भारत हर साल लगभग 85 लाख करोड़ मूल्य के पेट्रोलियम पदार्थों का निर्यात करता है
जब चाहे लोगों की जेब से पैसे निकाल लेने का सरकार का सबसे प्रिय तरीका रहा है, पेट्रोल, डीज़ल, गैस के दाम बढ़ा दो. सत्ताधारी पार्टी की कहती है; ‘हम दाम बढ़ाना नहीं चाहते थे लेकिन क्या कर सकते हैं तेल निर्यातक देशों ने कच्चे तेल के दाम बढ़ा दिए. तेल कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है’. विपक्षी पार्टी उसे ग़रीबों की दुश्मन बताकर चिल्लाती है. यह क्रूर तमाशा यूं ही ज़ारी रहता है और ‘हम भारत के लोग’ पिसते रहते हैं.
किसी तरह जिंदा रहने की ज़द्दोज़हद कर रहे, पूरी तरह कंगाल हो चुके, देश के 100 करोड़ लोग सरकार की इस धूर्तता को ना समझ पाएं, इसलिए 2010 में, जी हां, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने एक नया ड्रामा शुरू किया. ‘डीज़ल, पेट्रोल, गैस के दाम बढ़ाने की प्रक्रिया को आज़ाद कर दिया!’ मतलब मंहगाई बढ़ने का आधार, इन पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने की ज़िम्मेदारी तेल कंपनियों के हवाले कर दी. आज़ाद कर दिया मतलब उन्हें बाज़ार के ऊपर छोड़ दिया! उसके बाद से दाम बढ़ने की घोषणा सरकार नहीं करती बल्कि सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियां जैसे इंडियन आयल, भारत पेट्रोलियम करती हैं. सरकार बगुला भगत बनकर बयान ज़ारी करती है, हम क्या कर सकते हैं, यह सब तो तेल कंपनियों ने किया है, सब कुछ बाज़ार नियंत्रित है.
2022 में मोदी सरकार ने संसद को बताया था कि पिछले 8 साल में सरकार ने मात्र 78 बार डीज़ल, पेट्रोल, गैस के दाम बढ़ाए हैं. विपक्षी दल चिल्लाए; 78 बार नहीं, आप गिनती भूल रहे हैं, आपने 98 बार बढ़ाए हैं!! रौला-रप्पा कर, मेजें थपथपा कर शाम को सभी माननीय अपने-अपने बंगले पर लौट गए. आइये इस सरकारी ठगी की जड़ तक जाया जाए.
क्या आप जानते हैं, भारत पेट्रोलियम पदार्थों का बड़ा निर्यातक देश है?
भारत दुनिया की तेल शुद्धिकरण हब है, तेल की वैश्विक व्यापार श्रंखला की एक बहुत महत्वपूर्ण कड़ी है. यह बात सही है कि देश की तेल ज़रूरत का 85% आयात होता है. भारत हर रोज़ लगभग 5 बिलियन बैरल (7 करोड़ 95 लाख लीटर) कच्चा तेल आयात करता है. लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि भारत हर साल लगभग $442 बिलियन (अर्थात लाख करोड़) मूल्य के पेट्रोलियम पदार्थों का निर्यात भी करता है. यह निर्यात अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और एसिया के देशों को तो होता ही है, खाड़ी के उन देशों को भी होता है, जहां से कच्चा तेल भारत आता है. इसकी वज़ह यह है कि भारत में तेल शुद्धिकरण की लागत सबसे कम रहती है क्योंकि यहाँ ना सिर्फ़ दुनिया में सबसे सस्ती लेबर उपलब्ध है बल्कि उद्योगपतियों को वातावरण, ज़मीन और समुद्र को कितना भी दूषित करने की छूट है. भारत में बने ‘हाई स्पीड डीजल’ की विदेशों में बहुत भारी मांग है. सबसे अच्छी गैस, जिससे सबसे कम वायु प्रदुषण होता है, निर्यात हो जाती है. इसे ‘मोटर स्प्रिट’ कहा जाता है. हवाई ज़हाज़ों में इस्तेमाल होने वाला बेहतरीन गुणवत्ता वाला इंधन ‘एविएशन टरबाइन फ्यूल’ भारत से निर्यात होता है. पानी के बड़े-बड़े जहाज़ों का इंधन, जो उर्जा परियोजनाओं में इंधन के रूप में इस्तेमाल होता है, भारत निर्यात करता है. ‘नेप्था’ नाम का एक बहुत महत्वपूर्ण पेट्रोलियम पदार्थ है, जो अनेक रसायन तथा तरह-तरह के पॉलीमर बनाने में कच्चे माल की तरह इस्तेमाल होता है, उसका सबसे बड़ा निर्यातक भारत है. बड़े उद्योगों में बड़ी-बड़ी भट्टियाँ तथा ऑक्सीडेशन की प्रक्रिया, पेट्रोलियम कोक (पेटकोक) से चलती हैं. यह बेशकीमती पदार्थ भारत से निर्यात होता है. रसोई गैस (एलपीजी) भी काफ़ी मात्रा में इसी देश से निर्यात होती है. तरह-तरह के लुब्रिकेंट, डामर (बिटुमिन), सुपीरियर केरोसीन का भी भारत भारी मात्रा में निर्यात करता है.
