फासीवाद का उभार स्वयं ही पैदा किए गए आर्थिक संकट से सड़ते हुए पूंजीवाद द्वारा अपनी हिफाजत हेतु की गई अग्रिम हमलावर कार्रवाई है। जब पूंजीवादी आर्थिक संकट मजदूर वर्ग, सभी मेहनतकशों एवं जनता के बड़े हिस्से की जिंदगी को बेहद दुख-तकलीफ़ों से भर देता है तो उसे इस पीड़ित जनता के कभी न कभी सब्र खोकर विद्रोह कर देने का डर भी सताने लगता है। शोषित-उत्पीड़ित जनता द्वारा पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था को ही मिटा देने वाले भावी विद्रोह की इस आशंका को दूर करने के लिए स्वयं पूंजीवाद ही फासीवादी प्रतिक्रिया के रूप में एक छद्म ‘विद्रोह’ की सृष्टि करता है। यह ‘विद्रोह’ मौजूदा व्यवस्था के शोषक चरित्र पर भविष्य में शोषणहीन समाज के निर्माण की दृष्टि से आक्रमण करने के बजाय स्वयं पूंजीवाद की सड़न से समाज में पैदा हो रही काहिली, खुदगर्जी, लोभ, लालच, नशा, यौन कुंठा, आदि समस्त बुराइयों, और कुछ खास समुदायों की जनता, को ही सारी समस्याओं और दुख तकलीफ़ों की वजह बताता है। फासीवाद इनके लिए पूंजीवादी मुनाफे व निजी संपत्ति के संचय की निर्मम होड़ के बजाय आधुनिकता को ही जिम्मेदार बताते हुए इनके समाधान बतौर एक फर्जी गौरवशाली अतीत (जैसे ‘रामराज्य’) का गुणगान करता है, जिसमें सभी मेहनतकशों की जगह जन्मजात निश्चित थी और वे बिना किसी कामचोरी व उज्र के शासक अभिजात्य की सेवा-खिदमत करते थे। हालांकि इस काम के लिए वह पूंजीपतियों की धनशक्ति व प्रचारशक्ति सहित इस आधुनिकता की ही समस्त तकनीकी देनों का इस्तेमाल करता है। इसके पीछे उसका असल मकसद स्त्री-पुरुष एवं धर्म, जाति, नस्ल, राष्ट्रीयता के भेदभाव रहित मनुष्य की मनुष्य के साथ समानता के सभी आधुनिक जनतांत्रिक विचारों एवं मूल्यों के खिलाफ विभिन्न समुदायों की जनता में आपसी नफरत-वैमनस्य वाली एक पश्चगामी प्रतिक्रिया की सामाजिक मुहिम खड़ा करना होता है जिसकी ध्वंसकारी लहर पर सवार होकर वह शोषित-मेहनतकश जनता के दीर्घ संघर्षों द्वारा निर्मित जनवाद एवं मानवता के समस्त आधुनिक ढांचे को नष्ट कर दे और सम्पूर्ण समाज को पूंजी के अबाध शोषण तथा इतिहास की आभिजात्य प्रतिक्रिया की सारी शक्तियों के मनमाने आखेट का ऐसा खूनी जंगल बनाने की अपनी मंशा में कामयाब हो सके, जिसमें शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति, समानता व सामाजिक न्याय, आदि के स्थान पर क्रूर निरंकुश ताकत के बल पर जबरन दूसरों को अधीन बना उनके श्रम के फल को हड़प जीवन जीने को ही एकमात्र ‘आदर्श’ स्वीकार कराया जा सके।
इस फासीवादी मुहिम में एक अहम भूमिका समाज के उन लंपट व अपराधी तत्त्वों की भी होती है जिन्हें धर्म, राष्ट्रीयता, देशभक्ति, आदि के नाम पर देश के शत्रुओं से लड़ने के बहाने पूंजीपति वर्ग की धनशक्ति के बल पर इकट्ठा कर उन फ़ासिस्ट गुंडावाहिनियों में संगठित किया जाता है जिनका इस्तेमाल देश विरोधी करार दिए गए मजदूर व जन आंदोलनों को कुचलने के लिए हमले कराने और बढ़ती जनसंख्या से लेकर अव्यवस्था-अपराधों में वृद्धि तक सभी समस्याओं के जिम्मेदार बताकर नफरत का निशाना बनाये गए अल्पसंख्यकों, आदि के लिंचिंग व जनसंहार की साजिश को अंजाम देने में किया जाता है। ऐसे लंपट तथा अपराधी गिरोहों को समाज के नेतृत्व में स्थापित करने के बाद उनसे क्या उम्मीद की जाती है - कि वे उच्च नैतिक व्यवहार और सदाचार के उदाहरण पेश करेंगे? या जीवन के हर क्षेत्र में दुराचार और लंपटता फैलाते नजर आयेंगे?
