीर्णता और खींचतान मज़दूरों को संगठनों से दूर कर रही है. संगठनों के बीच क्रांतिकारिता का कोई अंतर मज़दूर नोट नहीं कर पा रहे. 10 अप्रैल का कार्यक्रम रद्द होने के बाद उन मज़दूर नेताओं से बातचीत में समझ आया कि संगठनों के बीच मौजूद यह प्रतिस्पर्धा उन्हें संगठित होने से रोक रही है. वे इसे इस तरह लेते हैं कि मज़दूर संगठनों के ये कार्यकर्ता हम मज़दूरों के लिए नहीं, बल्कि अपनी दुकान चमकाने के लिए आते हैं क्योंकि ऐसी कोई विधि नहीं है जिससे मज़दूर हमारी क्रांतिकारिता नाप सकें, खासतौर पर तब जब हमने वहां कोई सांगठनिक काम पहले किया ही नहीं, उन मज़दूरों से यह हमारी पहली मुलाक़ात है. इस विषय पर हमें गंभीर आत्मालोचना करने और ज़िला स्तर पर मोर्चे बनाने की ज़रूरत है.

5. दमन चक्र की भयावहता: ‘राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून’, ‘हत्या का प्रयास’ और ‘गुंडा एक्ट’ जैसे आरोप तो मज़दूरों पर अंग्रेज़ों ने भी नहीं लगाए

Image

हरियाणा, यू पी, उत्तराखंड, पंजाब और अन्यत्र कुल कितने मज़दूर और मज़दूर कार्यकर्ता हिरासत में लिए गए, कितने गिरफ्तार हुए, कितने जेलों में डाले गए यह आंकड़ा पता करना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि पुलिस ने गिरफ़्तारी के वक़्त की जाने वाली ज़रूरी क़ानूनी ज़िम्मेदारी निभाने की ज़हमत भी नहीं उठाई. क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन 50 के अनुसार, कैसे भी जघन्य, खूंख्वार अपराधी को गिरफ्तार करते वक़्त, पुलिस को आरोपी के परिवार को बताना होता है कि वे गिरफ्तार कर रहे हैं और उसे अमुक अदालत में पेश किया जाएगा. इसे ‘सूचित किए जाने का अधिकार’ कहा जाता है, जो भारतीय न्याय संहिता में भी मौजूद है. गिरफ़्तारी के वक़्त पुलिस को उसे अपनी डायरी में नोट करना होता है और उस डायरी को वेरीफाई करना अदालत की ज़िम्मेदारी है. मज़दूर आंदोलन के दौरान हुई गिरफ्तारियों में ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्या अपनी मेहनत के उचित दाम मांगना, इंसान जैसा व्यवहार किए जाने की मांग करना इतना बड़ा अपराध है? नोएडा में जाने कितने परिवार हैं जिनके कमाने वाले इकलौते मज़दूर को पुलिस उठा ले गई और वे एक थाने से दूसरे थाने भटकते रहे. ई रिक्शा चलाने वालों, फल सब्जी बेचकर किसी तरह पेट पालने वालों को उठा लिया गया, मानो वे सब आतंकी हों.

‘बेल्सोनिका मज़दूर यूनियन’ के महासचिव अजीत सिंह को ज़मानत देते वक़्त अदालत की टिप्पणी पर गौर किया जाए; ‘अभी तो ली अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है’, ‘इंक़लाब जिंदाबाद’ नारे लगाना अगर अपराध है, तो हमें शर्म आनी चाहिए’. ‘गिरफ्तार किए गए सभी लोग बाहरी हैं’, पुलिस के इस आरोप का क्या मतलब है? मैं यूपी से आकर फ़रीदाबाद बस गया. मेरे पड़ौसी पर ज़ुल्म हो तो मुझे ख़ामोश रहना चाहिए, क्योंकि मैं बाहरी हूं? पुलिस का यह कहना, अनैतिक और गैरजिम्मेदाराना तो है ही, संविधान का भी घोर अपमान है. सरकार घोषित क्यों नहीं कर देती, अब यह देश संविधान से नहीं चलेगा, पुलिस जो कहे, वही क़ानून है? पूरे का पूरा निज़ाम ही अगर कारखानेदारों, अमीरों, सूदखोरों के साथ खड़ा हो जाए, तो क्या कोई भी मज़दूरों का दर्द ना बांटे?

