दिल्ली पुलिस ही नहीं, फिलहाल 'देश की सीमाओं की रक्षा' के नाम पर बनीं बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स, इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस, आदि सब मोदी सरकार के हुक्म पर दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश की जनता के रोष से अपराधी चुनाव आयोग की सुरक्षा के लिए 'बहादुरी' से डटी हुईं हैं ताकि कहीं किसी कोने से भी वह जनता जंतर-मंतर पर घुसने न पाए जिसके मौजूदा जनतंत्र की सर्वोच्च शक्ति होने का ढोल खूब जोर शोर से बजाया जाता है. जनता को विरोध से रोकने वास्ते एक एक व्यक्ति को दसियों पुलिसियों द्वारा घसीट कर गिरफ्तार करने से लेकर स्त्रियों के वस्त्र-अंग खींचने तक की बहादुरी का नमूना इस जनतंत्र की पुलिस द्वारा पेश किया जा रहा है.
लेकिन क्यों? क्योंकि जिस बात की चर्चा लंबे वक्त से हो रही थी कि चुनाव आयोग सत्ताधारी फासिस्ट बीजेपी का एक विभाग बन गया है, चुनाव में बीजेपी को जिताने वास्ते हरमुमकिन धांधली की जा रही है और मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण या SIR के नाम पर बहुत बड़ी तादाद में बीजेपी विरोधियों, मजदूर-मेहनतकशों, मुसलमानों, आदि को वोट के बुनियादी अधिकार से ही वंचित किया जा रहा है, अब वह बात बाकायदा सबूतों सहित सबके सामने आ गई है और विपक्षी दलों से लेकर तमाम फासीवाद विरोधी जनवाद हिमायती लोग इसके विरोध में आवाज बुलंद कर रहे हैं।
मेहनतकशों-वंचितों-अल्पसंख्यकों का वोट का हक छीना जा रहा है
मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण (SIR) के नाम पर करोड़ों जनता को फिर से लाइनों में लगा कर उनकी पहचान-नागरिकता के लिए ऐसे सबूत पेश करने का फरमान जारी किया गया, जिनका एकमात्र मकसद सही नाम जोड़ना नहीं, बल्कि बड़ी तादाद में नाम काटना था. भारत की सत्ता के ढांचे की जरा भी समझ वाले हर व्यक्ति के लिए साफ था कि इसका निशाना गरीब-मेहनतकश, प्रवासी श्रमिक, वंचित समुदाय, मुसलमान तथा अन्य अल्पसंख्यक ही बनने थे. महाराष्ट्र, बंगाल जैसे चुनाव वाले राज्यों में बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट से नाम काटे गए और बड़ी संख्या में नाम जोड़े भी गए, जैसे महाराष्ट्र में चुनाव पूर्व 60 लाख नाम जोड़ दिए गए. बंगाल में 27 लाख मतदाता बिना सुनवाई के बाहर कर दिए गए. यह संख्या बहुत सी सीटों पर परिणाम के अंतर से अधिक थी. सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कहते हुए वोट देने के मौलिक अधिकार से ही इंकार कर दिया कि इस चुनाव में वोट नहीं दे पाए तो क्या बिगड़ जाएगा! यह कटौती फर्जी थी यह इससे ही जाहिर हो जाता है कि इनमें से 22 लाख मतदाताओं ने सबूतों सहित अपील की है और इनमें से जिनके नाम ट्रिब्यूनलों द्वारा वापस जोड़े गए हैं खुद चुनाव आयोग उनके खिलाफ अपील कर रहा है अर्थात ट्रिब्यूनलों के आदेशों को पलटने में लगा है. अब फिर उपचुनाव में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि वोट नहीं दे पाए तो क्या बिगड़ जाएगा, उपचुनाव ही तो हैं! इस प्रकार सभी राज्यों में मिलाकर अब तक 13.30 करोड़ मतदाता सूचियों से बाहर किए जा चुके हैं.
