‘हम भारत के लोग’ इजराइल द्वारा गाज़ा में किए जा रहे जनसंहार में शामिल नहीं हैं. इजराइल हमारी ‘फादरलैंड’ नहीं है!

सत्यवीर सिंह

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“इजराइल अकेला नहीं है, उसे 1.4 बिलियन भारतियों का समर्थन प्राप्त है”, जनसंहार के अपराधी, जिसके विरुद्ध ‘अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक अदालत, हेग’ ने गिरफ़्तारी वारंट ज़ारी किए हुए हैं, वह किसी देश में ही नहीं, बल्कि उसकी आकाश सीमा से भी गुजरता है तो उसे गिरफ्तार कर हेग की अदालत को सौंप दिया जाना चाहिए; ख़ुद अमेरिका में न्यूयॉर्क के मेयर ने जिसे गिरफ्तार कर लेने की घोषणा की हुई है, गाजा, दक्षिण लेबनान में मासूम फिलिस्तीनी बच्चों के खून के प्यासे, हिटलर के बाद मानवता के सबसे घृणित व्यक्ति, नेतान्याहू की कही यह टिप्पणी जिस दिन सुनी, सर शर्म से झुक गया. ‘ऐसा कहने की उसकी हिम्मत कैसे हुई’, इस लानत को पढ़कर सोशल मीडिया उबल पड़ा था. इससे पहले ऐसी ही एक बेहद शर्मनाक टिप्पणी प्रधानमंत्री मोदी कर चुके थे, जब इसी साल 25 फरवरी को, अर्थात मौजूदा जंग में इजराइल-अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए भयानक हमले के महज़ 2 दिन पहले, इसरायली संसद, ‘कनेसेट’ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘भारत हमारी मात्रभूमि है और इजराइल हमारी पित्रभूमि’. देश के 90% लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि कोई व्यक्ति ऐसा गलीज़ बयान भी दे सकता है. सोशल मीडिया पर फिर से वायरल हो गया, ‘लानत है!!’. फिलिस्तीन की आज़ादी के लिए कम से कम आधिकारिक तौर प्रतिबद्ध रहने वाले इस देश के लोगों के बारे में ऐसा सोचने की हिमाक़त होने की ठोस वज़ह मौजूद है जिसे जानना-समझना बहुत ज़रूरी है.

इजराइल पश्चिम एसिया में अमेरिकी फौजी चौकी की भूमिका निभाता आया है

14 मई 1948 में अपने जन्म से ही इजराइल, खाड़ी में अमेरिकी ख़ूनी फौजी चौकी की तरह काम करता आया है. निर्णायक रूप से ज़रूरी पेट्रोलियम खनिज से मालामाल खाड़ी के देशों पर जब चाहे हमले कर देना, अपने देश की सीमाएं अपनी मर्ज़ी से बढ़ाते जाना, किसी भी देश की सीमा में घुसकर बैठ जाना, संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित किसी भी प्रस्ताव को दो कौड़ी की क़ीमत ना देना और समूचे पश्चिम एसिया में अमेरिका के बंदूकची की ज़िम्मेदारी निभाना, यही इजराइल का काम है. खाड़ी में अशांति फैलाकर अमेरिका की दखल बनाए रखने की ज़िम्मेदारी इजराइल निभाता आया है. बदले में अमेरिका खाड़ी के देशों की अकूत लूट में से एक टुकड़ा इजराइल की ओर फेंक देता है. यही वज़ह है कि दुनिया के अधिकतर देशों के व्यापारिक, सांस्कृतिक ही नहीं बल्कि सामान्य कूटनीतिक संबंध भी इजराइल से नहीं रहे. भारत और इजराइल के बीच कूटनीतिक संबंध, इजराइल के वज़ूद में आने के पूरे 44 वर्ष बाद 29 जनवरी 1992 को कांग्रेस की नरसिंहाराव सरकार ने क़ायम किए थे. कांग्रेस पार्टी में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचार धारा वाले लोगों की कमी इसके जन्म से ही कभी नहीं रही. नरसिंहराव उसी ज़मात के प्रतिनिधि थे. बाबरी मस्जिद का विध्वंश भी उन्हीं की रहनुमाई में हुआ था.

