श्याम सुंदर पाठक बरौनी ज़िला बेगुसराय बिहार स्थित इंडियन आयल तेल रिफाइनरी में मज़दूर थे. 22 जून 2026 को जब वे अपनी ड्यूटी पर थे, एक भारी भरकम लोहे का पाइप उनके सर पर गिरा और वे लहू-लुहान, बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़े. उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डोक्टरों ने बताया, ये मर चुके हैं. मज़दूरों ने तय किया कि जब तक उनके परिवार को उचित मौत मुआवज़ा नहीं मिल जाता, श्याम सुंदर पाठक का अंतिम संस्कार नहीं होगा. पुलिस और इंडियन आयल प्रबंधन का हलक सूख गया. उन्होंने मृतक परिवार को 17 लाख रु मुआवज़ा तुरंत दिए जाने की घोषणा की और मज़दूरों तथा बिलखते परिवार को अंतिम संस्कार के लिए मना लिया.
‘डेड बॉडी’ परिदृश्य से हट गई और मज़दूर काम पर लौट गए. प्रबंधन और पुलिस ने राहत की साँस ली, चलो मामला निबट गया!! सोचा मज़दूर भी सोच लेंगे, ‘भगवान को यही मंज़ूर था!! लेकिन भगवान को यह मंज़ूर नहीं था!! श्याम सुंदर पाठक की तेरहवीं के दिन 5 जुलाई तक भी जब ‘तुरंत’ मिलने वाली 17 लाख रु की रक़म प्राप्त नहीं हुई, तो मज़दूर गुस्से में उबल पड़े. 6 जुलाई की सुबह 1000 से भी ज्यादा मज़दूर रिफाइनरी के गेट न 1 के बाहर इकट्ठे होकर नारे लगाने लगे. उनका ऐलान स्पष्ट था; ‘घोषणा’ से पेट नहीं भरता. अब 17 लाख नहीं, पूरे 23 लाख चाहिए जैसा पहले तय हुआ था. रोकड़ा प्राप्त हुए बगैर कोई अंदर नहीं जाएगा.’

काइयां प्रबंधन ने ‘ऊँची आवाज़ में आंख में आंख डालकर बात करने की जुर्रत’ करने पर मज़दूरों को सबक़ सिखाने का फ़ैसला लिया. इशारा मिलते ही सीआईएसएफ़ ने मज़दूरों पर लट्ठ बरसाने शुरू कर दिए. अपने साथी की दर्दनाक मौत को ना भूले मज़दूर अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं रख पाए और विद्रोह करते हुए जो भी गाड़ी-घोड़ा, गेट-फेट सामने नज़र आया सब उलट-पलट कर दिया. कुछ गाड़ियों में आग भी लगी. नोएडा की घटनाएं बताती हैं कि मज़दूर जब ‘पुलिस-कंपनी प्रबंधन गिरोह’ से डरने से इंकार कर लाल-लाल आंखें दिखाते हैं तो आगजनी ज़रूर होती है, वह पूरी तरह संदेहास्पद होती है और किसने की, यह किसी जांच में आख़िर तक पता नहीं चलता!! तोड़-फोड़ का शोर और नारों की आवाज़ ऊँची हो गई और कंपनी के अंदर भी पहुंचने लगी. अंदर वाले मज़दूरों में भी जब हलचल तेज़ हो गई और नारे कंपनी के अंदर से भी उठने लगे, तब प्रबंधन को जानवर-फ़रवरी याद आ गई!! तुरंत, वहीं गेट पर ही 23 लाख रु नक़द भुगतान हुआ तब मज़दूर अंदर गए.
मज़दूरों में यह क्रोध अप्रैल महीने से ही सुलग रहा था. बेहद आर्थिक तंगी से जूझ रहे, इसी बरौनी रिफाइनरी के मज़दूर, विमलेश कुमार पिछले 2 साल से हर रोज़ 12 घंटे, सप्ताह में सातों दिन, त्यौहारों पर भी उसी तरह काम करते जा रहे थे. ठेकेदार ने उन्हें कहा था कि पूरा ओवरटाइम इकठ्ठा मिल जाएगा. ओवरटाइम की रक़म जब 2 लाख से भी ज्यादा हो गई तो वे बेचैन होने लगे. ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं थे. कुल 11 मज़दूरों ने कंपनी से बिलकुल ऐसी ही लिखित शिकायत की, तब खलबली मची. मज़दूर उसी वक़्त अप्रैल महीने में ही बग़ावत करने वाले थे लेकिन इंडियन आयल कंपनी के शब्दों में ‘परिस्थिति की गंभीरता को भांपकर उठाए गए क़दमों से लंबित पड़े वेतन विवाद को सुलझा लिया गया. वैसे भी यह चंद मज़दूरों का सीमित विवाद ही था’.