भारत में कच्चा तेल बहुत कम पैदा होता है लेकिन यहां तेल शोधन क्षमता दुनिया में पहले नंबर पर है. तेल का आयात कर, उसे शुद्धिकरण कर निर्यात करने में बहुत प्रचंड मुनाफ़ा, छप्पर फाड़ मुनाफ़ा (wind fall profit) कूटा जा रहा है. इसलिए कच्चे तेल का आयात और शोधित तेल पदार्थों का निर्यात देश के लोगों की ज़रूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि मुनाफ़ा कूटने के लिए होता है.
मार्च 26 को समाप्त हुए वर्ष में भारत से पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का कुल निर्यात $441.78 बिलियन पहुंच गया है. इसकी सालाना वृद्धि दर 34.66% है. प्रमुख तेल व्यापार कंपनियां हैं, रिलायंस पेट्रोलियम जामनगर, नायारा वाडीनगर, रोज़नेफ्ट, मैंगलोर रिफाइनरी प्रा लि, भारत पेट्रोलियम कोच्ची तथा इंडियन आयल पारादीप ओडिशा. कच्चे तेल के दाम बढ़ने से तेल कंपनियों को नुकसान तो तब हो जब वे सिर्फ़ आयात करती हों. ये विकराल कंपनियां तो तेल का व्यापार करती हैं, आयात भी करती हैं और निर्यात भी करती हैं. कच्चे तेल (क्रूड आयल) के दाम बढ़ने-घटने से इन्हें क्या फ़र्क पड़ता है. आयातित माल के दाम बढ़ेंगे तो निर्यातित माल के दाम भी तो बढ़ेंगे.
तेल का खेल इतना मासूम नहीं जितना सरकार बताती है!!
तेल व्यापार कंपनियों की तह में जाएंगे तो पता चलेगा, ‘साम्राज्यवाद, पूंजीवाद की चरम अवस्था’ में, वित्तीय पूंजी के खेल में, मात्र बैंकिंग और औद्योगिक पूंजियाँ ही एकाकार नहीं हुई हैं बल्कि सरकार और कॉर्पोरेट भी एकाकार हो गए हैं. दैत्याकार मगरमच्छ जैसी ये कंपनियां और बैंकों के बड़े-बड़े क़र्ज़ डुबोने वाली कंपनियां नाभिनालबद्ध हैं.