ज़रूरी मुद्दे पर मुंह बंद कर बैठ जाने वाले नरसिंहराव ने इजराइल से कूटनीतिक संबंध तो क़ायम कर लिए, भारत-इजराइल के दूतावास भी एक-दूसरे देश में क़ायम हो गए लेकिन उससे आगे बढ़ने का साहस वे नहीं जुटा पाए. भारत-इजराइल संबंध भाजपा के पहले संस्करण अटल बिहारी वाजपेयी के शासन 1999 – 2004 में ही परवान चढ़े. कारगिल युद्ध में पर्दे के पीछे रहकर इजराइल ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. युद्ध उद्योग की इजारेदार पूंजी के दम पर चमकते इजराइल का गुजारा युद्ध के बगैर नहीं हो सकता. युद्ध ही प्रमुख व्यवसाय-व्यापार होने की वज़ह से किसी भी देश से इजराइल के व्यापारिक संबंध विशुद्ध रूप से व्यापारिक नहीं होते, इनमें सामरिक रंग ज़रूर रहता है. सामरिक रंग खुफियागिरी के बगैर नहीं चढ़ता इसलिए युद्ध के प्रमुख व्यवसाय के अतिरिक्त इजराइल का सहायक उद्योग खुफियागिरी है.

इजराइल बनने के पूरे 69 साल बाद 4 जुलाई 1917 वह दिन था, जब पहली बार भारत के किसी प्रधानमंत्री ने इजराइल की यात्रा की. मोदी सरकार द्वारा इस यात्रा को 1992 से शुरू हुए कूटनीतिक संबंधों की रजत जयंती बताकर ढोल नगाड़े बजाकर ऐतिहासिक बताने के तमाशे भी आयोजित किए. तमाशे का शोर शांत होने पर उस यात्रा का असली मक़सद पता चला. भारत सरकार द्वारा बेहद ख़तरनाक इसरायली जासूसी उपकरण ‘पेगासस’ को ख़रीदने और उसे अनेक विपक्षी नेताओं, वकीलों और अनेक ऐसे महत्वपूर्ण अधिकारियों के मोबाइल में फिट करने का सौदा हुआ था जो सरकार की हाँ में हाँ नहीं मिलाते थे. इस काम में इजराइल का जवाब नहीं. अभी भी जाने कितने मोबाइल में यह ख़तरनाक जासूसी उपकरण अपनी ‘सेवाएं’ दे रहा है. खुफियागिरी का यह इसरायली क़रतब तो वह है जिसे सब जानते हैं. इजराइल खुफियागिरी के वे कारनामे करने में भी महारत रखता है जिसकी जानकारी स्वयं मोदी सरकार को भी नहीं होगी.

इजराइल की सरकार मानवता के विरुद्ध जघन्य अपराधों की क़सूरवार है

ख़ुद अमेरिका का उप-राष्ट्रपति बोल चुका है कि दुनियाभर में इजराइल का एक मात्र ‘हमदर्द’ देश अमेरिका है, उसे अमेरिका को नाराज़ नहीं करना चाहिए. अमेरिका इजराइल की मदद ना करे तो पश्चिम एसिया में इसरायली ख़ूनी दुकान के दो हफ्ते में शटर गिर जाएंगे, लेकिन उसके बावजूद अमेरिका की खुफियागिरी करने से इजराइल बाज नहीं आया. अमेरिकी नेवी के ख़ुफ़िया विभाग के अधिकारी जोनादन पोलार्ड को 1987 में आजीवन कारावास की सज़ा हुई थी क्योंकि वह अमेरिकी सेना की अत्यंत संवेदनशील गोपनीय जानकारी इजराइल को देता था. 2004 में लॉरेंस फ्रेंक्लिन नाम का अमेरिकी सैन्य अधिकारी गिरफ्तार हुआ क्योंकि वह अमेरिका सरकार की ईरान संबंधी नीति की जानकारी, ऐपक (American Israel Public Accounts Committee, AIPAC) नाम की इसरायली-अमेरिकी-युद्ध उद्योग गिरोह की ख़तरनाक संस्था के मार्फ़त इजराइल को देता था. मौजूदा अमेरिका-ईरान जंग के दौरान तो इसरायली ख़ुफ़िया एजेंसी ‘मोसाद’ की अमेरिका में ख़ुफ़िया गतिविधियों के आतंक का ये आलम है कि अमेरिकी सेना के दूसरे देशों के ख़ुफ़िया तंत्र विरोधी ख़ुफ़िया विभाग ने इजराइल द्वारा खुफियागिरी करने के खतरे को ‘अत्यंत गंभीर’ क़रार दे दिया है. जो देश अपने ख़ूनी मंसूबों के लिए अमेरिका की खुफियागिरी कर सकता है, वह मोदी सरकार को असल में क्या समझता होगा, यहां क्या-क्या कर रहा होगा, अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं.

