स्टडी क्लास: सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास - 27: संगठित जन सैलाब की शक्ति से ताक़तवर कोई शक्ति नहीं होती

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बोल्शेविक पार्टी की छठी कांग्रेस की गतिविधियां जानकर हम समझे कि पार्टी का नेतृत्व तेज़ी से परिपक्व होते और लगातार नज़दीक आते क्रांतिकारी संकट को बहुत गंभीरता से पढ़कर तैयारियां कर रहा था. देश की संपूर्ण क्रांतिकारी उर्ज़ा को उस ऐतिहासिक अवसर में झोंक देने के लिए, ना सिर्फ़ उस कालजयी मंज़िल तक का रास्ता सर्वहारा वर्ग के सामने स्पष्ट किया गया, बल्कि ट्रोट्स्की जैसे गुटों को भी अपने में समेट लिया गया. बोल्शेविक पार्टी के अलावा देश में मौजूद अन्य क्रांतिकारियों के लिए बस एक ही शर्त रखी गई, आप अगर हमारे राजनीतिक कार्यक्रम से सहमत हैं, तो आपका स्वागत है, कड़वाहट भरी पिछली गतिविधियों को नहीं कुरेदा जाएगा. जो शामिल हुए, उन्हें बोल्शेविकों जैसा ही सम्मान मिला, ट्रोट्स्की केंद्रीय कमेटी के लिए चुने गए. मेंशेविकों और सोशलिस्ट रेवोलुसनरी संगठनों को छोड़, समूची क्रांतिकारी शक्ति की कमांड अपने हाथ में लेकर, बोल्शेविक पार्टी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे ऐतिहासिक कूच किया. मानव इतिहास का अब तक का सबसे शानदार अध्याय शुरू होने जा रहा था. रूस के मेहनतक़श दुनिया को ऐसी रौशनी से जगमगाने जा रहे थे, जिसका उजाला दुनियाभर में फैला, आज भी बुझा नहीं है, और कभी नहीं बुझने वाला.

पार्टी ने एक घोषणा पत्र तैयार किया, जिसका अंतिम पैरा इस तरह था, “बहादुरों! एक नए युद्ध की तैयारी का वक़्त आ गया है. पूरी ज़िद के साथ, वीरतापूर्वक लेकिन शांत चित्त से , किसी भी भड़कावे में आए बगैर, तैयारियों में जुट जाओ, अपनी सारी शक्ति समेटकर गोलबंद हो जाओ और अपने लड़ाकू दस्तों को मुस्तैद करो. पार्टी के परचम तले इकट्ठे हो जाओ, बहादुर मेहनतक़शो और सैनिको, गावों देहात के दबे कुचले पीड़ितो, अपने झंडे उठाकर एकजुट हो जाओ.” आइये, छठी कांग्रेस के बाद की और बोल्शेविक क्रांति से पहले के 2.5 महीनों की घटनाओं को जानें, परखें.

अपनी सत्ता खोने से दुखदायक कुछ नहीं होता

हर पल नज़दीक आती क्रांति को बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में सिर्फ़ सर्वहारा वर्ग ही देख पा रहा था, और सत्ता में क़ाबिज़ शोषक लुटेरे आंख बंद किए अपनी मौत का इंतज़ार कर रहे थे, ऐसी बात नहीं थी. ऐसा कभी नहीं होता क्योंकि अपनी सत्ता खोने से दुखदायक कुछ नहीं होता. सत्ता के गलियारों में बोल्शेविकों को कुचलने के लिए, सरमाएदार वर्ग द्वारा एक बहुत ही संगीन षडयंत्र रचा जा रहा था. क्रांति का गर्भपात कर प्रति-क्रांतिकारी तानाशाही को सत्ता सौंपने के लिए एक बर्बर घोड़ा सजाया जा रहा था. अरबपति रायाबुशिन्श्की ने ऐलान किया, “अकाल की मार से कंगाल लोगों और उनके तथाकथित हमदर्दों का गला दबा दो.” ख़ूनी षडयंत्र को क़ामयाब बनाने के लिए एक और षडयंत्र रचा गया. वर्ग सचेत क्रांतिकारी मेहनतक़शों को ‘हिंसा भड़काने’ का ज़िम्मेदार ठहराने वाली सरकार ने एक बहुत ख़ूनी योजना बनाई, जिसके तहत, जंग के मोर्चों से भाग रहे सैनिकों को गिरफ्तार कर मार डालने के लिए कोर्ट मार्शल चलाने और संगठित सर्वहारा वर्ग को बेरहमी से कुचलने की ज़िम्मेदारी सत्ता के नशे में टुन्न, मग़रूर और बेरहम सैन्य अधिकारी, कमांडर-इन-चीफ जनरल लवर कोर्निलोव को सौंप दी गई.