ठेका मज़दूरों की यह घुटन अकेले बरौनी आयल रिफाइनरी की नहीं है. उनके लहू का आख़री क़तरा तक चूस लेने की यह व्यवस्था हर तरफ़ है. हरियाणा के सफ़ाई कर्मचारियों ने 37 दिन तक शानदार संघर्ष द्वारा हरियाणा सरकार को उनसे बात करने, उनके दुःख-दर्द को सुनने और उनकी अधिकतर मांगें मान लेने को मज़बूर किया. 11 सितंबर को समझौता साइन हुआ लेकिन सरकार के लिखित आदेश के बावजूद 700 से अधिक मज़दूरों को ठेकेदारों ने काम पर लेने से मना कर दिया. उन्हें फिर से संघर्ष करना पड़ा. दिल्ली परिवहन निगम के ड्राईवरों की हड़ताल में भी, जो 15 सितंबर से ज़ारी है, यही हो रहा है. सरकार कह रही है कि उनकी मांगें मान ली गई हैं लेकिन हड़ताल ज़ारी है क्योंकि मज़दूरों को भर्ती करने और उन्हें वेतन देने वाले ठेकेदार मानने को तैयार नहीं. इस साल फ़रवरी से अप्रैल महीनों के बीच देश के मज़दूरों ने शानदार लड़ाई की बदौलत लगभग सभी राज्य सरकारों को न्यूनतम वेतन, साप्ताहिक छुट्टी, 8 घंटे का दिन के मांगें मनावाई लेकिन सूरत में ठेकेदारों ने उन्हें मानने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं की. वहां मज़दूरों को एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिल रही थी. महीने में 30-31 दिन नहीं 26-27 दिन ही काम लिया जाए, इसके लिए उन्हें पुलिस के डंडे खाने पड़े.
आदमखोर ठेकेदारी प्रथा का काला चिट्ठा
मज़दूर अधिकार कागज़ों में तो बने रहें लेकिन लागू ना हों, कारखानेदार उन्हें लूटता भी नज़र ना आए, मज़दूरों की सांसों से निकलती लपटों को झेलने के लिए एक बिचौलिया खड़ा कर दिया जाए, पूंजी और श्रम के बीच होने वाली सीधी-सपाट जंग को टेढ़ी-मेढ़ी बना दिया जाए; पूंजी के राज़ की उम्र बढ़ाने के लिए इस तज़वीज़ की ज़रूरत पड़ेगी, इस बात को सरकार ने बहुत पहले, 1970 में उस वक़्त ही भांप लिया था, जब ‘ठेका मज़दूर (नियमन एवं उन्मूलन) क़ानून 1970’ (The Contract Labor (Regulation & Abolition) Act, 1970 CLRA) पास किया था. है ना कमाल की दूरदर्शिता!! इस क़ानून की मार्फ़त, मालिक- मज़दूर की ऐतिहासिक लड़ाई को शिथिल करने के लिए एक तीसरा खिलाड़ी बीच में उतार दिया गया. मालिक अब बन गया, प्रमुख एम्प्लायर और ठेकेदार एम्प्लायर की भूमिका में आ गया. उत्पादन का मालिकाना वहीं रहा जहां पहले था, प्रमुख एम्प्लायर के पास. मज़दूरों से जूझने के अप्रिय काम में लेकिन वह इस क़ानून के बाद पर्दे के पीछे हो गया. ठेकेदार को आगे कर दिया गया. मज़दूर और ठेकेदार के बीच की झूमा-झटकी को अब वह अपने वातानुकूलित चैम्बर की खिड़की से पर्दा हटाकर मुस्कुराकर देखने लगा.
इस क़ानून का असल मक़सद, इसके पहले पेराग्राफ ‘पृष्ठभूमि (background)’ से ही स्पष्ट हो जाता है; “ठेका मज़दूरी एक बहुत महत्वपूर्ण और लगातार बढ़ती जा रही व्यवस्था है जिसके अंतर्गत कंपनियां उन मज़दूरों को काम पर लगाती हैं जो ‘थर्ड पार्टी’ से संबद्ध होते हैं जिसे ‘ठेकेदार’ कहा जाता है. ज़ाहिर है; अनेक कारक जैसे लागत कम करना, उच्च उत्पादकता, रोज़गार में लचीलापन, मुख्य योग्यताओं पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता, सुविधा आदि की वज़ह से कारखानेदार ठेका प्रथा की ओर आकृष्ट हो रहे हैं.”