मानेसर और गुड़गांव में जो आगजनी हुई है, वह किसने की, यह जानना बहुत ज़रूरी है लेकिन सरकार की ओर से किसी जांच का ऐलान अभी तक नहीं हुआ और उसके लिए मज़दूरों को ज़िम्मेदार ठहराकर ‘मास्टरमाइंड’ घोषित कर दिया गया. उन पर हत्या के प्रयास और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून’ जैसी अत्यंत गंभीर दमनकारी धाराएं लगा दी गईं. वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा, नोएडा से 512 किमी दूर लखनऊ में थे. उन्होंने रिमोट से नोएडा में राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा पैदा कर दिया!! गिरफ्तार मज़दूर कार्यकर्ताओं के वकीलों माणिक गुप्ता एवं पूजा शर्मा ने माननीय सुप्रीम कोर्ट को बताया कि जलती कार का स्क्रीन शॉट तथा एक वोइस मेसेज जो व्हात्सेप ग्रुप में पाए गए, वे डीसीपी के ड्राईवर अनिल कुमार द्वारा डाले गए थे. साथ ही यह भी बताया कि ‘रिचा ग्लोबल नोएडा’ के व्हाट्सेप ग्रुप में अनधिकृत रूप से प्रवेश कर पोस्ट डालने वाले दो शख्श सेक्टर 142 थाने में तैनात सब इंस्पेक्टर बीना और अनिल कुमार हैं. इन व्यक्तियों की संलिप्तता का रायता फ़ैल जाने के बाद पुलिस ने अनिल कुमार को गिरफ्तार भी कर लिया है लेकिन कहा है कि वह पुलिस की गाड़ी में ड्राईवर नहीं था, लेकिन एसआई बीना को ‘अंडर कवर पुलिस एजेंट’ बताकर उन्हें बेक़सूर बताया है.

यह सारी दर्दनाक दास्तां विधिवत माननीय सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है. आगजनी की यह पूरी कहानी इतनी षडयंत्रपूर्ण और रहस्यपूर्ण हो गई है कि न्यायिक जांच के बाद ही ‘दूध का दूध पानी का पानी’ हो पाएगा. हमें विश्वास है कि ‘गुंडा एक्ट’, ‘हत्या का प्रयास’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून’ जैसे दमनकारी क़ानूनों के तहत पुलिस यातना झेल रहे, जेलों में पड़े, ज़मानत को तरस रहे मज़दूर और मज़दूर कार्यकर्ता बेक़सूर पाए जाएंगे. अफ़सोस के साथ कहना है कि सरकार ने अभी तक इन घटनाओं की जांच के आदेश नहीं दिए हैं. मानेसर में तो बाउंसरों को नियुक्त करना, उनसे मज़दूरों, मज़दूर कार्यकर्ताओं को पिटवाना हर बड़ी कंपनी में हर रोज़ देखा जा सकता है. यह बहुत ही ख़तरनाक ‘खेल’ है. सरकार ने इस गैरकानूनी प्रैक्टिस को सख्ती से ना रोका तो कभी भी स्थिति विस्फोटक बन सकती है. बाउंसरों की नियुक्ति के बारे में श्रम विभाग को सरकार का नज़रिया स्पष्ट करना चाहिए, क़ानून बनाना चाहिए. सरकार अगर समझती है कि औद्योगिक विवाद को आपराधिक विवाद बनाकर, अपने जीवन-मरण की लड़ाई लड़ रहे मज़दूरों को आतंकित कर, उन्हें संघर्ष के रास्ते से हटाया जा सकता है, शोषण की चक्की में मज़दूर इसी तरह शांतिपूर्वक पिसते जाएंगे, मरते जाएंगे, तो हमरी विनम्र सलाह है, उसे इतिहास पढ़ना चाहिए.

