स्टडी क्लास: सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास - 29. साम्राज्यवादी जंग से तय होता है; मज़दूरों-मेहनतक़शों का खून कौन चूसेगा?

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‘7 नवंबर 1917’ तारीख, मानव इतिहास की अब तक की सबसे महत्वपूर्ण तारीख बन गई है. रूस की धरती से उस दिन वह प्रकाश फूटा जिसका उजाला समूची धरती पर फ़ैलता गया, आज भी फ़ैल रहा है और हमेशा फैलेगा. प्रति-क्रांति द्वारा वहां हुई पूंजीवाद की पुनर्स्थापना भी उस उजाले को कभी नहीं ढक पाएगी. जिस समय रूस का कमेरा वर्ग वहां के सरमाएदार ज़ालिमों से सदियों के शोषण और अपमान का हिसाब बराबर कर रहा था, ठीक उसी वक़्त पेत्रोग्राद में सोवियतों की दूसरी अखिल रूस कांग्रेस भी चल रही थी. सर्वहारा वर्ग की सत्ता प्रस्थापित होने के बाद उस कांग्रेस ने घोषणा की; “पेत्रोग्राद में मज़दूरों और सैनिकों द्वारा सफ़ल क्रांति के मद्देनज़र, बहुसंख्य मज़दूरों और सैनिकों की इच्छा के अनुरूप यह कांग्रेस सारी शक्ति अपने हाथ में लेती है.”

8 नवंबर को अगले दिन, एक तरह उसे उसी दिन कहा जाना चाहिए क्योंकि 7 नवंबर को सत्ता परिवर्तन रात में 12 बजे के बाद, अर्थात 8 नवंबर को ही हुआ था. 8 नवंबर को ही, रूस की सोवियतों की दूसरी कांग्रेस की ओर से, व्लादिमिर लेनिन के हस्ताक्षर से दो ऐतिहासिक हुक्मनामे ज़ारी हुए. पहला; सीमाओं पर शांति स्थापित करने के लिए ‘शांति का हुक्मनामा (Decree on Peace)’ तथा मेहनतक़श किसानों द्वारा ज़मींदारों की ज़मीनों पर क़ब्ज़ा कर लेने वाला ‘ज़मीन का हुक्मनामा (Decree on Land)’. इन दोनों प्रशासनिक आदेशों को सभा में ख़ुद लेनिन ने पढ़कर सुनाया था. इन्हें समझना आज भी उतना ही ज़रूरी है जितना उस वक़्त, 109 वर्ष पहले था. पहली बार दुनिया ने देखा कि मज़दूरों-मेहनतक़श किसानों की जब सरकार बनती है, उत्पादन करने वाले ही जब उत्पाद के मालिक बन जाते हैं, सर्वहारा वर्ग जब सत्ताधारी वर्ग बन जाता है, तो उस सरकार के सोचने, काम करने का क्या ढंग होता है. इस कड़ी में हम इन दोनों कालजयी आदेशों को ज्यों का त्यों पढेंगे और उसकी तुलना पूंजीपति-साम्राज्यवादी लुटेरों की शासन व्यवस्था में पारित आदेशों से करने का प्रयास करेंगे.

किसी देश की सरकार, शांति के अपने प्रस्ताव को जंग लड़ रहे देशों की सरकारों के साथ-साथ, उन देशों के मेहनतक़श मज़दूरों को भी भेज रही है, दुनिया ने पहली बार देखा. साम्राज्यवादी लूट-खसोट के इस विनाशकारी दौर में; जब विनाशकारी युद्धों के ज़रिए, अपना प्रभुत्व क़ायम कर संसाधनों की लूट और सप्लाई चेन पर नियंत्रण करने के मक़सद से सालों से नरसंहार चल रहा है, हज़ारों-हज़ार मासूम बच्चों को बमों से उड़ाया जा रहा है, दबंग देश द्वारा डाकुओं की तरह एक सार्वभौम देश के चुने हुए राष्ट्रपति को उसकी पत्नी के साथ रात में उठा लिया जा रहा है, दूसरे देश के घुटने टिकाने के लिए बच्चों के स्कूलों, अस्पतालों को विनाशकारी बमों से तबाह किया जा रहा है, एक देश की दस करोड़ की समूची आबादी को राख़ के ढेर में तब्दील करने के लिए कितने एटम बमों की ज़रूरत होगी, हिसाब लगाया जा रहा है, जाने कितने देशों के घुटने टिकाने के लिए वहां की सारी की सारी आबादी का गला घोटा जा रहा है; वहां कोई देश इस तरह भी सोच सकता है, जानने के लिए शांति के इस हुक्मनामे को बार-बार अच्छी तरह पढ़ा जाना चाहिए, जिससे उसकी तुलना मौजूदा साम्राज्यवादी दौर की ‘डील MOU’ से की जा सके. पूंजीवादी और समाजवादी सत्ताओं के सोचने का फ़र्क जाना जा सके. रूस की मज़दूर सरकार द्वारा पारित इन दोनों हुक्मनामों का हिंदी अनुवाद नीचे दिया जा रहा है

“शांति का सवाल आज का एक बहुत अहम और तकलीफदेह मुद्दा है. इस विषय पर बहुत कुछ कहा और लिखा गया है. आप सभी ने भी निस्संदेह इस पर बहुत चर्चा की है. इसलिए, मुझे एक ऐसा घोषणा-पत्र पढ़ने की अनुमति दें, जिसे आपकी चुनी हुई सरकार को लागू करना है.”