इतना स्पष्ट लिखने से भी अगर किसी को सरकार की समझ और दूरदर्शिता पर कोई शक हो तो वह तत्कालीन मुख्य श्रम आयुक्त इस टिप्पणी पर गौर करे जो उसी वक़्त की गई थी; “कॉर्पोरेट सेटअप और सरकार दोनों में कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट पर रखने का बढ़ता रुझान चिंता का विषय है, खासकर तब जब स्थायी कर्मचारियों और कॉन्ट्रैक्ट मजदूरों के वेतन में अंतर होता है.” चिंता के विषय पर चिंता करते हुए ठेका प्रथा को समाप्त करने की चिंता नहीं की बल्कि उसे नियमित करने, लागू करने की चिंता की!! भड़काऊ बात यह है कि इस क़ानून को जिसने ठेका मज़दूर नाम का मज़दूरों का हिमालय पहाड़ खड़ा कर दिया, ठेकेदारी को ‘नियमित और उन्मूलन’ करने के घोषित उद्देश्य से लाया गया था.
ठेका प्रथा से मुक्ति का काम अदालतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता
‘ठेका मज़दूर (नियमन एवं उन्मूलन) क़ानून 1970’ बनने के बाद अदालतों, खास तौर पर सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले ऐसे आए जिनसे यह भ्रम पैदा हुआ कि ठेका मज़दूरों पर ज़ुल्म होगा तो अदालतें न्याय करेंगी. नीचे दिए प्रमुख फैसले गौर तलब हैं.
गेमन इंडिया लिमिटेड बनाम भारत गणराज्य (सुप्रीम कोर्ट 1974, 1SCC596); “यह क़ानून ठेका मज़दूरों का शोषण रोकने और कार्य स्थल की दशाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से लाया गया था. यह क़ानून ठेका मज़दूरी के नियमन और उन्मूलन की व्यवस्था करता है. इस क़ानून का आधारभूत मक़सद जहाँ भी संभव है, ठेका व्यवस्था का उन्मूलन करना है और जहां कहीं भी इसे पूरी तरह हटाना संभव ना हो वहां ठेका मज़दूरों की कार्य दशा को इस तरह नियमित किया जाए कि मज़दूरों के वेतन के भुगतान और दूसरी सभी ज़रूरी सुविधाओं को सुनिश्चित किया जा सके. यही वज़ह है कि इस क़ानून में कार्य परिस्थितियों के नियमन तथा क्रमबद्ध उन्मूलन की व्यवस्था निहित है.”
भेल (BHEL) मज़दूर यूनियन बनाम भारत गणराज्य (सुप्रीम कोर्ट 1985, 1SCC630); “ठेका मज़दूर उन सभी सुविधाओं जैसे वेतन, भत्ते, छुट्टियां, काम के घंटे और कार्यस्थल की दशाओं के हक़दार हैं जो उस प्रतिष्ठान द्वारा नियुक्त किए गए उनके जैसे समान कार्य कर रहे मज़दूरों को उपलब्ध हैं. इस विशिष्ट मामले के मद्देनज़र यह भी स्वीकार किया जाता है कि ठेका मज़दूरों के वेतन से होने वाली कटौतियां भी बिलकुल उन मज़दूरों के वेतन से होने वाली कटौतियों के समान ही होनी चाहिएं जो प्रतिष्ठान के नियमित मज़दूरों के मामले में हैं. नियमित मज़दूरों की तरह ठेका मज़दूरों के मामले में सभी संबंधित श्रम क़ानून बिलकुल समान तरह से लागू होने चाहिएं.”
1991 के बाद से लेकिन निचली अदालतों के ही नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट के भी एक के बाद एक फैसले आते गए जो ठेका मज़दूरों और नियमित मज़दूरों में बहुत ही क्रूर भेदभाव को जायज़ ठहराते हैं और मुख्य मालिक को ठेका मज़दूरों के प्रति उनकी ज़िम्मेदारियों से मुक्त करते हैं. ‘स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया बनाम नेशनल यूनियन ऑफ़ वाटरफ्रंट वर्कर्स (2001)’ मामला एक अपवाद था जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ठेकेदार और मज़दूरों के बीच होने वाला एग्रीमेंट एक फ़र्ज़ी एग्रीमेंट (sham agreement) है. इसके आधार पर मुख्य मालिक जो सारे उत्पादन को हस्तगत कर रहा है वह ठेका मज़दूरों के प्रति अपनी किसी भी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता. ठेका मज़दूरों को नियमित करना होगा. इस क़ानून का सेक्शन 20 स्पष्ट करता है कि अगर ठेकेदार अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं कर रहा तो वे सभी जिम्मेदारियां मुख्य नियोक्ता को पूरी करनी हैं.
