रविवार 6 सितंबर की दोपहर, साउथ कैंपस दिल्ली विश्वविद्यालय के नज़दीक सत्य निकेतन में ‘निजी हॉस्टल डेज’ नाम की 50 साल पुरानी, पुराने स्टाइल की कमज़ोर बुनियाद वाली पांच मंज़िला जर्जर बिल्डिंग भरभराकर ढह गई. आस-पास के विभिन्न कॉलेजों के लगभग 40 छात्र अपने दड़बे नुमा पीजी निवासों में दब गए. कम से कम 7 युवाओं की मौत हो चुकी है. दर्जन के क़रीब जिंदगी मौत की लड़ाई लड़ रहे हैं. दर्जनों मलबे के पहाड़ में दबे पड़े हैं. बिल्डिंग ढहने की वजह बेसमेंट में नवीनीकरण का काम बताया जा रहा है. वास्तव में मालिक बेसमेंट को खोदकर, रहने की जगह तलाशते बेहाल छात्रों के लिए कुछ और दड़बे बनाकर, और मुनाफ़ा खींचने की व्यवस्था कर रहा होगा!! निर्माण कार्य पर नगर निगम की निगरानी का ये आलम है कि पैसे के हवसियों को कोई भी हेरा फेरी करने की छूट है, बशर्ते हेरा-फेरी की गंभीरता के अनुसार निगम अधिकारीयों, पार्षदों की ‘सेवा-पानी’ करने की उसकी तैयारी हो.
दो महीने पहले लखनऊ के अलीगंज में बिलकुल ऐसे ही कंसंट्रेशन कैम्प में आग लगी थी जिसमें 15 से अधिक छात्र जिंदा जलकर मरे थे. छात्र खिड़कियों से मदद की गुहार लगाते रहे लेकिन लोगों को तो छोड़िये, फायर ब्रिगेड तक को वहां पहुँचने की गुंजाईश नहीं थी. पिछले साल अगस्त महीने में राजिंदर नगर नई दिल्ली में ऐसी ही एक बिल्डिंग की बेसमेंट में बाढ़ आ जाने से 3 छात्र डूबकर मरे थे.
दाखलों के लिए होने वाली परीक्षाओं में घोटाले हैं, दर्जनों छात्र उस हताशा को सहन ना कर पाने की वजह से खुदकुशी कर चुके हैं. एडमिशन हो जाए तो हॉस्टल नहीं हैं, पीजी उद्योग छात्रों का लहू पी रहा है. स्कॉलरशिप नहीं, ग़रीब बच्चे अवसादग्रस्त होकर नशे के शिकार हो रहे हैं, मर रहे हैं. शिक्षा पूरी हो गई हो तो नोकरी के लिए कोचिंग उद्योग में मरना होता है. कोटा में छात्रों की मौतें अब अख़बारों के अंदर के पन्नों में बामुश्किल जगह पाती हैं. मौत के इतने सारे कुओं से जिंदा बच कर निकल गए तो भी नोकरी तो मिलनी ही नहीं है. प्रतियोगी परीक्षाओं के नाम पर कई साल तक उलझाकर रखा जाएगा, नौकरी के सपने आते रहेंगे लेकिन नौकरी के वे ख़्वाब साकार नहीं होने वाले. केंद्र सरकार तथा सभी राज्य सरकारों ने भर्तियां बंद की हुई हैं.
क्या किया जाए? क्या इस व्यवस्था में थेगली लगाने की गुंजाईश बची है? कॉकरोच जनता पार्टी को भले संभावना नज़र आ रही हो, लेकिन क्या वास्तव में शिक्षा उद्योग में सुधार हो पाएगा? क्या सभी को समान, सर्व सुलभ, मुफ़्त शिक्षा, सभी को रोज़गार की कोई संभावना नज़र आती है? शेखचिल्ली टाइप बातों से कुछ नहीं होने वाला. मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को जो अब निर्मम मुनाफाखोर उद्योग बन चुकी है, समूल पलटने की दिशा में बढ़ना पड़ेगा और वह लक्ष्य पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़कर फेंके बिना संभव नहीं. युवाओं को अपनी शक्ति पहचानकर, दम घुटकर, अवसादग्रस्त होकर तिल-तिल मरने का रास्ता छोड़कर क्रांतिकारी रास्ते पर बढ़ना होगा. देश की क्रांतिकारी ऊर्जा का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी उठानी होगी. शहीद-ए-आजम भगत सिंह के बताए रास्ते पर चलकर असली आज़ादी की लड़ाई लड़नी होगी. तब ही वे सही मायने में ‘युवा’ कहलाएंगे.
07 सितंबर 2026