व्लादिमिर लेनिन, रुस की सोवियतों की दूसरी कांग्रेस, दिनांक: 8 नवंबर 1917

शांति का हुक्मनामा (Decree on Peace)

6-7 नवंबर की क्रांति से बनी और मज़दूरों, सैनिकों व किसानों के प्रतिनिधियों की सोवियत पर आधारित मज़दूरों और किसानों की सरकार, युद्ध में शामिल सभी देशों के लोगों और उनकी सरकारों से अपील करती है कि वे एक न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक शांति के लिए तुरंत बातचीत शुरू करें.

न्यायपूर्ण या लोकतांत्रिक शांति से सरकार का मतलब है—बिना किसी इलाके पर कब्ज़ा किए (यानी किसी भी देश की ज़मीन हड़पे बिना या किसी भी राष्ट्र को ज़बरदस्ती अपने में मिलाए बिना) और वह भी बिना किसी हर्जाने के—तुरंत शांति. वही शांति, जिसके लिए युद्ध से थका-हारा और परेशान सभी युद्धरत देशों का मज़दूर वर्ग और अन्य मेहनतकश लोग तरस रहे हैं; और यह वही शांति है जिसकी मांग रूसी मज़दूरों और किसानों ने ज़ारशाही के खात्मे के समय से ही बहुत मज़बूती और ज़ोर-शोर से की है.

रूस की सरकार का प्रस्ताव है कि सभी युद्धरत राष्ट्रों द्वारा इस प्रकार की शांति तत्काल क़ायम की जाए, और हम उसके लिए कोई भी दृढ क़दम उठाने के लिए तैयार हैं. इसमें कोई देरी नहीं होनी चाहिए, उसके लिए सभी देशों, राष्ट्रों के जन प्रतिनिधियों की आधिकारिक सभाओं द्वारा ऐसी शांति की सभी शर्तों के अंतिम अनुमोदन का इंतज़ार नहीं किया जाना चाहिए.

किसी भी देश पर बलपूर्वक क़ब्ज़ा करना अथवा किसी भी छोटे या कमजोर राष्ट्र को उस राष्ट्र की जनता की स्पष्ट, प्रत्यक्ष और बिना किसी दबाव के व्यक्त की गई सहमति और इच्छा के बिना किसी बड़े या शक्तिशाली राज्य द्वारा अपने में शामिल कर लेना, उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करना, आम तौर पर जनवादियों और ख़ासतौर पर मज़दूर वर्ग की न्याय भावना के अनुरूप, रूस की सरकार को मान्य नहीं है, भले वह विलय कितने भी समय पहले क्यों ना हुआ हो, भले बलपूर्वक अपने में शामिल किया गया राष्ट्र विकसित हो या पिछड़ा हो और अंततः, चाहे वह राष्ट्र यूरोप में हो या दूर किसी जगह.

यदि किसी भी राष्ट्र को, उसकी ज़ाहिर इच्छाओं के बावजूद, चाहे उस राष्ट्र ने अपनी इच्छाएं प्रेस में ज़ाहिर की हों या सार्वजनिक सभाओं में, दलों के निर्णयों में, या राष्ट्रीय उत्पीड़न के विरुद्ध विरोध प्रदर्शनों और विद्रोहों में व्यक्त की गई हो, किसी भी दूसरे राष्ट्र द्वारा, वह कोई भी क्यों ना हो, ज़बरदस्ती से उसकी सीमाओं के भीतर रखा जाता है, उसे अपना राज्य कैसे चलाना है यह तय करने का अधिकार नहीं दिया जाता, और शक्तिशाली राष्ट्र द्वारा दूसरे राज्य से अपनी फ़ौजें पूरी तरह हटा नहीं ली जातीं जिससे वहां किसी भी किस्म का दबाव ना रहे, तो ऐसा विलय भी उस राष्ट्र की ज़बरन ज़ब्ती, अर्थात हिंसा ही कहलाएगी.

शक्तिशाली और धनी राष्ट्रों के बीच उनके द्वारा जीते गए कमजोर राष्ट्रों को कैसे बांटना है, इसे तय करने के लिए युद्ध जारी रखा जाए; हमारी सरकार इस बात को मानवता के विरुद्ध सबसे बड़ा अपराध मानती है और वह दृढ़तापूर्वक ऐलान करती है कि वह इस युद्ध को समाप्त करने के लिए उन शांति शर्तों पर तत्काल हस्ताक्षर करेगी, जो सभी राष्ट्रों और राष्ट्रियाताओं के लिए बिना किसी अपवाद के समान रूप से न्यायसंगत होंगी.

साथ ही, यह सरकार घोषणा करती है कि वह प्रस्तावित शांति शर्तों को अल्टीमेटम नहीं मानती है; दूसरे शब्दों में, यह किसी अन्य शांति शर्त पर भी विचार करने के लिए तैयार है. हम केवल इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि बाक़ी कोई शर्त हैं तो उन्हें युद्धरत देशों द्वारा जल्दी हो प्रस्तुत किया जाए तथा शांति प्रस्तावों-शर्तों में पूर्ण स्पष्टता हो, उनमें किसी भी तरह का छिपाव और लेशमात्र भी गोपनीयता ना हो.

