हरिशंकर परसाईं (22 अगस्त 1924 – 10 अगस्त 1995)
22 अगस्त 1924 को चंपाबाई और जुमक लालू प्रसाद, गांव जमानी, ज़िला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश के घर जन्मे, हिंदी के मूर्धन्य व्यंगकार हरिशंकर परसाईं आज होते तो ज़रूर सनातन विरोधी, देशद्रोही, अर्बन नक्सल, टुकड़े-टुकड़े गैंग घोषित हो चुके होते लेकिन उसके बाद भी उन्होंने वही लिखा होता जो तब लिखा. उनके व्यंग की धार आज निश्चित रूप से और ज्यादा धारदार और चमकदार रही होती.
गर्दिश के दिन
हरिशंकर परसाईं की बेबाकी कालजयी थी, उसी ने उन्हें कालजयी व्यंगकार बनाया. ख़ुद को परखना हो, सामने वाले को या सामाजिक-राजनीतिक परिवेश को, बहुत निर्दयी रूप से बेबाक़, बेख़ौफ़ और बे-लाग-लपेट रहना, उसी अंदाज़ में लिखना सच्चे व्यंगकार होने की ज़रूरी शर्त है. 1980 में प्रख्यात साहित्यकार कमलेश्वर ने 12 साहित्यकारों: हरिशंकर परसाईं, कमलेश्वर, मोहन राकेश, राही मासूम रज़ा, भीष्म साहनी, राजेंद्र यादव, राजकमल चौधरी, अमृतलाल नागर, मन्नू भंडारी, शिवानी, शानी और श्रीकांत वर्मा के संस्मरणों का संकलन प्रकाशित किया था; ‘गर्दिश के दिन’. हरिशंकर परसाईं अपने जीवन के बारे में लिखते हैं;
“लिखने बैठ गया हूँ पर नहीं जानता संपादक की मंशा क्या है और पाठक क्या चाहते हैं, क्यों आखिर वे उन दिनों में झाँकना चाहते हैं, जो लेखक के अपने हैं और जिनपर शायद वह परदा डाल चुका है। अपने गर्दिश के दिनों को, जो मेरे नामधारी एक आदमी के थे, मैं किस हैसियत से फिर जीऊँ ?-उस आदमी की हैसियत से या लेखक की हैसियत से ? लेखक की हैसियत से गर्दिश को फिर जी लेने और अभिव्यक्त कर देने में मनुष्य और लेखक, दोनों की मुक्ति है। इसमें मैं कोई ‘भोक्ता’ और ‘सर्जक’ की निःसंगता की बात नहीं दुहरा रहा हूँ। पर गर्दिश को फिर याद करने, उसे जीने में दारुण कष्ट है। समय के सींगों को मैंने मोड़ दिया था। अब फिर उन सींगों को सीधा करके कहूँ-आ बैल, मुझे मार!
गर्दिश कभी थी अब नहीं है, आगे नहीं होगी-यह गलत है। गर्दिश का सिलसिला बदस्तूर है, मैं निहायत बेचैन मन का संवेदनशील आदमी हूँ। मुझे चैन कभी मिल ही नहीं सकता। इसलिए गर्दिश नियति है। हाँ, यादें बहुत हैं। पाठक को शायद इसमें दिलचस्पी हो कि यह जो हरिशंकर परसाई नाम का आदमी है, जो हँसता है, जिसमें मस्ती है, जो ऐसा तीखा है कटु है- इसकी अपनी जिन्दगी कैसी रही है? यह कब गिरा फिर कब उठा ? कैसे टूटा ? कैसे फिर से जुड़ा ? यह एक निहायत कटु, निर्मम और धोबीपछाड़ आदमी है। संयोग कि बचपन की सबसे तीखी याद ‘प्लेग’ की है। 