यह भी जानकारी आ रही है कि बीजेपी ने बड़ी संख्या में वोट काटने के प्रीप्रिंटेड फॉर्म 7 अपने कार्यकर्ताओं से फाइल करवाए हैं और चुनाव आयोग इनके आधार पर, बिना स्थानीय बीएलओ, आदि की जांच के दिल्ली से ही सॉफ्टवेयर द्वारा नाम काट रहा है. बीजेपी कार्यकर्ताओं में हजारों फॉर्म 7 भरे हैं, ऐसे मतदाताओं के नाम काटने के लिए जिन्हें वो जानते तक नहीं! इनमें बड़ी सख्या मुस्लिम मतदाताओं की है. और जिनके नाम गलत काटे गए हैं, वे सबूत भी दें तो दिल्ली से नियंत्रित सिस्टम में स्थानीय बीएलओ/ERO को अधिकार ही नहीं है कि उनके सामने सही सबूत पेश किए जाने के बावजूद वो इनके नाम वापस जोड़ सकें. खुलासा और विरोध होने पर चुनाव आयोग कह रहा है कि ये लोग पहली बार वोटर बनने का फॉर्म 6 भरें, यह झूठ घोषणा करते हुए कि ये पहले मतदाता नहीं थे. इसके अतिरिक्त जबसे यह SIR नामक शुद्धिकरण चालू हुआ है तबसे नए वयस्क होकर मतदाता बनने वालों के नाम जोड़ने की प्रक्रिया ही बंद है और नहीं मालूम कि कितने करोड़ नवीन मतदाता सूची से बाहर रखें गए हैं. इसी प्रकार बिना कानून फॉर्म बदलने, प्रक्रिया बदलने, लिस्ट में नाम जोड़ने-काटने के सिस्टम को स्थानीय अधिकारियों के बजे कानून विरुद्ध दिल्ली दफ्तर के नियंत्रण में लाने, मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा मनमर्जी करने, आदि तमाम फर्जीवाड़े की बातें हाल में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के जरिए देश के सामने आईं हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में चुनाव आयोग के कामकाज संबंधी खुलासे पूरे देश को पहले से ही मालूम इस बात की पुष्टि ही करते हैं कि बीजेपी की फासीवादी सरकार ने पूंजीवादी जनतंत्र को पूरी तरह से खोखला कर चुनाव आयोग सहित इसकी सभी संस्थाओं को अपने अधीन कर लिया है और चुनाव आयोग पूरी तरह से चुनावों को बीजेपी के स्वार्थ में प्रबंध करने का औजार बन गया है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पहले फैसले और हाल के फैसले भी एक बार फिर से स्पष्ट करते हैं कि वहां से भी ‘जनतंत्र की रक्षा’ का हर विचार बस खामख्याली है। दरअसल पूंजीवादी जनतंत्र के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत नागरिकों के वोट देने के बुनियादी अधिकार को ही प्रभावी रूप से समाप्त किया जा चुका है। ऐसे में चुनाव आयोग के मुताबिक किसने कोई चुनाव जीता, और किसने सरकार बनाई, इसकी वैधता ही पूरी तरह संदिग्ध बन चुकी है।
सिर्फ वोट नहीं, सभी नागरिक अधिकार छीनने की शासक वर्गीय नीति
यह समझना ग़लत होगा कि बात सिर्फ वोट चोरी और चुनावी धांधली पर ही रुक जाएगी. पश्चिम बंगाल में वोट चोरी से आई बीजेपी सरकार मतदाता सूची में नाम न होने को सार्वजनिक योजनाओं के लाभ से वंचित करने का आधार बना राशन कार्ड रद्द करने का आदेश जारी कर चुकी है. वोटर लिस्ट में नाम नहीं है तो व्यक्ति की नागरिकता और पहचान पर ही सवाल खड़ा किया जा रहा है, उन्हें अवैध घुसपैठिया बताया जा रहा है. हालांकि कांग्रेस जनता के नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने की बड़ी दावेदार बनी हुई है, लेकिन कर्नाटक के कांग्रेसी मुख्यमंत्री डी शिवकुमार जून में ही ऐलान कर चुके हैं कि मतदाता सूची में नाम होने से ही व्यक्ति को सार्वजनिक योजनाओं का पात्र माना जाएगा. बिहार के मुख्यमंत्री ने भी ऐलान किया है कि मतदाता सूची में नाम न होने से व्यक्ति को सार्वजनिक योजनाओं का लाभार्थी नहीं माना जाएगा तथा भविष्य में उनके बैंक खाते भी बंद किए जा सकते हैं.
