नारे पुलिस के, हकीकत जनता की:  आज़ाद नगर की एक घटना ने फिर उठाए कई सवाल

नरेश

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जब फरियादी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाए, तो पुलिस के ‘सेवा-सुरक्षा-सहयोग’ जैसे नारों का क्या मतलब रह जाता है? देश के अलग-अलग राज्यों की पुलिस के स्लोगन आपने सुने और पढ़े होंगे। हरियाणा पुलिस का नारा है—“सेवा, सुरक्षा, सहयोग”, उत्तराखंड पुलिस का—“मित्र पुलिस”, और दिल्ली पुलिस का—“शांति, सेवा, न्याय”। इन नारों को सुनकर ऐसा लगता है कि पुलिस जनता की सेवा, सुरक्षा और न्याय के लिए हर समय तत्पर रहती है। लेकिन इन नारों की असली परीक्षा तब होती है जब कोई आम आदमी, मजदूर या गरीब व्यक्ति किसी काम से थाने पहुंचता है और उसका सामना पुलिसकर्मियों से होता है।

आम आदमी अक्सर थाने जाने से इसलिए डरता है कि उसकी बात सुनी जाएगी या नहीं, उसकी शिकायत दर्ज होगी या नहीं, उसे घंटों बैठाया जाएगा या नहीं, उसे डांट-फटकार का सामना करना पड़ेगा या नहीं। कई लोगों का अनुभव यह भी रहा है कि शिकायतकर्ता की समस्या पर कार्रवाई करने के बजाय उसी से सवाल-जवाब शुरू हो जाते हैं। ऐसी ही एक घटना फरीदाबाद की मजदूर बस्ती आजाद नगर में सामने आई।

रात में चोरी, छतों पर भागता चोर और झुग्गी में गिरकर पकड़ा गया. आजाद नगर रेलवे लाइन के किनारे बसी मजदूर बस्ती है। यहां चोरी की घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। कभी दुकानों को निशाना बनाया जाता है, कभी उन मजदूरों के घरों में चोरी होती है जो रात की ड्यूटी पर गए होते हैं और कभी सोते हुए लोगों के मोबाइल तक चोरी कर लिए जाते हैं। इसी सिलसिले में एक रात करीब 2 से 3 बजे के बीच कुछ चोर कई घरों में चोरी करने के बाद एक घर में घुसे। घर के सदस्य की आंख खुल गई तो चोर भागने लगे।

भागते हुए चोर छतों के ऊपर से कूद रहे थे। इसी दौरान एक चोर एक झुग्गी के ऊपर जा गिरा। झुग्गी के ऊपर लगी सीमेंट की चादर उसके वजन को सहन नहीं कर सकी और टूट गई। चोर झुग्गी के अंदर जा गिरा। शोर सुनकर आसपास के लोग जाग गए और उन्होंने उसे पकड़ लिया। उसके कुछ साथी भागने में सफल रहे। मौके पर गुस्साए लोगों ने पकड़े गए चोर की पिटाई भी कर दी और बाद में उसे पुलिस थाने ले गए।

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आजाद नगर में चोरी की घटनाएं नई बात नहीं. इस घटना को सिर्फ एक रात की घटना मानकर छोड़ देना भी सही नहीं होगा। बस्ती के लोगों के मुताबिक, आजाद नगर और फरीदाबाद के कई मजदूर इलाकों में चोरी की घटनाएं लंबे समय से होती रही हैं। बस्ती में रहने वाले रामकुमार की मां को रात में हार्ट अटैक आया। परिवार कमरे पर ताला लगाकर उन्हें अस्पताल लेकर गया। वापस लौटने पर देखा कि कमरे का ताला टूटा हुआ था और टीवी, गैस सिलेंडर, मोबाइल फोन तथा कुछ नकदी गायब थी। इसी तरह बस्ती में एक छोटे दुकानदार की दुकान के ऊपर लगी सीमेंट की चादरें तोड़कर चोर लगभग 50 हजार रुपये नकद ले गए। इन घटनाओं के कारण लोगों के मन में पहले से ही गुस्सा था।