6. जाति-धर्म में बंटने से इंकार

फ़रीदाबाद में, ‘शिवालिक प्रिंट्स लिमिटेड’, रेडीमेड कपड़े बनाने का बड़ा ग्रुप है जिनकी कई कंपनियां हैं, कई हज़ार मज़दूर काम करते हैं. यहां अधिकतर काम पीस रेट पर होता है. पीस रेट वाले मज़दूरों को संगठित करना मासिक वेतन पर काम करने वाले मज़दूरों से कहीं कठिन है क्योंकि उन्हें तो मालिक और ठेकेदार कई बार पार्टनर बताकर झांसा देते हैं. मज़दूर आंदोलन की मौजूदा लहर में इस ग्रुप की कंपनियों में भी शानदार हड़ताल हुई. एक सप्ताह से भी ज्यादा दिन काम पूरी तरह ठप्प रहा. मज़दूरों की मांग एकदम स्पष्ट थी ‘हरियाणा सरकार ने न्यूनतम वेतन 35% बढ़ाया है, पीस रेट भी उतना ही बढ़ना चाहिए.’ मालिक ने पुलिस बुला ली और मज़दूर कार्यकर्ताओं और यू ट्यूबर को बाहर खदेड़ दिया गया, लेकिन उससे मज़दूरों के तेवर पर रत्ती भर भी फ़र्क नहीं पड़ा. सारे मज़दूरों ने अनौपचारिक रूप से ‘खान बाबा’ को अपना नेता चुन लिया. जो भी बात हुई उन्हीं के नेतृत्व वाली टीम ने की. उप श्रमायुक्त भी कंपनी आ गए. पीस रेट वाले मज़दूर अपने रेट पूरे 35% तो नहीं बढ़वा पाए लेकिन फिलहाल 22% बढ़ाने, पेमेंट महीने की पहली-दूसरी तारीख को करने का लिखित क़रार होने और रेट को आगे फिर से रिवाइज करने के आश्वासन के बाद ही इन कारीगरों ने अपनी सिलाई मशीनों को हाथ लगाया.

इस संघर्ष में यह भी उजागर हुआ कि कई ठेकेदार तो पीस रेट है क्या, यह भी नहीं बताते थे!! ठेकेदारों ने मज़दूरों को ‘खान बाबा’ का धर्म बताने की कोशिश भी की लेकिन मज़दूरों ने उन्हें दौड़ा लिया; ‘रेट की बात करो, ख़बरदार अगर हिंदू-मुस्लिम करने की जुर्रत की तो!’ ठेकेदारों, मेनेजरों को मज़दूरों ने यह भी सिखाया कि महिलाओं से बात कैसे की जाती है. क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा की नेतृत्वकारी टीम के दो सदस्य इसी कंपनी में सिलाई कारीगर हैं, वे भी खान बाबा के साथ मालिकों-ठेकेदारों से वार्तालाप में पूरी तरह सक्रिय रहे. मौजूदा लहर की एक ख़ासियत रेखांकित होनी चाहिए, पुलिस और ठेकेदारों द्वारा धमकाए जाने के बावजूद, किसी भी जगह मज़दूर खाली हाथ काम पर नहीं लौटे, अपनी मांगें मनवाकर ही बा-इज्ज़त ही अंदर गए. ‘मज़हबी ज़हालत फैलाकर मज़दूरों को हिंदू-मुस्लिम में बांटेंगे और फिर वे भूल जाएँगे, घर चूल्हा जल रहा है या उनके बच्चे भूखे सो रहे हैं’, भाजपा – संघ परिवार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को मज़दूरों ने जड़ से उखाड़ फेंका है.

7. श्रम विभाग अपनी ज़िम्मेदारी पूरी क्यों नहीं कर रहा?

