‘तमिलनाडू फार्मर्स प्रोटेक्शन एसोसिएशन’ के नेता कृष्णामूर्ति को प्रतिरोध आंदोलन करने के लिए पुलिस ने आपराधिक मुक़दमे में फंसा दिया था. आंदोलनकारी मद्रास उच्च अदालत गए. जस्टिस एम निर्मल कुमार ने 26 जून को फैसला सुनाया, ‘प्रतिरोध करना जनवाद की पहचान है’. कार्यकर्ता ख़ुशी का इज़हार करते हुए
कार्य दिवस में श्रमिकों के काम के घंटे बढ़ाते जाना और उसमें ‘आवश्यक श्रम’ की अवधि घटाते जाना; पूंजी द्वारा अधिकतम अधिशेष अर्जित करने अर्थात ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा कूटने का आधारभूत नियम है; कार्ल मार्क्स एक वैज्ञानिक की तरह गणना कर 162 साल पहले ही सच्चाई समझा चुके हैं. श्रम की नैसर्गिक गति इसके ठीक विपरीत है. यही वज़ह है कि पूंजी और श्रम का द्वंद्व असमाधेय है. इनके बीच स्थाई शांति, दोनों में एक की निर्णायक पराजय से ही संभव है. ऐसे दौर भी आते हैं जब सतह पर शांति नज़र आती है, तब भी लेकिन ये दोनों पहलवान अपने अगले दांव की योजना और संघर्ष की तैयारी कर रहे होते हैं. पूंजी और श्रम के इस मूल द्वंद्व के इतिहास में झांका जाए, तो ऐसे अनेक अवसर नज़र आएंगे, जब कंगाल, साधनहीन लेकिन तादाद में विशाल मेहनतक़श वर्ग ने सर्व साधन संपन्न, महाबलशाली नज़र आने वाले सत्ताधीश मालिक वर्ग और उसकी ताबेदार सरकारों के छक्के छुड़ाए हैं और उन्हें अपनी ताक़त का अहसास कराया है, जैसे 1848, 1871, 1886, 1905, 1917 और 1945. सरमाएदार वर्ग और उसके शासन तंत्र को इन झटकों से उबरकर हमलावर होने में वक़्त लगा है और तब ही सर्वहारा वर्ग को कुछ लंबे समय तक राहत की साँस लेने के अवसर मिले हैं.
द्वितीय विश्व युद्ध में मज़दूर राज़ सोवियत संघ की शानदार, गौरवशाली जीत और उसके बाद वजूद में आए शक्तिशाली समाजवादी खेमे ने दुनियाभर के लुटेरे साम्राज्यवादियों को भीतर तक दहला दिया था. दस-बारह साल तक मालिक वर्ग और उसकी ताबेदार सरकारों को पूरी तरह रक्षात्मक रहने को मज़बूर होना पड़ा. क्रांतियों के डर से सभी औपनिवेशिक गुलाम देश, उसी दौरान ‘आज़ाद’ हुए और उन्हें मज़दूर वर्ग को राहत पहुँचाने वाले अनेक क़ानून बनाने पड़े. परिस्थितियां विपरीत होने पर, नीचे मुंडी कर बगुला भगत बन जाना, मज़दूर वर्ग को आर्थिक राहत देकर, उन्हें अपने ‘परिवार का हिस्सा’ बताकर ‘बुरा’ वक़्त निकाल लेना और परिस्थितियां अनुकूल होते ही भूखे भेड़िये की तरह मज़दूर वर्ग पर टूट पड़ना पूंजी की फ़ितरत है. शत्रु वर्ग की इस ख़ूबी को स्वीकार किया जाना चाहिए. 1957 से लगातार खोखले होते जा रहे समाजवादी खेमे को भी साम्राज्यवादी खेमा गंभीरता से लेता था, यह तब समझ आया, जब 26 दिसंबर 1991 को दीमक लगा सोवियत संघ का वह ढांचा भरभराकर ढह गया. सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी को जब उसी के महासचिव ने विसर्जित घोषित कर दिया और अपने आक़ा लुटेरे साम्राज्यवादियों के चरण चुंबन करने लगा.
मज़दूर अधिकारों को अकेले मोदी सरकार ने नहीं, 1991 के बाद हर सरकार ने लूटा है
1991, मज़दूर वर्ग के लिए बहुत तक़लीफ़देह मोड़ साबित हुआ है. कुछ समय के लिए ही क्यों ना हो, पूंजी का एकछत्र राज़ क़ायम हुआ. उसी की बदौलत पूंजीवाद उस जानलेवा संकट से अपनी जान बचाने में क़ामयाब हुआ. लाइसेंस-परमिट राज़ ख़त्म करने के उस नारे के पीछे शासक वर्ग की मंशा, दरअसल, 1945 के लाल झंडे की शान से घबराकर पास किए मज़दूर पक्षीय क़ानूनों को निष्प्राण करने की थी. असीम कुर्बानियों, अपने लहू से लाल हुई धरती से उपजाए 29 मज़दूर क़ानूनों को फ़ासीवादी मोदी सरकार 2019 – 20 में इसीलिए आसानी से रद्द कर पाई और उनकी जगह मज़दूरों के हाथ में 4 लेबर कोड का झुनझुना थमाकर इसीलिए साफ़ निकल गई, क्योंकि 1991 के बाद से हर रोज़ ये क़ानून कमज़ोर होते गए. हर रोज़ ज्यादा से ज्यादा मज़दूर इन मज़दूर क़ानूनों से ‘मुक्त’ होते गए. 5 साल पहले जब इन्हें दफ़नाया गया, तब बहुसंख्य मज़दूरों पर ये लागू ही नहीं थे. ‘लेबर कोड रद्द करो’ का नारा मज़दूरों में लोकप्रिय हुआ ही नहीं, क्योंकि असली कमेरे वर्ग को इसके लाभ मिल ही नहीं रहे थे. जिन्हें मिल रहे थे, वे ‘पक्के’ मज़दूर, राजनीतिक चेतना की शून्यता के चलते मालिकों की ओर झुके नज़र आते थे. यही वज़ह है, कई ठेका मज़दूर तो यह बोलते भी सुनाई पड़े, ‘हमारे लिए तो ये क़ानून कभी लागू थे ही नहीं, जिन्हें उपलब्ध थे उनसे भी छिन गए, अच्छा ही हुआ!’