रूस की सरकार किसी भी प्रकार की गुप्त कूटनीति को खत्म करने की घोषणा करती है और हम अपनी तरफ से अपने पक्के इरादे का ज़ाहिर ऐलान करते हैं कि सारी बातचीत पूरी तरह से खुले रूप में और जनता के सामने की जाएगी. ज़मींदारों और पूँजीपतियों की सरकार द्वारा फरवरी से 25 अक्टूबर, 1917 के बीच मंज़ूर की गई या दस्तख़त की गई गुप्त संधियों को तुरंत पूरी तरह से प्रकाशित किया जाएगा. इन गुप्त संधियों में शामिल हर उस बात को हम बिना शर्त और तुरंत रद्द करने का ऐलान करते हैं, जिसका मकसद (जैसा कि ज़्यादातर मामलों में होता है) रूसी ज़मीन-मालिकों और पूँजीपतियों के लिए फ़ायदे और विशेषाधिकार हासिल करना और 'ग्रेट रशियनों' द्वारा कब्ज़े में लिए गए इलाकों को अपनी आधीन बनाए रखना या उनका विस्तार करना है.

सभी देशों की सरकारों और लोगों को शांति के लिए तुरंत खुली बातचीत शुरू करने का प्रस्ताव देते हुए, यह सरकार अपनी तरफ से लिखित रूप में, टेलीग्राफ के ज़रिए, और अलग-अलग देशों के प्रतिनिधियों से या ऐसे प्रतिनिधियों के सम्मेलन में बातचीत करने के लिए तैयार है. उक्त बातचीत को आसान बनाने के लिए, सरकार तटस्थ देशों में अपने पूर्ण अधिकार प्राप्त प्रतिनिधि नियुक्त कर रही है.

हमारी सरकार युद्ध में शामिल सभी देशों की सरकारों और लोगों को तुरंत युद्ध-विराम का प्रस्ताव प्रस्तुत करती है और अपनी तरफ से यह ज़रूरी समझती है कि प्रस्तावित युद्ध-विराम कम से कम तीन महीने की अवधि के लिए हो; यानी इतनी लंबी अवधि के लिए हो कि युद्ध में शामिल या युद्ध में भाग लेने के लिए मजबूर सभी लोगों या राष्ट्रों के प्रतिनिधियों के बीच शांति वार्ता पूरी हो सके, और शांति की शर्तों की अंतिम मंज़ूरी के लिए सभी संबंधित देशों के लोगों के प्रतिनिधियों की आधिकारिक सभाएँ बुलाई जा सकें.

युद्ध में शामिल सभी देशों की सरकारों और लोगों के सामने शांति का यह प्रस्ताव रखते हुए, रूस की अंतरिम मज़दूर-किसान सरकार खास तौर पर उन तीन सबसे विकसित देशों और इस युद्ध में शामिल सबसे बड़े देशों—यानी ग्रेट ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी—के जागरूक मज़दूरों से भी अपील करती है. इन देशों के मज़दूरों ने तरक्की और समाजवाद के काम में सबसे बड़ा योगदान दिया है; उन्होंने इंग्लैंड में चार्टिस्ट आंदोलन, फ़्रांस के मज़दूर वर्ग द्वारा की गई ऐतिहासिक महत्व की कई क्रांतियों और आखिर में जर्मनी में 'एंटी-सोशलिस्ट लॉ' (समाजवाद-विरोधी कानून) के खिलाफ़ बहादुरी भरे संघर्ष और जर्मनी में सर्वहारा वर्ग के बड़े और अनुशासित संगठन बनाने के लंबे और बेहतरीन उदाहरण पेश किए हैं—ऐसे काम जो दुनिया भर के मज़दूरों के लिए एक मिसाल हैं. सर्वहारा बहादुरी और ऐतिहासिक रूप से रचनात्मक कार्यों के ये सभी उदाहरण इस बात की गारंटी हैं कि उक्त देशों के मज़दूर उस ज़िम्मेदारी को समझेंगे जो अब उनके सामने है—यानी समूची मानवता को युद्ध की विभीषिका और उसके नतीजों से बचाना. साथ ही, ये मज़दूर समग्र रूप में, पक्के इरादे और ज़बरदस्त जोश के साथ की गई अपनी कार्रवाई से शांति स्थापित करने में हमारी मदद करेंगे और मेहनतक़श शोषित-पीड़ित अवाम को हर तरह की गुलामी और शोषण से आज़ाद कराएंगे.