1 अप्रैल से लागू नए घोषित न्यूनतम वेतन का उद्योगपतियों की यूनियनों ने विरोध किया था. उप श्रमायुक्त फ़रीदाबाद ने मीटिंग बुलाकर उद्योगपतियों से नए वेतन का भुगतान सुनिश्चित करने को भी कहा था, साथ ही कहा था कि वे कंपनी के नोटिस बोर्ड पर बढे हुए नए वेतन लिखें और यह भी लिखें कि हमारी कंपनी में अकुशल, अर्द्धकुशल, कुशल एवं उच्च कुशल के लिए घोषित न्यूनतम वेतन क्रमश: 15,220.71, 16,780.74, 18,500.81 तथा 19,425.85 दिया जा रहा है. लेकिन उसके बाद से अनेक कारखानों से रिपोर्ट आईं कि नोटिस बोर्ड पर यह सूचना लिखी गई, उसकी फोटो डीएलसी को भेजी गई और उस सूचना को मिटा दिया गया. 1 अप्रैल से लागू वेतनमान मिले या नहीं, इसका पता मई के पहले सप्ताह में हुए वेतन भुगतान पर चला. 10 मई तक हर रोज़ अनेक कंपनियों के गेट पर पहले जैसे ही प्रदर्शन नज़र आए. मज़दूरों की शिकायतें थीं कि जिस कुशल मज़दूर को पहले न्यूनतम वेतन से ज्यादा मिल रहा था, उसे अकुशल बताकर बढ़ा हुआ वेतन दे दिया गया, जो लगभग उतना ही आया जितना पहले आता था. पीस रेट से भुगतान करने वाले कितने ही ठेकेदारों ने रेट बढ़ाने को बोला लेकिन बढ़ाया ही नहीं, ‘हमें मालिक ने पहले वाला रेट ही दिया है, हम क्या करें?’.

वेतन कोड 2019 के अनुसार भी, घोषित न्यूनतम वेतन निर्देशों का अनुपालन ना करने वाले कारखाना मालिकों पर; पहली ग़लती पर रु 50,000/, उस ग़लती को बार-बार करने पर 1,00,000/ जुर्माने और 3 महीने की सज़ा का प्रावधान है. साथ ही पीड़ित मज़दूर को जितनी रक़म कम मिली है, उसकी 10 गुना भरपाई पाने का ‘वेतन एक्ट 1936’ वाला अधिकार वेतन कोड में उसी तरह उपलब्ध है, लेकिन एक भी उद्योगपति से लेबर विभाग ने पूछा हो, उसके ख़िलाफ़ सख्ती की हो, दंडित किया हो, ऐसा पढ़ने में नहीं आया. सरकार द्वारा मज़दूरों के हक़ में बनाए गए किसी भी क़ानून का अनुपालन ना होने पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं होती? क्या सरकार और उसका लेबर विभाग नहीं जानता कि एक उद्योगपति पर कार्यवाही होते देख, बाक़ी भी उस रास्ते जाने से डरते हैं और उद्योगपति कुछ भी करे, कोई कार्यवाही नहीं होगी, ऐसा दस्तूर पता चलने पर दूसरे भी वैसा ही करने लगते हैं और श्रम क़ानून मज़ाक बनकर रह जाता है? इस तरह, क्या फिर से पहले जैसे आक्रोश प्रदर्शनों की ज़मीन तैयार नहीं हो रही?