1980 के दशक में चंद पूंजीपतियों के मालिकाने में समस्त धन-दौलत के इकट्ठा होने के लिए पूंजी संचय के रास्ते में सभी बाधाओं-अड़चनों को हटाने वाली नवउदारवादी पूंजीवादी नीतियों के साथ ही मजदूरों-मेहनतकशों के अपने अधिकारों के संघर्ष हेतु संगठित शक्ति को कुचलने हेतु उनके ट्रेड यूनियन व जनवादी अधिकारों पर निर्मम हमला एवं उसके समानांतर ही पूंजीपति वर्ग की सरपरस्ती में बीजेपी-आरएसएस-विहिप, आदि (संघ परिवार) द्वारा अतीत के किसी गौरवशाली हिंदू राष्ट्र की पुनर्स्थापना हेतु खड़ी की गई प्रतिगामी मुहिम का आरम्भ फासीवादी उभार की एक ही परिघटना के अंग थे। अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ध्वंस तथा उसकी जगह एक ‘भव्य’ राम मंदिर का निर्माण इसका केंद्र बनाया गया। इसे हिंदू धर्म मानने वाली बहुसंख्य जनता की आस्था का प्रश्न बना हर तर्क व कानून के परे बना इसके लिए विशाल मात्रा में चंदा व चढ़ावा इकट्ठा किया गया। इस मंदिर के चढ़ावे में गबन के हाल में सार्वजनिक हुए घटनाक्रम को भारतीय पूंजीवाद की सरपरस्ती में खड़ी की गई हिंदुत्ववादी फासीवादी सियासत के उभार के इस ऐतिहासिक राजनीतिक संदर्भ में ही देखना चाहिए। इसके कुछ अहम पहलू क्या हैं?
मंदिर ट्रस्ट ‘हिंदू राष्ट्र’ वाले भारतीय पूंजीवादी राज्य का अंग है
यह मंदिर बीजेपी-संघ के हिंदू राष्ट्र प्रोजेक्ट का अभिन्न अंग है। 22 जनवरी, 2024 को राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं” बल्कि “एक नए युग की शुरुआत” बताया था। ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ को नवंबर 2019 के अयोध्या फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कहने पर केंद्र सरकार ने गृह मंत्रालय ने गजट में नोटिफाई किया है और ट्रस्ट में उसके एक्स-ऑफिशियो सदस्य हैं। उत्तर प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन के अधिकारी भी ट्रस्ट के सदस्य हैं। इस ट्रस्ट ने ही मंदिर के निर्माण की देखरेख की (प्रधानमंत्री के विश्वासपात्र आईएएस नृपेंद्र मिश्रा निर्माण कमेटी के अध्यक्ष थे) और उसके बाद उसका प्रबंधन अपने हाथ में लिया। कई हजार करोड़ के कोष का नियंत्रक यह ट्रस्ट शुरू से ही प्रधानमंत्री कार्यालय तक सीधी पहुंच वाले एक ब्यूरोक्रेटिक ढांचे की तरह काम करता रहा है, जिस पर कोई ऑडिट की निगरानी नहीं है। दरअसल कुछ भगवाधारियों की उपस्थिति से दिए गए बाह्य ‘धार्मिक स्वरूप’ के बावजूद यह सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़ी संस्था है।
इस ट्रस्ट का ढांचा, जिसमें केंद्र/उप्र सरकार और विश्व हिंदू परिषद-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच पावर शेयर होती है, ने धर्म और शासन के बीच अंतिम बारीक लाइन तक को मिटाने के अलावा, वित्तीय हेराफेरी का रास्ता भी बनाया। साफ है कि बड़े राजनीतिक लोगों, अफसरों और धार्मिक एडमिनिस्ट्रेटर्स के समूह ने पारंपरिक आपसी सीमाओं को खत्म कर दिया और एक धार्मिक-राजनीतिक गठजोड़ बना लिया। इसके अंदर रियल एस्टेट सट्टेबाजी, बड़े पैमाने पर धन के कुप्रबंधन और गबन ने पहले के सभी अनुभवों को पीछे छोड़ दिया क्योंकि ‘ऊपर तक जाने वाला रास्ता’ होने के कारण यहां जवाबदेही का कोई तरीका ही नहीं था।