16 अगस्त 1917 को कोर्निलोव ने सरकार से जंग करने से मना करने वाले सैनिकों को फांसी की सज़ा देने की पॉवर देने की मांग की. सरकार ने ना सिर्फ़ वह पॉवर उन्हें दे दी, बल्कि 25 अगस्त को मास्को के ग्रांड थिएटर में बोल्शेविकों को ताक़त से कुचलने के लिए ज़मींदारों, सरमाएदारों की एक बड़ी मीटिंग, ‘स्टेट कौंसिल’ बुलाई गई, जिसमें क्रांति-विरोधी सेना गठित करने की योजना तैयार हुई. सेना और प्रशासन के बड़े अधिकारीयों, बैंकों के मालिकों, उद्योगपतियों, सूदखोरों, बड़े व्यापारियों और रूस की लड़ाकू जन-जाति ‘कज्ज़ाक’ के लठैतों ने भी भाग लिया. सता के सारे टुकड़खोर एक हो गए और उन्होंने सरकार को भरोसा दिलाया कि क्रांति को कुचलने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, तन-मन-धन से साथ हैं. जैसे भी हो, इन क्रांतिकारियों को कुचल डालो. साथ ही, कृपया नोट किया जाए कि उदारवादियों की आख़री मंज़िल क्या होती है. क्रांति को कुचलने के इस शक्तिशाली प्रति-क्रांतिकारी जमावड़े में वे सोवियतें भी शामिल थीं, जिनका नेतृत्व मेंशेविक और सोशलिस्ट रेवोलुसनरी कर रहे थे!!

मज़दूर हड़तालों की क्या ताक़त होती है, बोल्शेविकों ने दुनिया को दिखाया

‘स्टेट कौंसिल’ वाले दिन, अर्थात 25 अगस्त को बोल्शेविक पार्टी ने मास्को में आक्रोश प्रदर्शन तथा मास्को, पेत्रोग्राद समेत देश के सभी औद्योगिक क्षेत्रों के सभी कारखानों में आम हड़ताल की घोषणा की, जिसमें बहुत बड़ी तादाद में मज़दूरों ने भाग लिया. किसानों के संगठन, सोशलिस्ट रेवोलुसनरी पार्टी का प्रतिनिधि केरेंसकी क़ामयाब हड़तालों की रिपोर्ट पढ़कर आग बबूला हो गया और सुरक्षा बलों को हुक्म दिया, ‘इन हड़ताली मज़दूरों और इन किसानों को, जो उस ज़मीन के मालिक बन जाने की मांग कर रहे हैं, जो इन्हें जोतने के लिए दी गई है, इन्हीं के खून की नदी में डुबो दो!!! ख़ूनी कोर्निलोव ने कहा, आपके हुक्म की तामील होगी, बस एक काम कीजिए, इन सोवियतों की सभी कमेटियों को भंग कर दीजिए. इतना ही नहीं, 1871 के गौरवशाली पेरिस कम्यून वाली परिघटना रूस में भी दोहराई गई. ब्रिटेन और फ्रांस जो विश्व युद्ध में रूस के साथ लड़ रहे थे, उनके प्रतिनिधियों ने भी इस कौंसिल में भाग लिया और कहा कि आप इन वामपंथी क्रांतिकारियों को कुचलने में देर ना करें, हम भी पूरी तरह आपके साथ हैं, हर मदद करने को तैयार हैं. इतना ही नहीं, प्रथम युद्ध के प्रमुख दुश्मन जर्मनी से भी क्रांति को कुचल डालने के काम में हर प्रकार के समर्थन का आश्वासन केरेंसकी और कोर्निलोव को मिला.