6 – 7 नवंबर की क्रांति से बनी और मज़दूरों, सैनिकों और किसानों की सोवियतों (प्रतिनिधि सभाओं) के समर्थन पर टिकी मज़दूरों और किसानों की सरकार शांति के लिए तुरंत बातचीत शुरू करना चाहती है. हम सरकारों और जनता, दोनों से अपील करेंगे. हम सरकारों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते, क्योंकि इससे शांति समझौता होने में देरी होगी और जनता ऐसा करने की हिम्मत नहीं कर सकती; फिर भी हमें जनता से अपील न करने का भी कोई अधिकार नहीं है. हर जगह सरकारों और जनता के बीच मतभेद होते हैं, इसलिए युद्ध और शांति के मामलों में जनता दखल दे इस मामले में हमें मदद करनी चाहिए. बेशक, हम बिना किसी ज़बरदस्ती कब्ज़े और बिना हर्जाने वाली शांति के अपने पूरे कार्यक्रम पर ज़ोर देंगे. हम इससे पीछे नहीं हटेंगे; लेकिन हमें अपने दुश्मनों को यह कहने का मौका भी नहीं देना चाहिए कि उनकी शर्तें हमारी शर्तों से अलग हैं और इसलिए हमारे साथ बातचीत शुरू करने का कोई मतलब नहीं है. हमें उन्हें यह फ़ायदा लेने का अवसर नहीं देना चाहिए और अपनी शर्तें किसी अल्टीमेटम (अंतिम चेतावनी) के रूप में पेश करने से बचना चाहिए. इसीलिए हमारे प्रस्ताव में यह बात शामिल है कि हम शांति की किसी भी शर्त और किसी भी प्रस्ताव पर विचार करने को तैयार हैं. हम उन पर विचार करेंगे, लेकिन इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि हम उन्हें मान ही लेंगे. हम उनकी शर्तों पर विचार के लिए उन्हें अपनी संविधान सभा के सामने रखेंगे, जिसके पास यह तय करने का अधिकार होगा कि कौन से रियायतें दी जा सकती हैं और कौन सी नहीं. हम उन सरकारों के धोखे से रूबरू हो रहे हैं जो शांति और न्याय की सिर्फ़ बातें करती हैं, लेकिन असल में ज़बरदस्ती कब्ज़ा करने और लूट-पाट करने के लिए युद्ध लड़ती हैं. इनमें कोई भी सरकार वह कभी नहीं कहती जो वह असलियत में सोचती है. हम गुप्त कूटनीति के एकदम ख़िलाफ़ हैं और जो भी सच्चाई होगी उसे पूरी जनता के सामने खुलकर रखा जाएगा. हम मुश्किलों से आँखें नहीं चुराते. ऐसा हमने कभी नहीं किया. सिर्फ़ एक पक्ष के चाहने से युद्ध को खत्म नहीं किया जा सकता. हम तीन महीने के लिए युद्ध-विराम का प्रस्ताव रख रहे हैं, लेकिन उससे कम समय के प्रस्ताव को भी ठुकराएंगे नहीं, जिससे हमारी थकी-हारी सेना कुछ देर के लिए ही सही, चैन की साँस ले सके; इसके अलावा, सभी सभ्य देशों में शांति की शर्तों पर चर्चा करने के लिए राष्ट्रीय सभाएँ बुलाई जानी चाहिए.

तुरंत युद्ध-विराम का प्रस्ताव रखते हुए, हम उन देशों के वर्ग-सचेत मज़दूरों से अपील करते हैं जिन्होंने मज़दूर वर्ग के आंदोलन को आगे बढ़ाने में बहुत योगदान दिया है. हम ब्रिटेन के मज़दूरों से अपील करते हैं, जहाँ चार्टिस्ट आंदोलन हुआ था; फ्रांस के मज़दूरों से, जिन्होंने बार-बार हुए विद्रोहों में अपनी वर्ग-चेतना की ताकत दिखाई है; और जर्मनी के मज़दूरों से, जिन्होंने समाजवाद-विरोधी कानून के खिलाफ लड़ाई लड़ी और शक्तिशाली संगठन बनाए हैं.

14 मार्च के घोषणापत्र [पेट्रोग्राद सोवियत द्वारा जारी] में हमने बैंकरों को सत्ता से हटाने का आह्वान किया था, लेकिन मिली-जुली अंतरिम सरकार ने उन बैंकरों को हटाने के बजाय, उनके साथ ही गठबंधन कर लिया था – उन्हें सरकार में शामिल कर लिया था. अब हमने बैंकरों की सरकार को सत्ता से उखाड़ कर फेंक दिया है.

सरकारें और पूंजीपति वर्ग अपनी ताकतों को एकजुट करने और मज़दूरों व किसानों की हमारी क्रांति को खून की नदियों में डुबोने, उसे कुचलने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे. युद्ध के तीन सालों ने आम जनता को एक अच्छा सबक सिखाया है — अनेक देशों में सोवियत आंदोलन उभरे हैं और जर्मन नौसेना द्वारा विद्रोह हुआ, भले जल्लाद विल्हेम के ऑफिसर कैडेटों ने उसे कुचल दिया. आखिरकार, हमें यह याद रखना चाहिए कि हम अफ्रीका के किसी दूर-दराज़ इलाके में नहीं, बल्कि यूरोप में रह रहे हैं, जहाँ खबरें तेज़ी से फैलती हैं.

मज़दूर आंदोलन की जीत होनी निश्चित है और वह जीत शांति व समाजवाद का रास्ता सुनिश्चित करेगी. (लंबे समय तक तालियों की गड़गड़ाहट)

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ज़मीन के प्रश्न पर रिपोर्ट – Report on Land

हम कहना चाहते हैं और क्रांति ने यह स्पष्ट रूप से साबित कर दिया है कि ज़मीन के मुद्दे को साफ-साफ रखना कितना ज़रूरी है. सशस्त्र विद्रोह - यानी दूसरी, समाजवादी क्रांति - साफ़ तौर पर साबित करती है कि ज़मीन को किसानों को सौंप दिया जाना चाहिए. जिस सरकार को उखाड़ कर फेंक दिया गया है और जिन मेंशेविकों तथा समाजवादी-क्रांतिकारियों (सोशलिस्ट-रिवोल्यूशनरीज़) जैसे समझौतावादी दलों ने ज़मीन के मुद्दे को सुलझाने में तरह-तरह के बहाने बनाकर देरी की और देश को आर्थिक अराजकता और किसान विद्रोह की स्थिति में धकेल दिया – वे अपराधी हैं. उनका यह कहना कि ग्रामीण इलाकों में दंगे और अराजकता की स्थिति बनी हुई है झूठ, कायरतापूर्ण और धोखा देने की क़वायद है. समझदारी भरे कदमों से दंगे और अराजकता कहाँ और कब भड़की है? अगर सरकार ने समझदारी से काम लिया होता और उनके कदम गरीब किसानों की ज़रूरतों को पूरा करते, तो क्या किसानों के बीच अशांति फैलती? लेकिन सरकार के सभी कदम - जिन्हें अवकसेन्त्येव और डेन की सोवियतों ने मंज़ूरी दी थी - किसानों के हितों के खिलाफ़ थे और उन्होंने ही किसानों को विद्रोह करने पर मजबूर किया.