1936 या 37 होगा। मैं शायद आठवीं का छात्र था। कस्बे में प्लेग पड़ी थी। आबादी घर छोड़ जंगल में टपरे बना कर रहने चली गयी थी। हम नहीं गये थे। माँ सख्त बीमार थी। उन्हें लेकर जंगल नहीं जाया जा सकता था। भाँय-भाँय करते पूरे आस-पास में हमारे घर ही चहल-पहल थी। काली रातें। इनमें हमारे घर जलने वाले कंदील। मुझे इन कंदीलों से डर लगता था। कुत्ते तक बस्ती छोड़ गये थे, रात के सन्नाटे में हमारी आवाजें हमें ही डरावनी लगती थीं। रात को मरणासन्न माँ के सामने हम लोग आरती गाते-जय जगदीश हरे, भक्त जनों के संकट पल में दूर करे। गाते गाते पिताजी सिसकने लगते, माँ बिलख कर हम बच्चों को हृदय से चिपटा लेती और हम भी रोने लगते। रोज का यह नियम था। फिर रात को पिताजी, चाचा और दो एक रिश्तेदार लाठी-बल्लम लेकर घर के चारों तरफ घूम-घूम कर पहरा देते। ऐसे भयकारी, त्रासदायक वातावरण में एक रात तीसरे पहर माँ की मृत्यु हो गयी। कोलाहल और विलाप शुरू हो गया। कुछ कुत्ते भी सिमट कर आ गये और योग देने लगे। पाँच भाई-बहनों में माँ की मृत्यु का अर्थ मैं ही समझाता था- सबसे बड़ा था। प्लेग की वे रातें मेरे मन में गहरे उतरी हैं। जिस, आंतक, अनिश्चय निराशा और भय के बीच हम जी रहे थे, उसके सही अकंन के लिए बहुत पन्ने चाहिए। यह भी कि पिता के सिवा हम कोई टूटे नहीं थे। वह टूट गये थे। वह इसके बाद भी 5-6 साल जिये, लेकिन लगातार बीमार, हताश, निष्क्रिय और अपने से ही डरते हुए। धंधा ठप्प। जमा-पूँजी खाने लगे। मेरे मैट्रिक पास होने की राह देखी जाने लगी। समझने लगा था कि पिताजी भी अब जाते ही हैं बीमारी की हालत में उन्होंने एक बहन की शादी कर ही दी थी- बहुत मनहूस उत्सव था वह। मैं बराबर समझ रहा था कि मेरा बोझ कम किया जा रहा है। फिर अभी दो छोटी बहनें और एक भाई थे। मैं तैयार होने लगा। खूब पढ़ने वाला, खूब खेलने वाला और खूब खाने वाला मैं शुरू से था। पढ़ने और खेलने में मैं सब भूल जाता। मैट्रिक हुआ, जंगल विभाग में नौकरी मिली। जंगल में सरकारी टपरे में रहता। ईंटें रखकर, उन पर पटिये जमा कर बिस्तार लगाता, नीचे जमीन चूहों ने पोली कर दी थी। रात भर नीचे चूहे धमाचौकड़ी करते रहते और मैं सोता रहता। कभी चूहे ऊपर आ जाते तो नींद टूट जाती पर मैं फिर सो जाता। छह महीने धमाचौकड़ी करते चूहों पर मैं सोया। बेचारा परसाई? नहीं, नहीं, मैं खूब मस्त था। दिन भर काम। शाम को जंगल में घुमाई फिर हाथ से बना कर खाया गया भरपेट भोजन-शुद्ध घी और दूध। और चूहों ने बड़ा उपकार किया। ऐसी आदत डाली कि आगे की जिन्दगी में भी तरह-तरह के चूहे मेरे नीचे ऊधम करते रहे हैं, साँप तक सर्राते रहे हैं, मगर मैं पटिया बिछा कर पटिये पर सोता रहा हूँ। चूहों ने ही नहीं, मनुष्यनुमा बिच्छुओं और साँपों ने भी मुझे बहुत काटा है-पर ‘जहर मोहरा’ मुझे शुरू में ही मिल गया। इसलिए ‘बेचारा परसाई’ का मौका ही नहीं आने दिया। उसी उम्र से दिखाऊ सहानुभूति से मुझे बेहद नफरत है। अभी भी दिखाऊ सहानुभूति वाले को चाँटा मार देने की इच्छा होती है जब्त कर जाता हूँ वरना कई शुभचिंतक पिट जाते। फिर स्कूल मास्टरी। फिर टीचर्स ट्रेनिंग और नौकरी की तलाश-उधर पिताजी मृत्यु के नजदीक। भाई पढ़ाई रोक कर उनकी सेवा में। बहनें बड़ी बहन के साथ हम शिक्षण की शिक्षा ले रहे हैं। फिर नौकरी की तलाश। एक विद्या मुझे और आ गयी थी- बिना टिकट सफर करना। जबलपुर से इटारसी, टिमरनी, खंडवा, इन्दौर, देवास बार-बार चक्कर लगाने पड़ते। पैसे थे नहीं। मैं बिना टिकट बेखटके