कोर्निलोव अपने काम में लग गया. बोल्शेविक कार्यकर्ताओं, सर्वहारा वर्ग और आम जन मानस में भ्रम और अफ़रातफ़री पैदा कर क्रूर दमन चक्र चलाने के लिए उसने यह झूठी ख़बर फैलाई कि बोल्शेविक पार्टी, फ़रवरी क्रांति के 6 महीने पूरे होने के अवसर को मनाने के लिए, 27 अगस्त (9 सितंबर) को क्रांति का बिगुल फूंकने जा रही है. यह एक तरह, केरेंसकी सरकार को एक इशारा था, ‘बोल्शेविकों पर टूट पड़ो’. सभी सरकारी हथियारबंद सुरक्षा एजेंसियों ने बोल्शेविक पार्टी पर पूरी ताक़त से हमला बोल दिया. उसी वक़्त, कोर्निलोव ने भी अपनी सेना को पेत्रोग्राद कूच करने का हुक्म सुना दिया; ‘सोवियेट्स को उखाड़ फेंको और नंगी फौज़ी तानाशाही क़ायम करो’. इस हुक्म से क्रांति की दुश्मन और शासक वर्ग की ताबेदार दो संस्थाओं के बीच दरार पैदा हो गई. केरेंसकी चाहता था कि कोर्निलोव क्रांतिकारियों को कुचलकर अपनी बैरक में लौट जाए, जिससे उसकी सरकार उसी तरह ज़ारी रहे. इसलिए उसने ऐलान किया कि सरकार, ‘कोर्निलोव मिशन’ में शामिल नहीं है. कोर्निलोव के साथ हुए हमारे समझौते में फ़ौजी तानाशाही क़ायम करने की शर्त नहीं थी. कितना भी ढकने की कोशिश करें, सरमाएदारों के बीच अंतर्द्वंद्व पूरी तरह पट जाए, वे, सर्वहारा वर्ग की तरह एक हो जाएँ, ऐसा कभी नहीं होता.

बोल्शेविकों के नेतृत्व में हर पल पक रही क्रांति की लहर को कुचलने के लिए कोर्निलोव तथा केरेंसकी ने सत्ता को आपस में बांट लेने के लिए गठजोड़ तो बिठा लिया था लेकिन लुटेरे शासक वर्ग की फ़ितरत के अनुसार, जैसे ही कोर्निलोव ने अपना ख़ूनी हमला शुरू किया, उसके दिल में ख़ुद शासक बन जाने की तमन्ना उसके नियंत्रण से बाहर हो गई. उसे समझते ही, केरेंसकी पलटी मार गया. उसका दिमाग फौजी कोर्निलोव से तेज़ चलता था, वह समझ गया कि सत्ता पर क़ब्ज़े की लड़ाई मेज के इर्द-गिर्द कॉफ़ी सेवन करते कभी तय नहीं होती. केरेंसकी ने यह समझने में बिलकुल वक़्त जाया नहीं किया कि जैसे ही कोर्निलोव का दमन चक्र तेज़ होगा, वह क़ामयाब होगा, फौजियों की बंदूकों के निशाने पर वह आ जाएगा, और अगर कोर्निलोव का हमला नाकाम हुआ, तो बोल्शेविक उसे नहीं छोड़ेंगे. इसलिए केरेंसकी कोर्निलोव से अलग हो गया.

संगठित जन शक्ति के सामने बड़े-बड़े तुर्रमखां रुई की तरह उड़ जाते हैं!!

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रूस का ख़ूनी फौजी अफ़सर कार्निलोव तथा रुसी मज़दूरों और जन प्रतिरोध का दृश्य

मगरूर कोर्निलोव की नज़र सत्ता की कुर्सी से हिलने को तैयार नहीं थी. आखिरकर 7 सितंबर को कोर्निलोव ने अपनी तीसरी बटालियन के कमांडर क्राइमोव को हुक्म सुनाया; ‘पित्रभूमि की रक्षा के लिए पेत्रोग्राद की ओर कूंच करो’. बोल्शेविक पार्टी नेतृत्व ने मज़दूरों और मज़दूर वर्गीय सैनिकों से कहा; प्रति-क्रांतिकारी हमले का मुक़ाबला करने की तैयारी करो. वे तो ख़ुद अपनी तैयारी कर ही रहे थे. रेड गार्ड्स की टुकड़ियां मोर्चा बंदी में लग गईं. ट्रेड यूनियनों ने ऐलान किया; दुअन्नी-चवन्नी की लड़ाई का वक़्त पीछे छुट गया, निर्णायक लड़ाई का वक़्त आ पहुंचा है. रेड गार्ड्स के नेतृत्व में सेना में तब्दील हो जाओ. पेत्रोग्राद में खंतियाँ खुदने लगीं. पेत्रोग्राद पहुंचने के रास्ते रास्ते बंद कर दिए गए, हर तरफ़ हथियार लहराते मज़दूर मोर्चा संभाले हुए थे. रणनीति के तहत ही कुछ रास्ते खुले रखे गए थे. घेराबंदी कुछ दूरी पर रखी गई थी जिससे वहां से प्रवेश करने वालों को ट्रैप किया जा सके. वहां चाकचौबंद मोर्चाबंदी फ़ौलादी बना दी गई. नाविकों की एक बड़ी टुकड़ी के मज़दूरों के साथ मिल जाने से उनके हौसले बुलंद थे.