8. मज़दूरों ने हड़तालों की ताक़त पूरे देश को याद करा दी

Image

‘आप लोग मज़दूर, मज़दूर करते हैं, कहाँ हैं मज़दूर?’ ‘देखा, किसानों ने सरकार को झुका दिया, मज़दूर कुछ नहीं कर सकते!!’ ‘नई साइबर तकनीक, एआई ने मज़दूरों की लड़ने की ताक़त छीन ली!’ ‘अपना वेतन नहीं बढ़ावा सकते, ये मज़दूर क्या क्रांति करेंगे, सब भूल जाइए!’ 23 फ़रवरी को पानीपत रिफाइनरी में पीले हेलमेट वाली वह विशाल नदी ने जानकारी के आभाव में ऐसे कमेंट करने वालों की आंखें खोल दी हैं. गुस्से में तमतमाए 35,000 आक्रोशित मज़दूरों का वह प्रचंड तूफ़ान, गोर्की के शब्दों में ‘दूर-दूर तक नरमुंड ही नरमुंड!!’ मज़दूरों पर हर वक़्त लठैतों की तरह रौब गांठने वाले काली-नीली और ख़ाकी वर्दीधारी सुरक्षाकर्मी, मेनेजर, महाप्रबंधक कैसे निरीह नज़र आ रहे थे!! मज़दूर हड़तालों की भनक मिलते ही सत्ताधारी वर्ग का हलक क्यों सूख जाता है? क्योंकि मज़दूरों के पसीने से ही पूंजी के पहाड़ खड़े होते हैं. इतना ही नहीं, ज़रा सी राजनीतिक चेतना का संचार होते ही, असेंबली लाइन में खड़े या पीले हेलमेट पहने ऊँची इमारतों पर, मृत्यु को ललकार कर काम करते मज़दूरों को अजेय सेना में तब्दील होने में वक़्त नहीं लगता. उनका काम उन्हें अनुशासित

सेना में बदल डालता है. चंडीगढ़ और लखनऊ में बैठे जिन हुक्मरानों को 11 साल से जो समझ नहीं आ रहा था, दो मिनट में समझ आ गया; ‘न्यूनतम वेतन बढ़ना चाहिए!’

मज़दूरों की ताक़त का यह जलवा तो तब है, जब वे संगठित नहीं हैं. हड़तालों को योजनाबद्ध ढंग से, देश भर में दूसरे मज़दूरों से तालमेल बिठाते हुए, क्रमबद्ध ढंग से नहीं चला रहे. 8 घंटे की शिफ्ट, ओवरटाइम का डबल रेट से भुगतान, साप्ताहिक अवकाश, पीने के लिए इंसानों जैसा पानी, शौच की व्यवस्था और दुर्घटना होने पर ईलाज से आगे नहीं सोच पा रहे. वे क्या कर सकते हैं, अपनी ताक़त का अहसास उन्हें ख़ुद नहीं है. मज़दूर आक्रोश की इस मौजूदा गौरवशाली लहर ने लेकिन भयानक गर्मी के इस सीजन में मौसम को और गरमा दिया है. लाल झंडों की धूल झड़ चुकी है. मज़दूरों की ललकार धीमी पड़ सकती है, लेकिन अब थमने के आसार नज़र नहीं आ रहे. शोषण-उत्पीड़न-ज़िल्लत की इंतेहा हो चुकी. मज़दूरों की पीठ दीवार से सट चुकी है, पीछे हटाने की गुंजाईश ही नहीं छोड़ी. उन्हें जो भी चाहिए, संघर्ष से ही मिलेगा, यह सीख उन्हें प्रेरित करती रहेगी. परिस्थितियां वही इशारा कर रही हैं. मज़दूर, समाज के ज्यादा से ज्यादा हिस्से का विश्वास जीतते जा रहे हैं. 24 मई को ‘मासा’ द्वारा आयोजित मज़दूर कन्वेंशन में जोगिंदर उगराहां जैसे बड़े और प्रतिष्ठित किसान नेता की जोशपूर्ण मौजूदगी और राजेंद्र भवन में तिल रखने की जगह का भी ना होना बहुत मायने रखते हैं.

9. स्मार्ट फोन की स्मार्टनेस इस आंदोलन में समझ आई!