गाड़ी में बैठ जाता। तरकीबें बचने की बहुत आ गयी थीं। पकड़ा जाता तो अच्छा अंग्रेजी में अपनी मुसीबत का बखान करता। अंग्रेजी के माध्यम से मुसीबत बाबुओं को प्रभावित कर देती और वे कहते- लेट्स हेल्प दि पूअर बॉय। दूसरी विद्या सीखी-उधार माँगने की। मैं बिल्कुल निःसंकोच भाव से किसी से भी उधार माँग लेता। अभी भी इस विद्या में सिद्ध हूँ। तीसरी चीज सीखी बेफिक्री ! जो होना होगा, होगा, क्या होगा ? ठीक ही होगा। मेरी एक बुआ थी। गरीब, जिन्दगी गर्दिश भरी, मगर अपार जीवन-शक्ति थी उसमें। खाना बनने लगता तो उनकी बहू कहती- बाई, न दाल ही है न तरकारी। बुआ कहती-चल, चिन्ता नहीं। राह मोहल्ले में निकलती और जहाँ उसे छप्पर पर सब्जी दिख जाती, वहीं अपनी हम उम्र मालकिन से कहती- ए कौशल्या तेरी तोरई अच्छी आ गयी है। जरा दो मुझे तोड़ के दे। और खुद तोड़ लेती। बहू से कहती- ले बना डाल, जरा पानी जादा डाल देना। मैं यहाँ-वहाँ से मारा हुआ उसके पास जाता तो वह कहती- चल, कोई चिन्ता नहीं, कुछ खा ले। उसका यह वाक्य मेरे लिए ताकत बना- कोई चिन्ता नहीं।”
जीवन परसाईं जी को हर रोज़ व्यंगकार बनाता गया.
‘सीधे-साधे और जटिल मुक्तिबोध’
मैं ऐसा लिखूंगा तो सरकार क्या सोचेगी, समाज के रसूखदार लोग उसे कैसे लेंगे, इसका मेरे जीवन पर क्या अंजाम होगा; ये सब सवाल सोचने वाला व्यक्ति सामाजिक सरोकार वाला साधारण कार्यकर्ता भी नहीं हो सकता, साहित्यकार या व्यंगकार होना तो बहुत दूर की बात है. परसाईं जी ने यह बोझ कभी अपने सर पर रखा ही नहीं. किसी को इस बात का एक और सबूत चाहिए तो प्रस्तुत है, उनके समकालीन सघन सामाजिक सरोकार के दूसरे हस्ताक्षर साहित्यकार, गजानन माधव मुक्तिबोध (13.11.1917 – 11.09.1964) के बारे में उनकी टिप्पणी:
“भोपाल के हमीदिया हॉस्पिटल में जब मुक्तिबोध मौत से जूझ रहे थे, तब उस छटपटाहट को देखकर मोहम्मद अली ताज़ ने कहा था;
उम्र भर जीकर भी ना जीने का अंदाज़ आया
ज़िंदगी छोड़ दे पीछा मेरा मैं बाज़ आया
जो मुक्तिबोध को निकट से देखते रहे हैं जानते हैं कि दुनियावी अर्थों में उन्हें जीने का अंदाज़ कभी नहीं आया. वरना यहां ऐसे उनके समकालीन खड़े हैं जो प्रगतिवादी आंदोलन के कंधे पर चढ़कर ‘नया पथ’ में फ्रंटपोजित होते थे, फिर पंडित द्वारकाप्रसाद मिश्र की ‘कृष्ण-यान’ का धूप-दीप के साथ पाठ करके फूलने लगे और अब जनसंघ की राजमाता की जय बोलकर फल रहे हैं...वर्ग-चेतना के तीव्र बोध की दो घटनाएं दिलचस्प हैं. मुझ पर एक प्रकाशक ने कॉपीराइट का मुक़दमा चला दिया था. मुक्तिबोध आए हुए थे. दिसंबर का महिना था. भोजन करके सामने के मैदान में बैठे हुए थे. मैं कचहरी जाने लगा, तो पूछा, पार्टनर मजिस्ट्रेट कौन है? मैंने नाम बताया. वे बोले – नाम से मालूम होता है, वह नीची जाति का है. विदर्भ में होते हैं ये लोग. आप छूट जाएंगे. मैंने यह पूछा- आपको यह अंदाज़ कैसे लगा? उन्होंने कहा – वह नीची जाति का है न, उसकी सहानुभूति लेखक के प्रति होगी, प्रकाशक के प्रति नहीं. संयोग से मुक़दमा खारिज़ भी हो गया.”