ऐसा नहीं कि घोर प्रतिक्रिया के पिछले 35 वर्ष के लंबे, अंधेरे दौर में मज़दूरों ने लड़ाइयां नहीं लड़ीं. यह, लेकिन, स्वीकारना पड़ेगा कि 2026 के जनवरी महीने में बरौनी रिफाइनरी के मज़दूरों ने लाल झंडे लहराकर संघर्ष का जो बिगुल फूंका है, जिसकी लपटें हर रोज़ विस्तार लेती गई और मज़दूरों के विद्रोही तेवरों से, जिस तरह एक के बाद एक सरकारें हांफती नज़र आईं , वैसे हालात, मालिकों की दादागिरी के इस दौर में हुए दूसरे मज़दूर आंदोलन नहीं कर पाए. 2012 से ज़ारी शानदार मारुती आंदोलन में वे संभावनाएं नज़र ज़रुर आईं, ख़ासतौर पर आंदोलन में ठेका मज़दूरों के शामिल हो जाने के बाद, लेकिन नेतृत्वकारी संगठनो की संकीर्ण सोच की वज़ह से वह आंदोलन अपने उरूज़ पर पहुंचने और कुछ भी हांसिल कर पाने से पहले ही कुचल डाला गया.
पिछले 5 सालों में मज़दूर वर्ग ने बेइंतेहा अपमान झेला है
2014 से शुरू हुए मोदी काल में मज़दूरों के शोषण-दमन-उत्पीड़न और उससे भी पीड़ादायक, उन्हें ज़लील करने की प्रक्रिया बहुत तेज़ हुई और मज़दूरों के काम की परिस्थितियां हर रोज़ दमघोटू होती गईं . ‘व्यवसाय की सुगमता’ के नाम पर, मज़दूरों की हड्डियाँ तक चूस लेने की खुली छूट मालिकों को घोषित रूप से दे दी गई थी. मालिकों की धृष्टता हर रोज़ बढ़ती गई. मज़दूरों के 12 घंटे के कार्य दिवस से भी मुनाफ़े के हब्शी मालिकान खुश नहीं थे. “मज़दूरों को सप्ताह में 70 घंटे तो काम करना ही चाहिए” नारायण मूर्ति ने यह बयान अक्टूबर 2023 में दिया था, जो दिसंबर 2025 तक पुराना पड़ गया, जब ‘एल एंड टी’ चेयरमेन एस एन सुब्रमन्यन ने कहा “70 घंटे प्रति सप्ताह काम करने से भी देश विकसित राष्ट्र नहीं बनेगा, उन्हें 90 घंटे प्रति सप्ताह (मतलब हर रोज़ 15 घंटे) काम करना चाहिए. आप अपनी पत्नी को आख़िर कितनी देर घूर सकते हैं.” पूंजी के इन बेगैरत ज़मूरों की इच्छा मज़दूरों के काम के घंटे जानलेवा बनाने की ही नहीं थी, बल्कि उनके मंसूबे उन्हें पूरी तरह गुलाम बना लेने के थे.
ऐसे बयानों से मज़दूर समझ गए कि किसी खास स्तर तक उन्हें कुचलने के बाद दमन का कोल्हू रुक जाएगा, ऐसी बात नहीं है. ये ज़ालिम मालिक उनकी मौत तक, बेरहमी से चूड़ियाँ कसते ही जाने वाले हैं. हर तरफ़, यहां तक कि श्रम अदालतों तक में भी सारा काम ठेका मज़दूर ही कर रहे हैं. सारा उत्पादन और निर्माण इन्हीं के खून पसीने से हो रहा है. ठेका मज़दूरों को इंसान ही नहीं समझा गया. उन्हें किसी अधिकार के लायक़ ही नहीं समझा गया; इंसानी जीवन जीने लायक़ वेतन, 8 घंटे का कार्य दिवस, डबल रेट से ओवरटाइम, बोनस, सालाना वेतन वृद्धि, यूनियन बनाकर इज्ज़त के साथ मालिक के सामने बैठकर उसकी आंखों में आखें डालकर बात करना, काम के वक़्त चोट लगने, मौत हो जाने पर क़ानून संवत मुआवज़ा, पीएफ़, ईएसआईसी की सभी सुविधाएं, महिलाओं को कम से कम 6 महीने का सवेतन मातृत्व अवकाश, फैक्ट्री में क्रेच की सुविधा, पीने को स्वच्छ पानी, साफ़ शौचालय और सबसे अहम, ‘सुन, कल से काम पर मत आना’ कहने की मालिक की जुर्रत ना होना, विरोध करने, हड़ताल करने का अधिकार, ये अधिकार ठेका मज़दूरों को कभी मिले ही नहीं. इस बर्बर अन्याय के विरुद्ध बग़ावत की अग्नि मज़दूरों के सीने में काफ़ी वक़्त से धधक रही थी. बाक़ी अधिकार की क्या कहें, उनके पीने के लिए गेट से बाहर रखे ड्रमों में वह पानी था जिसे पशु भी ना पिएं!! पानीपत के मज़दूर बार-बार ड्रम का ढक्कन उठाकर दिखा रहे थे, उस पानी में कीड़े थे. महिलाओं के लिए भी शौच की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी. शौचालय में कितना वक़्त गुजारा, इसका हिसाब भी रखा जा रहा था. उनका खून ना खौलता, मुमकिन ही नहीं था.