स्पष्ट है कि सिर्फ बीजेपी ही नहीं, यह पूरे भारतीय शासक पूंजीपति वर्ग की नीति है एवं बड़ी तादाद में नागरिकों को उनके नागरिक एवं आर्थिक अधिकारों से वंचित करने का आधार तैयार किया जा रहा है. दरअसल उनका ज़िंदा रहने का मौलिक अधिकार ही खतरे में पड़ जाएगा और अधिकारों से वंचित ऐसी भयभीत जनता अपने किसी भी अधिकार के लिए लड़ने में असमर्थ होकर शासक वर्ग के अत्यंत निर्मम शोषण का शिकार बन जाएगी. अतः वोट चोरी की इस साजिश का दायरा बहुत बड़ा है और यह कई दशक से जारी शासक वर्गीय प्रोजेक्ट है. असम में एनआरसी तथा पहचान के रूप में आधार की पूरी योजना इसी का अंग थी जिसमें केंद्र व राज्यों की सभी सत्ताधारी पार्टियां शामिल रही हैं. इसी के लिए अवैध घुसपैठियों का पूरा हौव्वा खड़ा किया गया ताकि नागरिकता, पहचान, वोटर लिस्ट के इस ‘शुद्धिकरण’ के लिए तर्क तैयार किया जा सके.
याद रहे 2004 में तत्कालीन यूपीए सरकार (वाम मोर्चा समर्थित) के कांग्रेसी गृह मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल ने संसद में देश में 1,20, 53, 950 अवैध बांग्लादेशी होने बताए थे, जिनमें से असम में 50 लाख और पश्चिम बंगाल में 57 लाख का आंकड़ा था. ये आंकड़े उसके पहली एनडीए सरकार ने तैयार किया था और यूपीए इसकी पुष्टि कर रहा था, हालांकि बाद में विरोध के बाद उन्होंने कहा कि ये अपुष्ट आंकड़े थे और सभी पार्टियों के समर्थन और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में की गई एनआरसी में भी यह बात पूरी तरह झूठ पाई गई. अवैध आप्रवासियों, घुसपैठियों, बांग्लादेशियों, आदि के बारे में ऐसे दीर्घ दुष्प्रचार द्वारा ही देश में इस तथाकथित ‘शुद्धिकरण’ के पक्ष में माहौल तैयार किया गया था.
चुनांचे आज फासिस्ट बीजेपी सरकार जो कर रही है उसमें निश्चय ही विपक्षी चुनावी दलों को मतदाता सूची तथा अन्य प्रकार की धांधली द्वारा सरकार बनाने की होड़ के समान अधिकार से वंचित कर सत्ता पर अपना एकाधिकार कायम करने का उसका निहित फासीवादी स्वार्थ है, लेकिन इस नीति की बुनियाद में भारतीय शासक वर्ग का एक दीर्घकालीन प्रोजेक्ट है जिस पर मूलतः सभी शासक वर्गीय दलों के मध्य एकराय है. इस बात को समझे बिना इसके प्रतिरोध की सटीक रणनीति तैयार नहीं की जा सकती है.
सरकार चलाने हेतु चुनाव में होड़ की दलों की आजादी फासीवादी दौर में छीनी जा रही है
यूं तो पहले भी चुनाव पूंजीपतियों की धनशक्ति, सांप्रदायिक-जातिगत प्रतिगामी सामाजिक वर्चस्व व संगठित अपराध की शक्ति से ही लड़े व जीते जाते रहे हैं। मेहनतकशों-उत्पीड़ितों के लिए तो इनमें अपने प्रतिनिधि चुनवा पाने के लिए कभी भी कोई निष्पक्ष अवसर जैसा कुछ नहीं था। किंतु इतना सच है कि शासक वर्ग की विभिन्न पार्टियों के बीच चुनाव में जीतकर सत्ता चलाने का मौका पाने की होड़ का एक अखाड़ा जरूर उपलब्ध था। इस होड़ के बीच में मेहनतकश-उत्पीड़ित जनता को भी अपना पक्ष रखने का एक सीमित अवसर प्राप्त हो जाता था, इससे अधिक कतई नहीं।
अब पूंजीवाद द्वारा पैदा घोर आर्थिक संकट से यह हुआ है कि बड़े इजारेदार पूंजीपतियों ने विभिन्न पूंजीवादी दलों के बीच होड़ के इस मैदान में भी अपनी पूंजी की शक्ति के साथ ही चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट तथा नौकरशाही की मदद से रही सही तटस्थता को समाप्त कर दिया है। इस प्रकार उन्होंने केंद्र-राज्यों की सत्ता को अपने मुनाफों के नजरिये से पसंदीदा पार्टी बीजेपी के लिए लगभग पूरी तरह आरक्षित कर दिया है। पूंजी की इस नग्न तानाशाही का सर्वाधिक खामियाजा मजदूरों-मेहनतकशों तथा उत्पीड़ित समुदायों की जनता को उठाना पड़ रहा है और समाज में हर प्रकार का आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक शोषण-उत्पीड़न बढ़ता ही जा रहा है। साथ ही फासिस्ट बीजेपी द्वारा सत्ता से दूर किए गए पूंजीवादी समूहों-दलों को भी पूंजीवादी सत्ता संचालन की होड़ से बाहर कर दिए जाने से विरोध है, हालांकि मेहनतकशों के शोषण पर उन्हें ऐतराज नहीं है।