रिलायंस कंपनी का जामनगर तेल शुद्धिकरण काम्प्लेक्स

मुकेश अंबानी के मालिकाने वाली ‘रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड’, जो 17 लाख करोड़ पूंजी वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी है, तेल शोधन और संबंधित व्यवसाय करने वाली दुनिया की सबसे कंपनी है. 7500 एकड़ में फैले इस विशाल प्लांट की तेल शोधन क्षमता 14 लाख बैरल प्रतिदिन है. 1 बैरल = 159 लीटर, अत: शोधन क्षमता 22 करोड़ 26 लाख लीटर प्रतिदिन है. इस कॉम्प्लेक्स का ‘कोम्प्लेक्सिटी इंडेक्स’ भी दुनिया में सबसे बेहतर, 21.1 है. इसका मतलब है कि इस कंपनी में क्रूड आयल प्राप्त होने से उसके निर्यात के लिए जहाज़ों में लादने तक सारा काम और उसकी अनेक सहायक यूनिट जहां दूसरे पेट्रोलियम पदार्थ बनते हैं, सब एक ही परिसर में, एक दूसरे से मिल-जुल कर काम करते हैं जिसकी वज़ह से इस कंपनी की तेल शुद्धिकरण लागत दुनिया में सबसे कम है. इस रिफाइनरी के दो भाग हैं, एक इंडिया के लिए और दूसरा ‘स्पेशल इकनोमिक ज़ोन’ पूरी तरह निर्यात के लिए समर्पित है, जहाँ कंपनी को लगभग सभी टैक्स माफ़ हैं और वह सरकारी अनुदान भी प्राप्त करती है. सरकार कांग्रेस की रहे भाजपा की, यह कंपनी, हर सरकार को सरकारी तेल कंपनियों से कहीं ज्यादा प्यारी है. कारण बताने की ज़रूरत नहीं, सब जानते हैं!! बहुत सस्ते में मिले रुसी तेल के आयात और निर्यात द्वारा इस कंपनी ने अकूत मुनाफ़ा कूटा है. इस कंपनी ने मार्च 26 को समाप्त वित्तीय वर्ष में कुल $29.4 बिलियन (रु 2,78,808 करोड़) का निर्यात किया, $10.1 बिलियन (रु 95,754 करोड़) का शुद्ध मुनाफ़ा कमाया.
नायारा वाडीनगर – रोज़नेफ्ट
रिलायंस के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी तेल कंपनी ‘नायारा’ है. 2026 मार्च को 6,080 करोड़ का घोषित शुद्ध लाभ कमाने वाली वाडीनगर गुजरात स्थित, 4 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली यह कंपनी बहुत रहस्यपूर्ण है. इसके मालिक कौन हैं, इसके और रुसी कंपनी रोज़नेफ्ट के बीच क्या संबंध हैं, यह समझना बहुत मुश्किल है. ‘नायारा’ कंपनी के 49.13% शेयर रुसी तेल कंपनी ‘रोज़नेफ्ट’ के पास हैं, बाक़ी 49.13 % ‘निवेशकों के संघ (Consortium of Investors)’ के पास हैं. ‘रोज़नेफ्ट’ रुसी कंपनी है लेकिन रूस में नहीं बल्कि सिंगापुर में रजिस्टर्ड है. ‘निवेशकों के संघ’ के अंदर क्या है? गूगल का उत्तर रहस्य को और बढ़ा देता है; निवेशकों के इस संघ का नेतृत्व ‘मारेटेरा’ नाम की कंपनी, जिसका पहला नाम ‘ट्रेफीगूरा’ था और ‘यूनाइटेड कैपिटल पार्टनर्स’ नाम की कंपनियां मिलकर करती हैं. 49.13% और 49.13% के बाद बचे 1.74% शेयर का मालिक कौन है? इस सवाल पर ए आई ने भी हाथ जोड़ लिए!! इन कंपनियों के असली निवेशक कौन हैं? उत्तर आया; ‘ट्रेफीगूरा’ कंपनी इटली में रजिस्टर्ड है. इसने अपना नाम नहीं बदला बल्कि अपनी संपूर्ण पूंजी ‘हारा कैपिटल सारी’ नाम की कंपनी को दे दी, जिसने वह पूंजी ‘नायारा एनर्जी’ में लगा दी. वित्तीय पूंजी के इसी गिरोह ने 2017 में रुइया की एस्सार आयल नाम की कंपनी $12.9 बिलियन में ख़रीदी थी. एस्सार कंपनी और उसका मालिक ‘रुइया’ वही हैं जिन्होंने भारतीय बैंकों के रु 43,000 करोड़ डुबोए थे. बैंकों के डूबे यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि बैंकों के डूबे क़र्ज़ तो मोदी सरकार ने माफ कर दिए और सरकारी खजाने से इन बैंकों को पूंजी दे दी. डूबे तो भारत के ग़रीब-गुरबे मेहनतक़शों के, जिनसे जीएसटी के नाम से हर महीने 2 लाख करोड़ से भी ज्यादा की वसूली कर सरकारी खजाना भरा जाता है.