आरम्भ में राम जन्मभूमि न्यास ही एकमात्र रजिस्टर्ड संगठन था जो संघ परिवार के मंदिर अभियान का हिस्सा था। न्यास की स्थापना जमीन खरीदने और मंदिर बनाने के लिए की गई थी, जिसके लिए इसने 1985 के बाद के सालों में काफी पैसा इकट्ठा किया। इसने 1980 के दशक के आखिर और 1990 के दशक की शुरुआत में जमीन के कई बड़े 'टुकड़े' खरीदे। बीजेपी की उत्तर प्रदेश सरकार ने तो इसके ‘राम कथा पार्क’ के लिए 42 एकड़ जमीन भी लीज पर दी थी। लेकिन दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद केंद्र सरकार ने इन सभी प्लॉट को कानूनी तौर पर अधिग्रहण कर लिया था। इसके तहत मस्जिद और उसके आस-पास की सभी 67.7 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण कर लियागया, जिसमें न्यास की जमीन भी शामिल थी।
सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले के तहत सारी जमीन कानूनी तौर पर नए सरकारी ट्रस्ट को सौंप दी गई। इसलिए न्यास के पास काम करने का कोई मकसद नहीं रहा। तब इसकी लीडरशिप, जिसमें इसके लंबे समय से मुखिया रहे महंत नृत्य गोपाल दास भी शामिल थे, को नए तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में शामिल कर लिया गया। यह तब किया गया जब न्यास और 1980 के दशक से राम जन्मभूमि आंदोलन के दूसरे नेताओं पर नियमित तौर पर बिना किसी हिसाब-किताब या ऑडिट के करोड़ों रुपये जुटाने और हज़म करने के आरोप लगते रहे। दशकों से, विहिप और उससे जुड़े संगठनों को बार-बार अपने चैरिटेबल स्टेटस और टैक्स छूट को लेकर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से कई चुनौतियों और प्रश्नों का सामना करना पड़ा है।
नया ट्रस्ट एक ब्यूरोक्रेटिक ढाँचा था, जो नई दिल्ली में प्राइम मिनिस्टर ऑफिस से पूरी तरह जुड़ा हुआ था। ट्रस्ट बनने का नतीजा यह हुआ कि पहले जो एक तथाकथित ‘आंदोलन’ था, वह सरकार और संघ परिवार के कंट्रोल वाला ‘फ्लैगशिप प्रोजेक्ट’ बन गया। इसमें विहिप के कुछ खास सांगठनिक वफादारों को सर्वाधिक एडमिनिस्ट्रेटिव और फाइनेंशियल पावर वाले पदों पर बिठा दिया गया, जो हज़ारों करोड़ की कॉर्पोरेट संपत्तियों के नियंत्रक व जिम्मेदार बन गए। चंपत राय को ही लें। उनका चरित्र व कौशल संघ परिवार में उनके ‘पटवारी’ नाम से मेल खाते हैं, जिसका मतलब है जमीन और रेवेन्यू के मामलों में माहिर। निश्चय ही इस ट्रस्ट में उनकी कुशलता का ‘अच्छा’ इस्तेमाल जमीनों को बाजार भाव से 5-10 गुना अधिक कीमतों पर खरीदने में किया गया है, जिसके जरिए आस्थावान जनों से बड़े पैमाने पर इकट्ठा चंदे-चढ़ावे को संघ/विहिप के लोगों को हस्तांतरित किया गया! चुनांचे अगर कभी निष्पक्ष जांच होती है, तो कोई नहीं जानता कि इस गबन व हेराफेरी का 'जाल' किस हद तक जाएगा। क्योंकि, आखिरकार, जैसी सूचनाएं सार्वजनिक हो रही हैं उससे यह सिर्फ एक गलती मात्र तो नहीं हो सकती है।
हिंदू मठ-मंदिरों का बुनियादी चरित्र
अगर हम पारंपरिक हिंदू मठ-मंदिरों के चरित्र पर ध्यान दें तो अन्य कुछ धर्मों के संस्थानों की तरह इनका कोई सामाजिक चरित्र व उत्तरदायित्व नहीं रहा है। ये वैधानिक तौर पर देवता की संपत्ति बताए जाते हैं किंतु इनके ब्राह्मण पुरोहित-पुजारी व अन्य ‘सेवक’ इनके वास्तविक मालिक होते हैं जो इनका निजी संपत्ति की तरह मनमाना उपभोग करते हैं। अतः इनमें किसी प्रकार के सामाजिक उत्तरदायित्व, हिसाब-किताब या ऑडिट की कोई परंपरा रही ही नहीं है। कुछ मंदिर