हर जेब में स्मार्ट फोन होने से आजकल हर कोई हर वक़्त ऑनलाइन है. इस उपकरण ने मज़दूरों को जागरुक करने, संगठित करने और संघर्ष के लिए उठ खड़े होने और नेतृत्व करने में बहुत ही अहम भूमिका निभाई है. 3 फ़रवरी को बेगुसराय ज़िले की बरौनी रिफाइनरी में मज़दूर आक्रोश और प्रबंधन/ ठेकेदारों द्वारा उसके दमन के विडियो उसी वक़्त पानीपत पहुँचने लगे थे. आक्रोश धधकने लगा था और वह ज्वालामुखी 23 फरवरी को फूट पड़ा. ए आई द्वारा उपलब्ध कराए, ‘accessed mobile footage data’ के अनुसार 23 फरवरी को इंडियन आयल पानीपत रिफाइनरी की हड़ताल को आर्सेलर-मित्तल निप्पन स्टील, सूरत गुजरात के 5000 मज़दूर लाइव देख रहे थे. साथ-साथ हड़ताल की योजना भी बन रही थी. 27 फ़रवरी को सूरत में भी वही संगीत शुरू हो गया. सूरत पुलिस की डीसीपी शेफ़ाली बरवाल ने स्वीकार किया है, ‘ये मज़दूर पानीपत के विडियो देखकर ही भड़के हैं’. स्मार्ट फोन का ही कमाल है कि 23 की शाम को ही एक मज़दूर ने रूस के एक शहर से विडियो डाला था, “मुझे तो मज़दूरी की तलाश यहां खींच लाई है, लेकिन जाना तो आखिर वहीं इंडिया में ही है. आप सभी से अपील है, पानीपत के हड़ताली मज़दूरों का साथ दीजिए. वे हमारे साथी हैं. जिंदा रहने की लड़ाई लड़ रहे हैं.”

10. मज़दूरों में क्रांतिकारी वर्गीय चेतना भी ज़रूर आएगी

Image

जीवन भर लेबर कैंप और गंदी संकरी बस्तियों में अमानवीय जीवन जीने को मज़बूर, निर्माता और उत्पादनकर्ता मज़दूर

कितनी भी अनुशासित हों, कितनी भी संगठित नज़र आएं, स्वत:स्फूर्त हड़तालों की आख़री मंज़िल चंद आर्थिक मांगें मनवाने से आगे नहीं हो सकती. कमेरों की मौजूदा प्रचंड लहर ने बहुत महत्वपूर्ण आर्थिक लड़ाई जीती है. जीवन-मरण की लड़ाई में उससे कुछ राहत ज़रूर मिलेगी, इसमें कोई शक़ नहीं. इसके लिए सभी बहादुर मज़दूर साथी दिली मुबारकबाद, क्रांतिकारी लाल सलाम के हक़दार हैं. लेकिन उसके साथ ही, मज़दूरों को इससे आगे बहुत दूर तक देखने की ज़रूरत है. उन्हें जो तजुर्बा हुआ है उसका विश्लेषण करने की ज़रूरत है. उनके असेंबली लाइन से हटते ही, उनके शरीर की धड़कन की तरह गड़-गड़ाने वाली बड़ी-बड़ी, करोड़ों रु की आधुनिक मशीनें कैसे धातु का निर्जीव ढेर नज़र आती हैं? चलती मशीन के वक़्त उनकी चीख़ पुकार को नज़रंदाज़ करने वाले मालिक और उनके इर्द-गिर्द मंडराने वाले उनके चमचे, मशीन बंद होते ही कैसे हांफने लगते हैं? हड़ताल शुरू होते ही, मालिकों, सरकारों का बोलने का लहज़ा इतना नरम कैसे हो जाता है? उनके कहने से मज़दूर तुरंत काम पर ना लौटें तो उनकी और सरकार की आंखों में खून क्यों उतर आता है? मज़दूरों के लिए ही क्यों ‘न्यूनतम वेतन’, ‘जिंदा रहने लायक़ वेतन’ की बात की जाती है, मालिकों के लिए तो लाखों करोड़ के पैकेज अपने आप घोषित हो जाते हैं? उन्हें ही क्यों लेबर कैंप, गंदे नाले के किनारे मच्छरों के बादलों के बीच रहने को मज़बूर होना पड़ता है? सारा निर्माण, सारा उत्पादन करने वाले मज़दूर ऐसे नारकीय जीवन जीने को क्यों मज़बूर हैं? उनके जाति-धर्म-प्रदेश उनकी एकता में कहां बाधक हैं? 21%, 35% की यह वेतन वृद्धि बेतहाशा बढ़ती मंहगाई के दौर में कब तक राहत देगी? एक कंपनी के मज़दूर अगर इकट्ठे होकर मालिक को दिन में तारे दिखा सकते हैं, तो अलग-अलग कंपनियों, अलग-अलग शहरों के मज़दूर भी इकट्ठे हो जाएं, तो क्या होगा? ये गंभीर राजनीतिक सवाल हैं. मज़दूरों को इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने के लिए गंभीरता से विचार करना होगा.