‘पूछिए परसाईं से’
परसाईं जी का साहित्यिक जीवन 23 वर्ष की उम्र में 1947 में शुरू हुआ, अर्थात अंग्रेज़ों से आज़ादी मिलने के बाद का पूरे 48 साल के कालखंड को उन्होंने परखा और जो भी ग़लत होता नज़र आया, भले उसे करने वाला कोई भी तुर्रमखां क्यों ना हो, परसाईं जी ने नहीं बख्शा. उनका साहित्यिक उत्पाद इतना विशाल है कि उसे इस एक लेख में समेटा ही नहीं जा सकता. उपन्यास; रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज, ज्वाला और जल; कहानी संग्रह: हंसते हैं रोते हैं, भोलाराम का जीव, दो नाक वाले लोग, व्यंग लेख संग्रह; वैष्णव की फिसलन, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, विकलांग श्रद्धा का दौर, तिरछी रेखाएं, आत्म कथा; गर्दिश के दिन, संपादन; वसुधा (साहित्यिक पत्रिका), बाल साहित्य: अकाल उत्सव, चूहा और मैं, जैसे उनकी दिन फिरे, समीक्षा; सुदामा के चावल. संस्मरण; तिरछी रेखाएं, मरना कोई हार नहीं होती, सीधे-साधे और जटिल मुक्तिबोध; रायपुर और जबलपुर से प्रकाशित होने वाले ‘देशबंधु अख़बार में उनका कॉलम ‘पूछिए परसाईं से’ बहुत लोकप्रिय हुआ था जिसमें वे पाठकों के सवालों के जवाब दिया करते थे. बानगी:
प्रश्न: समाज में लोग धर्म के नाम पर इतना दिखावा क्यों करते हैं?
परसाई जी का उत्तर: "क्योंकि भगवान से डरने वाले कम हैं और पड़ोसी को दिखाने वाले ज्यादा हैं। धर्म अब अध्यात्म नहीं, सामाजिक प्रदर्शन का जरिया बन गया है।"
प्रश्न: आज के युवाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या क्या है?
परसाई जी का उत्तर: "सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके पास डिग्रियां तो हैं, लेकिन काम नहीं। दिशाहीन और बेकार युवाओं की भीड़ सबसे ज्यादा खतरनाक होती है, क्योंकि उनका इस्तेमाल कोई भी चालाक आदमी अपने फायदे के लिए कर सकता है।"
प्रश्न: जीवन का सबसे बड़ा सच क्या है?
परसाई जी का उत्तर: "यही कि आदमी दूसरों की बुराइयों को बहुत जल्दी देख लेता है, लेकिन अपनी पीठ पर लदे हुए पापों का थैला उसे कभी दिखाई नहीं देता।"
प्रश्न: सुख और दुख में क्या अंतर है?
परसाई जी का उत्तर: "सुख वह है जो दूसरों को दिखाकर महसूस होता है, और दुख वह है जो छुपाने पर भी चेहरे से झलक जाता है।"
हरिशंकर परसाईं की कविताएं
- जगत के कुचले पथ पर भला कैसे चलूं मैं?
किसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझको
नहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझको
ले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाता
और उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाता
शूल से है प्यार मुझको, फूल पर कैसे चलूं मैं?
जगत के कुचले पथ पर भला कैसे चलूं मैं?
बांध बाती में हृदय की आग चुप जलता रहे जो
और तम से हारकर चुपचाप सिर धुनता रहे जो
जगत को उस दीप का सीमित निबल जीवन सुहाता
यह धधकता रूप मेरा विश्व में भय ही जगाता
प्रलय की ज्वाला लिए हूं, दीप बन कैसे जलूं मैं?
जगत के कुचले पथ पर भला कैसे चलूं मैं?
