सामाजिक वस्तुस्थिति  - पूंजीवादी सड़न

रणवीर सिंह

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प्रस्तावना

आज दुनिया एक पूंजीवादी समाज है। मतलब, पूंजी का वर्चस्व। सारा विकास पूंजी पर आधारित है। पूंजी, जरूरत के बजाए अपने मुनाफे के आधार पर तय करती है की किस वस्तु का कितना उत्पादन होगा और किस देश में होगा? पूंजी वस्तुतः श्रमिक वर्ग को आदेश देती है कि ये काम करो और बदले में तुम्हें इतने पैसे मिलेंगे। पूंजी के मालिकों को पूंजीपति वर्ग कहा जाता है और श्रम शक्ति के मालिकों को मज़दूर वर्ग। पूंजीवादी व्यवस्था मूलतः श्रम शक्ति का अधिकतम दोहन करके मुनाफा कमाने का यंत्र है। कठिन परिश्रम के बाद भी मज़दूर को मुश्किल से इतने पैसे मिलते हैं की वो अपने परिवार को ज़िंदा रख सके वो भी न्यूनतम स्तर पर। नब्बे प्रतिशत से ज्यादा समाज, मज़दूर वर्ग में आता है। पूंजीपति वर्ग, समाज का एक छोटा हिस्सा होने के बावजूद भी सत्ता में है। सत्ता का संचालन, राज्य रूपी तंत्र के माध्यम से होता है जिसके तीन अंग हैं – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका। विधायिका, कानून बनाती है, कार्यपालिका लागू करती है और न्यायपालिका फैसला देती है।

हालात

मज़दूर का अधिकतम शोषण करके और मजदूरी गिराकर ही पूंजीपति वर्ग अपने मुनाफे को उच्चतम स्तर तक ले जा सकता है। दूसरी तरफ, मजदूरी बढ़ाकर ही मज़दूर वर्ग अपना जीवन जीने लायक बना सकता है। यही वर्ग संघर्ष का आधार है, उसकी निरन्तरता की वजह है और उसके गैर मिलनात्मक होने का स्वरूप है। पाँच सौ साल से ज्यादा समय से चल रहे पूंजीवाद में आज हालात क्या हैं?

  1. गिरती मुनाफा दर, उत्पादन शिथिलता और निष्क्रिय पूंजी भंडार के चलते, पूंजीवाद आर्थिक संकट में है लेकिन राजनीतिक रूप से फिलहाल आश्वस्त है क्योंकि अभी उसके सारे विकल्प खत्म नहीं हुए हैं। फिलहाल, फासीवाद के नागरिक संस्करण का उपयोग हो रहा है। लेबर कोड की मदद से और ऐ आई की आड़ में, नियमित रोजगार खत्म करके, चौतरफा ठेका व्यवस्था लागू करके और गिग अर्थव्यवस्था को चमत्कारिक बताकर मज़दूरों को हमेशा के लिए गुलाम बनाने के लिए, पूंजीवाद किसी भी हद तक जाने के लिए बेचैन है।
  2. पूंजी की आक्रामकता, वर्ग संघर्ष को और तेज कर रही है। मज़दूर वर्ग आक्रोशित है क्योंकि गुज़ारा नहीं हो पा रहा है। भोजन का स्तर और नहीं गिराया जा सकता। रहने का ठिकाना न्यूनतम आकार का है जिसे आए दिन अवैध घोषित किया जाता है और बिना किसी सूचना या मुआवजे के गिराने के लिए बुलडोज़र सदैव तैयार रहता है। सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं और निजी स्कूल में बच्चों को भेजना मुमकिन नहीं है। सरकारी अस्पताल जर्जर हैं और निजी अस्पतालों में इलाज कराने की सोच भी नहीं सकते। खुद, पत्नी और बच्चों को काम में झोंककर भी गुजारा नहीं हो पा रहा।
  3. मालिक और मज़दूर के वर्तमान वर्ग संघर्ष से पार पाने में मौजूदा यूनियन संयंत्र अक्षम प्रतीत हो रहा है। आज, मात्र लिखा पढ़ी से काम नहीं चल सकता। सार्वजनिक क्षेत्र और नियमित रोजगार के दौर में बनी यूनियनें, आज की चुनौतियों का सामना नहीं कर सकतीं। वे, एक औपचारिक दायरे में सिमटकर रह गई हैं। लेबर कानून की जगह लेबर कोड लागू होते समय भी, यूनियनें निर्णायक विरोध करने में नाकाम रहीं। मज़दूर, उदासीनता का शिकार हो रहे हैं जिसके चलते यूनियन सक्रिय सदस्य संख्या भी कम हो रही है। माँग पत्र और ज्ञापन जैसे औपचारिक काम बेअसर हो चुके हैं। निराशा के निशान मजदूरों के चेहरे पर साफ देखे जा सकते हैं।
  4. हालात, बिखरी हुई मज़दूर ऊर्जा को एकत्र करने का इशारा कर रहे हैं। नए संगठन बन भी रहे हैं लेकिन उन्हें बाउंसरों और छंटनी का सामना करना पड़ रहा है। पंजीकरण प्रक्रिया को जटिल बना दिया गया है। कागजी खाना पूरी बढ़ा दी गई है। दूसरी तरफ, छोटे छोटे संगठन साथ आ रहे हैं और संयुक्त मंचों का निर्माण कर रहे हैं। आंदोलन भी कर रहे हैं लेकिन सीमित संख्या और संसाधनों के चलते कुछ बड़ा नहीं हो पा रहा है। हाँ, बड़ा उत्पीड़न अवश्य झेलना पड़ रहा है जैसे फर्जी मुकदमे, संगीन धाराएं, कारावास और जमानत के लिए लंबा संघर्ष।
  5. आज का वर्ग संघर्ष, सामान्य नहीं है और जल्दी खत्म नहीं होगा। पूंजीवाद का वर्तमान संकट भी सामान्य नहीं है। रोजगार मिल नहीं सकता। महंगाई कम हो नहीं सकती। मेहनतकश अवाम की क्रय शक्ति बढ़ नहीं सकती। बाज़ार में मांग बढ़ नहीं सकती। निष्क्रिय पूंजी, उत्पादन में लग नहीं सकती। मुनाफा दर बढ़ नहीं सकती। मसलन, पूंजी के पहाड़ और कंगाली के महासागर ऐसे ही एक दूसरे को निहारते रहेंगे। जनता आक्रोशित होती रहेगी। दमन चक्र चलता रहेगा। लोकतंत्र और न्यायपालिका से भरोसा उठता रहेगा। विधायक और सांसद बिकते रहेंगे। दरबारी मीडिया, फासीवाद की खिदमत में कुछ न कुछ पेश करता ही रहेगा।