विद्रोह भड़काने के बाद, सरकार ने दंगे फैलने और अराजकता भड़कने का शोर मचाया, जिसके लिए वे खुद ज़िम्मेदार थे. वे इसे खून-खराबे और क्रूर दमन से कुचलना चाहते थे, लेकिन खुद ही क्रांतिकारी सैनिकों, नाविकों और मज़दूरों के सशस्त्र विद्रोह में धराशायी हो गए. मज़दूरों और किसानों की क्रांतिकारी सरकार की पहली ज़िम्मेदारी ज़मीन के मुद्दे को सुलझाना होगी, जिससे गरीब किसानों की विशाल आबादी को शांत और संतुष्ट किया जा सके. मैं अब आपको उस आदेश (डिक्री) को पढ़कर सुनाऊँगा जिसे सोवियत सरकार को लागू करना चाहिए. इस आदेश की एक धारा में ज़मीन समितियों के लिए वह 'जनादेश' (मैन्डेट) शामिल है, जिसे किसानों के प्रतिनिधियों की स्थानीय सोवियतों को मिले 242 जनादेशों के आधार पर तैयार किया गया है.

ज़मीन का हुक्मनामा (Decree on Land)

1917 की क्रांति क़ामयाब होने के अगले ही दिन ज़ारी ‘ज़मीन का हुक्मनामा (Decree on Land)’

(1) ज़मीनों के मौजूदा को तत्काल प्रभाव से और बिना किसी मुआवजे के समाप्त किया जाता है.

(2) सभी भूमि संपदाएँ, साथ ही सभी राजशाही, मठ और गिरजाघर की भूमियाँ, उनके सभी पशुधन, औजार, भवन और अन्य जो भी संपत्ति उनके पास है, संविधान सभा के आगामी अधिवेशन तक ‘वोलोस्ट भू-समितियों’ और ‘किसान प्रतिनिधियों की उयेज़्द सोवियत’ के आधीन हो चुकी हैं.

(3) जब्त की गई सारी संपत्ति को, जो अब से समस्त जनता की है, किसी भी प्रकार की क्षति पहुंचाना बहुत ही गंभीर अपराध (grave crime) माना जाएगा और ऐसा करने वालों को क्रांतिकारी अदालतों द्वारा दंडित किया जाएगा. किसान प्रतिनिधियों की उयेज़्द सोवियतों (रूस के देहात में ग्राम पंचायत जैसी किसानों की स्थानीय संस्थाएं) की यह महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है कि वे भूमि संपदाओं की ज़ब्ती के दौरान पूर्णतया सुव्यवस्था सुनिश्चित करें, संपदाओं के आकार और ज़ब्ती के अधीन विशिष्ट संपदाओं का निर्धारण करें, ज़ब्त की गई सभी संपत्तियों की सटीक सूची तैयार करें और किसानों को हस्तांतरित किए गए सभी कृषि उपकरणों, भवनों, औजारों, पशुधन, उपज भंडार आदि की पूर्णतया क्रांतिकारी तरीके से रक्षा करने के लिए सभी आवश्यक उपाय करें.

(4) निम्नलिखित किसान जनादेश, जिसे ‘इज़वेस्टिया वेसेरोस्सियस्कोगो सोवेता क्रेस्त्यांस्किख डेपुटाटोव’ अख़बार द्वारा 242 स्थानीय किसान जनादेशों से संकलित किया गया है और उसी समाचार पत्र के अंक संख्या 88 (पेट्रोग्राड, अंक संख्या 88, 19 अगस्त, 1917) में प्रकाशित किया गया है, संविधान सभा द्वारा अंतिम निर्णय लिए जाने तक महान भूमि सुधारों के कार्यान्वयन के लिए हर जगह मार्गदर्शक के रूप में कार्य करेगा.

ज़मीन के बारे में किसानों का जनादेश

"ज़मीन से जुड़े मसले को पूरी तरह से सिर्फ़ जनता की चुनी हुई संविधान सभा ही सुलझा सकती है. ज़मीन के मसले का सबसे न्यायोचित समाधान इस तरह होगा:

(1) ज़मीन पर निजी मालिकाने हक़ हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाए; ज़मीन को बेचना, खरीदना, पट्टे पर देना, गिरवी रखना या किसी और तरह से हस्तांतरित करना पूरी तरह पूरी तरह प्रतिबंधित हो. सारी ज़मीन—चाहे वह राज्य, शाही परिवार, मठ, चर्च, फ़ैक्टरी, वसीयत से बंधी, निजी, सार्वजनिक या किसानों की हो—बिना किसी मुआवज़े के ज़ब्त कर ली जाए और उसे पूरी जनता की संपत्ति बना दिया जाए. इसके इस्तेमाल करने का अधिकार उन्हीं लोगों का रहे, जो उस पर खेती करते हैं. इस संपत्ति-संबंधी बदलाव से जिन लोगों को नुकसान होगा, उन्हें जीवन की नई परिस्थितियों के अनुकूल होने के लिए ज़रूरी समय मिले और उस अवधि में उन्हें सार्वजनिक मदद पाने का हक़दार माना जाए.

(2) सारी खनिज संपदा—धातु खनिज, तेल, कोयला, नमक आदि—और साथ ही राज्य के लिए महत्वपूर्ण सभी जंगल और जल-स्रोत राज्य के विशेष अधिकार में रहेंगे. छोटी नदियाँ, झीलें, जंगल आदि कम्यून (स्थानीय सामुदायिक रहन-सहन की इकाई) के इस्तेमाल में आएंगे और उनका प्रबंधन स्थानीय स्व-शासन निकायों द्वारा किया जाएगा.