‘राम निवास बनाम मारुती सुजुकी इंडिया लि, मुक़दमा न 208 दिनांक 08.09.2016’ पर गुड़गांव की कुमुद गुगनानी की अदालत का 7 नवंबर 2025 को आया फ़ैसला अदालती संवेदनहीनता और पतन को रेखांकित करता है:
“इस न्यायालय की ओर से इस बात पर यह ध्यान दिए बिना निर्णय देना लापरवाही होगी कि आज की गलाकाट प्रतिस्पर्धा की दुनिया में, राष्ट्र निर्माण, प्रत्येक भारतीय का सबसे पवित्र कर्तव्य है. इतिहास, इस सबसे ज्वलंत तथ्य का गवाह है कि केवल वही अर्थव्यवस्थाएँ बची रहीं और फली-फूली हैं, जहाँ मज़दूर अनुशासन में रहे. यदि भारत को, मौजूदा वक़्त की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करनी है, तो उसे अपने श्रमिकों में कठोर अनुशासन लाना होगा. न्याय प्रदान करने वाले विभाग से कम से कम यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह गलत काम करने वाले कर्मचारी के प्रति सहानुभूति और करुणा दिखाने की बार-बार दोहराई जाने वाली भावनाओं के आगे न झुके और मज़दूर हित के कानून की आड़ में और अधिक अनुशासनहीनता को बढ़ावा न दे.
जहाँ तक मज़दूर के रोज़गार का सवाल है, यह रिकॉर्ड में दर्ज है कि उसने कहीं भी मज़दूरी के लिए आवेदन नहीं किया, फिर भी वह निश्चित रूप से अपने और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए कमाई कर रहा है. उसने यह भी स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि उसकी पत्नी, गाँव में एक किराने की दुकान चलाती है, जिसकी देखभाल भी वह खुद करता है. इसका मतलब हुआ कि बर्खास्तगी के बाद से वह निश्चित रूप से अपना गुजारा कर रहा है.
इसलिए, मज़दूर की सेवा से बर्खास्तगी को गलत या अवैध नहीं कहा जा सकता, अर्थात दोनों ही मुद्दों पर, तदनुसार, फ़ैसला मज़दूर के विरुद्ध दिया जाता है.”
‘नोकरी से निकाले जाने के 12 साल बाद भी मज़दूर अगर जिंदा है, तो उसे किसी आर्थिक मुआवज़े की ज़रूरत नहीं’ इस क्रूर अमानवीय सोच पर टिका यह फ़ैसला राजनीतिक शास्त्र के उस मूलभूत सिद्धांत को रेखांकित करता है कि वर्ग विभाजित समाज में न्याय प्रणाली भी शासक वर्गीय हितों से निष्पक्ष नहीं हो सकती. व्यवस्था पर संकट हो तो ‘न्याय’ का गाउन उतार फेंक समूची न्याय प्रणाली शासक वर्ग के सामने नत मस्तक हो जाती है.
ठेकेदारों की इतनी जुर्रत कैसे हो जाती है?
कैमरों से घिरा मुस्कुराता मंत्री जब मज़दूरों के साथ समझौते की घोषणा करता है, मिठाइयां मुंह में डाली जाती हैं, उसके बाद भी ठेकेदार पहले की तरह मज़दूरों को कुचलना ज़ारी रखता है. हर रोज़ होने वाले इस तमाशे की ठोस वज़ह मौजूद है. ‘प्रिंसिपल एम्प्लायर’ और ठेकेदार के बीच हुआ ‘कॉन्ट्रैक्ट एग्रीमेंट’ और कैमरों के सामने तमाशा कर रहे मंत्री की असली नीयत ठेकेदारों को इस जुर्रत का हौसला देती है. ठेकेदारी की टेंडर प्रक्रिया इस तरह होती है: मुख्य नियोक्ता अपने लिए मज़दूरों की ज़रूरत के आधार पर टेंडर ज़ारी करता है. हर पद के लिए वेतन निर्धारित कर ही उसका एस्टीमेट बनता है. कई ठेकेदार उस टेंडर के लिए प्रतियोगिता करते हैं जिससे टेंडर की रक़म एस्टीमेट से काफ़ी कम हो जाती है. सबसे कम रेट कोट करने वाले ठेकेदार को वह टेंडर अवार्ड हो जाता है. उसी के आधार पर स्टाम्प पेपर पर एग्रीमेंट साइन होता है जिसे भंग करने वाली पार्टी को अदालत में घसीटा जा सकता है. टेंडर अवधि में पिछले टेंडर एग्रीमेंट को रद्द कर, बढ़ी मज़दूरी के अनुरूप, परिवर्तित एग्रीमेंट के द्वारा ही ठेकेदार को नई दर से वेतन आदि का भुगतान करने को बाध्य किया जा सकता है.