अमेरिका के ज्यादातर सांसद तो ऐपक के ख़रीदे हुए हैं, उसी से पैसे लेकर चुनाव जीतते हैं लेकिन आज जब अमेरिका का आम मेहनतक़श अवाम इस जनसंहार और ख़ूनी जंग की हवश वाले देश से घृणा करने लगा है, ज़ायनवादी रक्तपिपासु फ़ासीवादी ज़ाहिलों को दौड़ाने लगा है, तब इस घृणित देश से मोदी सरकार की गलबहियां बढ़ती जा रही हैं, दोस्ती गहराती जा रही है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सबसे प्रिय देश मुसोलिनी के वक़्त इटली था और आज इजराइल है. इसलिए भी भारत-इजराइल सैन्य, ख़ुफ़िया और व्यापारिक गठजोड़ की असलियत को समझना, उसकी तह तक जाना बहुत ज़रूरी है. साम्राज्यवादी लूट-खसोट के इस विभत्स दौर में भारत-इजराइल के बीच हो रहे ‘विशिष्ट रणनीतिक गठजोड़ों (Special Strategic Alliances)’ पर नज़र रखना शोषित-पीड़ित अवाम की सेहत के लिए बहुत ज़रूरी है. इसलिए भी, क्योंकि इन रणनीतिक गठजोड़ों का बहुत उपरी सतही हिस्सा ही लोगों को बताया जाता है, उसके अंदर जो उसका असली ख़तरनाक भाग है, वह ‘राष्ट्र हित’ में अत्यंत गोपनीय रखा जाता है.

भारत के लोग नहीं, मोदी सरकार इसरायल द्वारा गाजा के जनसंहार में हिस्सेदार है

पिछले 12 साल के शासन में भाजपा ने आर्थिक ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में देश का जो बेड़ा गर्क़ किया है, उसका अनुमान लगाना संभव नहीं, उसकी भरपाई मुमकिन नहीं. दिलचस्प बात ये है कि इजराइल के साथ संबंधों के मामले में 90% देश एक तरफ़ है जिसका प्रतिनिधित्व गाजा में पिछले 2 वर्षों में इजराइल द्वारा ढाई जा रहीं बेइंतेहा हैवानियत, जनसंहार की जांच करने के लिए गठित ‘संयुक्त राष्ट्र स्वतंत्र जांच आयोग’ के अध्यक्ष सेवानिवृत्त जस्टिस एस मुरलीधर करते हैं, जिनके द्वारा तैयार शानदार रिपोर्ट को दुनियाभर के इंसाफ पसंद लोग बहुत आदर से पढ़ रहे हैं. उसके आधार पर युद्ध अपराधियों के विरुद्ध मुक़दमे दर्ज़ हो रहे हैं. दुनिया में भारत का सम्मान बढ़ रहा है. वहीं दूसरी ओर, एमनेस्टी इंटरनेशनल की 30 जुलाई को ज़ारी रिपोर्ट, ‘मेड इन इंडिया: द सप्लाई ऑफ वेपन्स एंड अम्युनिसन टू इजराइल’ ने साबित कर दिया कि इजराइल द्वारा अपने देश में और गाज़ा में जो मानवता के विरुद्ध जघन्य अपराध, जनसंहार किया है, मासूम बच्चों के खून से जो होली खेली है उसमें भारत की मौजूदा सरकार पूरी तरह से लिप्त है, सह-अपराधी है.

इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट में ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ के महासचिव एग्नेस कलामार्ड ने बताया है कि 7 अक्टूबर 2023 से 30 नवंबर 2025 के बीच कुल 2,596 जहाज गोला बारूद, 3,90,516 मशीन गन, 5,64,970 गोले, मिसाइल और दूसरे हथियार भारत सरकार ने इजराइल सरकार को भेजे. भारत की सैन्य साज़ो सामान बनाने की निजी कंपनियां जैसे ‘पी एल आर सिस्टम’ जो अडानी और ‘इजराइल वेपन इंडस्ट्रीज’ का संयुक्त उपक्रम है, ‘इंडो-एम आई एम’, ‘भारत फोर्ज ग्रुप’ की कंपनी ‘कल्याणी स्ट्रेटेजिक सिस्टम्स’ तथा ‘अशोका मैन्युफैक्चरिंग’ ने तो यह विध्वंशकारी युद्ध सामग्री सप्लाई की ही, भारत सरकार की मालिकाने के सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ‘म्युनिसंस इंडिया’, ‘इंडिया ओप्टेल’ तथा ‘एडवांस्ड इक्विपमेंट एंड म्युनिसंस इंडिया’ ने भी बहुत भारी मात्रा में आधुनिक तोपों के अत्यंत विनाशकारी गोले, राकेट लांचर, अत्यंत आधुनिक सेंसर तथा राडार आदि में काम आने वाले सेमी-कंडक्टर इजराइल को मुहैया कराए, जिससे इजराइल द्वारा गाज़ा में किए जा रहे जनसंहार में कोई कमी ना आने पाए. इस रिपोर्ट ने यह भी साबित कर दिया है कि भारत-इजराइल रणनीतिक मैत्री संधियों की आड़ में बहुत बड़े पैमाने पर युद्ध सामग्री का उत्पादन इजराइल की ख़ूनी और विस्तारवादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हो रहा है. हर समय युद्ध की भूख वाली इसरायली जायनवादी, फ़ासीवादी घृणित फ़ौज की ज़रूरत की वस्तुएं भारत में बन रही हैं. इसरायली युद्ध अपराधों में मोदी सरकार भागीदार है. चूंकि देश के 90% लोग समूची दुनिया की तरह दुनिया के नक़्शे पर एक कैंसर की शक्ल ले चुके इजराइल देश से बेहद घृणा करते हैं, मोदी सरकार इस घिनौने ख़ूनी व्यापार को चोरी-छुपे कर रही है.