महिना भर 12-15 घंटे भूखे पेट खटने के बाद, वेतन के नाम पर 10,000 रु जो ऐसे दिए जाते थे मानो खैरात बंट रही हो. हक़ीक़त ये है कि वेतन अगर जिंदा रहने लायक़ ना हो, तो काम के घंटे 8 होकर भी 8 नहीं रहते. छुट्टी होने से घंटों पहले मज़दूर अपने परिवार की चिंता कर सुपरवाइज़र के पीछे-पीछे घूमना शुरू कर देते थे, ‘सर ओवरटाइम करा लो!’ ऐसी ज़िल्लत कोई नहीं सह सकता. गंदी अंधेरी बस्तियों में मच्छरों के बादलों के बीच किसी तरह जिंदा मज़दूरों की कमर पीछे हटते-हटते दीवार से सट चुकी थी. वे समझ गए, उन्हें उनके पूरे परिवारों के साथ मौत की ओर धकेला जा रहा है. अब पीछे क्या हटना. बिखरे बारूद में चिंगारी का काम, अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान पर हुए हमले से पैदा गैस की क़िल्लत ने कर दिया. छोटे गैस सिलिंडर जिसमें उनके जीवन की गाड़ी चलाने वाला इंधन भरा होता है, की क़ीमतें मानो बेक़ाबू हो गईं. जैसे-तैसे दो रोटी लपेटकर काम पर ले जाना भी उनकी हैसियत से बाहर हो गया.
‘हम महकूमों के पांव तले जब धरती धड़-धड़ धड़केगी!’
हड़ताली नोएडा रेडीमेड गारमेंट वर्कर्स को घेरे यू पी पुलिस. जीने लायक़ वेतन की मांग कर रहे 300 से भी अधिक मज़दूरों को विभिन्न गंभीर मुक़दमों में फंसा दिया गया है. दो राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगाया गया है.
जब खोने के लिए अक्षरसः कुछ नहीं बचा, तब मज़दूरों के क्रोध का ज्वालामुखी फूट पड़ा, जिसका सबसे धधकता मंज़र पानीपत की इंडियन आयल की रिफाइनरी बनी. तीखे मज़दूर आक्रोश आंदोलन की इस मौजूदा लहर को शुरू करने का श्रेय तो बरौनी रिफाइनरी के मज़दूरों के नाम रहेगा, जिन्होंने साल 2026 शुरू होते ही अब और सहन ना करने, पीछे ना हटने का फ़ैसला कर लिया था, लेकिन 23 फ़रवरी को जैसे ही एक निर्माण मज़दूर निर्माणाधीन बिल्डिंग से गिरा, पानीपत रिफाइनरी में काम कर रही 35,000 मज़दूरों की सेना टूट पड़ी. क्रोध में उठते नारों का शोर पीले हेलमेट का ऐसा तूफ़ान उठा जिसे दरबारी मीडिया ने भी हड़ताल या आंदोलन नहीं ‘विद्रोह’ लिखा. खोने को कुछ भी ना बचे और कमर पीछे दीवार से सट गई हो तो मज़दूरों का मुक़ाबला कोई नहीं कर सकता. पीले हेलमेट वाली उस अग्नि धारा के सामने उनके ऊपर रौब गांठने वालों की टांगें उनकी पतलूनों में कांपती नज़र आ रही थीं. उस धधकते ज्वालामुखी ने चंडीगढ़ ही नहीं दिल्ली में बैठे हुक्मरानों को भी हिला दिया था. सतह पर मज़दूर आक्रोश के बारूद की मोटी परत पूरे देश में बिछी हुई है ही, उसके बाद तो एक के बाद एक, फरीदाबाद, गुड़गांव, मानेसर, भिवाड़ी, चौपांकी, नीमराना, धारूहेड़ा, सोनीपत, नोएडा, हापुड़, मथुरा आदि एनसीआर रूपी पेट्रोग्राद के एक के बाद एक, सारे किले ढहते चले गए. दिल्ली, हरियाणा, यू पी, राजस्थान के बाद उत्तराखंड और पंजाब का नंबर लग गया. गुजरात, एम पी, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र होते हुए मज़दूर आक्रोश की तपिश दक्षिण में बहुत दूर तक पहुंची.