मंत्री और उसके अमले को यह बुनियादी बात मालूम नहीं, ऐसी बात नहीं है. असली सवाल नीयत का है. मौजूदा दौर के मंत्रियों-संतरियों की नीयत मालिक-मज़दूर विवाद को न्यायोचित ढंग से सुलझाने की हो तो बनावटी मुस्कान लिए फ़ोटो खिंचवाते वक़्त ही उस मंत्री को यह घोषणा भी करनी चाहिए कि सरकार और मज़दूरों के बीच हुए समझौते के अनुसार मज़दूरों की सेवा शर्तें, वेतन, भत्ते आदि संशोधित हो चुके हैं. परिणामतः ठेका मज़दूरों के संबंध में ठेकेदारों और मूल नियोक्ताओं के बीच हुए सभी एग्रीमेंट तत्काल प्रभाव से रद्द समझे जाएं. नई घोषित सेवा-शर्तों के अनुरूप नए एग्रीमेंट होंगे लेकिन ठेकेदारों को तत्काल प्रभाव से नई सेवा शर्तों को मानना है, उनके अनुरूप ही भुगतान करना है. सरकारी आदेश की अवहेलना करने वाले ठेकेदारों को दंडित कर उन्हें ब्लैक लिस्ट किया जाएगा. इसके बाद किसी भी ठेकेदार की मज़ाल नहीं होगी कि वह मनमानी करे. ऐसा लेकिन होगा तब ही जब सरकार मक्कारी ना करे, अपनी घोषणाओं का सम्मान करे, उसकी नीयत ईमानदार हो, उसकी मंशा वही हो जो उसके मुंह से निकल रहा है.
मज़दूरों और सरकारों के बीच हुए किसी भी समझौते में क्या ऐसा होता है? केंद्रीय गृह मंत्री मीडिया के सामने बोल चुका है कि वे जुमले फेंकते हैं. वह बयान एक तरह से समूचे शासन तंत्र को एक तरह से दिशा निर्देश था कि वादे करो और भूल जाओ!! हरियाणा नगर निगम के 13,093 सफ़ाई कर्मियों को ठेका मज़दूरों के रूप में नियमित करने और ठेका मज़दूरों को स्थाई मज़दूरों की रिक्तता के अनुरूप नियमित करने अर्थात पक्का करने की मांग को ‘सिद्धांतत: मंज़ूर’ कर लिया गया है. यह घोषणा मुख्यमंत्री ने 11 सितंबर को की थी. आज के कम्प्यूटर युग में जब हर सरकारी काम ऑनलाइन है तब भी जब 28 सितंबर तक कागज़ों पर कोई हलचल होती नज़र नहीं आई, तब सफ़ाई कर्मचारियों ने हरियाणा के मुख्य मंत्री को चेतावनी दी, हमारे साथ खेल किया तो बहुत मंहगा पड़ेगा. हम हरियाणा सफ़ाई कर्मचारी यूनियन को बधाई देना और उन्हें सलूट करना चाहते हैं जो सरकार पर मानी गई मांगें मनवाने के लिए लगातार पर्याप्त दबाव बनाए रहे और हरियाणा सरकार से पूछते रहे; मज़दूरों से संबंधित कोई भी सकारात्मक कार्यवाही बैलगाड़ी की रफ़्तार से क्यों होती है, जबकि नकारात्मक गतिविधि ‘बुलेट ट्रेन’ की गति से चलती है?
सफ़ाई कर्मचारियों को नियमित करने के लिए ठोस क़दम उठाइये. उसी दबाव का नतीज़ा है कि 30 सितंबर को नियमित सफ़ाई कर्मचारियों की नियुक्ति का जैसा लेटर हरियाणा सरकार को ज़ारी करना पड़ा है वैसा लेटर बहुत दिन से देखने को नहीं मिला. वरिष्ठ आई ए एस, शैश्वत सांगवान की अध्यक्षता में हरियाणा सरकार ने एक कमेटी गठित की है जो नियमित सफ़ाई कर्मचारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया चलाएगी, जिससे सालोंसाल ठेके पर काम कर रहे सफ़ाई कर्मचारी नियमित हो सकेंगे. यूनियन को बधाई देते हुए हम उन्हें यह सलाह भी देंगे कि सरकार पर यूनियन का दबाव कम ना होने दें. गन्ने में से रस उसे कोल्हू में डालने से ही निकलता है!!!