जिस घटना का यहां जिक्र है, उसमें भी चोर को पकड़ने की कोशिश करने वाले रमन कुमार को चाकू मार दिया गया था। खून से लथपथ रमन को देखकर लोगों का गुस्सा और बढ़ गया और इसी आक्रोश में पकड़े गए चोर की पिटाई हुई। थाने में फरियादी से ही सवाल पूछे जाने लगे. रात करीब तीन-चार बजे लोग पकड़े गए चोर को थाने लेकर पहुंचे। पुलिस ने चोर को थाने में बैठा लिया और लोगों से कहा कि वे सुबह 10-11 बजे आएं। सुबह जब रमन कुमार के परिवार वाले थाने पहुंचे तो, उनके अनुसार, पुलिसकर्मियों ने चोरी की घटना पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें ही डांटना शुरू कर दिया। कहा गया कि—“तुमने इसकी इतनी पिटाई क्यों की? अगर इसकी जान चली जाती तो क्या होता?”

यह सवाल अपने आप में गलत नहीं है कि किसी पकड़े गए व्यक्ति की पिटाई क्यों की गई। कानून किसी को भी भीड़ के हाथों सजा देने की अनुमति नहीं देता। लेकिन सवाल यह भी है कि जिस व्यक्ति को चोर पकड़ते समय चाकू लगा और जो घायल हुआ, उसकी शिकायत और चोरी की घटना पर पुलिस ने क्या कार्रवाई की? यही सवाल मजदूर बस्ती के लोगों के सामने था।

महिलाएं थाने पहुंचीं तो शिकायत लिखने पर भी विवाद! इसके बाद मजदूर संगठन की महिला कार्यकर्ता रिंपी के नेतृत्व में लगभग 10-15 महिलाएं थाने पहुंचीं। महिलाओं ने चोरी की घटनाओं और रमन कुमार को लगी चोट के संबंध में प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की। महिलाओं के मुताबिक, पुलिसकर्मी ने पहले उनके साथ तीखे अंदाज में बात की। बाद में कहा गया कि दरखास्त लिखकर दो। महिलाओं ने सामूहिक रूप से दरखास्त लिखकर दी। लेकिन इसके बाद कथित तौर पर पुलिसकर्मी ने कहा कि इस तरह की दरखास्त स्वीकार नहीं होगी। पुरानी चोरी की घटनाओं को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता और केवल रमन कुमार को लगी चोट के बारे में लिखो। यहां तक कहा गया कि—“चोरी तो हुई ही नहीं। चोर पकड़ा गया है, चोरी नहीं हुई तो एफआईआर कैसी?” महिलाओं ने अपनी बात रखने की कोशिश की, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद घायल रमन कुमार को बुलाकर पुलिसकर्मी द्वारा तैयार की गई दरखास्त पर उसके हस्ताक्षर करवाए गए। बस्ती के लोगों के अनुसार, उस दरखास्त में बस्ती में लगातार होने वाली चोरी की घटनाओं का उल्लेख नहीं था। संगठन के हस्तक्षेप के बाद बदला पुलिस का रवैया.

अगले दिन मजदूर संगठन के कार्यकर्ता नरेश थाने पहुंचे और पुलिसकर्मी से बातचीत की। नरेश के अनुसार, बातचीत के दौरान पुलिसकर्मी ने उन्हें यह कहकर डराने की कोशिश की कि चोर की पिटाई का वीडियो उसके पास है और अगर ज्यादा बात की गई तो पिटाई करने वालों के खिलाफ ही प्राथमिकी दर्ज हो सकती है। नरेश ने जवाब दिया कि वे मजदूर संगठन के कार्यकर्ता हैं और यदि शिकायत की रिसीविंग नहीं दी गई तथा कार्रवाई नहीं हुई तो शाम को थाने पर प्रदर्शन किया जाएगा और मीडिया को भी बुलाया जाएगा। इसके बाद पुलिसकर्मी का रवैया कुछ नरम हुआ और उसने रमन कुमार का मेडिकल कराने की बात कही। नरेश ने सवाल किया कि मेडिकल भी पुलिस ही करवाए और रमन कुमार को लेकर जाया जाए। इसके बाद वे वापस लौट आए। लेकिन शाम तक पुलिस की ओर से कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दी.