जो पिछले दशकों में कुछ राज्य सरकारों के नियंत्रण में आए हैं खास तौर पर दक्षिण भारत में, वे अपवाद हैं और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) उन्हें भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग उठाता रहा है। इन अपवादों को छोड़कर मठ-मंदिरों के पैसे संपत्ति का हिसाब किताब व किसी सामाजिक जवाबदेही की कोई परंपरा ही नहीं है और पहले हमेशा से ही तथाकथित साधु संन्यासी और अब बहुत से संघ विहिप से जुड़े लोग ही इनकी पूरी संपत्ति और चंदे-चढ़ावे का मालिक बने रहे हैं। यही वजह है कि इनमें एकत्रित किए गए चंदे-चढ़ावे के मनमाने उपयोग को इनके संचालक अमानत में खयानत जैसा कुछ मानते ही नहीं हैं और इसीलिए अयोध्या में हुए गबन पर उठने वाले सवालों को भी इन्होंने आरम्भ से हिंदू धर्म और मंदिर विरोध कहकर आस्था आहत होने का ही दिखावा किया है। अयोध्या के मंदिर आंदोलन और अब ट्रस्ट में गबन, और इसके लिए परस्पर विवादों, का भी एक पूरा इतिहास है जिसका कुछ विवरण हम नीचे देंगे।
किंतु पिछले दशकों में भारत में लचर ही सही किंतु एक संवैधानिक बुर्जुआ जनतंत्र के चलते सामाजिक जवाबदेही का मूल्य कुछ हद तक विकसित हुआ है, हालांकि मोदी सरकार ने इसके विपरीत पीएम केयर फण्ड, इलेक्टोरल बांड, आदि सभी मामलों में जवाबदेही, हिसाब किताब, ऑडिट आदि की पूरी प्रक्रिया से बचने की कोशिश की है। इसी से अयोध्या मंदिर को धार्मिक के बजाय राजनीतिक अभियान तथा सरकारी संस्था बना इसे केंद्र व उप्र सरकार के अंतर्गत ले आने से इकट्ठा किए गए चंदे और चढ़ावे के हिसाब-किताब का सवाल भी सामाजिक चेतना में आ गया है और उस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। यही संघ-बीजेपी तथा मोदी-योगी के लिए गले की हड्डी बन गया है।
पूंजीवादी जनतंत्र के समानांतर व इतर फासीवादी राज्य
पहले से ही सार्वजनिक हो चुकी सूचनाओं-तथ्यों के विस्तृत विवरण में जाए बगैर हम इतना जिक्र करना काफ़ी समझते हैं कि ट्रस्ट बनने के आरम्भ से ही यह गबन जारी था। 6 साल पहले एक निजी ऑडिट ने इसमें मौजूद चोरी के रास्तों के बारे में बताया था। 5 साल पहले एक ही बक्से में 5 लाख रुपये की चोरी पकड़ी गई थी। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने 3 महीने पहले ही चढ़ावे में हेराफेरी की सूचना ट्रस्ट और पुलिस को दे दी थी, लेकिन बैंक पर भी चुप रहने का दबाव बनाया गया। बैंक का यह भी कहना है कि उस पर गिनती करने के लिए कुछ खास लोगों को रखने का दबाव डाला गया था। स्पष्ट है कि यह कोई नई तथा ट्रस्ट संचालकों के लिए अनजानी घटना नहीं थी और उनकी छत्रछाया में ही सब काम जारी था।
नया घटनाक्रम सिर्फ इस चोरी का सार्वजनिक जानकारी में आ जाना है, जिसके बाद भी इस पर पर्दा डालने और कुछ छुटभैयों को बलि का बकरा बना वास्तविक बड़े अपराधियों को बचाने के प्रयास किए गए हैं। मीडिया ‘सूत्रों’ द्वारा बताया जाता है कि चोरी जाहिर हो जाने के बाद भी कोई कानूनी कार्रवाई शुरू करने (रोजनामचा, एफआईआर, जांच अधिकारी द्वारा आधिकारिक जांच) के बजाय 5 जून को ट्रस्टी चंपत राय के आदेश पर पुलिस ने चंद कथित आरोपियों के घर की तलाशी ले लगभग 80 लाख रू क़ब्ज़े में ले लिए थे। किंतु जब इस कार्रवाई का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड ही नहीं है और पुलिस चंपत