स्वर्ग और नरक: काल्पनिक अवधारणाओं से लेकर धरातल की वास्तविकताओं तक - सरदूल सिंह अध्यापक

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'स्वर्ग' और 'नरक'—ये दो ऐसे शब्द हैं, जिन्हें हर व्यक्ति अपने जीवन में अनगिनत बार सुनता है। इन शब्दों को सुनते ही मन में इनसे जुड़ी अवस्थाओं और काल्पनिक दुनिया का चित्र उभरने लगता है।

विचारवादी दर्शन के अनुसार, स्वर्ग और नरक की व्याख्या अक्सर कथावाचकों, विचारवादी प्रचारकों या ग्रामीण अंचल की दंतकथाओं में मिलती है। इस दर्शन के अनुसार, स्वर्ग की कल्पना एक ऐसे स्थान के रूप में की गई है जहाँ व्यक्ति की इच्छा व्यक्त करते ही सभी आवश्यकताएँ और सुख-सुविधाएँ उपलब्ध हो जाती हैं। इसके विपरीत, नरक वह स्थान है जहाँ सभी परिस्थितियाँ व्यक्ति की इच्छा के प्रतिकूल होती हैं और उसे असीम शारीरिक व मानसिक कष्ट झेलने पड़ते हैं। विडंबना यह है कि इन अवस्थाओं की कल्पना इस धरती पर न होकर आकाश में कहीं दूर, और वह भी मृत्यु के बाद के जीवन के लिए की गई है। कहावतों में भी कहा जाता है—"स्वर्ग देखने के लिए तो मरना ही पड़ता है।"

भौतिकवादी दर्शन और बदलती परिभाषाएँ

विचारों के इस द्वंद्व, विज्ञान के विकास और उन्नत सामाजिक परिस्थितियों के बीच जब मानव जीवन को सुखी बनाने के साधन विकसित हुए, तो स्वर्ग और नरक की परिभाषाओं में भी दार्शनिक बदलाव आया। जो अवधारणाएँ अब तक किसी अदृश्य लोक में स्थापित थीं, वे भौतिक रूप में इसी धरातल पर सिद्ध की जाने लगीं। सामाजिक जीवन को सुखी,सरल बनाने वाले साधन और विकसित किए जाने संभव हुए। परिणाम स्वरूप साहित्य और संगीत में भी इन कल्पनाओं को साकार किया गया। गीत लिखे जाने लगे—"अगर कहीं स्वर्ग है तो उतार ला ज़मीन पर।" राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यवस्थाओं को बदलने के विचार सामने आए। यह माना जाने लगा कि समाजवाद जैसी राजनीतिक व्यवस्था के माध्यम से हर व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकताओं—रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन—की पूर्ति इसी धरती पर संभव है जो विभिन्न देशों में वास्तविक जीवन में बनाया भी गया जो स्वर्ग का वास्तविक रूप है।

आधुनिक विज्ञान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जीवन केवल इसी ग्रह पर है। अतः यदि इस धरती पर किसी व्यक्ति के पास सम्मानजनक और सर्वसुविधायुक्त जीवन है, तो वही उसके लिए 'स्वर्ग' है; और यदि वह अभावों, विषमताओं तथा कष्टों में जीने को मजबूर है, तो यही जीवन उसके लिए 'नरक' है।

भारत के संदर्भ में विषमता: 'इंडिया' बनाम 'भारत'

यदि भारत के संदर्भ में इसकी व्याख्या करें, तो एक ही देश में दो अलग-अलग दुनिया (स्वर्ग और नरक) स्पष्ट दिखाई देती हैं, जिन्हें अक्सर 'इंडिया' और 'भारत' के रूप में देखा जाता है। इसका मुख्य कारण आर्थिक असमानता है, जिसे निम्नलिखित आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है:

आर्थिक खाई: भारत की शीर्ष 1% आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का लगभग 40% हिस्सा है। शीर्ष 10% लोगों के पास लगभग 70% संपत्ति है, जबकि निचली 50% आबादी के पास महज 3% से 13% संपत्ति ही बचती है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में : इसी आर्थिक विषमता का असर स्वास्थ्य पर भी दिखता है। देश के लगभग 67% बच्चे और 57% गर्भवती महिलाएँ एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित हैं। यही खून की कमी भावी जीवन के स्वास्थ्य के स्तर को निर्धारित करती है।