20 जुलाई को छात्रों-युवाओं पर हुई पुलिस बर्बरता, पैलेट गन हमले का कहीं इजराइल कनेक्शन तो नहीं?

20 जुलाई 2026 को दिल्ली में दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं. पहली; ‘भारत इजराइल मुक्त व्यापार संधि’ की दूसरे दौर की मीटिंग वाणिज्य भवन में शुरू हुई जो 23 जुलाई तक चली. दूसरी; जंतर मंतर पर एक महीने से भी ज्यादा वक़्त से परीक्षाओं में फर्जीवाड़े को रोकने की मांग पर शांतिपूर्ण और अनुशासित प्रदर्शन कर रहे युवा आंदोलनकारियों ने जब संसद भवन कूंच किया, तब दिल्ली पुलिस ने ऐसी बर्बरता से योजनाबद्ध षडयंत्रकारी हमला किया जैसा पहले कभी नहीं हुआ; जैसे, कीलें गड़ी लाठियों से हमला, बैट्री संचालित बिजली का झटका देने वाले लट्ठों से हमला, महिला प्रदर्शनकारियों को पुरूष पुलिस अधिकारियों द्वारा पीटा, घसीटा जाना, महिला छात्रों से छेड़छाड़, पत्थरों से भे ट्रक को पुलिस स्टेशन के मालखाने से निकाल कर जंतर मंतर के मुहाने पर खड़ा किया जाना और सबसे अहम पैलेट गन से 7 राउंड गोलियां चलाया जाना जो कश्मीर के अलावा किसी क्षेत्र पर पहली बार हुआ.

इन दोनों घटनाओं को एक साथ पढ़े जाने की ठोस वज़ह मौजूद है. ज़ुल्म-ओ-ज़बर, दमन, विरोध की आवाज़ कुचलने के लिए किसी भी हद तक जाने के नए-नए तरीक़े इज़ाद कर आज़माना इजराइल की खूबी रही है. एक झटके में जान से मारने की बजाए तड़पाकर मारना, आंदोलनकारियों को अंधा, अपंग, अपाहिज़ बना डालने के लिए रबड़ की गोलियां, पैलेट गन का इस्तेमाल करना मानवता को इजराइल ने ही सिखाया. इजराइल को पैलेट गन और गोलियों की भूख अपार है. विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में महज़ 1 करोड़ की आबादी वाला छोटा सा देश इजराइल दुनिया में पैलेट गन और गोलियों का सबसे बड़ा ख़रीदार था. इजराइल को यह ख़ूनी सामग्री निर्यात करने वाले देशों में भारत पहले नंबर पर है. उसी रिपोर्ट के अनुसार भारत ने $23,91,280, यूरोपियन यूनियन ने $27,930, जर्मनी ने 22,770, स्पेन ने $5,340, थाईलैंड ने $1,000 मूल्य की पैलेट गन-गोलियां इजराइल को बेचीं. 2023 में ही भारत ने इजराइल के अलावा इन देशों को भी पैलेट गन और गोलियां निर्यात कीं: फ़्रांस $2,81,690, नेपाल $2,23,520, रूस $24,870, बांग्लादेश $4,350, कोमोरोस $200. भारत ने 2023 में कुल $29,25,910 मूल्य की 28,874 किलो पैलेट गोलियां निर्यात कीं और भारत समूची दुनिया को पैलेट गन और गोलियां सप्लाई करने वाला पहले नंबर का देश बन गया है.