‘जिंदा मज़दूरों का खून चूसकर फूलने वाली चुड़ैल’, ठेका प्रथा की भयावहता

2013-14 से 2023-24 तक देश में मज़दूरों की कुल तादाद में ठेका मज़दूरों के प्रतिशत का ग्राफ बढ़ता चला जा रहा है. 10 सालों में यह आंकड़ा 34% से बढ़कर 42% पहुंच गया है. इस ग्राफ पर गौर किया जाए तो पता चलता है कि यह प्रतिशत पहले 5 साल में जिस दर से बढ़ा, उसके बाद के 5 सालों में और ज्यादा गति से बढ़ा. इसका मतलब हुआ कि ना सिर्फ़ ठेका मज़दूरों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है बल्कि वृद्धि की दर भी बढ़ती जा रही है. 2023-24 से 2026 के बीच वृद्धि की यह दर और भी भयानक हो गई है. अभी के ठेका मज़दूरों के आंकड़े मौजूद नहीं हैं लेकिन इस ग्राफ के ट्रेंड से अंदाज़ लगाया जा सकता है कि यह आंकड़ा निश्चित रूप से 55% से ऊपर ही हो गया होगा. अगले पांच सालों में शायद ही कहीं कोई नियमित मज़दूर नज़र आए.
अमेरिका में ठेका मज़दूरों का प्रतिशत 10.8%, यूरोप में 12% तथा लेटिन अमेरिका के किसी भी देश में 20% से अधिक नहीं है. वहीं पूर्व एसिया के देशों जैसे इंडोनेशिया, थाईलैंड, फिलिपीन्स आदि में ठेका मज़दूरों का प्रतिशत हमसे भी ज्यादा 75% तक है. जल परिवहन में सबसे ज्यादा 82%, पेट्रोलियम और धातु उद्योग में 74.6%, टेक्सटाइल में सबसे कम 16.8% ठेका मज़दूर हैं.

ठेका मज़दूर महामारी, सरकारी विभागों- पब्लिक सेक्टर में निजी सेक्टर से भी ज्यादा भयानक है. सरकारी और पब्लिक सेक्टर में ठेका मज़दूरों का ग्राफ और कष्टदायी कहानी बयां करता है. 2013-14 में निजी सेक्टर में ठेका मज़दूर कुल मज़दूरों का 34% थे, वहीं सरकारी इदारों में उनसे कहीं कम मात्र 19% थे. इन दस सालों में निजी सेक्टर में ठेका मज़दूरों का प्रतिशत जहां 8% बढ़ा, वहीं इसी अवधि में सरकारी सेक्टर में यह 27.3% बढ़ा. सरकार ने ग्रेड 4 अर्थात चपरासी, ड्राईवर, स्वीपर, माली, लिफ्ट मेन आदि में सरकारी भर्ती 1991 से ही बंद की हुई है. इस ग्रेड में जो नियमित कर्मचारी सर्विस में बचे हैं, वे जल्दी ही रिटायर हो जाने वाले हैं. सन 2000 से ग्रेड 3 अर्थात क्लर्क, टाइपिस्ट आदि की सरकारी भर्तियां भी लगभग बंद हो चुकी हैं. ‘कम्प्यूटर ऑपरेटर’ के नाम पर ये भर्तियां भी ठेके पर की जा रही हैं. सभी सरकारी दफ्तरों, यहां तक कि पुलिस स्टेशन और अदालत तक में सारा क्लेरिकल कार्य ठेका कम्प्यूटर ऑपरेटर ही कर रहे हैं. यही वज़ह है कि सारे देश में केंद्र और राज्य मिलाकर 1 करोड़ से भी अधिक सरकारी पद खाली पड़े हैं जिन पर अब भर्तियां कभी नहीं होने वालीं. विपक्षी दल इन सरकारी पदों को भरने के भाषण पेलते रहते हैं लेकिन सरकार में जाते ही मुंह बंद कर दम साधकर बैठ जाते हैं.