जग दिखाता है मुझे रे राह मंदिर और मठ की
एक प्रतिमा में जहां विश्वास की हर सांस अटकी
चाहता हूँ भावना की भेंट मैं कर दूं अभी तो
सोच लूँ पाषान में भी प्राण जागेंगे कभी तो
पर स्वयं भगवान हूँ, इस सत्य को कैसे छलूं मैं?
जगत के कुचले पथ पर भला कैसे चलूं मैं?
- क्या किया आज तक क्या पाया?
मैं सोच रहा, सिर पर अपार
दिन, मास, वर्ष का धरे भार
पल, प्रतिपल का अंबार लगा
आखिर पाया तो क्या पाया?
जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा
औरों के स्वर में स्वर भर कर
अब तक गाया तो क्या गाया?
सब लुटा विश्व को रंक हुआ
रीता तब मेरा अंक हुआ
दाता से फिर याचक बनकर
कण-कण पाया तो क्या पाया?
जिस ओर उठी अंगुली जग की
उस ओर मुड़ी गति भी पग की
जग के अंचल से बंधा हुआ
खिंचता आया तो क्या आया?
जो वर्तमान ने उगल दिया
उसको भविष्य ने निगल लिया
है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु
जूठन खाया तो क्या खाया?
परसाईं जी, आप बहुत याद आते हैं
इस लेख के संकलनकर्ता ने हिंदी और अंग्रेज़ी में बहुत सारे व्यंगकारों को पढ़ा है, उर्दू और पंजाबी के भी कई व्यंगकारों को सुना है. वह बहुत ज़िम्मेदारी से कहना चाहता है कि परसाईं जी के स्तर का किसी को नहीं पाया. परसाईं जी ने अगर अपना साहित्य अंग्रेज़ी में लिखा होता तो उनकी ख्याति सारी दुनिया में महक रही होती. आइये आनंद लें:
“-स्वामीजी, दुसरे देशो में लोग गाय की पूजा नही करते, पर उसे अच्छी तरह रखते है और वह बहुत खूब दूध देती है. - बच्चा , दूसरे देशो की बात छोडो। हम उनसे बहुत ऊँचे है। देवता इसीलिय सिर्फ हमारे यहाँ अवतार लेते है। दूसरे देशो में गाय दूध के उपयोग के लिए होती है, हमारे यहाँ दँगा करने, आंदोलन करने के लिए होती है। हमारी गाय और गायो से भिन्न है। - स्वामीजी, और सब समस्याएं छोड़कर आप लोग इसी एक काम में क्यों लग गए है? - इसी से सब हो जाएगा बच्चा! अगर गोरक्षा का क़ानून बन जाए तो यह देश अपने आप समृध्द हो जाएगा। फ़िर बादल समय पर पानी बरसाएंगे, भूमि खूब अन्न देगी और कारखाने बिना चले भी उत्पादन करेंगे। धर्म का प्रताप तुम नही जानते। अभी जो देश की दुर्दशा है, वह गौ के अनादर के कारण ही है। - एक और बात बताइये। कई राज्यो में गौ रक्षा के लिए क़ानून है बाकी में भी पास हो जाएगा। आगे आप किस बात पर आंदोलन करेंगे? - अरे बच्चा, आंदोलन के लिए बहुत विषय है। सिंह दुर्गा का वाहन है। उसे सर्कस वाले पिंजरे में बंद करके रखते है और उससे खेल कराते है। यह अधर्म है। सब सर्कसों के खिलाफ आंदोलन करके, देश के सारे सर्कस बन्द करवा देंगे। फिर भगवान का एक अवतार मत्स्यावतर भी है। मछली भगवान का प्रतीक है। हम मछुओ के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ देंगे। सरकार का मत्स्यपालन विभाग बंद करवा देंगे। - स्वामीजी उल्लू लक्ष्मी जी का वाहन है। उसके लिए भी तो कुछ करना चाहिये। - यह सब उसीके लिए तो कर रहे है, बच्चा! इस देश में उल्लू को कोई कष्ट नही है। वह मजे में है।” (निठल्ले की डायरी)
“मैं ईसा की तरह सूली पर से यह नहीं कहता - पिता, उन्हें क्षमा कर। वे नहीं जानते वे क्या कर रहे हैं। मैं कहता - पिता, इन्हें हरगिज क्षमा न करना। ये कम्बख्त जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं।” (विकलांग श्रद्धा का दौर)
“दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है। इसका उपयोग महत्वाकांक्षी खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं। यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है। यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उनमें उन्माद और तनाव पैदा कर दे। फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं। यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है। हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है। इसका उपयोग भी हो रहा है। आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है।” (आवारा भीड़ के ख़तरे)
“किसी अलौकिक परम सत्ता के अस्तित्व और उसमें आस्था मनुष्य के मन में गहरे धँसी होती है। यह सही है। इस परम सत्ता को, मनुष्य अपनी आखिरी अदालत मानता है। इस परम सत्ता में मनुष्य दया और मंगल की अपेक्षा करता है। फिर इस सत्ता के रूप बनते हैं, प्रार्थनाएँ बनती हैं। आराधना-विधि बनती है। पुरोहित वर्ग प्रकट होता है। कर्मकाण्ड बनते हैं। सम्प्रदाय बनते हैं। आपस में शत्रु भाव पैदा होता है, झगड़े होते हैं। दंगे होते हैं।” (आवारा भीड़ के ख़तरे)
“संविधान में जूते मारने का बुनियादी अधिकार तो होना ही चाहिए। आदमी के पेट में अन्न न हो, शरीर पर कपड़े न हों, पर पाँवों में जूता ज़रूर होना चाहिए, जिससे वह जब चाहे, बुनियादी अधिकार का उपयोग कर सके।” (ठिठुरता हुआ गणतंत्र)
“पुजारी जानता है; भगवान चाहे कहीं और हों, मगर मंदिर में तो क़तई नहीं है। मुसलमान जानता है कि ख़ुदा कहीं होगा तो मस्जिद के बाहर होगा, यहाँ तो नहीं है। मगर अपना धंधा इसी में सुरक्षित है कि लोगों को विश्वास दिलाएँ कि यज्ञ से उनका कल्याण होगा। मंदिर और मस्जिद में की गई पुकार भगवान एकदम सुनता है—सीधी ‘हॉट लाइन’ है”। (वैष्णव की फिसलन)
“धर्म का जन्म अज्ञान और डर से हुआ—आदिम मनुष्य के प्रकृति और जगत के बारे में अज्ञान और डर से। फिर धर्म संस्थागत हुआ, राजसत्ता के साथ मिला, शोषण का जरिया बना”। (सदाचार का ताबीज़)
“शोषकों के वर्ग-स्वार्थों को जब कोई चुनौती देता है; तो उस वर्ग के प्रवक्त्ता कहते हैं, यह आदमी ख़ुदा से लड़ रहा है। ख़ुदा को प्राइवेट संपत्ति का रक्षक और शोषण का एजेंट तभी से बना लिया गया था—जब मनुष्य ने उसके होने की कल्पना की थी”। (माटी कहे कुम्हार से)
“दुनिया के पगले शुद्ध पगले होते है—भारत के पगले आध्यात्मिक होते हैं”। (आध्यात्मिक पागलों का मिशन)
“पता नहीं यह परंपरा कैसे चली कि भक्त का मुर्ख होना ज़रूरी है” (भगत की गत)
“तसव्वुर खींच वो तस्वीर आँखें हों रसाई हो, उधर शमशीर खींची हो इधर गर्दन झुकाई हो।” (हम एक उम्र से वाकिफ हैं)
“जिस दिन घूसखोरों की आस्था भगवान पर से उठ जाएगी, उस दिन भगवान को पूछने वाला कोई नहीं रहेगा।” (अपनी अपनी बीमारी)
“झूठ बोलने के लिए सबसे सुरक्षित जगह अदालत है। वहाँ सुरक्षा के लिए भगवान और न्यायाधीश हाजि़र होते हैं।” (ठिठुरता हुआ गणतंत्र)
“धर्म जब धंधे से जुड़ जाए तो उसे योग कहते हैं” (वैष्णव की फिसलन)
“साहित्यिक पत्रिकाएं ब्राह्मण होती हैं, व्यंग शूद्र माना गया है” (व्यंग का ज़माना)
साहित्य अकादमी पुरस्कार 1982 ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’, शरद जोशी पुरस्कार 1992
प्यारे व्यंगकार हरिशंकर परसाईं जी को उनके जन्म दिवस और स्मृति दिवस पर सादर नमन, कृतज्ञता पूर्ण सलाम