सवाल उठता है कि क्या इस ख़तरनाक उत्पादन और व्यापार को भारत अकेले कर रहा है, या इस ‘पैलेट गन विश्वगुरु’ का असली गुरु इजराइल है? इस सवाल के उठने की यह वज़ह भी है कि भारत-इजराइल के बीच होने वाली किसी भी ‘रणनीतिक सैन्य मदद संधि’ को कभी भी स्पष्ट रूप से देश के सामने नहीं रखा जाता. संसद में भी कुछ नहीं बताया जाता. व्यापार में हर स्टेज पर रहस्यपूर्ण गोपनीयता बरती जाती है. जैसा की हम इन संधियों में प्रयुक्त शब्दावली से जानेंगे, चालाकी बरतते हुए जो बताया जाता है वह सवाल का जवाब देने की बजाए उसे और गहरा और रेखांकित कर देता है. बंदरगाह पर जहाज में इस विनाशकारी सामग्री का विवरण उसे जहाजों में लोड करने वाले मज़दूरों को भी मालूम नहीं होता. जंग के दौरान जब स्पेन के बंदरगाह पर वहां की ‘गोदी कर्मचारी यूनियन’ ने गाज़ा के मासूम बच्चों का क़त्लेआम करने वाली इस सामग्री को छूने से मना कर दिया और जहाज़ वहां रुका रहा, तब देश को मालूम हुआ कि भारत की संघी सरकार यह मानवद्रोही काम कर रही है.

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इजराइल के साथ रणनीतिक समझौतों का विवरण छिपाया क्यों जाता है?

क्या आप जानते हैं? भारत की यूनाइटेड पेमेंट इंटरफ़ेस (UPI) और इजराइल की MASAV के बीच पैसे के सीधे लेन-देन की सुविधा क़ायम हो गई है? ‘Indo Israel Cyber Centre of Excellence (CoE) Ethical AI Systems’, इस भारी भरकम नाम से दोनों सरकारों के बीच, आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस के मामले में क्षितिज स्कैनिंग (Horizon Scanning) के लिए विज्ञान एवं तकनीकी सहयोग क़ायम हो गया है? ‘आई 2 यू 2 (इंडिया, इजराइल, यूनाइटेड अरब एमिरेट, यू एस ए)’ नाम की संधि में क्या-क्या तय हुआ है? इजराइल के साथ साझा उत्पादन और तकनीकी सहयोग के नाम पर, जिसका उद्देश्य ‘आगामी पीढ़ी के लिए सैन्य साज़ो-सामान बनाना, ख़ुफ़िया तंत्र को मज़बूत बनाना एवं अति आधुनिक सैन्य उपकरणों का उत्पादन’ बताया गया है, किस प्रकार की संधियाँ मोदी सरकार ने इजराइल के साथ कर, इस पीढ़ी को ही नहीं बल्कि हमारी अगली पीढ़ी को भी बांध दिया जा रहा है? क्या यह देश किसी की जागीर है जो लोगों से पूछे बगैर आने वाली पीढ़ियों के बारे में फैसले लिए जा रहे हैं? ‘आपातकालीन संघर्ष क्षमता (resilience) बढ़ाना’, ‘ज़रूरत पड़ने पर सैन्य सामग्री का झटपट आदान-प्रदान, सुरक्षा संबंधी ख़तरा महसूस होने पर, पलक झपकते एक दूसरे की मदद को दौड़ पड़ना’ के अंतर्गत क्या-क्या तय हो चुका है? क्या यह सब जानने का अधिकार देश के जन मानस को नहीं है?

क्या आप जानते हैं? ‘ख़ुफ़िया सूचनाओं को साझा करना: अपने-अपने क्षेत्रों में महसूस हो रही चुनौतियों और अंतर्राष्ट्रीय आतंक का मुक़ाबला करने के लिए अत्यंत ख़ुफ़िया जानकारियां साझा करना, परस्पर मदद करना’ का सीधी-सपाट भाषा में क्या अर्थ समझा जाए? इजराइल को तो हर वक़्त जंग चाहिए, विनाशकारी युद्ध के बगैर वह दो दिन में तड़प उठता है, ‘वृहत इजराइल परियोजना’ में समूचे खाड़ी क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लेना चाहता है, तो क्या इजराइल की तरफ से युद्ध लड़ने के लिए भारतीय फ़ौज भी भेजी जाएगी? इजराइल की सरकार दुनिया का सबसे दुर्दांत आतंकवादी संगठन है, वह किस तरह आतंकवाद को ख़त्म करने में भारत की मदद करने वाली है? DRDO तथा ‘इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज’ ने मिलकर ‘बराक (MRSAM) मिसाइल सिस्टम परियोजना’ खड़ी की है. इसके क्या मायने समझे जाएँ? क्या देश की बुनियाद ही बदल डालने के लिए मोदी सरकार ने देश के लोगों से जनादेश प्राप्त कर लिया है या महामानवों को उसकी ज़रूरत ही नहीं होती? टवोर राइफल, नेगेव लाइट मशीन गन और ड्रोन का उत्पादन संयुक्त रूप से किया जा रहा है. यह भी इजराइल के साथ एक समझौता हुआ है. इसकी तफशील लोगों को तो छोड़िये, क्या ‘लोकतंत्र के मंदिर’ संसद को भी कभी बताई गई है?