राय के आदेश पर काम कर रही थी तो यह लीपापोती वाली अफवाह ही अधिक लगती है। इसके बाद यह जानकारी छिपी नहीं रह सकी तब भी नियमित एफआईआर व पुलिस जांच के बजाय एक गैरकानूनी SIT गठित कर दी गई - जब थाने में चोरी की रिपोर्ट ही नहीं तो यह जांच किस बात की कर रही थी? कुल मिलाकर चोरी के सबूत मिटाने वाली बात अधिक प्रतीत होती है। किंतु बात दबने के बजाय फैलती चली गई, और नक़द चढ़ावे के अतिरिक्त दान की गईं सोने-चांदी की मूर्तियों व ईंटों, आदि का भी कोई रसीद न होने, और वास्तविकता में मौजूद न होने की बातें चर्चा में आने लगीं।
तब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि आरोपों को जांच पूरी होने से पहले तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। यह सही सिद्धांत है। लेकिन यह सिद्धांत तब कहां होता है जब बिना जांच पूरी हुए विपक्षी नेताओं को भ्रष्टाचार का प्रतीक बताया जाता है? हर आंदोलन में बिना अपराध बड़ी तादाद में लोगों को जेल में डाला जाता है? इस देश में लाखों लोग सालाना सिर्फ़ संदेह में गिरफ्तार किए जाते हैं और उनमें से बहुतों पर तो अदालत में आरोप सिद्ध होने की बात तो दूर, कभी आरोप लगाए ही नहीं जाते, कोई चार्जशीट दाख़िल नहीं होती, कभी मुकदमा चलाया ही नहीं जाता, सजा नहीं होती, और फिर भी वे सालों-साल जेल में सड़ते रहते हैं। कानूनी न्यूनतम मजदूरी मांगने के लिए हुए हाल के मजदूर आंदोलन में ही हजारों मजदूरों को बिना किसी आरोप के गिरफ्तार कर लिया गया। अभी तक उनमें से कितनों को जमानत तक नहीं मिल पाई है।
किंतु इस एक मामले में अलग-अनोखा रवैया था। यहां अचानक सबको न्यायिक प्रक्रिया याद आ गई। किंतु न्यायिक प्रक्रिया तो अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट अर्थात एफआईआर से शुरू होती है न? यहां तो FIR की ही नहीं गई तो न्यायिक प्रक्रिया कहां और कब शुरू हुई? दरअसल यह थी चोरी व हेराफेरी पर पर्दा डालने, असल अपराधियों को बचाने और मामला अंदरखाने सेटल कर लूट का माल हजम करने की प्रक्रिया। जब यह बंदरबांट पूरी हो गई तो कुछ निचले कर्मचारियों पर ठीकरा फोड़ पहले सैंकड़ों करोड़ की बताई जा रही लूट को मात्र कुछ लाख में सीमित कर दिया गया।
इसके बाद लिखी गई प्रथम सूचना रिपोर्ट, सबसे आख़िर में! अजब-गजब न्यायिक प्रक्रिया! इसके लिए ही कुछ खास चुने हुए अधिकारियों की ड्यूटी SIT के रूप में लगाई गई थी। न रोजनामचा, न FIR, न केस डायरी, पर जांच हो भी गई! अब FIR और जांच में इसके निष्कर्ष को औपचारिक कागजी रूप दिया गया। इसके बाद 8 आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है जिनसे लगभग 80 लाख रुपये बरामद किए बताए गए हैं।
उपरोक्त घटनाक्रम फ़ासिस्ट राज्य की एक खास विशिष्टता की ओर ध्यान दिलाता है अर्थात इसमें औपचारिक बुर्जुआ जनतांत्रिक राज्य के साथ व समानांतर ही फासिस्ट संगठन एक राज्येतर राज्य की तरह काम करते हैं। अयोध्या में भी संघ परिवार के संगठन एक समानांतर राज्य की तरह ही काम करते हैं। इसीलिए तो पुलिस-प्रशासन के अधिकारी कानूनी प्रक्रिया के पालन के बजाय चंपत राय के आदेशों का पालन करते रहे।
संघ-बीजेपी का चाल, चेहरा व चरित्र - गबन व हेराफेरी नए नहीं हैं