यह समझना भी आवश्यक है कि बीजेपी विरोधी विभिन्न विपक्षी दल पूंजीवादी सत्ता संचालन की होड़ में बराबरी का मौका तो जरूर चाहते हैं किंतु उनके हित भी एक ओर बड़ी पूंजी तो दूसरी ओर प्रतिगामी सामाजिक वर्चस्व की ताकतों से जुड़े हैं। वे भी मजदूर वर्ग, मेहनतकश तथा उत्पीड़ित जनता के बड़ी तादाद में इस नग्न तानाशाही के खिलाफ मैदान में उतर आने से भय खाते हैं। अतः वे इस नग्न तानाशाही के विरुद्ध मीडियाई बयानबाजी और कोर्ट आदि में मुकदमों से आगे बढ़कर किसी वास्तविक जनसंघर्ष का आह्वान करने में रुचि नहीं रखते। यहां तक कि जिन चुनावों को धांधली से चुराया हुआ बता रहे हैं उनमें शामिल होकर उन्हें वैधता भी प्रदान कर रहे हैं ताकि पूरी पूंजीवादी व्यवस्था पर खतरा खड़ा न हो जाए.
दरअसल बीजेपी-एनडीए व कांग्रेस-इंडिया गठबंधनों में बस यह होड़ है कि कौन खुद को देशी-विदेशी पूंजी का बेहतर खिदमतगार सिद्ध कर दे ताकि सत्ता की चाबी सौंपने वास्ते पूंजीपति वर्ग उन्हें ही बेहतर व भरोसेमंद माने। एक ओर मोदी नेतृत्व में बीजेपी-एनडीए का प्लेटफॉर्म है कि उग्र राष्ट्रवाद, अंधता व धर्म जाति भाषा की नफरती राजनीति की आड़ में मजदूरों मेहनतकशों उत्पीडितों के सारे जनवादी हक-हकूक छीन तथा विरोध-असहमति की हर आवाज को निर्ममता से कुचल वह पूंजी को लूट की पूरी छूट देकर उसकी सर्वाधिक सेवा करने में सक्षम है। दूसरी ओर राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस-इंडिया का प्लेटफॉर्म है कि इस नग्न लूट से तथाकथित जनतंत्र में सारी उम्मीदें ही खत्म हो जाने से मेहनतकश उत्पीड़ित जनता पूरी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ ही विद्रोह कर दे सकती है। इसलिए काम पूंजी के हित में करते हुए भी जनतंत्र, सामाजिक न्याय और जनकल्याण की बातें करते हुए अवाम को झूठी उम्मीदें दिलाते रहना ही पूंजी के हितों की हिफाजत का सर्वश्रेष्ठ तरीका है। दोनों की बातें बाह्य तौर पर भिन्न जरूर हैं लेकिन परोक्ष रूप से दोनों के तार बड़ी पूंजी और प्रतिगामी सामाजिक शक्तियों के साथ ही जुड़े हुए हैं। सपा के रिलायंस मार्का समाजवाद, कांग्रेस की राज्य सरकारों के अदानी से मधुर रिश्ते और शरद पवार के अदानी अंबानी से 'पारिवारिक' संबंधों वगैरह से हैरत राजनीतिक नासमझी का लक्षण है।
चुनाव आयोग, न्यायपालिका सहित संवैधानिक संस्थाओं की गैर जनतांत्रिक अपारदर्शी नियुक्ति एवं कार्य पद्धति
हालांकि भारत का सारा शासक वर्ग दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र होने का दावा करते नहीं थकता, कटु सच्चाई यह है कि पूंजीवादी जनतंत्रों के स्तर से भी भारत के संवैधानिक जनतंत्र की विशिष्टता इसके अत्यंत कमजोर जनतांत्रिक कायदे, जनवादी अधिकारों के हनन के इंतजाम और जनता के प्रति इसकी नौकरशाही की जवाबदेही का सम्पूर्ण अभाव है. फिलहाल हम इसकी चुनाव आयोग, सुप्रीम/हाई कोर्ट, राज्यपाल, महालेखाकार, अटॉर्नी/सॉलिसिटर जनरल, मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, सूचना आयोग, जैसी सभी संवैधानिक संस्थाओं को देखें तो इनकी नियुक्ति पूर्णतः सत्ताधारी दल की मनमर्जी से होती है जिसमें जनतंत्र में सर्वोच्च बताई जाने वाली जनता की कोई भूमिका तो दूर उसे इसकी कोई सूचना तक नहीं होती, पूरी प्रक्रिया इतनी अपारदर्शी है.