मज़दूर आंदोलन की यह लहर स्वत:स्फूर्त थी लेकिन अराजक नहीं थी. प्रभावशाली इतनी थी कि एक जगह भी मज़दूर ख़ाली हाथ काम पर नहीं लौटे. आंदोलन की वज़ह इतनी ठोस थी कि इशारा होते ही काम पर लगा हर मज़दूर उठ खड़ा हुआ, उसे पता था, क्या करना है. क्या परिणाम होगा, उस चिंता का बोझ उस दिन मज़दूरों ने सर से उतारकर फेंक दिया था. जब कुछ छोड़ा ही नहीं तो निज़ाम छीन क्या लेगा? मज़दूरों की समझ स्पष्ट थी, आक्रोश में भी होश नहीं खोना है. मानेसर-गुड़गांव और नोएडा में जो भी हिंसा, आगजनी हुई है, वह मज़दूरों ने नहीं की. यह सच्चाई यूपी और हरियाणा की सरकारों को भी मालूम है, वर्ना अब तक जांच के आदेश ज़ारी हो गए होते और जांच रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत कर मज़दूरों की ज़मानतें रोक दी गई होतीं. संदेश इतना स्पष्ट और निज़ाम की कुर्सी हिला देने वाला था कि स्थानीय एसएचओ से मुख्यमंत्री तक कोई नहीं कह सकता, उसे समझ नहीं आया, मज़दूर आख़िर चाहते क्या हैं!!
वेतन में ठीक-ठाक वृद्धि किए बगैर मज़दूर गला नहीं छोड़ने वाले, ‘डीप स्टेट’ समझ गया!! सरकारों ने जो काम पिछले 11 सालों में सैकड़ों प्रदर्शनों, सभाओं, ज्ञापनों के बावजूद नहीं किया, वह 3 अप्रैल को फटाफट हो गया, बल्कि बाद में पता चला कि वह तो फ़रवरी महीने में ही हो गया था, मज़दूरों को बताया नहीं जा रहा था. मज़दूर जब तक सड़कों पर मरे पड़े नज़र ना आएं, तब तक वेतन क्यों बढाएं!! हरियाणा सरकार ने जब न्यूनतम वेतन में 35% की घोषणा कर दी, पुलिस ने हाथ जोड़कर मज़दूरों से कहा; भाई, ‘इब तो मशीन्नें चाल्लू कर द्यो!’
15,220/ न्यूनतम वेतन की घोषणा करते हुए भी हरियाणा सरकार मज़दूरों से बेईमानी करने से नहीं चूकी. 23,196 न्यूनतम वेतन नहीं दिया, जिसकी घोषणा हरियाणा सरकार द्वारा गठित न्यूनतम वेतन कमेटी 29 दिसंबर 2025 को ही कर चुकी थी. मज़दूरों को हड़ताल से हटाकर काम पर लगाने के बाद, सरमाएदारों का मुनाफ़े का कोल्हू शुरू होते ही, क्रूर दमनकारी सरकारी तंत्र, आंदोलन के अगुवा मज़दूरों और मज़दूर कार्यकर्ताओं पर टूट पड़ा. जन हस्तक्षेप की तथ्य अन्वेषक टीम द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार गुड़गांव मानेसर में लगभग 100 मज़दूरों को गिरफ्तार किया गया. नोएडा में 1,000 से भी अधिक मज़दूरों और मज़दूर कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया, जिनमें लगभग 100 लोग अभी भी लक्सर जेल में बंद हैं. प्रख्यात पत्रकार, राजनीतिक कार्यकर्ता सत्यम वर्मा तथा छात्र कार्यकर्ता आकृति पर दमनकारी धारा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून’ लगाई गई है जिससे उन्हें लंबे वक़्त तक जेल में रखकर मज़दूर कार्यकर्ताओं को आतंकित किया जा सके.
मज़दूरों के तेवर देखकर, उस यूपी सरकार ने भी न्यूनतम वेतन में 21% की घोषणा की, 200 से अधिक ठेकेदारों के लाइसेंस रद्द किए 1.16 करोड़ के बकाया वेतन का भुगतान कराया, जो समझती थी कि ग़रीब-गुरबों, भूख और बेरोज़गारी समेत मेहनतक़शों की हर समस्या का समाधान बुलडोज़र आतंक से हो सकता है!! “भाइयो, आपको घोषित न्यूनतम वेतन के भुगतान, बोनस और डबल रेट से ओवरटाइम भुगतान की गारंटी हम देते हैं, आप अपने काम पर लौट जाइए”, नोएडा में मज़दूरों के हुजूम के सामने यूपी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा विनम्रतापूर्वक दिया गया यह भाषण, उन मज़दूरों की शक्ति का प्रमाण है जिन्हें फ़ासिस्ट मोदी-योगी सरकार में इंसान ही नहीं समझा गया.
हमारे कार्यभार: आंदोलनरत मज़दूरों और मज़दूर संगठनों के बीच की दूरी मिटानी है
पार्लेजी के 5 रु वाले बिस्किट पैकेट और चाय में 12-15 घंटे हाड़तोड़ काम, दिन भर अपमानित होना, शाम को गंदे नाले के किनारे झुग्गी में भिनभिनाते मच्छरों के बीच ‘आराम’, वह झुग्गी अवैध जिसे कभी भी तोड़े जाने की दहशत, बच्चों को शिक्षा नहीं, भविष्य नहीं, परिवार को साथ रख नहीं सकते, कैसी भी आपदा आ जाए, हज़ारों मील दूर जाना और फिर उसी जगह लौट आने की मज़बूरी, फिर वही ज़िल्लत; कोई जिंदा इंसान विद्रोह किए बगैर नहीं रह सकता.