मंदिर के खजाने से चढ़ावे की हेराफेरी संघ परिवार के सबसे ऊंचे लेवल के लोगों के बारे में मीडिया प्रचार द्वारा गढ़े गई इस इमेज के दावे की सच्चाई को उजागर करती है कि संघ प्रचारकों में जन्मजात अटूट नैतिक पवित्रता होती है जो औपचारिक निगरानी को गैर-जरूरी बना देती है। यह दावा कि उनका वैचारिक कमिटमेंट बहुत ऊंचा होता है, इस बारे में लंबे प्रचार द्वारा स्थापित सभी गलतफहमियों का जाल बहुतों की नजर में एकबारगी साफ हो गया है। कुछ रिपोर्ट के अनुसार, 2025 तक डोनेशन गिनने के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर, जिसमें बिना जेब वाली यूनिफॉर्म जैसी चीजें शामिल थी, सिर्फ एक कागजी दिखावा था, क्योंकि दरअसल चोरी में आने वाली हर "रुकावट" को दूर करने के लिए, एक सोची-समझी योजना थी। खैर यह सब नया नहीं है. जैसा हमने हिंदू मठ-मंदिरों के चरित्र के बारे में ऊपर ही कहा, यह तो इस मंदिर अभियान के आरम्भ से ही जारी था। बस दो उदाहरण।
8 सितंबर 1991, इंडियन एक्सप्रेस, लखनऊ की रिपोर्ट देखें - अदालती आदेश से नियुक्त राम जन्मभूमि मंदिर के मंदिर के ताले खुलने से पहले से ही मुख्य पुजारी लाल दास ने विहिप नेताओं पर मंदिर के लिए आए मनी ऑर्डर्स के जरिए 1.30 करोड़ के दान को कब्जा लेने व हेराफेरी करने और विक्रेताओं को धमकाकर 50 हजार व 25 हजार रू में जमीन सौदे करने का आरोप लगाया था। उन्होंने फैजाबाद के तत्कालीन एसएसपी एके जैन के विहिप से मिले होने और श्रावण झूलनोत्सव में माइक से तीर्थयात्रियों को चढ़ावा मंदिर के बजाय विहिप के काउंटर पर देने का ऐलान करने का इल्जाम भी लगाया था। उन्हें पद से हटाने के लिए धमकियां दी गईं थीं और पुलिस व विहिप के गुंडों ने हमले किए थे। बाद में उन्हें पद से हटा दिया गया। 1993 में मधु किश्वर को दिए एक इंटरव्यू में, उन्होंने बताया था कि उन्हें अपनी जान का डर है। कुछ महीने बाद असल में उनकी हत्या कर दी गई। यह भिन्न बात है कि लाल दास स्वयं भी दूध के धुले नहीं थे।
इंडियन एक्सप्रेस, 15 मार्च 1992 में अयोध्या से योगेश वाजपेयी की एक रिपोर्ट देखें - रिपोर्ट में अयोध्या की घटनाओं का खुलासा किया गया है, और यह भी बताया गया है कि कैसे विहिप स्थानीय मंदिरों और मठों पर अपना कंट्रोल बढ़ा रही थी, इन संस्थाओं पर विहिप समर्थक महंतों की नियुक्ति और उत्तराधिकार को जबरदस्ती के तरीके से कर रही थी और जो नहीं मानते थे उन्हें हटा रही थी। रिपोर्ट में लाल दास व अन्य कई महंतों के बयान हैं। किंतु विहिप समर्थक या विरोधी महंतों के बयानों से अधिक अहम बात जो इस रिपोर्ट में हैं कि कोई पखवाड़ा ऐसा नहीं गुजरता था जब एक-दो लाशें अयोध्या में न गिरती हों और उस दौरान 6 साल में एक दर्जन से अधिक महंतों की निर्मम हत्या हुई थी। यह सब मठ-मंदिरों की संपत्ति के झगड़े ही थे। यह धार्मिक आस्था और नैतिकता के पूरे सरंजाम की कलई खोलने के लिए काफ़ी है।
इन रिपोर्टों को देने का मकसद सिर्फ इस तथाकथित मंदिर अभियान की वास्तविकता को जाहिर करना है कि इसमें आरम्भ से ही कुछ भी नैतिक, सांस्कृतिक, या धार्मिक आस्था जैसी कोई बात थी ही नहीं, जैसा कि पूंजीपति वर्ग की धन व मीडिया शक्ति के भारी प्रचार से बाद में स्थापित किया गया। यह पूरा अभियान देश में एक प्रतिगामी सामाजिक मुहिम खड़ी कर फ़ासिस्ट पार्टी द्वारा देश की सत्ता हथियाने के लिए था। जिन सूचनाओं से आज बहुत से लोग अचंभित हो रहे हैं या अपनी आस्था को आहत पा रहे हैं, इस पूरा अभियान का मूल चरित्र ही दरअसल वही था।