(3) जिन ज़मीनों पर उच्च-स्तरीय वैज्ञानिक खेती की जाती है—जैसे फलों के बाग, पेड़-पौधों के फ़ार्म, बीज उत्पादन के खेत, नर्सरी, हॉटहाउस आदि—उन्हें बांटा नहीं जाएगा. इसके बजाय, उन्हें मॉडल फ़ार्म में बदल दिया जाएगा और ऐसी ज़मीनों के आकार और महत्व के आधार पर उन्हें राज्य या कम्यून के विशेष इस्तेमाल के लिए सौंप दिया जाएगा. कस्बों और गांवों में घरों से जुड़ी ज़मीनें, जिसमें फलों के बाग और सब्ज़ियों के बगीचे शामिल हैं, उनके मौजूदा मालिकों के इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रखी जाएं; इस ज़मीन के इस्तेमाल पर टैक्स लगे जिसका निर्धारण ज़मीन के टुकड़ों के आकार के अनुरूप हो और इसके लिए कानून बने.

(4) स्टड फ़ार्म (घोड़ों के प्रजनन केंद्र), सरकारी और निजी अच्छी नस्ल के पशुओं और मुर्गियों के फ़ार्म वगैरह ज़ब्त कर लिए जाएंगे और वे पूरी जनता की संपत्ति बन जाएंगे. ऐसे फ़ार्म के आकार और महत्व के आधार पर, वे राज्य या कम्यून के विशेष इस्तेमाल में आएंगे. किसी भी प्रकार के मुआवज़े के सवाल पर संविधान सभा विचार करेगी.

(5) ज़ब्त की गई जागीरों के सभी पशु और खेती के औज़ार, उनके आकार और महत्व के आधार पर, राज्य या कम्यून के विशेष इस्तेमाल में आ जाएंगे और इसके लिए कोई मुआवज़ा नहीं दिया जाएगा. कम ज़मीन वाले किसानों के खेती के औज़ार ज़ब्त नहीं किए जाएंगे.

(6) ज़मीन के इस्तेमाल का अधिकार रूसी राज्य के उन सभी नागरिकों (बिना किसी लिंग-भेद के) को दिया जाएगा जो अपनी मेहनत से, अपने परिवार की मदद से या साझेदारी में खेती करना चाहते हैं, लेकिन यह अधिकार तभी तक रहेगा जब तक वे खेती करने में सक्षम हैं. मज़दूरों को काम पर रखने की इजाज़त नहीं है. ग्राम समुदाय के किसी सदस्य की दो वर्ष तक की अस्थायी शारीरिक अक्षमता की स्थिति में, ग्राम समुदाय उस अवधि के लिए उसकी भूमि की सामूहिक खेती करके उसकी सहायता करने के लिए बाध्य होगा, जब तक कि वह पुनः कार्य करने में सक्षम न हो जाए. वृद्धावस्था या खराब स्वास्थ्य के कारण स्थायी रूप से अक्षम और स्वयं भूमि की खेती करने में असमर्थ किसान, भूमि के उपयोग के अपने अधिकार से वंचित हो जाएंगे, लेकिन बदले में उन्हें राज्य से पेंशन प्राप्त होगी.

(7) ज़मीन का मालिकाना बराबरी के आधार पर होगा, अर्थात् भूमि का वितरण स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार श्रम मानक या निर्वाह मानक के अनुरूप काम करने वाले लोगों के बीच किया जाएगा. भूमि स्वामित्व के रूपों - घरेलू, कृषि, सामुदायिक या सहकारी – में कोई भेदभाव नहीं होगा, प्रत्येक गांव और बस्ती में एक ही नियम लागू होगा.

(8) हस्तांतरित की जाने वाली समस्त भूमि ‘राष्ट्रीय भूमि कोष’ कहलाएगी. किसानों के बीच इसका वितरण, सामाजिक स्तर पर बगैर किसी भेदभाव के, गांव अथवा कम्यून द्वारा लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई स्थानीय प्रशासनिक ग्राम इकाई, नगर समितियों से शुरू कर क्षेत्रीय सरकारी निकायों द्वारा किया जाएगा. जनसंख्या वृद्धि, उत्पादकता में वृद्धि और कृषि के वैज्ञानिक स्तर में सुधार के आधार पर भूमि निधि का समय-समय पर पुनर्वितरण भी किया जाएगा. आवंटन की सीमाओं में परिवर्तन होने पर भी पहले आवंटन का केंद्र बिंदु बदला नहीं जाएगा. कम्यून छोड़कर जाने वाले सदस्यों की भूमि, राष्ट्रिय भूमि कोष में वापस चली जाएगी. इस भूमि को आबंटित करने में, छोड़कर जाने वाले व्यक्ति के निकट परिवार वालों अथवा जिसे वे चाहेंगे उन्हें प्राथमिकता मिलेगी. उस भूमि में डाले गए उर्वरकों और अन्य भूमि सुधारों की लागत, यदि ज़मीन के वापस भूमि कोष में जाने तक पूरा उपयोग नहीं हुआ है, तो उसकी भरपाई की जाएगी.