मज़दूरों की ऐसी ही परिस्थितियों का बारीकी से अध्ययन कर अपनी कालजयी पुस्तक, ‘इंग्लैंड में मज़दूर वर्ग की दशा’ में, फ्रेडेरिक एंगेल्स इस अपराध के लिए सिर्फ़ मालिक पूंजीपतियों और उनकी ताबेदार सरकारों को ही दोषी नहीं ठहराते, बल्कि पूरे के पूरे समाज को मज़दूरों की इस ‘सामाजिक हत्या’ का क़सूरवार मानते हैं, पूरे समाज को मज़दूरों का इरादतन हत्यारा कहते हैं; “अब मैं यह साबित कर सकता हूँ कि इंग्लैंड का समाज हर दिन और हर पल वह काम कर रहा है, जिसे मज़दूरों के संगठनों को बिलकुल सीधे तौर पर 'सामाजिक हत्या' कहना चाहिए; यानी समाज ने मज़दूरों को ऐसे हालात में डाल दिया है, जहाँ वे न तो अपनी सेहत का ख़याल रख सकते हैं और न ही लंबी ज़िंदगी जी सकते हैं; यह समाज धीरे-धीरे इन मज़दूरों की ज़िंदगी को खत्म कर रहा है और उन्हें समय से पहले मौत के मुँह में धकेल दे रहा है. यह साबित करना भी कठिन नहीं है कि समाज जानता है कि ऐसे हालात मज़दूरों की सेहत और ज़िंदगी के लिए जानलेवा हैं, फिर भी उनकी हालत सुधारने के लिए कुछ नहीं करता. समाज चूंकि अपने इन कामों का अंजाम जानता है; इसलिए उसका यह काम गैर-इरादतन हत्या नहीं, बल्कि हत्या है. मेरा यह आरोप स्वयं सरकारी दस्तावेज़ों, संसद और सरकार की रिपोर्टों से साबित हो जाता है.” क्या आप मज़दूरों की इस इरादतन हत्या में शरीक़ होना चाहेंगे?
- लीगल कमेटियां गठित करेंगे
जिंदा रहने लायक़ वेतन मांग कर रहे हड़ताली मज़दूरों पर पुलिस दमन
गुड़गांव, मानेसर और नोएडा में कुल कितने मज़दूरों, मज़दूर कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया, कितनों को गिरफ्तार किया गया और कुल कितनी एफआईआर दर्ज़ हुईं, ये महत्वपूर्ण आंकड़े आज तक उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि गिरफ़्तारी के वक़्त पुलिस को जो ज़रूरी कानूनी क़दम उठाने होते हैं, जैसे गिरफ़्तारी का कारण बताना और वारंट दिखाना, ज़ब्ती मेमो बनाना, उसकी प्रति पीड़ित के परिवार वालों को देना, कब और कौन सी अदालत में हाज़िर किया जाएगा यह बताना, वे भी पूरे नहीं किए गए. गिरफ्तारियां महीनों बाद तक ज़ारी रहीं, क्योंकि हर एफआईआर में कुछ नामों के बाद ‘अन्य’ लिखा हुआ है.
किसी भी व्यक्ति को कहीं भी पुलिस द्वारा ‘अन्य’ में शामिल बताकर दबोच लिया गया. अधिकतर को हिरासत में बर्बर यातनाएं दी गईं. कुछ मामलों में पीड़ित परिवार के सदस्य को इसलिए धर लिया गया क्योंकि उसने पुलिस से गिरफ़्तारी की वज़ह जानने की ‘जुर्रत’ की. ऑनलाइन उपलब्ध जानकारी के अनुसार गुड़गांव, मानेसर में कुल 61 गिरफ्तारियां हुईं जिनमें 20 महिलाएं हैं. 11 व्यक्ति अभी भी भोंडसी जेल में बंद बताए जा रहे हैं. सबसे पहले 6 मज़दूर कार्यकर्ताओं को पानीपत में गिरफ्तार किया गया था. नोएडा में 350 – 400 मज़दूरों को गिरफ्तार किया गया. कुछ अख़बार यह आंकड़ा 1000 भी बताते हैं.