पूंजीवादी राज्य के सभी अंग जनतंत्र को खोखला कर फासिस्ट गिरोहों के सहायक का काम करते हैं
भारत के पूंजीपति वर्ग ने अपने आविर्भाव के काल से ही प्रतिगामी सामंती विशेषाधिकारों, विचारों, मूल्यों, आदि के खिलाफ जनवाद, समानता एवं तार्किकता के लिए संघर्ष नहीं, समझौते और बहुत हद तक उन्हें कायम रखने का रास्ता चुना था। आज जब पूंजीवादी व्यवस्था घोर आर्थिक संकट में है तब तो इसका कोई भी हिस्सा आज जरा भी प्रगतिशील चरित्र नहीं रखता। यही वजह है कि आज सामान्य पूंजीवादी जनतंत्र में मजदूरों-मेहनतकशों पर स्थापित बुर्जुआ तानाशाही के साथ ही आज जब इजारेदार वित्तीय पूंजी का सर्वाधिक प्रतिगामी, निरंकुश एवं खूनी हिस्सा अपनी नग्न तानाशाही अर्थात फासीवादी सत्ता कायम कर स्वयं पूंजीपति वर्ग के कुछ हिस्सों और बुर्जुआ विपक्ष के लिए भी पूंजीवादी बाजार तथा जनतंत्र में होड़ की आजादी के अधिकार को कुचल रही है, तब भी कुछ व्यक्ति अपवादों को छोड़कर पूंजीवादी संवैधानिक जनतंत्र के सभी संस्थानों और बुर्जुआ बुद्धिजीवी तबके जैसे पत्रकारों, जजों, वकीलों, प्रोफेसरों, लेखकों, कलाकारों, आदि में इसका प्रतिरोध अत्यंत न्यून है। उसके बजाय इनका बड़ा हिस्सा स्वयं फासीवादी मुहिम के पोषक बन गए हैं। पूंजीवादी व्यवस्था के संकट जनित बुर्जुआ संवैधानिक संस्थाओं एवं सम्पूर्ण सिविल सोसाइटी का यह खोखलापन ही लोकतंत्र को पूरी तरह निगलने में फासीवाद की मदद करता है। यही तथाकथित बुलडोजर ‘न्याय’, एनकाउंटर राज एवं कुपोषण-एनीमिया से बीमार समाज में भोजन की जगह धर्म व मंदिर को विकल्प के रूप में पेश करने की अमानवीय नृशंस विकृतियों को मुमकिन बनाता है। ठीक यही स्थिति है जिसमें धर्म एवं आस्था के नाम पर हर किस्म की विकृति व विद्रूपता संभव है, और जनतंत्र-संविधान के रक्षक बताए जाने वाले सुप्रीम कोर्ट व मीडिया सहित पूंजीवादी राज्य का हर अंग इन विद्रूपताओं के समक्ष समर्पण कर चुका है और धर्म के नाम पर भगवाधारी गुंडों का हर अनैतिक आचरण आम बात बन गया है। अयोध्या में मंदिर के नाम पर आस्थावान भक्तों के चढ़ावे में गबन इसी स्थिति में न सिर्फ मुमकिन हुआ है बल्कि ऐसा करने वाले अभी भी इस पर लज्जित होने के बजाय पूरी बेशर्मी से आलोचना से आहत होने और हिंदू धर्म की रक्षा करने का नाटक कर रहे हैं, जैसा आरएसएस की ओर से 3 जुलाई को दत्तात्रेय होसबोले के इस बयान में देखा जा सकता है -
“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संपूर्ण हिन्दू समाज से भी आह्वान करता है कि इस कठिन क्षण में वह आवश्यक धैर्य और संयम का परिचय दें तथा इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का लाभ उठाकर हिन्दू विरोधी, राष्ट्र विरोधी शक्तियों के हिंदू धर्म एवं समाज को बदनाम करने के षड़यंत्रों को विफल करे।”