इजराइल के साथ हो रहे सैन्य गठजोड़ का पूरा ब्यौरा देश को बताया जाए

‘अडानी-एल्विट एडवांस सिस्टम’ के अंतर्गत इजराइल के ‘हेर्म्स 900 मेल’ नाम के ड्रोन उत्पादन का कारखाना अडानी की साझेदारी में हैदराबाद में स्थापित हो गया है. 50,000 वर्ग फिट में फैली इजराइल के बाहर किसी देश में इजराइल की यह सबसे बड़ी यूनिट है. ‘कल्याणी – राफेल एडवांस सिस्टम’ नाम से भारत के कल्याणी ग्रुप (भारत फोर्ज) और इजराइल की कुख्यात हथियार कंपनी ‘रफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स’ की साझेदारी में हैदराबाद में ही अत्याधुनिक अचूक निशाने वाले अनेक हथियार, टैंक को निशाना बनाने वाली मिसाइल आदि बनने लगे हैं. ‘इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज’ और भारतीय कंपनियों ‘डी सी एक्स’ और ‘पुंज लोयड’ की हथियार बनाने की दो यूनिट तमिलनाडु में स्थापित हो चुकी हैं जहां रडार तथा अनेक प्रकार की अत्याधुनिक राइफल बनते हैं. ‘महिंद्रा डिफेंस’ और ‘इजराइल एरोनोटिक्स’ मिलकर ड्रोन बनाते हैं तथा ‘ऑर्बिटर 4 प्लेटफार्म’ के नाम से भारतीय नेवी के युद्धपोतों में उन्हें फिट भी करते हैं. मतलब भारतीय नौ सेना के अंदरूनी मामलों तक भी इजराइल की आधिकारिक पहुंच हो गई है! ‘इजराइल वेपन इंडस्ट्रीज’ तथा घातक हथियार बनाने की अडानी की कंपनी ‘पी एल आर सिस्टम्स’ के बीच युद्ध का साज़ो-सामान बनाने का बहुत व्यापक क़रार हो चुका है. सिविलियन पैलेट गन, ठीक वही जो 20 जुलाई को निहत्थे छात्रों-युवाओं पर चलाई गई, कश्मीर के युवाओं पर तो यह ज़ुल्म दशकों से ढाया जा रहा है, आंदोलनकारियों को आतंकित करने के लिए इस्तेमाल होने वाले इस दुर्दांत औज़ार का का उत्पादन भारत – इजराइल के संयुक्त उपक्रम ‘एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (AWEIL)’ द्वारा किया जा रहा है. पेगासस जासूसी उपकरण के क़रार की मौजूदा स्थिति क्या है? यह सारी जानकारी देश के जन-मानस को होना बहुत ज़रूरी है.

हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत कसोल घाटी को ‘लघु इजराइल’ कहा जाने लगा है क्योंकि इजराइल के युवा, वहां सेना की आवश्यक सेवा करने के बाद, अर्थात गाजा, लेबनान, सीरिया आदि में बर्बर जनसंहार करने के बाद, सरकार द्वारा यहाँ छुट्टियाँ मनाने भेजे जाते हैं. यहां इसरायली होटल, रेस्टोरेंट, इसरायली धार्मिक चबाड हाउस ही नहीं, बल्कि सड़कों मार्गों के सूचनापट तक हिब्रू भाषा में भी लिखे हुए हैं. गोवा में अंजुना, अरमबोल तथा राजस्थान के पुष्कर में भी इसरायली हत्यारे छुट्टियाँ मनाने, रिचार्ज होने आते हैं जिससे वापस लौटकर दोगुनी उर्ज़ा से वहां क़त्लेआम मचा सकें. सारी दुनिया जान चुकी है कि इसरायली सैनिक वास्तव में नृशंस हत्यारे हैं और वे जब भी विदेश घूमने जाते हैं तो अधिकतर देशों से खदेड़े जाते हैं या गिरफ्तार कर लिए जाते हैं. यहां इस बात का उल्लेख भी ज़रूरी है कि भारत में रह रहा यहूदी समुदाय जिसकी तादाद लगभग 4,500 है, इजराइल के जनसंहार में किसी भी तरह शामिल नहीं है, ना ही उनके प्रति घृणा या भेदभाव की भावनाएं देश में मौजूद हैं. उनमें से अधिकतर इजराइल सरकार द्वारा फिलिस्तीनियों पर ढाए जा रहे ज़ुल्म-ओ-सितम को पसंद नहीं करते.

इजराइल के साथ गठजोड़ से निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के इन सभी सैन्य सामग्री उत्पादन करने वाले कारखानों में क्या उत्पादन हो रहा है, उत्पाद का वितरण अथवा बिक्री किस तरह हो रही है, इस मामले में रहस्यपूर्ण गोपनीयता बरती जा रही है. सरकार का चरित्र इस मामले में संदेह के घेरे में है ही. ऐसी परिस्थितियों में अटकलों को रोका नहीं जा सकता. मोदी सरकार - राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा इजराइल के बीच तेज़ी से बढ़ते जा रहे सभी संबंधों को खुले रूप में संसद और जन मानस के समक्ष रखवाना बहुत अहम मुद्दा बन चुका है.