आज (29 जून) को ताज़ा क़ानूनी स्थिति इस प्रकार है: नोएडा- कुल 11 एफआईआर दर्ज़ हैं; 116/26, 117/26, 149/26, 151/26, 157/26, 158/26, 163/26, 164/26, 165/26, 169/26 तथा 172/26. इनमें कुल 173 लोगों के नाम हैं जिनमें 97 को ज़मानत मिल चुकी है लेकिन उनमें भी कई अभी तक जेल से नहीं छूटे क्योंकि ज़मानतियों की संपत्ति, दस्तावेज़ों का सत्यापन नहीं हो पाया. 2 साथियों पर राष्ट्रिय सुरक्षा क़ानून लगा है. कई साथी एक से अधिक एफ़आईआर में आरोपी हैं. सभी लक्सर जेल में बंद हैं. मानेसर- ‘आल इंडिया लायर्स एसोसिएशन फॉर जस्टिस (AILAJ) के 5 वकील जिन्होंने मज़दूरों को क़ानूनी मदद पहुंचाई, अभी भी जेल में बंद हैं. सभी गिरफ्तार साथी जो भोंडसी जेल में बंद थे, जेल से रिहा हो चुके हैं. (साभार साथी राखी सहगल)
नोएडा में ख़ासतौर पर सेसन कोर्ट से बहुत कम लोगों को ज़मानत मिली है. जिनको मिली है इलाहबाद उच्च न्यायलय से ही मिली है जिसकी शर्तें बहुत सख्त हैं जिनका पालन किसी तरह अपने परिवार को जिंदा रख पाने वाला मज़दूर नहीं कर सकता. अदालतों द्वारा बिलकुल नग्न तरीक़े से मज़दूर विरोधी और मालिक/ सरकार परस्त रुख ग्रहण कर लेना, इस निज़ाम के ताबूत में आखरी कील साबित होगा लेकिन उसे झेलने, निबटने के इंतेज़ाम करना मज़दूर संगठनों का पहला महत्वपूर्ण कार्यभार है. मज़दूर वर्ग से प्रतिबद्धता रखने वाले वकीलों का एक सशक्त पेनल बनाना हमारी पहली ज़िम्मेदारी होनी चाहिए. कोई भी मज़दूर अदालती चक्करों और खर्च का बोझ नहीं उठा सकता. यह ज़िम्मेदारी मज़दूर संगठनों और कार्यकर्ताओं ने नहीं उठाई तो ना सिर्फ क़ानूनी लपेटे में आए मज़दूर आगे कभी मुंह नहीं खोलेंगे, बल्कि दूसरे मज़दूर भी अन्याय का विरोध करने से पहले दस बार सोचेंगे. देश की जेलों में 5000 से ज्यादा ऐसे क़ैदी बंद हैं जिनकी ज़मानत मंज़ूर हो चुकी है, लेकिन ज़मानतियों की व्यवस्था ना कर पाने की वज़ह से जेल में हैं.
- पीड़ित मज़दूर आर्थिक मदद कोष गठित करेंगे
जिस मज़दूर परिवार का एक मात्र कमाने वाला व्यक्ति पुलिस द्वारा उठा लिया गया, महीनों से जेल में बंद है, उसके परिवार पर क्या बीतती है, वह परिवार ही जानता है. मज़दूर के भाई और दूसरे रिश्तेदार, दोस्त भी मज़दूरी कर किसी तरह जिंदा रहने की ही ज़द्दोज़हद कर रहे होते हैं. उन्हें अपने सगे संबंधी पर आई मुसीबत का दर्द कम नहीं होता, लेकिन क्या करें? जेब में पैसे ना हों, घर में खाने की व्यवस्था ना हो तो अपने सगे भाई के प्रति भी अपनी भावनाएं कैसे ज़ाहिर करें? ग़रीब मेहनतक़शों को यहाँ हर रोज़ अपनी भावनाओं का गला घोंटना होता है. लेनिन के शब्दों में; “मध्ययुगीन व्यवस्था की तुलना में बुर्जुआ लोकतंत्र एक बड़ी ऐतिहासिक प्रगति तो है, लेकिन यह हमेशा सीमित, अधूरा, झूठा और पाखंडपूर्ण ही रहता है—और पूंजीवाद के तहत तो ऐसा ही होना तय है. यह अमीरों के लिए स्वर्ग और शोषितों व गरीबों के लिए एक झांसा और धोखा होता है.”
मज़दूर संगठन और उनसे सरोकार रखने वाला समाज अगर मज़दूरों को इस ज़ालिम व्यवस्था से लड़ते देखना चाहता है तो उनके परिवारों से भी सरोकार रखना होगा. सिर्फ़ जोशीले भाषण देने और पर्चे बांटने से मज़दूर वर्गीय चेतना नहीं आती, ना वह आसमान से टपकती है. उसके लिए बौद्धिक जागरूकता लाने के साथ-साथ धरातल पर ठोस कार्य भी करने होते हैं. किसी ज़माने में यह इस देश में होता भी था. बॉम्बे टेक्सटाइल मिल मज़दूरों और डीसीएम दिल्ली में महीनों तक चलने वाली हड़तालें ऐसे ही चली हैं. सामुहिक रसोइयाँ चली हैं. पब्लिक फंडिंग तथा जन भागीदारी की रवायत को जिंदा कर उसे मज़बूत बनाना होगा. मज़दूर आंदोलन की मौजूदा शानदार लहर में मज़दूरों ने तो अपना फ़र्ज़ पूरा करने में क़सर नहीं छोड़ी, लेकिन हम क्रांतिकारी मज़दूर संगठनों ने अपनी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं की. यह बेमेल ज्यादा दिन नहीं चल सकता .