यदि किसी विशेष जिले में उपलब्ध भूमि, स्थानीय जनसंख्या की आवश्यकताओं के लिए अपर्याप्त साबित होती है, तो अतिरिक्त जनसंख्या को कहीं और बसाया जाएगा. नई जगह को रहने लायक़ बनाने, ज़रूरी उपकरण उपलब्ध कराने समेत पुनर्वास के आयोजन की पूरी ज़िम्मेदारी सरकार की होगी. पुनर्वास इस क्रम में किया जाएगा: पहले पुनर्वास के इच्छुक भूमिहीन किसान, फिर कम्यून के वे सदस्य जो गंदी आदतों के शिकार हैं, भगोड़े इत्यादि हैं. पुनर्वास में कौन कहाँ रहेगा, इसका निर्धारण आपसी तालमेल अथवा लॉटरी से होगा. इस आदेश की समूची व्याख्या को, जो रूस के समस्त वर्ग-सचेत किसानों के विशाल बहुमत की पूर्ण इच्छा को अभिव्यक्त करती है, को एक अस्थायी कानून घोषित किया जाता है, जिसे संविधान सभा के अधिवेशन होने तक यथासंभव तत्काल लागू किया जाएगा, और इसके कुछ प्रावधानों को किसान प्रतिनिधियों की उयेज़्द सोवियत द्वारा निर्धारित उचित क्रमिकता के साथ लागू किया जाएगा.

(9) ग़रीब किसानों और ग़रीब कज्ज़ाक (देहात का एक समुदाय) की ज़मीन ज़ब्त नहीं की जाएगी.

ऐसी बातें भी सुनने में आ रही हैं कि ज़मीन का यह हुक्मनामा और किसान 'जनादेश' (मैन्डेट) ‘सोशलिस्ट-रिवोल्यूशनरी पार्टी’ ने तैयार किए है. यह बात अगर सभी है तो भी इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि इसे किसने तैयार किया? एक लोकतांत्रिक सरकार के तौर पर, हम आम जनता के फ़ैसले को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते, भले ही हम उससे सहमत न भी हों. अपने तजुर्बे के आलोक में, इस आदेश को असल में लागू करने और स्थानीय स्तर पर इसे अमल में लाने के दौरान, किसान खुद समझ जाएँगे कि सच्चाई क्या है. अगर किसान सोशलिस्ट-रिवोल्यूशनरी पार्टी का साथ देते रहते हैं, और संविधान सभा में उन्हें बहुमत भी दिला देते हैं, तब भी हम यही कहेंगे — तो क्या हुआ?

अनुभव ही सबसे अच्छा शिक्षक है और वही बताएगा कि कौन सही है. किसान इस समस्या को एक तरफ़ से सुलझाएँ और हम दूसरी तरफ़ से. अनुभव ही हमें क्रांतिकारी रचनात्मक कार्यों की मुख्य धारा में लाएगा और नए सरकारी कृषि फार्म बनाने के लक्ष्य में एक साथ आने के लिए मजबूर करेगा. हमें अनुभवों से सीखना चाहिए; हमें जनता की रचनात्मक क्षमताओं को पूरी आज़ादी देना सीखना चाहिए. पुरानी सरकार, जिसे क्रांति के ज़रिए उखाड़ फेंक दिया गया है, ज़मीन की समस्या को पुरानी, लकीर की फ़क़ीर, बनी बनाई ज़ारशाही नौकरशाही की मदद से सुलझाना चाहती थी लेकिन समस्या को सुलझाने के बजाय, उस नौकरशाही ने किसानों से लड़ाई ही मोल ले ली.

हमारी क्रांति के आठ महीनों के दौरान किसानों ने बहुत कुछ सीखा है; वे ज़मीन से जुड़ी सभी समस्याओं को खुद सुलझाना चाहते हैं. इसलिए हम उनके द्वारा तैयार किए गए कानून में किसी भी बदलाव के ख़िलाफ़ हैं. हम इसकी बारीकियों में नहीं जाना चाहते, क्योंकि हम एक आदेश लिख रहे हैं, न कि किसी कार्य-योजना को अंतिम रूप दे रहे हैं. रूस बहुत बड़ा देश है और हर जगह के हालात अलग-अलग हैं. हमें किसानों पर पूरा भरोसा है कि वे खुद इस समस्या को सही ढंग से और हमसे बेहतर तरीके से सुलझा सकेंगे. वे यह काम हमारी सोच के अनुसार करते हैं या सोशलिस्ट-रिवोल्यूशनरी पार्टी के कार्यक्रम के अनुसार, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. अहम बात यह है कि किसानों को पक्का भरोसा हो जाए कि गाँवों में अब कोई ज़मींदार नहीं है, सभी फ़ैसले उन्हें खुद ही लेने हैं, और उन्हें अपनी ज़िंदगी का इंतज़ाम भी खुद ही करना है (तालियों की गगनभेदी गड़गड़ाहट)

किसानों को समाजवादी क्रांति से जोड़ने के प्रश्न पर अधिकतम लचीलेपन की ज़रूरत है

किसानों की ज़मीनों के प्रश्न पर सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में समाजवादी शासन व्यवस्था की नीति स्पष्ट है. भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप जितने बड़े कृषि फार्म बनाने संभव हों, उतने बड़े सरकारी कृषि फार्म बनाए जाएं, जहां आधुनिकतम वैज्ञानिक तकनीक और उपकरणों द्वारा राष्ट्र के सभी लोगों की ज़रूरतों के अनुसार फसलें बोई जाएं और अधिकतम उत्पादन का लक्ष्य हांसिल किया जाए. कृषि कार्य को आरामदायक और आनंददायक बनाया जाए. विशाल सरकारी कृषि फार्म पर काम करने वाले मज़दूरों के लिए सभी सुविधा संपन्न निवास वहीं उपलब्ध हों. औद्योगिक क्षेत्र की तरह सभी को उनके श्रम के अनुरूप वेतन मिले. सारा कृषि उत्पाद और उसका वितरण सरकार के आधीन हो. धीरे-धीरे कृषि क्षेत्र और औद्योगिक क्षेत्र तथा ग्रामीण और शहरी जीवन के अंतर को समाप्त किया जाए जिससे सदियों से क़ायम यह कष्टदायक भेद भी समाप्त हो.