अनेक मज़दूर मिल जुलकर सामाजिक रूप से जो उत्पादन करते हैं, उसे कंपनी का मालिक हड़प लेता है और फिर वह, उत्पादन करने वाले मज़दूरों को किसी तरह जिंदा रहने और मज़दूरों की अगली पीढ़ी तैयार करने लायक़ वेतन उनके हाथ पर रख देता है, यही वह ज़ालिम व्यवस्था है जिसे पूंजीवाद कहते हैं. मज़दूर एक तरह उजरती गुलाम हैं. यही व्यवस्था है, मज़दूरों की मुसीबतों की असली वज़ह. इस व्यवस्था को निशाने पर लिए बगैर, हर 5-7 साल में दुअन्नी-चवन्नी की राहत के लिए लड़ना वैसे ही है जैसे कैंसर की कीमोथिरेपी करने के बजाए, उससे पैदा हुए मवाद को पूंछते जाना. मज़दूर इकट्ठे होकर वह कीमोथिरेपी कर सकते हैं, इस बात को मज़दूर भले ना जानें, मालिक और सरकार जानते हैं, इसीलिए हमेशा उन्हें बांटने की जुगत बिठाते रहते हैं. उसके बावजूद भी जब मज़दूर इकट्ठे होकर ललकारते हैं तो उनकी धमनियों में लहू जम जाता है, उनका हलक सूख जाता है. मालिकों और उनकी सरकार को मालूम है कि मज़दूरों-मेहनतक़श किसानों की तादाद बहुत विशाल है, उनमें आपस में बैर होने का कोई कारण है ही नहीं. उनका काम उन्हें इकठ्ठा करता रहता है, इसके क्या परिणाम हो सकते हैं. वे एक हो गए तो सामाजिक उत्पादन के निजी मालिकाने वाली इस ज़ालिम पूंजीवादी व्यवस्था की जगह सामाजिक उत्पादन पर सामाजिक मालिकाने वाली समाजवादी व्यवस्था क़ायम कर, मुफ्तखोरों को भगाकर, मज़दूर ख़ुद शासक बन जाएंगे. मज़दूरों ने अगर उनकी चाल समझकर उसे नाकाम नहीं किया, संगठित नहीं हुए तो यूं ही उजरती गुलाम बने रहेंगे.

सर्वहारा के महान नेता लेनिन ने उसी उजरती गुलामी से मुक्ति का सही रास्ता समझाते हुए लिखा है, “जब सभी वर्ग सचेत मज़दूर मुक्ति के लिए संघर्ष करते हैं, जब वे पूरे देश में एकजुट होकर समाजवाद का प्रसार करते हैं, जब वे एक समाजवादी मज़दूर पार्टी का निर्माण करते हैं, जो समूची जनता को सरकारी दमन से मुक्त कराने तथा सभी मेहनतक़श लोगों को पूंजी के जुए से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्ष करती है – एकमात्र तभी मज़दूर वर्ग सभी देशों के मज़दूरों के उस महान आंदोलन का अभिन्न अंग बनेगा, जो समस्त मज़दूरों को एकजुट कर उस लाल झंडे को उठाता जिस पर अंकित है: ‘दुनिया के मज़दूरों एक हो!”


About सत्यवीर सिंह

Copyright © 2026 . All rights reserved.