कोविड का नाम आते ही आज भी दहशत होती है. वैसा ही, ‘एबोला’ नाम का महामारी फ़ैलाने वाला बेहद ख़तरनाक वायरस अफ़ीका के देशों ‘डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कोंगो’ तथा युगांडा में तेज़ी से फ़ैल रहा है. दुनिया आज एक बड़ा गांव बन गई है. दूर से ही चिपक जाने वाले, बेहद ख़तरनाक छुआछूत वाले वायरस को फ़ैलने से रोका नहीं जा सकता. एक साल पहले जब एबोला नाम की महामारी अफ्रीका के इन देशों में पता चली थी, तब ही अमेरिकी वित्तीय संस्था ‘यू एस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट, यूएस ऐड’ ने इसकी रोकथाम के लिए बजट बनाकर अच्छी ख़ासी रक़म निर्धारित की थी. उसके कुछ दिन बाद ही दुनिया के सबसे बड़े अमेरिकी धन पशु एलोन मस्क को अमेरिकी सरकार में केंद्रीय मंत्री का दर्ज़ा देते हुए ‘डिपार्टमेंट ऑफ़ गवर्नमेंट एफिशिएंसी, DOGE’ का मुखिया बना दिया था. मस्क ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए ‘यू एस ऐड’ द्वारा एबोला रोकथाम के लिए निर्धारित बजट को रद्द कर दिया, जिससे इस महामारी की रोकथाम का कार्य ठप्प पड़ गया.
आज जब यह एबोला महामारी विकराल होने के कगार पर पहुंच गई है, दुनियाभर में 15,000 से ज्यादा लोग इसकी बलि चढ़ चुके हैं, तब अमेरिका में एलोन मस्क से सवाल पूछे जा रहे हैं, आपने एबोला रोकथाम का बजट क्यों रद्द किया? विनाशकारी ठगी पकड़े जाने पर, बच निकलने के लिए, उसका जवाब था; ‘एबोला रोकथाम के लिए निर्धारित बजट का ग़लती से रद्द हो गया’! इन कॉर्पोरेट की फितरत सब जान गए हैं, किसी को ये जवाब हज्म नहीं हुआ. अमेरिका में जांच शुरू हो गई. ‘यू एस ऐड’ के एबोला रोकथाम से सम्बद्ध डोक्टरों और विशेषज्ञों ने गवाही दी कि एलोन मस्क झूठ बोल रहा है. उससे कोई ग़लती नहीं हुई. उसने जान पूछकर ऐसा किया है. जब वह बजट काट रहा था तब हमने उसे समझाया था, गुहार लगाई थी कि ऐसा मत करो. इसके परिणाम विनाशकारी होंगे. लेकिन वह नहीं माना. जांच आगे बढ़ी, तो बड़े-बड़े, डरावने कंकाल बाहर निकलने लगे.
एलोन मस्क की ब्रेन कंप्यूटर कंपनी ‘न्युरालिंक’ की काली करतूतें
जन स्वास्थ्य से जुड़ी प्रतिष्ठित अमेरिकी संस्था, ‘द फिजिसियांस कमेटी फॉर रेस्पोंसिबल मेडिसिन, (पीसीआरएम)’ ने तय किया कि वे इस बेहद गंभीर और संवेदनशील मुद्दे की जड़ तक जाएंगे. ‘न्युरालिंक’ के पिछले कई सालों की करतूतों को खोद निकालने पर इस संस्था के विशेज्ञ डोक्टरों ने पाया कि एलोन मस्क की ब्रेन कंप्यूटर चिप कंपनी, ‘न्युरालिंक’ ने दुनियाभर के दवाईयों के बाज़ार को हड़प लेने के मक़सद से, एक अलग ही खेल रचा. न्युरालिंक ने युनिवेर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया से 2017 से 2020 के दरम्यान $1.4 मिलियन का क़रार कर युनिवेर्सिटी की सभी सुविधाओं को इस्तेमाल करने के अधिकार ख़रीद लिए. वहां कौन से प्रयोग होंगे, इसके बारे में कोई भी सवाल युनिवेर्सिटी नहीं करेगी, यह भी उस क़रार की एक शर्त थी.