ऊपर कृषि के हुक्मनामे में हमने देखा कि वैसा नहीं हुआ बल्कि मेहनतक़श किसानों की मांगों और उनके जनादेश के अनुसार ज़मीन जोतने वाले किसानों को ज़मीनों का मालिक बना दिया गया. एक तरह से यह क़वायद जनवादी क्रांति का अधूरा कार्य पूरा करने की कार्यवाही थी. उसे लागू करते वक़्त की बोल्शेविकों की यह भावना नोट की जानी चाहिए कि किसानों को उनके तजुर्बे से यह सीखने दिया जाएगा कि उनका और खेती किसानी का भविष्य, ज़मीनों के छोटे-छोटे टुकड़ों, जहां आधुनिक कृषि तकनीक और उपकरण इस्तेमाल होने संभव ही नहीं, में नहीं है. समाजवादी क्रांति के अनुसार कृषि का लक्ष्य तो 1917 से 13 वर्ष बाद 1930 में ही संपन्न हो पाया. समाजवादी क्रांति का मतलब है कि तुरंत किसानों की ज़मीनों को बलपूर्वक अधिग्रहित कर लिया जाएगा और वहां सरकारी फार्म्स बनाकर किसानों से ज़बरदस्ती खेती कराई जाएगी और चूंकि उसके लिए परिस्थितियां परिपक्व नहीं हैं, इसलिए अभी हम जनवादी क्रांति की स्टेज में हैं, भ्रामक है. क़ामयाब होने, राज-सत्ता सर्वहारा वर्ग के हाथ में आ जाने के बाद भी क्रांतियां समाज के कोने-कोने में पहुंचने और जन मानस में आत्मसात होने में वक़्त लेती हैं. इस दौर में सत्ताधारी सर्वहारा वर्ग को अधिकतम लचीलापन और धैर्य प्रदर्शित करने की दरकार होती है.

खेती-किसानी के प्रश्न पर रूस में अगर अड़ियलपने से काम लिया गया होता तो किसानों के संगठन ‘सोशलिस्ट रेवोल्युसनरी पार्टी’ के नेतृत्व में किसानों का यह जनादेश उसी वक़्त रद्द कर दिया गया होता और किसान, सर्वहारा वर्ग से दूर हो गए होते. इस दूरी का इस्तेमाल सरमाएदारों की अस्थाई सरकार द्वारा क्रांति को कुचलने में किया गया होता. लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने ऐसा नहीं होने दिया. इस जनादेश के ज़ारी होने के वक़्त, 19 अगस्त 1917 में ही बोल्शेविक पार्टी अच्छी तरह जानती थी कि कृषि ज़मीन के मालिकाने संबंधी यह आदेश समाजवादी क्रांति का कार्यक्रम नहीं बल्कि फरवरी जनवादी क्रांति का अधूरा कार्य है. उसके बावजूद भी बोल्शेविक पार्टी ने उसे स्वीकार कर उसे अपने राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाया. यह किसानों को धोखे से अपने पक्ष में कर लेने की नीयत से नहीं, बल्कि इस स्पष्ट समझ के साथ किया गया था कि समाजवादी कृषि अर्थात विशाल सरकारी फार्म्स वाली खेती को अपनानना किसानों के अपने तजुर्बे से सीखने दिया जाना चाहिए, ना कि उन्हें ज़बरदस्ती कम्युनिस्ट बनाकर.

सत्ता हांसिल कर लेने के बाद भी उस सोच में लेशमात्र बदलाव नहीं आया. समाजवादी क्रांति से 3 महीने पहले ज़ारी यह जनादेश बोल्शेविक पार्टी का नहीं बल्कि किसानों के अपने संगठन, ‘सोशलिस्ट रेवोल्युसनरी पार्टी’ का है, इसे स्वीकार कर लागू करने में भी बोल्शेविक पार्टी को कोई दिक्क़त नहीं हुई. क्रांति की क़ामयाबी के बाद समूचे मेहनतक़श अवाम का भरोसा जीतना उसके पहले की अवस्थिति जितना ही ज़रूरी होता है. सख्ती वर्ग-शत्रुओं के साथ की जाती है, वर्ग-मित्रों के साथ नहीं भले वर्ग-मित्र वर्ग-सचेत ना हों. बोल्शेविकों द्वारा किसानों के अधिकतम हिस्से को क्रांतिकारी वर्ग के साथ जोड़ लेना, क्रांति की क़ामयाबी के लिए और समाजवादी सत्ता क़ायम होने के बाद 3 साल चले भयानक गृह युद्ध में प्रतिक्रांतिकारी ताक़तों को कुचलने में बहुत निर्णायक शामिल हुआ. ख़ासतौर पर किसानों को क्रांतिकारी खेमे से जोड़ने के मामले में, भारत के क्रांतिकारी खेमे को बोल्शेविकों से बहुत महत्वपूर्ण सबक़ सीखने की ज़रूरत है.

संदर्भ: https://www.marxists.org/archive/lenin/works/1917/oct/25-26/26b.htm

https://www.marxists.org/archive/lenin/works/1917/oct/25-26/26d.htm

क्रमश:

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