धुर दक्षिणपंथी ज़ायनवादी ज़हालत, मनु स्मृति की ज़हालत से कितना मेल खाती है!!

धुर दक्षिणपंथी ज़ायनवादी फ़ासीवादी विचारधारा के 4 स्तंभ हैं; कहानवाद (Kahanism), हिंसक घुसपैठिया आतंक (violent settler extremism), धुर दक्षिणपंथी राजनीतिक पार्टियाँ और धुर दक्षिणपंथी समूह. ‘कहानवाद’ के जनक रब्बी मेईर कहान के अनुसार यहूदी दुनिया की सबसे श्रेष्ठ नस्ल है. इश्वर ने यहूदी नस्ल को ख़ासतौर पर बनाया है, वे समूची मानवता में सर्वश्रेष्ठ हैं. एक दिन दुनिया यहूदी धर्मशास्त्र ‘हलाचा’ के अनुसार ही चलेगी. फिलिस्तीनियों और दूसरे सभी गैर-यहूदियों को इजराइल (वृहत इजराइल, जिसकी सीमाएं असीमित हैं) से अपनी इच्छा से ही कहीं दूर चले जाना चाहिए, यदि वे ऐसा नहीं करते तो उन्हें उनके बच्चों और महिलाओं समेत मार डालना नस्ली तौर पर श्रेष्ठ यहूदियों की ज़िम्मेदारी है. इन ‘एमलक’ (अरबी-फिलिस्तीनी लोगों के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द) लोगों की नस्ल को ही समाप्त करने से इश्वर खुश होगा. सेक्युलर और जनवादी होना एक विकृति है, यह नस्ली मिलावट का दुष्परिणाम है. कहानवाद अमेरिका और इजराइल दोनों जगह प्रतिबंधित है लेकिन मरणासन्न संकटग्रस्त पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के मौजूदा फासीवादी दौर में जब हर दकियानूसी, बेहूदगी, ज़हालत को जिंदा किया जा रहा है, तब नव-कहानवाद नाम से वह अपना विषैला फन बाहर निकाल रहा है.

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देश को शर्मिदा करने वाली तस्वीर; इजराइल का ज़ायनवादी, फ़ासीवादी युद्ध अपराधी स्मोटरिच इंडो-इजराइल डील पर साइन करते हुए

‘वेस्ट बैंक’ नाम के 1967 में इजराइल द्वारा ज़बरदस्ती क़ब्जाए क्षेत्र में कुल 7,00,000 यहूदी घुसपैठिए हैं, जिनके नाज़ियों जैसे मारक दस्ते हैं जिन्हें ‘द हिलटॉप यूथ’ कहा जाता है. ये सब छ्टे हुए कहानवादी हैं जिनका पूरी तरह अमानवियकरण हो चुका है. वे हर रोज़ वहां के मूलनिवासी फिलिस्तीनियों पर बेइंतेहा ज़ुल्म ढाते हैं. ऐसा कर वे खुश होते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे अपनी धार्मिक ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं. इतेमार बेन ग्विर की पार्टी ‘ओत्ज्मा येहुदित’ कहानवाद को सही मानती है. यह बेन ग्विर वही है जिसने फ्लोतिला में सवार यूरोपियन महिलाओं को बाल पकड़कर घसीटते हुए विडियो बनवाया था! सभी फिलिस्तीनियों का क़त्ल कर फिलिस्तीनी नस्ल को ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए, यह इस पार्टी की आधिकारिक मान्यता है. स्मोटरिच नाम का इजराइल का वित्त मंत्री बेन ग्विर से भी घिनौना व्यक्ति है जो ख़ुद को समलैंगिकों से नफ़रत करने वाला फ़ासिस्ट कहता है. उसका मानना है कि इजराइल को इस समूची धरती पर उसी तरह शासन करने का अधिकार है जैसे यहूदी धर्मग्रंथों में वर्णित राजा डेविड और राजा सोलोमन करते थे. ये बेहूदगी ही स्कूलों में इजराइल के बच्चों को पढाई जाती है. यही वज़ह है कि 80% से ज्यादा इसरायली यहूदी ईरान से और 70% से अधिक लेबनान से इन देशों को पूरी तरह नष्ट होने तक युद्ध ज़ारी रखने के पक्ष में हैं. ‘कहानवाद’ की यह नस्ली श्रेष्ठता वाली और इजराइल की भौगोलिक सीमाएं लगातार बढ़ाते जाने वाली बात पढ़ते हुए, ब्राह्मणवाद, मनु स्मृति में वर्णित दलितों और महिलाओं के बारे में ज़हरीले विचारों और ‘एक दिन अखंड भारत ज़रूर क़ायम होगा’ वाली कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादियों के विचारों तथा की याद ताज़ा हो जाती है. मोदी सरकार और राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ ‘वृहत इजराइल’ की तरह ‘अखंड भारत’ बनाने पर लगे हुए हैं.