यही वजह है कि जहां उस पुरानी कहानी वाले रामराज्य में एक धोबी के सवाल पर भी राजा राम ने जवाब दिया था, वहां मोदी-शाह-भागवत-आदित्यनाथ के इस रामराज्य में दान देने वाले करोड़ों आस्थावान भक्त उस चढ़ावे का क्या हुआ यह सवाल पूछ रहे हैं और जवाब में उन्हें टीवी डिबेट की नूरा कुश्ती, प्रेस कॉन्फ्रेंस, धर्म रक्षा और राष्ट्रवाद का पैकेज थमा दिया जा रहा है। आस्थावान भक्त ने सोचा था कि उसका चढ़ाया हुआ गहना-नोट, उसकी बूढ़ी मां की साड़ी की गांठ से निकला दस रुपया, उसकी बेटी की गुल्लक से निकले सिक्के ईश्वर चरणों तक पहुंच उसे पाप के दोष से मुक्त कर मोक्ष का रास्ता खोलेंगे। लेकिन अब वह भक्त सोच रहा है—"हे प्रभु! मेरी भेंट आपके चरणों तक पहुंची या रास्ते में किसी ने उसे झटक कर इस जन्म में ही साक्षात दुनियावी मोक्ष प्राप्त कर लिया?" इस पर पहले बीजेपी नेताओं ने उससे कहा - "यह राम मंदिर है, यहां सवाल मत पूछो।" फिर जब सवाल बढ़ गए तो कहा - "यह हिंदुओं की आस्था पर हमला है।" जब उससे भी बात नहीं बनी तो कहा - "जांच होने दो। दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा।"
अगर देवता की मूर्ति बोलती तो सबसे पहले वही पूछती - "भक्तों का पैसा कहां गया?" लेकिन पत्थर की मूर्ति सवाल नहीं पूछती। सवाल केवल चेतन जनता पूछती है। और जनता को चुप कराने के लिए इनके पास प्रवक्ता हैं, एंकर हैं, आईटी सेल है, ट्रोल सेना है, राष्ट्रवाद है, विदेशी साजिश है, अर्बन नक्सल हैं, टुकड़े-टुकड़े गैंग, ईडी-सीबीआई, बजरंग दल है। मजेदार बात यह है कि जो राम राज्य के ठेकेदार कल तक हर गली-मोहल्ले में नैतिकता व शुचिता का थोक व्यापार कर रहे थे, जो लोग खुद को हिन्दू धर्म, राम और राम मंदिर का अकेला ठेकेदार घोषित करते थे, आस्था को कानून-संविधान से ऊपर बताते थे, वे आज अचानक कानून के इतने बड़े पालक बन गए हैं कि हर वाक्य की शुरुआत "जांच पूरी होने दो" से करते हैं।
ये वही लोग हैं जो जन आंदोलनों के कार्यकर्ताओं या किसी विपक्षी नेता के घर से कुछ भी बरामद दिखा शाम तक उसे देशद्रोही या अरबों के घोटाले का मास्टरमाइंड घोषित कर देते हैं। यदि किसी विश्वविद्यालय, किसी मजदूर संगठन, किसी अल्पसंख्यक संस्थान या किसी विपक्षी दल पर इतने गंभीर आरोप लगते, तो क्या भाजपा के नेता "जांच पूरी होने का इंतजार" करने की सलाह देते? या फिर वे टीवी स्टूडियो से लेकर संसद तक हंगामा खड़ा कर देते? उत्तर हम सब जानते हैं। हो सकता है अब तक तो आरोपियों की लिंचिंग तक हो गई होती।
दरअसल यहां समझने की बात यह है कि धर्म व आस्था के नाम पर नफरती उन्मादी सियासत करते, आस्थावान भक्तों को गुमराह करते ये नेता खुद पारंपरिक आस्थावान भक्तों की तरह जरा भी धर्मभीरू नहीं हैं। दान-चढ़ावे के गबन में इन्हें पाप और नरक, या अगले जन्म में कीड़े-मकोड़े की योनि मिलने का कतई कोई भय भी नहीं है। नीत्शे और सावरकर की फ़ासिस्ट विचारधारा वाले ये नेता धर्म और ईश्वर की असल सच्चाई अच्छी तरह जानते हैं। धर्म इनके लिए शोषित-उत्पीड़ित मेहनतकश जनता को शोषण मुक्ति के संघर्ष से रोकने हेतु आपस में विभाजित करने वाली पूंजीवादी नफ़रती राजनीति का एक बड़ा औजार भर है। नीत्शे के इन शिष्यों के लिए साधारण लोगों को शक्ति व छल के बल पर कुचल उन्हें अपने अधीन कर उनकी मेहनत का शोषण करना ही एकमात्र ‘नैतिकता’ है। आम आस्थावान धर्मभीरू भक्तजन जितनी जल्दी इस कठोर सच्चाई को जान-समझ लें उतना ही ख़ुद उनके, हमारे समाज और देश के लिए बेहतर होगा। जितना जल्दी भारत के मजदूर, मेहनतकश जनता एवं गरीब लोग सांप्रदायिक नफरत, सवर्णवादी जाति अहंकार एवं स्त्री पैर की जूती की मानसिकता वाली हिंदुत्व की विध्वंसक विचारधारा से मुक्त होंगे, उतना ही जल्दी पूंजी के जुए से स्वयं उनकी मुक्ति का दिन भी करीब आयेगा।