ठेका मज़दूर मतलब गुलाम मज़दूर
ख़ुद सरकार अपने सभी विभागों में और धीरे-धीरे सभी पदों पर ठेका मज़दूर बिठा रही है और यही छूट वह सभी सरमाएदारों को दे रही है. ऐसा क्यों हो रहा है? उत्तर जानना कोई राकेट साइंस नहीं. नियमित मज़दूर, चाहे वह स्वीपर हो चाहे कैबिनेट सेक्रेटरी, होने का मतलब है; भर्ती होने की निश्चित अवधि के बाद नियमित होकर, निश्चित वेतन-भत्ते, पदोन्नति, छुट्टियों, वार्षिक वेतन वृद्धि, मंहगाई भत्ता वृद्धि, निश्चित काम के घंटे, यूनियन बनाने के अधिकार, स्वाभिमान-सम्मान के साथ काम करने का अधिकार, इलाज सुविधा, आजीवन पेंसन, फेमिली पेंसन, पीएफ, अनुशासनिक कार्यवाही के नाम पर दमन के विरुद्ध लड़ने के अधिकार आदि का हक़दार हो जाता है. सरकार ख़ुद मज़दूरों को इनमें से कोई अधिकार देना नहीं चाहती और पूंजीपति वर्ग की प्रबंध कमेटी होने के नाते यही छूट वह अपने आक़ा मालिकों को देना चाहती है. ‘सस्ते से सस्ता मज़दूर, ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा’, यही उसका मूल मंत्र है.
सरकार अब कुछ छिपा भी नहीं रही, सब डंके की चोट पर कर रही है. उसने बाक़ायदा क़ानून बनाकर मज़दूरों के वे सब अधिकार छीन लिए हैं, जो उन्होंने असीम क़ुर्बानियों से लड़कर हांसिल किए थे. पेंसन तक छीन ली गई है. ठेका मज़दूरों को भुखमरी वेतन के अलावा कुछ नहीं मिलता. ऊपर वर्णित कोई अधिकार, कैसी भी सामाजिक सुरक्षा उन्हें उपलब्ध नहीं है. काम के घंटे भी बस कागज़ों में लिखे हैं, असलियत में मज़दूर को, चाहे उसे कम्प्यूटर ऑपरेटर ही क्यों ना कहा जाता हो, जब तक मालिक/ बॉस चाहे तब तक काम करना होता है!! बीमार होने पर ईलाज तो छोडिए मरने पर भी कुछ नहीं. दाह संस्कार की मदद भी नहीं!! 80% मज़दूरों को पीएफ़ की कोई सुविधा भी उपलब्ध नहीं. चूंकि ज्यादातर मज़दूरों को छीने गए 29 मज़दूर अधिकारों में से कोई भी उपलब्ध नहीं था, इसलिए उनके छीने जाने के विरुद्ध मज़दूरों का ऐसा आंदोलन नहीं उठ पाया जैसा उठना चाहिए था या जैसा सरकार को अपने मंसूबों से पीछे हटने को मज़बूर करने के लिए आवश्यक था.
एक और महत्वपूर्ण पहलू है इस आदमखोर ठेकेदारी प्रथा का जिसे मज़दूरों का संभावित पीड़ित तबक़ा नज़रंदाज़ कर रहा है. मज़दूरों की विशाल-ओ-विकराल सेना का सबसे ज्यादा मेहनतक़श असंगठित तबक़ा या सरकारी मज़दूरों का ग्रेड 4 तबक़ा सारे मज़दूर अधिकार खो ही चुका है. उनके लिए 29 अधिकार छीनकर 4 लेबर कोड आने से कोई फ़र्क नहीं पड़ा. ज्यादातर मज़दूरों ने तो वे अधिकार कभी भोगे ही नहीं! दफ्तरों में वातानुकूलित मौसम में पेंट-शर्ट-टाई पहनने वाला, ठीक-ठाक वेतन पाने वाला मज़दूरों का वह हिस्सा, जो मज़दूर वर्गीय चेतना से बहुत दूर जा चुका है, जो नाक सिकोड़कर कहता है, ‘हमें इस पॉलिटिक्स में नहीं पड़ना’, जो ‘लेबर कोड रद्द करो, सभी मज़दूर अधिकार बहाल करो’ आंदोलनों में शरीक़ होना तो छोडिए, उन पर्चों को भी छूना नहीं चाहता जिसे मज़दूर कार्यकर्ता बांटते हैं, अब उनका नंबर लगने वाला है. ठेका मज़दूरों के पास तो खोने को कुछ बचा ही नहीं लेकिन इन टाई वाले मज़दूरों के पास खोने को बहुत कुछ है. टाइम आ गया है कि वे भी ‘इस पॉलिटिक्स’ में पड़ें, पर्चा हाथ में पकड़ें, उसे अच्छी तरह पढ़ें और मुटठी भींचकर अपने उन मज़दूर साथियों के साथ एक हो जाएं जिनकी फटी कमीज़ें पसीने में तरबतर रहती हैं, जिनके पैरों में चप्पल टूटी हुई होती हैं, जिनके दांत ब्रश किए हुए नहीं होते!