पेत्रोग्राद में सबसे दहशतज़दा जत्थेबंदियाँ थीं, मेंशेविक और सोशलिस्ट रेवोलुसनरी पार्टी. जंग में सबसे बड़ी जीत, वह मुक़ाम हांसिल करना होती है, जब दुश्मन के खेमे में आपकी ताक़त के चर्चे हों. केरेंसकी का दिमाग कम्प्यूटर जैसा चलने लगा. वह समझ गया, जन सैलाब की शक्ति का मुक़ाबला कोई नहीं कर सकता. कोर्निलोव चाहे जितनी उछल-कूद कर ले, जीतेंगे बोल्शेविक ही. डरे हुए केरेंसकी ने बोल्शेविकों के पास संदेश भेजा; ‘मैं और हम लोग, मतलब मेंशेविक और सोशलिस्ट रेवोलुसनरी, कोर्निलोव के नहीं आपके साथ हैं.” जीत के नशे में अकड़ जाना, गुमराह हो जाना, अपने अंतिम लक्ष्य से भटक जाना, बोल्शेविकों की फ़ितरत नहीं थी. कोर्निलोव के भयानक ख़ूनी हमले का मुक़ाबला करने की तैयारियों के बीच भी उन्होंने केरेंसकी सरकार और मेंशेविक और सोशलिस्ट रेवोलुसनरी पार्टी पर हमले कम नहीं किए, उनकी घृणित भूमिका उजागर करने के अभियान में कोई ढील नहीं आने दी. उन्होंने स्पष्ट किया कि कोर्निलोव नाम के हत्यारे को जन मानस को कुचल डालने के काम में इन्हीं सरकारी गुर्गों, गद्दारों ने लगाया है. इन्हें अलग-अलग देखना ठीक नहीं.

क्रांतिकारियों के हौसले के सामने कोर्निलोव की हेंकड़ी चकनाचूर हो गई. उसका विद्रोह कुचल डाला गया. उसके ‘कमांडर-इन-चीफ’ क्राइलोव ने गिरफ्तार होने की बजाए आत्म हत्या करना मुनासिब समझा. कोर्निलोव और उसके लगुए-भगुओं, देनिकिन और लुकोम्सकी को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन बोल्शेविकों ने उन्हें केरेंसकी को क्यों सौंप दिया, यह समझ नहीं आया क्योंकि केरेंसकी ने कुछ ही दिन बाद उन्हें रिहा कर दिया. कोर्निलोव के विद्रोह ने रूस की फ़िज़ा में तराजू का काम किया. रुसी मेहनतक़श समझ गए, क्रांतिकारियों और क्रांति के दुश्मन प्रति-क्रांतिकारियों में किसका पलड़ा भारी है. एक और बात इस विद्रोह से तय हो गई; मेंशेविक और सोशलिस्ट रेवोलुसनरी क्रांति के ग़द्दार हैं, बुर्जुआजी के निर्लज्ज ताबेदार हैं. बोल्शेविकों के हाथों में लहरा रही क्रांति की पताका की शान रुसी जन मानस के दिलोदिमाग पर छा गई. कोर्निलोव को कुचलने में बोल्शेविक पार्टी ने एक सेना जैसा रणकौशल दिखाया. यह परिघटना आगे आने वाली दिलक़श फिल्म का ट्रेलर साबित हुई.