- संगठनों में परस्पर सामंजस्य क़ायम कर संयुक्त मोर्चे गठित करेंगे
मज़दूर हड़तालों की इस मौजूदा शानदार लहर ने क्रांतिकारी मज़दूर संगठनों में व्याप्त एक अनोखी कमज़ोरी को भी उजागर किया है. दरअसल स्वत:स्फूर्त हड़तालों की यह प्रचंड लहर, जो, कम से कम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की हर फैक्ट्री तक पहुंची, वहां भी जहां क्रांतिकारी मज़दूर संगठन नहीं पहुंचे थे. जैसे ही मज़दूर मुट्ठी भींचकर चिल्लाते हुए, विद्रोही तेवर दिखाते हुए बाहर निकले, हर जेब में मौजूद स्मार्टफ़ोन की करामात से उनके विडियो सोशल मीडिया पर छा गए. मुख्य गटर धारा के मीडिया के पतन से ऐसे एकल या यू ट्यूबर के विडियो तुरंत वायरल हुए. क्रांतिकारी मज़दूर संगठनों के कार्यकर्ता एक के बाद एक हड़ताली मज़दूरों के बीच पहुंचने लगे. ख़ुद को असली क्रांतिकारी और दूसरों को ग़ैर-क्रांतिकारी बताने की कार्यकर्ताओं की इस क़वायद ने हड़ताली मज़दूरों को बहुत खिन्न किया क्योंकि वे अपने जीवन-मरण की लड़ाई लड़ रहे थे. वे नहीं जानते थे, क्रांतिकारिता क्या होती है, कैसे नापी जाती है!! मज़दूरों ने महसूस किया कि मज़दूर संगठनों के ये लोग उनका दर्द बांटने नहीं, बल्कि मार्केटिंग सेल्समेन के अंदाज़ में अपनी-अपनी संस्था को चमकाने आए हैं. जैसे ही वेतन बढ़ने की मांग पूरी हुई, वे अंदर काम पर चले गए और किसी भी संगठन से नहीं जुड़ पाए, या यूं कहें कि संगठित होने की उनकी इच्छा भी कमज़ोर हुई.
देश में सही क्रांतिकारी पार्टी मौजूद ना होने, क्रांतिकारी उर्ज़ा का एक न्यूक्लियस ना मौजूद होने की वज़ह से समूची क्रांतिकारी शक्तियों का सही मायने में वह अगुवा दस्ता नहीं बन पाया, मज़दूरों का भरोसा जिसे हांसिल होता और सारा मेहनतक़श अवाम उस ओर खिंचा चला जाता. देश में अनेक क्रांतिकारी पार्टियां और क्रांतीकारी मज़दूर जन संगठन मौजूद हैं. इस कमज़ोरी को स्वीकार कर इससे निबटने के उपाय करने पड़ेंगे. ख़ुद ही ख़ुद को असली क्रांतिकारी, सच्चे बोल्शेविक होने का सर्टिफिकेट ज़ारी करना, बाक़ी सभी को नकली क्रांतिकारी और मेंशेविक घोषित कर देना, ओछापन है जो कुंठा से पैदा होता है. यह बात देश का शोषित-पीड़ित अवाम कहे, तब अच्छा लगता है. हक़ीक़त कितनी भी कड़वी हो, स्वीकार करने का साहस होना चाहिए. यह स्वीकारोक्ति होते ही, आपस में तालमेल, मोर्चे, साझा मंच बनने शुरू हो जाएँगे. परिस्थितियां उस सकारात्मक दिशा में बदलनी शुरू भी हो गई हैं. अनेक संगठनों के अनेक मंच आज कार्यशील हैं. विभिन्न मोर्चों में आपसी तालमेल भी बनने लगे हैं. आगे जैसे-जैसे वर्ग संघर्ष तेज़ होगा, सरकारी दमन बढ़ना निश्चित है. तब ये मोर्चे और मज़बूत होंगे जिनका आख़री अंजाम निश्चित ही अखिल भारतीय संयुक्त क्रांतिकारी मोर्चा बनने में होगा और उसी की प्रचंड उर्ज़ा से सही मायने में लेनिनवादी क्रांतिकारी पार्टी का उद्भव होना भी लाज़िमी है. उस दिशा में कोई भी उतावली प्रक्रिया को बाधित करेगी. हम लोग देश में सामान्य तानाशाही नहीं झेल रहे, जैसी 1975 में झेली थी. यह फ़ासीवादी घटाटोप है जिससे साझे मोर्चे बनाकर ही लड़ा जाता है, जैसा महान फ़ासीवादी योद्धाओं क्लारा जेटकिन और जेओर्जी दिमित्रोव ने हमें फासीवाद के पहले संस्करण में सिखाया है. अकेले-अकेले जब हम अपने गिरफ्तार साथियों की ज़मानत तक नहीं करा सकते तो फ़ासीवादी निज़ाम को शिकस्त कैसे दे सकते हैं.
- मज़दूर वर्गीय समझदारी बढ़ाने के अभियान चलाएंगे
मज़दूर आक्रोश की लहर शांत होने लगी है. जांबाज़ मज़दूरों के इस शानदार संघर्ष ने शायद पहली बार एक और सुखद बदलाव भी लाया है. श्रम विभाग, पहली बार कारखानेदारों को यह कहता नज़र आ रहा है कि घोषित न्यूनतम वेतन अगर आप नहीं देंगे तो कार्यवाही होगी. इसी का परिणाम है कि अप्रैल महीने की सैलरी जब मई की दस तारीख तक मिली, तब मज़दूर सड़कों पर उतने आक्रोशित नज़र नहीं आए जितने की आशंका थी. श्रम कानूनों या श्रम संबंधी सरकारी घोषणाओं को नज़रंदाज़ करने की गंदी लत लग चुके मालिकों को भी अपना ढर्रा बदलने पर मज़बूर होना पड़ा है. कुशल को अर्धकुशल या अकुशल ठहराने की वारदातें तो हुई हैं लेकिन 15,220 से कम वेतन किसी को मिला हो, उसने श्रम विभाग अथवा मज़दूर संगठनों को रिपोर्ट किया हो और कार्यवाही ना हुई हो, ऐसा नहीं हुआ.