आज़ादी के बाद, सार्वजनिक क्षेत्र विस्तार के साथ, एक बड़ा मध्य वर्ग विकसित हुआ। नियमित रोजगार के साथ साथ, अन्य सुविधाएं मिलीं और जीवन भर पेंशन का भरोसा भी मिला। यह सिलसिला लगभग तीस साल तक चला। फिर, उदारवाद के नाम पर, पूंजीवाद को खुली छूट दे दी गई। सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार रुक गया, निजीकरण प्रक्रिया तेज हो गई और ठेका मजदूरी व्यवस्था लागू कर दी गई। बेरोज़गारी तेज़ी से बढ़ने लगी। मजदूरी गिरती चली गई। औपचारिक अर्थव्यवस्था, गिग अर्थव्यवस्था में बदल गई। उसी उदारवाद के बाद पैदा हुए युवा, रोजगार से वंचित होते चले गए और आज जंतर मंतर पर बैठने और दमन झेलने के लिए मजबूर हैं। छोटे व्यापार को बढ़ी पूंजी निगल गई। छोटे व्यापार क्षेत्र के युवाओं ने शेयर बाज़ार, अचल संपत्ति, सोना चांदी, पूजा पाठ, आदि सभी क्षेत्रों में हाथ पाँव मारे लेकिन तकदीर नहीं बदली। थक हार कर, ये युवा भी उन जंतर मंतर वाले युवाओं में शामिल हो गए। आर्थिक तंगी, जनता के चेहरे से झलक रही है और छिपाने की सारी तरकीबें बेकार जा रही हैं। कभी आँकड़े विश्वसनीय होते थे, आज चेहरे विश्वसनीय हैं।

पलायन

जो वर्ग आर्थिक रूप से राज़ करता है, वही सांस्कृतिक रूप से भी राज करता है। पूंजीपति वर्ग की देखादेखी, पूरा समाज लालच, हड़प, धोखा, नसीब, पूजा और ज्योतिष की चपेट में है। इसे मज़दूर वर्ग राजनीति से, पूंजीपति वर्ग राजनीति की तरफ एक पलायन कहा जा सकता है। आम से खास की तरफ पलायन। खुद्दारी से मौकापरस्ती की तरफ पलायन। समाज से अपनी तरफ पलायन। जनवाद से फासीवाद की तरफ पलायन।