‘सारी सत्ता सोवियतों को’ – यह कालजयी नारा एक बार फिर गूंज उठा

क्रांति को कुचलने वाली एक और बहुत दूर तक जाने वाली बात भी इसी परिघटना से निकली. ‘सोवियत’ नाम की बहुत शानदार जन संस्थाओं का होना, रूस की एक बहुत दिलचस्प ख़ासियत थी. इन सोवियतों ने, जो 1905 की रूस की पहली असफल क्रांति के वक़्त वज़ूद में आई थीं, बोल्शेविक क्रांति की क़ामयाबी में एक बहुत अहम भूमिका अदा की. रुसी मेहनतक़श अवाम को कोर्निलोव प्रतिक्रांतिकारी विद्रोह से समझ आ गया कि सोवियतों में से मेंशेविक और सोशलिस्ट रेवोलुसनरी पार्टी तत्वों को खींचकर बाहर करना लाज़िमी है. सोवियतों पर नियंत्रण को बोल्शेविकों ने क्रांति की पूर्व शर्त के रूप में लिया. मेहनतक़श किसान भी समझ ही चुके थे कि उन्हें किस खेमे में जाना है. वे समझ गए थे कि कोर्निलोव अगर बोल्शेविकों को कुचलने में क़ामयाब हो जाता, तो उनके बाद ज़मीन के लिए लड़ रहे मेहनतक़श किसानों का नंबर लगने वाला है.

क्रांति की क़ामयाबी के लिए, आम जन मानस की नज़र स्पष्ट होने से ज्यादा अनुकूल कुछ नहीं होता. कोर्निलोव की निर्णायक हार के बाद क्रांतिकारी संकट गंभीर रूप ले चुका था, क्रांति को अब कोई नहीं रोक सकता था. क्रांतिकारी वर्ग की नब्ज़ पर हर वक़्त हाथ रखने वाले बोल्शेविक समझ गए; छोटे ही नहीं, मझोले किसान भी अब साथ आ चुके हैं. मेहनतक़श किसानों को बोल्शेविक पार्टी की ताक़त पर इतना भरोसा हो गया था और ज़मींदार आने वाले मंज़र को भांपकर इतने डर गए थे कि सितंबर महीने में, किसानों ने कई जगह पर ज़मींदारों को खदेड़ कर उनकी ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया. ज़मींदारों से पूछे बगैर, उनकी ज़मीन को जोतना-बोना शुरू कर दिया.

सोवियतों का बोल्शेविकरण ही वह अवस्थिति थी, बोल्शेविक जिसका इंतज़ार कर रहे थे. जहां-जहां से मज़दूरों, किसानों और सैनिकों ने मेंशेविक और सोशलिस्ट रेवोलुसनरी डेलिगेट चुनकर सोवियतों में भेजे थे, वहां से उन्हें वापस बुलाने और फिर से चुनाव कराने की मांग ज़ोर पकड़ती जा रही थी. सबसे पहले पेत्रोग्राद सोवियतों ने पाला बदला, अध्यक्ष मेंशेविक चेखिद्ज़े को स्तीफा देना पड़ा, वहां बोल्शेविक नेता चुना गया. उसके बाद मास्को में वही हुआ. हर पल बदलती, अंगड़ाई लेती परिस्थितियों पर बोल्शेविकों की बारीक नज़र थी. क्रांतिकारी हालात के परिपक्व हो जाने पर क्रांतिकारी रणनीति अधिकतम लचीलेपन की मांग करती है और बोल्शेविक पार्टी को इस मामले में 10 में 10 नंबर देने पड़ेंगे.

सोशलिस्ट रेवोलुसनरी पार्टी और मेन्शेविक पार्टी में सरमाएदारों के ताबेदार बन गए नेताओं के ख़िलाफ़ अंदरूनी विद्रोह शुरू हो गया और ये पार्टियां टूटने लगीं. ‘लेफ्ट सोशलिस्ट रेवोलुसनरी’ गुट वज़ूद में आया. मेंशेविकों की टूट से बने क्रांतिकारी गुट ने अपने को ‘अंतर्राष्ट्रीयतावादी’ कहना शुरू किया. इन दोनों पार्टियों से टूटकर बने क्रांतिकारी धड़े बोल्शेविकों के नज़दीक आ गए, क्रांतिकारी उर्ज़ा और बढ़ गई.