क्रांतिकारी मज़दूर संगठनों को क्या करना चाहिए? सबसे पहले लेनिन की पम्फलेट ‘हड़तालों के बारे में” पढ़नी और पढ़ानी चाहिए: “अक्सर एक फ़ैक्टरी में हड़ताल शुरू होते ही तुरंत दूसरी अनेक फ़ैक्टरियों में भी हड़तालें शुरू हो जाती हैं. इन हड़तालों का बहुत ही ज़बरदस्त नैतिक असर होता है! ये उन मज़दूरों पर कैसा प्रभाव डालती हैं जो देखते हैं कि उनके साथी अब गुलाम नहीं रहे और—भले कुछ समय के लिए ही सही— वे इन अमीरों के बराबर आकर खड़े हो गए हैं! हर हड़ताल मज़दूरों के मन में समाजवाद के विचार को बहुत मज़बूती से लाती है; उन्हें पूँजी के दमन से आज़ादी पाने के लिए समूचे मज़दूर वर्ग के संघर्ष के बारे में सोचने पर मजबूर करती है. अक्सर ऐसा देखा गया है कि किसी बड़ी हड़ताल से पहले, किसी फ़ैक्टरी, उद्योग की किसी शाखा या किसी शहर के मज़दूर समाजवाद के बारे में शायद ही कुछ जानते थे, या कभी कभार ही इस पर विचार करते थे; लेकिन हड़ताल के बाद, उनके बीच स्टडी सर्कल और संगठन काफ़ी फैल जाते हैं और ज़्यादा से ज़्यादा मज़दूर समाजवादी बन जाते हैं”
मज़दूरों की राजनीतिक समझदारी बढ़ाने के लिए पर्चे, अख़बार, पत्रिकाएं, पुस्तकें लेकर मज़दूरों के बीच जाने का यह सबसे सही समय है. जैसा लेनिन ने लिखा है, हड़तालें मज़दूरों के ज़हन में उनकी मुक्ति का सवाल, समाजवाद का सवाल पैदा कर देती हैं. ‘छोड़ो, जाने दो’, जो लोग यह बोलकर बिना परचा तक लेने से मना कर आगे बढ़ जाते थे, वे अब पर्चा लेकर अपना मोबाइल नंबर भी लिखवाकर जाते हैं. घनघोर मायूसी और सघन प्रतिक्रिया का काला दौर हमेशा-हमेशा के लिए पीछे छूट चुका है.
- मज़दूरों का विश्वास जीतेंगे और मानवद्रोही मुनाफ़ाखोर ज़ालिम पूंजीवादी व्यवस्था को दफ़न करेंगे
आज सबसे बड़ी चुनौती है मज़दूरों का विश्वास जीतना, स्वत:स्फूर्त आंदोलन की सीमाएं मज़दूरों को समझाकर उन्हें संगठित होने के लिए प्रेरित करना, दुअन्नी-चवन्नी की आर्थिक मांगों से आगे पूंजी से मुक्ति के लक्ष्य को उनकी विज़न के दायरे में लाना है. ज़िंदगी भर, न्यूनतम वेतन, जिंदा रहने लायक़ पैसे दे दो, हमारी झुग्गियों पर बुलडोज़र मत चढ़ाओ, हमारे बच्चे कहाँ जाएंगे, हम क्या खाएंगे, कैसे जिंदा रहेंगे; जिंदगी भर क्या इन्हीं मांगों के लिए ही लड़ते रहना है? सारा उत्पादन और निर्माण करने वाले मज़दूरों को उनके सारे उत्पाद, उनके बनाए भवनों का मालिक बनने के लिए क्यों नहीं लड़ना चाहिए? दिन भर हाड़तोड़ मेहनत कर, वे ‘अवैध’ झुग्गियों में रहें और प्रबंधन, ख़रीदी, बिक्री तक सभी ज़िम्मेदारियाँ उनके जैसे ही थोडा ज्यादा वेतन पाने वाले कर्मचारियों को सौंपकर दिन भर पत्ते खेलने वाला, क्लबों में दारू गटकने वाला मालिक एकड़ों के विशाल महलों में रहे, यह कहां का न्याय है? मालिकों के नालायक नशेड़ी बेटे पढ़ने, तफ़रीह करने विदेश जाएं और मज़दूरों के होनहार बच्चे पढने-खेलने की उम्र में होटलों-ढ़ाबों पर बर्तन मांजने वाले ‘छोटू’ बनें, तपती दोपहरी में घर-घर सब्जी फलों की भारी–भरकम थैलियाँ घर-घर पहुँचाने को मज़बूर हों, ऐसा क्यों? मेहनतक़श मज़दूर ही क्यों रेल पटरी किनारे रेलगाड़ियों के कानफोडू शोर और सड़ांध मारते गटर के बीच रहें? ये सवाल उन्हें बेचैन करने चाहिएं.
न्यूनतम वेतन 15,220 हो, 23,196 हो या 30,000 हो, इन मांगों से आगे बढ़ना होगा. अब तो पूरे देश से बुलंद आवाज़ में ये मांगें उठनी चाहिएं; ‘उत्पादन करने वाले सर्वहारा वर्ग का वेतन, निठल्ले नहीं तय करेंगे, बल्कि उत्पादनकर्ता और निर्माता होने की वज़ह से सर्वहारा वर्ग ही अपना और बाक़ी सभी का वेतन तय करेगा. सामाजिक उत्पादन का मालिकाना भी सामाजिक होगा.
