
- पहले हम कहीं कहीं नज़र आते थे लेकिन अब हम हर जगह दिखते हैं। लगता है, इक्कीसवीं सदी हमारी है।
- हमें नाम से नहीं, संख्या से जाना जाता है जैसे पांच, दस, पन्द्रह, इत्यादि।
- हमें नियुक्ति पत्र नहीं मिलता, सीधे नियुक्ति मिलती है। हम, ऊंची दीवारों के अन्दर काम करते हैं। बिल्कुल, प्रेमचंद के उपन्यास दो बैलों की कथा के कांजी हाउस की तरह।
- हमारी कैन्टीन भी अलग होती है और पानी के ड्रम भी। हमारी देखभाल के लिए बाउंसर तैनात रहते हैं।
- काम के घन्टों की जगह, हमारे लिए काम के दिवस होते हैं वो भी खगोल विज्ञान के अनुसार। जैसे, सूर्य निकलने से चन्द्रमा निकलने तक या सूर्य छिपने से चन्द्रमा छिपने तक। हमें अवकाश से मुक्त रखा गया है।
- हमें ताउम्र अकुशल रहने का वरदान मिला हुआ है और हम न्यूनतम मज़दूरी के हकदार हैं।
- दिखने में हम बिलकुल मानव जैसे हैं लेकिन हमारे साथ मानवों जैसा व्यवहार नहीं किया जाता, खास तौर से खाने, पानी और भाषा के मामले में।
- हम, सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं के झंझट से मुक्त हैं।
- हमारी मज़दूरी बढ़ने की प्रक्रिया भी बड़ी रोचक है। हम काम छोड़कर बाहर आएंगे। समाज हमारा संज्ञान लेगा। बल प्रयोग होगा, धाराएं लगेंगी और मुक़दमा चलेगा। फिर, हमारी मज़दूरी बढ़ेगी।
- हम, यूनियन नहीं बना सकते। हम, बनी बनाई यूनियन में भी शामिल नहीं हो सकते। अगर हम शामिल हुए तो उस यूनियन की मान्यता रद्द हो जाएगी। यानि, हमारा न्यूनतम स्तर बरकरार रखने के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।
- हमारे नियमित मज़दूर साथी हमसे पांच गुना ज्यादा मज़दूरी पाते हैं। उनकी यूनियन भी है और कई बार हमने उनके नेताओं को आते जाते देखा है। ना वो हमसे बोलते हैं और ना हम उनसे।
- गलती होने पर हमारे पैसे भी कटते हैं और इज्ज़त भी।
- हम जहां भी रहते हैं, वो जगह अवैध निकलती है। नयी जगह जाते हैं तो वो भी अवैध निकलती है। लगता है, हमारी ज़िन्दगी ही अवैध है। कहीं हम, इन्सानियत के अवैध प्रमाण पत्र तो नहीं?
- हमारे बारे में, लोग तरह तरह की बातें करते हैं। कोई कहता है, हम उदारवाद की उत्पत्ति हैं। कोई कहता है, हम वक्त की जरूरत हैं। कोई कहता है, हम व्यापार की सुगमता हैं और कोई कहता है, हम रीढ़ की हड्डी हैं। जितने मुँह, उतनी बात।
- हम निजी सम्पत्ति से मुक्त हैं तो क्या हम जन्मजात समाजवादी कहलाएंगे? समाजवादी कहते फिरते हैं कि निजी सम्पत्ति विहीन समाज बनाएंगे। तो क्या फिर, सब हमारी तरह हो जाएंगे या हम, सबकी तरह हो जाएंगे? ये सोचकर, खुशी के मारे, कहीं हमारे प्राण ही न निकल जाएं। वैसे, उन हालात में प्राण निकल भी जाएं तो कोई गम नहीं होगा।■
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