मज़दूरों की हत्यारी ठेका प्रथा को दफ़न करो
‘मज़दूरों को यूनियन नहीं बनाने देंगे, संगठित नहीं होने देंगे, उन्हें 12-15 घंटे रगड़ेंगे तो वे लड़ना भूल जाएंगे, हमेशा के लिए हमारे गुलाम बने रहेंगे, पूंजी और मुनाफ़े के हमारे पहाड़ हिमालय से भी बड़े हो जाएंगे’, नियमित मज़दूर ख़त्म कर हर तरफ़ ठेका मज़दूरों को भर्ती करने के पीछे सरकार और उसके आक़ा सरमाएदारों की यह सोच काम करती है. पैसे को ही माई-बाप समझने वाले इन शेखचिल्लियों ने इतिहास नहीं पढ़ा है. एक युग था जब इंसान ख़रीदे और बेचे जाते थे, तब भी विद्रोह हुए हैं. दासों ने अपनी ज़ंजीरें तोड़कर उनसे दास प्रभुओं के सर फोड़े हैं. प्रख्यात दास प्रथा विरोधी अमेरिकी योद्धा और मानवाधिकार कार्यकर्ता फ्रेडेरिक डगलस ने कहा है; “विद्रोह से भी ख़राब वह वज़ह होती है जो विद्रोह को पैदा करती है (The thing worse than rebellion is the thing that causes rebellion.)”
सामंतों के लिए खेतों में अपनी हड्डियां घिसने वाले किसानों को भी संगठित नहीं होने दिया जाता था. प्रतिरोध की भनक मिलते ही उन्हें उनकी झोंपड़ियों में जिंदा जला दिया जाता था. फिर भी कंकाल बन चुके उन्हीं किसानों ने सामंतों और उनके लठैतों, दबंगों को उनकी टांगें पकड़कर ज़मीन पर खचेड़ा है. भूखे प्यासे रहकर खेतों में पसीना बहाकर फ़सल उगाओ और उसके दो भाग ज़मींदार को सौंप दो, इस ख़ूनी व्यवस्था के विरोध में 1946-47 में बंगाल में उठे शानदार ‘तिभागा आंदोलन’ का नारा था; ‘निज खामरे धान तोलो!’ (धान की फसल को अपने आंगन में लाओ) और ज़मींदारों से छीनकर अपनी फसल को किसान वास्तव में अपने घर लेकर आए.
पूंजी की गुलामी के इस दौर में तो असंगठित मज़दूर अपनी ताक़त हर रोज़ दिखा रहे हैं. याद कीजिए, 23 फ़रवरी को इंडियन आयल रिफाइनरी का वह मंज़र जब पीले हेलमेट पहने 35,000 ठेका मज़दूरों का वह झंझावात उठा था जिसकी धमक से चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री का सिंहासन डोल गया था. जो सरकार 12 साल से मज़दूरों का न्यूनतम वेतन 11,200 से एक रु बढ़ाने को तैयार नहीं थी, उसने हाथ जोड़कर कहा था, 1 अप्रैल से 15,220/ से कम वेतन किसी को मिलता है तो उस मालिक को गिरफ्तार कर लिया जाएगा!! उसके बाद तो मज़दूरों के क्रोध से उठी लपटों ने एक के बाद देश के हर राज्य को अपनी चपेट में ले लिया था. सरकार और उसके आक़ा सरमाएदार याद रखें, देश के ये 60 करोड़ असंगठित मज़दूर संगठित भी हो सकते हैं. क्रांतिकारी वर्ग चेतना से लैस होकर वे एक दूसरे के साथ गोलबंद भी हो सकते हैं. सरकार का बढ़ता दमन और उसका नंगा होता चरित्र मज़दूरों को उसी दिशा में धकेल रहा है. दमन घनघोर होने पर जब संघर्ष के सभी छोटे रास्ते बंद कर दिए जाते हैं तो मज़दूर मुख्य हाई वे पकड़ लेते हैं. मज़दूरों की हत्यारी ठेका प्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकने के सिवा अब विकल्प नहीं बचा है. सरकार की नीयत और आचरण ख़ुद मज़दूरों को यह बहुमूल्य शिक्षा दे रहे हैं. नोट किया जाए, सर्वहारा वर्ग ही भविष्य का सत्ताधारी वर्ग है, आने वाला युग उसी का है.