संयुक्त संगठित आंदोलन ही पुलिस को उसकी ज़िम्मेदारी निभाने और ग़रीबों से सही व्यवहार करने को मज़बूर कर सकते हैं

इसके बाद क्रांतिकारी मजदूर मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने बस्ती के लोगों के साथ सामुदायिक भवन में बैठक की। बैठक में पूरी घटना पर चर्चा हुई और लोगों की सहमति से थाने पर क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा तथा इंक़लाबी मज़दूर केंद्र द्वारा संयुक्त प्रदर्शन करने का फैसला लिया गया। शाम को बड़ी संख्या में लोग नारे लगाते हुए थाने पहुंचे। थाने के मुख्य द्वार पर इतनी संख्या में लोगों को देखकर पुलिस प्रशासन सक्रिय हुआ और थानाध्यक्ष भी मौके पर पहुंचे। लोगों ने अपनी शिकायत और मांगें उनके सामने रखीं। बस्ती के लोगों के अनुसार, थानाध्यक्ष ने आश्वासन दिया कि उनकी दी गई दरखास्त के आधार पर ही एफआईआर दर्ज की जाएगी और कार्रवाई की जाएगी। इस आश्वासन के बाद लोग वापस लौट गए। अगले दिन पुलिसकर्मी बस्ती में पहुंचे। घटनास्थल की जांच की गई, अलग-अलग स्थानों के फोटो लिए गए, गवाहों के नाम और पहचान संबंधी दस्तावेज लिए गए और प्राथमिकी दर्ज की गई। बाद में एफआईआर की कॉपी रमन कुमार के फोन पर भेजी गई।

सवाल सिर्फ आज़ाद नगर का नहीं है. आजाद नगर की यह घटना केवल एक बस्ती या एक थाने की कहानी नहीं है। देश के अनेक हिस्सों में आम लोगों को पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है—ऐसी शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। मोबाइल चोरी या छीने जाने के मामलों में भी कई लोग बताते हैं कि उनसे घटना को चोरी या छीने जाने के बजाय मोबाइल खो जाने के रूप में लिखने को कहा जाता है। आम आदमी आखिर करे भी क्या? वह पुलिस के सामने खड़ा होता है। सामने कानून लागू करने वाली संस्था होती है। वह अपने अधिकारों से पूरी तरह परिचित भी नहीं होता। इसलिए कई बार वह वही लिखता है जो उससे लिखने के लिए कहा जाता है।

यहीं से सवाल पैदा होता है—अगर आम आदमी अपनी शिकायत भी अपनी मर्जी से दर्ज नहीं करा सकता, तो फिर “सेवा, सुरक्षा, सहयोग” जैसे नारों का वास्तविक अर्थ क्या है? जनता की ताकत उसका संगठन ही है. इस पूरी घटना से एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है—अकेला व्यक्ति और संगठित जनता, दोनों की स्थिति एक जैसी नहीं होती।

रमन कुमार अकेले घायल हुए। परिवार शिकायत लेकर गया। महिलाओं ने सामूहिक रूप से थाने जाकर अपनी बात रखी। उसके बाद मजदूर संगठन के कार्यकर्ता पहुंचे। जब वहां भी बात नहीं बनी तो बस्ती के लोगों ने बैठक की और सामूहिक रूप से थाने पहुंचकर अपनी मांग रखी। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की। यह किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ लड़ाई नहीं है। सवाल यह है कि आम नागरिक को उसके अधिकारों के लिए बार-बार सामूहिक दबाव बनाने की जरूरत क्यों पड़े? लोकतंत्र में जनता को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए नेताओं, अधिकारियों और सरकारी संस्थाओं के सामने अपनी बात रखने का अधिकार है।

बस्ती में पानी ना आता हो, सामुदायिक शौचालय की जरूरत हो, स्कूल या अस्पताल की जरूरत हो, बिजली-पानी की समस्या हो, सड़क की समस्या हो या पुलिस से संबंधित कोई शिकायत हो—इन समस्याओं को उठाने का सबसे लोकतांत्रिक रास्ता है कि लोग शांतिपूर्ण और संगठित तरीके से अपनी मांग रखें, लिखित शिकायत दें, उसकी प्राप्ति लें और कानून के दायरे में रहकर जवाबदेही मांगें। मेहनतक़श जनता जब संगठित होगी, अपनी बात मजबूती से रखेगी और अपने अधिकारों के लिए सामूहिक रूप से आवाज उठाएगी—तभी लोकतंत्र में जनता की आवाज वास्तव में मजबूत होगी। नारे चाहे कितने भी सुंदर क्यों न हों, उनकी असली परीक्षा जनता के साथ व्यवहार में होती है।

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