इजराइल हमारी ‘फादरलैंड’ नहीं है; ‘हम भारत के लोग’ हत्यारे नेतन्याहू के साथ नहीं, फिलिस्तीनियों के साथ हैं

मुस्लिम समुदाय से घृणा में अंधी हुई मोदी सरकार, देश को, इजराइल के अक्षम्य और अनगिनत युद्ध अपराधों में सहभागी होने के विनाशकारी रास्ते पर बहुत दूर ले जा चुकी है. इस जन-विरोधी सरकार को यह सोचने की भी ज़रूरत महसूस नहीं हुई कि इजराइल के साथ ऐसी निर्लज्ज गलबहियों का खाड़ी के देशों से हमारे रिश्तों और वहां रोज़ी-रोटी कमाने गए 93 लाख भारतीयों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? खाड़ी देशों में अपनी कार्यकुशलता और व्यवहार से वहां के मेहनतक़श अवाम का दिल जीत रहे ये लगभग 1 करोड़ देशवासी भारत को हर साल $50 बिलियन से भी ज्यादा विदेशी मुद्रा भेजते हैं जो भारत के कुल निर्यात का 39% है. यूं तो समूची दुनिया ही लेकिन ख़ासतौर पर खाड़ी के देशों का मेहनतक़श अवाम इजराइल से घृणा करता है. इजराइल के गुनाहों में हमारे शरीक होने का मतलब उनकी घृणा के पात्र हम भी होंगे. उसका प्रभाव खाड़ी में काम कर रहे भारतीय लोगों पर क्या होगा, सोचकर ही सिहरन होती है.

मोदी सरकार को इस देश को गाजा के मासूमों के क़त्लेआम में घसीटने का कोई जनमत प्राप्त नहीं है. हमें उस ओर घसीटे जाने की हिमाक़त का पुरज़ोर विरोध होना चाहिए. इजराइल के साथ किए जा रहे सभी रणनीतिक समझौतों को शब्दश: प्रकाशित किया जाना ज़रूरी है. इस देश का मज़दूर मेहनतक़श वर्ग अपनी राष्ट्रिय आज़ादी के लिए बलिदान दे रहे, बहादुरी से लड़ रहे फिलिस्तीनी अवाम से अपनी एकजुटता का ऐलान करता है. अगर ईमानदारी से कराना संभव है, तो मोदी सरकार जनमत संग्रह करा कर देख सकती है; देश के 80% से ज्यादा लोग कहेंगे; इजराइल हमारी पित्रभूमि नहीं है, हम जनसंहार के अपराधी गाज़ा के मासूमों के खून में नहाए, हत्यारे नेतान्याहू के साथ नहीं, अपनी राष्ट्रिय आज़ादी की जंग लड़ रहे फिलिस्तीनियों के साथ हैं. मोदी और नेतन्याहू दोनों के उक्त बयान झूठे हैं.

इसरायली शासक वर्ग, ज़ायनवादी ज़ाहिल उस देश को जिस रास्ते पर ले जा रहे हैं, वह तबाह हो जाने वाला रास्ता है. पहले पूंजीवादी-साम्राज्यवादी लुटेरे ब्रिटिश साम्राज्य की तरह, ख़ूनी लठैत अमेरिकी लुटेरों का दूसरा साम्राज्य भी डूब रहा है. अमेरिकी बगला-बच्चा इजराइल उसके साथ ही डूब जाने वाला है. ‘हम भारत के लोग’ उसके साथ डूबने को तैयार नहीं हैं. दरअसल हम, अर्थात देश का मज़दूर मेहनतक़श अवाम किसी भी साम्राज्यवादी गिरोह के साथ नहीं हैं, क्योंकि हम मानते हैं कि पूरी तरह सड़ चुके, दुर्गन्ध फैला रहे मरणासन्न पूंजीवाद-साम्राज्यवाद को समूची दुनिया से जड़ से उखाड़े बगैर विनाशकारी युद्धों से राहत नहीं मिलने वाली. इस ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए जागतिक साम्राज्यवादी लड़ी की एक कड़ी, अपने-अपने देश में साम्राज्यवाद-पूंजीवाद को जन-क्रोध से बचाने की ज़िम्मेदारी निभा रही अपनी-अपनी सरकारों के विरुद्ध एकजुट संघर्षों की श्रंखला शुरू करनी होगी.

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