जज जो कभी नैतिक मूल्यों को बनाए रखने, मानवाधिकारों की रक्षा करने और ज़ुल्म और दमन की किसी भी चाल को रोकने के लिए सत्ता के खिलाफ खड़े हुआ करते थे, वे आज, सेवानिवृति के बाद ऊंचा पद पाने का जुगाड़ कर रहे हैं, न सिर्फ़ कमाने के लिए बल्कि ताउम्र सत्ता का हिस्सा बने रहने के लिए। वे आज बुलडोज़र न्याय, फर्जी मुठभेड़ और झूठे केस संस्कृति पर कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं हैं।

अधिकारी जो कभी गरीबों की शिकायतें सुनने के लिए घंटों बैठते थे और समाधान निकालते थे, वे आज अपने बंगलों, जलसों, और नियुक्तियों तक सीमित हो गए हैं। बॉस के इशारों पर नाचने और अपने आत्मसम्मान को त्यागने के लिए मजबूर हैं।

पत्रकार जो कभी जनता के मुद्दे उठाने और हालात का खुलकर विश्लेषण करने के लिए जाने जाते थे, वे आज सत्ता के सामने नतमस्तक हैं। उनकी भूमिका सिर्फ़ प्रायोजित बहस और सत्ता के हित में सांप्रदायिक एजेंडा चलाने तक सीमित हो गई है। एक दिलचस्प और साहसी पेशा, आज सरकारी विज्ञापनों और छवि सुधार लेखों का मोहताज बन कर रह गया है।

अर्थशास्त्रियों, दार्शनिकों, सामाजिक वैज्ञानिकों, स्वतंत्र कार्यकर्ताओं, वगैरह का पूरा वर्ग, जो कभी तर्क, तरक्की और समाज की भलाई की एक मजबूत आवाज़ हुआ करता था, आज कम बोलता है। वे लोग भी आज गुणा भाग कर रहे हैं। कुछ सृजनशील सोच के लोग तो अर्थव्यवस्था, बेरोज़गारी, महंगाई, अपराध, धोखाधड़ी, महिला सुरक्षा, सांप्रदायिकता, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की बदहाली, आदि की अनदेखी करके, तंत्र विफलताओं पर पर्दा डालने में लगे हुए हैं। कुछ महानुभाव, माहौल बनाने के लिए, अभूतपूर्व विकास और उज्ज्वल भविष्य का ढोल पीट रहे हैं। ऐसा लगता है, बुद्धिजीवी ज्ञान पर फासीवादी बंदूक का पहरा है।

पूरा राजनीतिक परिदृश्य पूंजी की गुलामी और पूंजीवादी संस्कृति की गिरफ्त में है। चुनाव जीतो और पैसा कमाओ। सही और गलत देखने का समय नहीं है। किसी भी कीमत पर बड़ा पद पाओ और सत्ता के प्रति समर्पित रहो। मध्य वर्ग के सक्रिय हिस्से को चुनाव, शेयर बाज़ार, प्रॉपर्टी बाज़ार, धर्म, ज्योतिष, वगैरह में फंसाया जा चुका है। विश्वविद्यालय, जो कभी तार्किक सोच, प्रगतिशील विचारधारा, धर्मनिरपेक्ष रुझान और समाजवादी चिंतन धारा के महा केन्द्र हुआ करते थे, आज अवैज्ञानिक चिंतन, ऊल जलूल सोच, फिरकापरस्ती तथा और रहस्यवाद का शिकार हो गए हैं। समाजवादी हवा मानो बंद है और पुराने साथी बुजुर्ग होते जा रहे हैं। ऐसा लगता है, बौद्धिक जलधारा की गति कम हो गई है और पानी अब उतना साफ नहीं लगता। यदि युवा, समाजवाद की ओर नहीं बढ़ रहे, तो समाजवाद को युवाओं की तरफ बढ़ना होगा। अपने तौर तरीके युवाओं के अनुकूल बनाने होंगे। अपने काम में नयापन, आकर्षण और खुलापन लाना होगा। युवा मिजाज पर असहज होने के बजाए, उनकी उछल कूद, उत्तेजना और तुनक मिजाजी को भी स्वीकार्य बनाना होगा। हो सकता है, हमें उनकी भाषा शैली सीखनी पड़े और उनके गीतों में आनंदित होना पड़े। समाजवाद को सच में पूंजीवाद का विकल्प बनाने के लिए, नए नए अपडेट जारी करने होंगे। युवा शक्ति भंडार का सदुपयोग किए बिना कोई भी क्रांति संभव नहीं है।

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