पूंजीवादी व्यवस्था में शादी भी एक आर्थिक आधार पर किया जाने वाला कॉन्ट्रैक्ट ही होता है। शादी से पहले भावी जीवन में आर्थिक सुविधाओं के स्थायित्व को देखा जाता है। व्यक्ति के गुणों को कम देखा जाता है अर्थात वहां भी पैसे का प्रभाव ही दिखाई देता है। यही मेल और बेमेल की गई शादियां ही स्वर्ग और नर्क का रूप साबित होती हैं।

जीवन से पलायन: इसी प्रकार के सैंकड़ों प्रकार के नारकीय जीवन और आर्थिक तंगी से तंग आकर प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख लोग आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाते हैं, जिनमें सर्वाधिक संख्या किसानों, मजदूरों और विद्यार्थियों की होती है।

सुविधाओं और संसाधनों के अनुसार स्वर्ग नरक

यह विषमता ग्रामीण और शहरी जीवन के अंतर में भी साफ झलकती है:

शिक्षा के क्षेत्र में : एक तरफ आधुनिक सुविधाओं और योग्य शिक्षकों से लैस निजी स्कूल हैं, तो दूसरी तरफ बुनियादी ढाँचे और अध्यापकों के अभाव से जूझते सरकारी विद्यालय।

स्वास्थ्य सेवाएँ: एक तरफ महंगे कॉर्पोरेट अस्पताल हैं जहाँ वेंटिलेशन और उच्च स्तरीय सुविधाएँ हैं, तो दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों की लंबी लाइनें, एक बेड पर दो-दो मरीज, फर्श पर पड़े बीमार और गंदगी से बद्तर शौचालय।

यातायात और आवास: आम जनता के लिए रेलगाड़ियों में गिने-चुने साधारण (जनरल) डिब्बे होते हैं जिनमें ठसाठस भीड़ भरी होती है, जबकि आरक्षित डिब्बों में आरामदायक सफर उपलब्ध होता है कई बार सीटें खाली भी रहती हैं। आवास के क्षेत्र में भी एक तरफ अति-आधुनिक बहुमंजिला इमारतें हैं, तो दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं से वंचित झुग्गी-झोपड़ियाँ।

समतावादी समाज: धरती पर स्वर्ग का निर्माण

आधुनिक तकनीक और विज्ञान में इतनी क्षमता है कि वे प्रत्येक व्यक्ति की प्रत्येक आवश्यकता पूरी करने (स्वर्ग बनाने) के लिए पर्याप्त उत्पादन कर सकें और प्रत्येक मनुष्य को अत्यधिक शारीरिक श्रम से मुक्त कर 'फुर्सत का समय' फ्री टाइम दे सकें। लेकिन जब तक संसाधनों और तकनीक पर चंद लोगों का कब्जा रहेगा, तब तक स्वर्ग केवल उन्हीं के लिए रहेगा और बहुसंख्यक आबादी नारकीय जीवन जीने को मजबूर रहेगी। इस स्थिति को बदला जा सकता है।

यदि समाज में ऐसा कानून बनाया जाए जहाँ कार्य करने योग्य प्रत्येक व्यक्ति उत्पादन प्रक्रिया में भाग ले, सभी को "योग्यता अनुसार काम और आवश्यकता अनुसार दाम" मिले, तो एक समतावादी समाज जिसे राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र की भाषा में समाजवादी व्यवस्था कहा जाता है का निर्माण हो सकता है। इसी धरती पर सच में स्वर्ग बनाया जा सकता है।

धरती पर 'स्वर्ग' का निर्माण अपने आप नहीं होगा; यह मानव समाज द्वारा किया जाने वाला एक पवित्र कार्यभार है। इसके लिए वैचारिक रूप से जागरूक होकर एक ऐसे समाज की स्थापना के प्रयास में योगदान देना होगा जो प्रवास, गरीबी, उत्पीड़न, अपराध, पारिवारिक विघटन और विषमता को समाप्त कर हर नागरिक के लिए सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित कर सके, स्वर्ग को बना सके, नरक को मिटा सके। प्रत्येक को घर, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, रोजगार की गारंटी देकर इस नरक को मिटाया जा सकता है क्योंकि यह मानव द्वारा बनाया गया नरक ही है किसी किस्मत या पिछले जन्म का मामला नहीं। यह व्यवस्था जनित अपराध या बुराई है। यह खत्म की जा सकती है, की जानी चाहिए और चेतन लोगों को मिलकर यह काम करना होगा।

(लेखक श्री करनपुर, राजस्थान में शिक्षक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।)


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