वहां सबसे पहले 12 स्वस्थ बंदरों को पकड़कर लाया गया. उन्हें बेहोश कर उनके अंग उखाड़ कर दूसरे में लगाने, उनके मस्तिष्क में तरह-तरह के कीटाणुओं द्वारा संक्रमण कराने, उन पर विभिन्न रसायनों के प्रभाव का पता लगाने के प्रयोग चलते रहे. उन बंदरों पर आख़री प्रयोग था, लोहे के पेंच को उनकी खोपड़ी में कसते जाना जिससे पता चल सके कि मस्तिष्क का कौन सा भाग नष्ट होने क्या परिणाम होते हैं. मरने से पहले मस्तिष्क किस तरह व्यवहार करता है. घातक रोगाणु (pathogens) किस तरह फैलते हैं, यह जानना भी उस शोध का हिस्सा था. सबसे नृशंस था, संक्रमित मस्तिष्क के उस सड़े हुए हिस्से को, जिसमें जानलेवा हर्पीस बी वायरस और और घातक रोग फ़ैलाने वाले बैक्टीरिया मौजूद थे, एक जगह से दूसरी जगह खुले डिब्बों में ले जाया जाना जिससे पता चल सके कि उन खुले डिब्बों के संपर्क में आने वाले लोगों पर संक्रमण किस तरह फैला और उसके क्या परिणाम हुए.
जन स्वास्थ्य से जुडी इस संस्था पीसीआरएम ने नयूरालिंक कंपनी की इस भयावह करतूत के सारे सबूतों की फाइल बनाई और सबसे पहले अमेरिकी अदालत में हर्जाने और आपराधिक मुक़दमा दायर किया जो अदालत ने स्वीकार नहीं किया लेकिन वे युनिवेर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया के विरुद्ध दावा दायर करने में क़ामयाब रहे. उसके बाद ‘अमेरिकी परिवहन विभाग’, फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन विभाग, सिक्यूरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन तथा पशु कल्याण क़ानून के तहत मामले दर्ज़ कराए हुए हैं, जिन पर सुनवाई चल रही है. सबसे महत्वपूर्ण नयूरालिंक और एलोन मस्क के विरुद्ध अमेरिकी समाज में तीव्र जनाक्रोश व्याप्त है.
एलोन मस्क की दूसरी कंपनियां ‘स्पेसएक्स’ तथा ‘स्टारलिंक’ गैरपारंपरिक युद्ध कंपनियां हैं. अभी तक हम पारंपरिक युद्ध कंपनियों के बारे में ही जानते थे, जो हथियार, गोला बारूद, मिसाइल, लड़ाकू जहाज आदि विनाशकारी लड़ाकू युद्ध सामग्री बनाती हैं. अब गैरपारंपरिक युद्ध कंपनियों की भी भरमार हो गई है, जो ख़ुफ़िया तंत्र, इलेक्ट्रोनिक यूद्ध, दुश्मन देश में दंगे भड़कवाना, तोड़-फोड़ कराना, गैर आतंकी देश को आतंकी और छ्टे हुए खूंख्वार आतंकी देश को दूध से धुला ‘डेमोक्रेटिक’ बताने की परियोजनाओं में निवेश करती हैं. इनके अलावा एक तीसरी श्रेणी युद्ध ठेकेदार कंपनियों की है जो मोर्चों पर रसद उपलब्ध कराना, युद्ध में मारे गए लोगों एवं सैनिकों की लाशों को ठिकाने लगाना आदि काम करती हैं. ये पारंपरिक युद्ध ठेकेदारी के काम हैं. युद्ध ठेकेदारों ने गैरपारंपरिक ठेकेदारी की कंपनियां भी बना ली हैं, जैसे अनेक अमेरिकी और ब्रिटिश ठेका कंपनियां युक्रेन के शहरों-गावों में गाड़ियाँ लेकर घूमती हैं और 18 से 40 साल की उम्र के लोगों को पकड़कर युद्ध के मोर्चे पर ज़बरदस्ती लड़ने भेजती हैं, क़ैदियों को भी इसी तरह गिरफ्तार कर मोर्चों पर भेजा जाता है. यही वज़ह है कि 5 साल से ज़ारी रूस-युक्रेन और लगभग 3 साल से ज़ारी खाड़ी युद्ध बंद होने की बात से ही इन कंपनियों का हलक सूख जाता है. जंग की तबाही से ही इन कंपनियों के मुनाफ़े की गटर गंगा बहती है, इनकी ‘बॉटम लाइन’ फूलती है.
मौजूदा दौर में यही है, पूंजीवादी विकास का असली स्वरूप!!