कोर्निलोव की हार के बाद भी, मेंशेविक और सोशलिस्ट रेवोलुसनरी पार्टियों ने क्रांति के उठ रहे तूफ़ान को रोकने की एक और कोशिश की. 25 सितंबर 1917 को उन्होंने ‘रूस स्तरीय जनवादी सम्मेलन’ बुलाया, जिसमें सोवियतों, समाजवादियों, ट्रेड यूनियनों, ज़ेम्स्त्वो और सेना की यूनिटों में मौजूद उनके लगुए-भगुवों को आमंत्रित किया गया. सम्मेलन के बाद ‘अस्थाई कौंसिल ऑफ़ रिपब्लिक’ का गठन हुआ जिसे उन्होंने भविष्य में बनने वाली संसद का प्रारंभिक स्वरूप बताया. यह क़वायद, समाजवादी क्रांति को जनवादी क्रांति के रास्ते भटकाने के लिए की गई थी. क्रांति के प्रचंड उभार के सामने रेत के इस महल को बिखरने में देर नहीं लगी. इसने लेकिन उस मोड़ पर बोल्शेविक पार्टी को एक झटका ज़रुर दिया. बोल्शेविक पार्टी की केंद्रीय कमेटी के दो सदस्यों, कामानीव और ठेओदोरोविच ने पार्टी से मतभेद व्यक्त्त करते हुए, इस ‘पूर्व-संसद’ नाम के छलावे का पूर्ण बहिष्कार करने की बजाए, ‘इसे भी देख लेना चाहिए’ यह राय रखी. केंद्रीय कमेटी ने लेकिन जब सख्ती से कहा, इस चक्कर में बिलकुल नहीं पड़ना है, लोगों के सामने प्रस्तुत किए जा रहे छलावे को विश्वसनीय नहीं बनाना है, तो ये दोनों सदस्य भी मान गए.

रूस का सर्वहारा स्वर्ग पर धावा बोलने के मुहाने पर

कोर्निलोव वाले ख़तरे को नेस्तो-नाबूद करने के बाद बोल्शेविकों ने तय कर लिया था; ‘बढ़ते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएंगे’. लेनिन ने ऐलान किया; पेत्रोग्राद और मास्को सोवियतों में बहुमत हांसिल कर लेने के बाद, बोल्शेविक पार्टी, राज-सत्ता को अपने हाथ में लेने के लायक़ हो गई हैं और बिना वक़्त गंवाए ऐसा करना उनकी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी है. क्योंकि देश का बहुमत हमारे साथ है. यह कैसे होगा? लेनिन ने गंभीरता से इसका ब्लू प्रिंट बनाना शुरू कर दिया. केंद्रीय कमेटी तथा पार्टी से सम्बद्ध सभी संगठनों की जिम्मेदारियां तय होने लगीं. 20 अक्टूबर को लेनिन छुपकर फ़िनलैंड से पेत्रोग्राद पहुँच गए. उसके 3 दिन बाद 23 अक्टूबर को केंद्रीय कमेटी की वह ऐतिहासिक मीटिंग हुई जिसमें फ़ैसला लिया गया कि अब मज़दूरों-मेहनतक़शों को रूस की सत्ता पर क़ाबिज़ होने के लिए निर्णायक धावे की तैयारी करनी है. उसकी तारीख भी तय हो गई.

यह गुप्त ऐतिहासिक प्रस्ताव उद्धृत होना बहुत ज़रूरी है; “केंद्रीय कमेटी समझ गई है कि रुसी क्रांति की अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां (जर्मन नेवी में विद्रोह, जो यह दर्शाता है कि यूरोप भर में और दूसरी जगह भी विश्व क्रांति की परिस्थितियां परिपक्व हैं; साम्राज्यवादी दुनिया का यह निर्णय कि रूस की क्रांति का गला घोंटना है), साथ ही सैन्य परिस्थितियां (इस बात का पक्का सबूत कि रुसी सरमाएदारों और केरेंसकी ने पेत्रोग्राद और मास्को को जर्मन सेना को सौंप देने का फ़ैसला कर लिया है) और यह हकीक़त कि सर्वहारा की पार्टी ने सोवियतों में भी बहुमत हांसिल कर लिया है – इसके साथ ही, किसानों का विद्रोह और जन मानस का हमारी ओर झुकाव (जैसा मास्को के चुनावों से ज़ाहिर हो चुका है) और अंत में, कोर्निलोव जैसे दूसरे हमले की तैयारियां होती स्पष्ट नज़र आ रही हैं (पेत्रोग्राद से सेना को वापस बुला लेना, कज्ज़ाक टुकड़ियों की पेत्रोग्राद में तैनाती, कज्ज़ाकों द्वारा मिंस्क को घेर लेना), ये सब परिस्थितियां बताती हैं कि आर-पार की लड़ाई का वक़्त आ पहुंचा है...यह समझते हुए कि सैन्य टकराव लाजिमी है, उसकी परिस्थितियां पूरी तरह परिपक्व हो गई हैं, केंद्रीय कमेटी पार्टी के सभी संगठनों को निर्देश देती है कि उसके अनुरूप तैयारियां शुरू कर दें और उससे सम्बंधित सभी व्यवहारिक प्रश्नों पर चर्चा करें.”