वित्तीय कंपनियों के इस मकड़जाल के अंदर और गहरे तक घुसने की कोशिश की तो यह ऊतर मिला, “ऊर्जा और धातु क्षेत्र की इन वित्तीय कंपनियों के निवेशक खुदरा निवेशक नहीं होते. ये निवेशक या तो ख़ुद सार्वभौम सरकारें होती हैं या असाधारण रूप से धनी लोग और उनकी कंपनियों की परस्पर साझे की कंपनियां होती हैं (मतलब असली निवेशक तक पहुंचना असंभव है). इसी तरह रुसी कंपनी ‘रोज़नेफ्ट’ के मालिकाने के बारे में गहराई तक जाने पर पता चला कि इसकी मालिक रूस की सरकार है. फिर यह कंपनी रूस के बजाए सिंगापुर में क्यों रजिस्टर हुई? जवाब आया, “‘रोज़नेफ्ट’ नाम की कंपनी की जड़ ‘पीजेएससी रोजनेफ्त आयल कंपनी’ है. इस मातृ कंपनी ने एक दूसरी कंपनी के साथ ‘स्पेशल परपज व्हीकल’ बनाया जिसके ज़रिए ‘नायारा वाडीनगर’ कंपनी में आधी हिस्सेदारी ख़रीद ली!! इसी ‘नायारा वाडीनगर’ नाम की कंपनी ने बहुत सस्ते में बिके रुसी तेल के लगभग आधे हिस्से को ख़रीदा है और फिर उसका शुद्धिकरण कर पेट्रोल तथा दूसरे पेट्रोलियम पदार्थों को यूरोप को निर्यात किया. नतीज़तन छप्पर फाड़ (wind fall profit) कमाया. इस सारी खुदाई से यह रहस्य भी समझ आ गया कि रूस के पुतिन और चीन के शी ने खुद को आजीवन राष्ट्रपति क्यों घोषित किया हुआ है? साथ ही यह भी पता चला कि फ़ासीवाद में मूल सत्ता, चुनाव के ज़रिए क्यों नहीं बदलतीं? नायारा कंपनी के 49.13% शेयर धारक ‘निवेशकों के संघ’ के बारे में जानने की कोशिश तो सर चकरा गया. कुल मिलकर वित्तीय पूंजी के इन गिरोहों की थाह पाना बहुत ही कठिन है. ये वित्तीय पूंजी का सबसे विभत्स दौर है.
मैंगलोर रिफाइनरी प्रा लि: तेल शुद्धिकरण की यह कंपनी भी अपनी कुल क्षमता का 40% एक्सपोर्ट करती है. इन सभी निजी कंपनियों को देश की तेल ज़रूरतों को पूरा करने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है.
सरकारी तेल कंपनियां घाटे में नहीं हैं, ज़बरदस्त मुनाफ़ा कूट रही हैं
सरकारी कंपनियां, ‘भारत पेट्रोलियम’ तथा ‘इंडियन आयल कारपोरेशन’ ने भी देश की ज़रूरतों को पूरा करने के बाद पिछले साल 6 करोड़ 20 लाख टन से भी ज्यादा पेट्रोलियम पदार्थों का निर्यात किया है. मार्च 26 को समाप्त हुए वर्ष में इन दोनों कंपनियों ने क्रमश: 25,843 करोड़ तथा 36,802 करोड़ का शुद्ध लाभ कमाया है. इंडियन आयल का मुनाफ़ा मार्च 2026 में मार्च 2025 की तुलना में 184% तथा भारत पेट्रोलियम का मुनाफ़ा 94% बढ़ा है. इंडियन आयल ने 10 करोड़ 51 लाख टन तथा भारत पेट्रोलियम ने 38 लाख 50 हज़ार टन पेट्रोलियम पदार्थों का निर्यात किया. भारत की कुल वार्षिक तेल खपत 24 करोड़ 40 लाख टन है, दैनिक खपत 9 करोड़ लीटर है.