केंद्रीय कमेटी के दो सदस्यों, कामानीव और ज़िनोविएव ने इस प्रस्ताव का विरोध किया. उनका कहना था कि बुर्जुआ सरकार को उखाड़कर सत्ता हासिल करने के लिए जो तैयारी चाहिए, वह अभी सर्वहारा वर्ग की नहीं है. ट्रोट्स्की ने प्रस्ताव के विरोध में मत तो नहीं दिया लेकिन एक संशोधन प्रस्तुत किया. उनका कहना था कि प्रस्तावित विद्रोह, सोवियतों की दूसरी कांग्रेस से पहले शुरू नहीं होना चाहिए. सभी सदस्यों ने इस संशोधन का यह कहते हुए विरोध किया, कि इससे देर होगी और विद्रोह की तारीख उजागर हो जाएगी. साथ ही, अस्थाई सरकार को उसे कुचलने की तैयारियां करने का वक़्त मिल जाएगा. संशोधन रद्द हो गया. केंद्रीय कमेटी के सदस्यों को अलग-अलग प्रांतों में जाकर तैयारियां शुरू करने की जिम्मेदारियां सौंप दी गईं . पेत्रोग्राद में एक केंद्रीय ‘रेवोलुसनरी मिलिट्री कमेटी’ गठित की गई.

क्रांति को कुचलने वाला सत्ताधारी वर्ग हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा था. उसने एक ‘ऑफिसर्स लीग’ गठित कर ली थी. शीषक लुटेरों का अपने लूट तंत्र को बचाने का आखरी आसरा धर्म होता है. केरेंसकी सरकार ने अचानक इसाई धर्म का झंडा उठाते हुए क्रॉस के निशान के साथ ‘शॉक बटालियन’ गठित की. इस बीच केरेंसकी सरकार ने अपनी राजधानी पेत्रोग्राद से मास्को ले जाने का हैरान करने वाला फैसला किया. इससे रुसी अवाम समझ गया कि सरकार वाक़ई पेत्रोग्राद को जर्मन सेना को सौंपने जा रही है, जिससे जर्मन सेना बोल्शेविकों को बेरहमी से कुचल सके. बोल्शेविक यही बात बार-बार कह रहे हैं. पेत्रोग्राद के मज़दूर सड़कों पर आ गए, हम राजधानी को बदलने नहीं देंगे. राजधानी पेत्रोग्राद ही रहेगी. केरेंसकी सरकार को वह फ़ैसला वापस लेना पड़ा.

29 अक्टूबर को विस्तृत केंद्रीय कमेटी (केंद्रीय कमेटी + प्रमुख कामरेड्स) की मीटिंग हुई, जिसमें विद्रोह को संचालित करने के लिए स्टालिन के नेतृत्व में एक ‘पार्टी केंद्र’ की स्थापना की गई. सब कुछ तय हो जाने के बाद, इस मीटिंग में भी, लेकिन, कामानीव तथा ज़िनोविएव ने इस फैसले का भी विरोध किया, जबकि यह प्रस्ताव पहले ही पारित हो चुका था. उनकी इस हिमाक़त पर केंद्रीय कमेटी ने उन्हें लताड़ा, इससे खफ़ा होकर, केंद्रीय कमेटी के इन दोनों सदस्यों ने एक भयानक ग़द्दारी करते हुए, इस बेहद गंभीर और अत्यंत संवेदनशील गुप्त योजना का सारी डिटेल, मेंशेविकों के अख़बार ‘नोवोया ज़िज्न’ को भेज दी. उसने उसे छाप दिया!!

क्रमश:


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