दरअसल संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति जनता के प्रति नहीं सत्ताधारी दल के प्रति जवाबदेह हैं और अधिकांशतः सेवानिवृत्त भ्रष्ट चापलूस नौकरशाह ही हैं. जिस संविधान सभा की इतनी प्रशंसा की जाती है उसने इस प्रक्रिया के निर्णय की जिम्मेदारी आने वाली सरकार के विवेक पर छोड़ दी थी. और देश के सर्वाधिक जनवादी बताए जाने वाले प्रधानमंत्री नेहरू का विवेक था कि ऐसा कोई नियम न बनाकर नियुक्तियों का आधार उनकी/सरकार की पसंद को ही रखा जाए. यह हाल सर्वाधिक ‘जनवादी’ प्रधानमंत्री का था, तो लोग फासिस्ट मोदी से क्या उम्मीद रखते हैं? अतः चुनाव आयुक्तों से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों तक सभी पदों पर भ्रष्ट, टुकड़खोर, चापलूस, कॉर्पोरेट पूंजी के नौकर, मजदूर-मेहनतकश, उत्पीड़ित-वंचित जनता के शत्रु, न्याय और जनवाद के हर बुनियादी मूल्यों को कुचलने वाले ही भरे हुए हैं तो इसमें अचंभा क्या है?
चुनावी विपक्ष सरकार चलाने का मौका भर चाहता है, जनवाद नहीं
अगर हम चुनावी विपक्ष के विरोध पर गौर करें तो वे इस विरोध का निशाना मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को ही बना रहे हैं और बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों को ज्ञानेश कुमार के अपने विरोध के पक्षकार के तौर पर पेश कर रहे हैं. किंतु चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी की नियुक्ति भी इसी मोदी सरकार ने की थी. और मोदी सरकार के बारे में एक तथ्य निर्विवाद है कि कोई भी नियुक्ति ऐसे व्यक्ति की नहीं हुई जो ईमानदार हो, स्वाभिमानी हो, षडयंत्रों में शामिल होने में आना-कानी करे. सत्ता में मौजूद संघी गिरोह बहुत खांटी अपराधी हैं, वे कच्ची गोलियां नहीं खेलते. अच्छी तरह टटोलकर कि बंदे में रीढ़ नाम की चीज नहीं है, तभी उसकी नियुक्ति होती है. इन दोनों आयुक्तों की ग्रेजुएशन भी गुजरात में हो चुकी है.
कैबिनेट सेक्रेटरी वह व्यक्ति होता है जो सत्ता के हर अपराध में प्रत्यक्ष या परोक्ष हिस्सेदार होता है. फासीवादी शासन का एक दिन भी किसी बड़े अपराध के बगैर नहीं गुजरता. उत्तराखंड में तो फासीवाद का उत्तर प्रदेश जैसा ही नंगा नाच हुआ है, हो रहा है. संधू साहब के कार्यकाल में ही वहां मुसलमानों की दुकानों पर नाजियों की तरह क्रॉस लगाकर जुल्म ढाए गए, तब उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ा!! ‘नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ देश में सबसे ज्यादा पैसा उगाही वाले इदारों में से है. सुखबीर संधू उस जिम्मेदारी को भी निभा चुके हैं. विवेक जोशी भी हरियाणा सरकार के बहुत वफादार सेवादार रहे हैं. उनकी तारीफ में और कुछ कहने की जरूरत ही नहीं!!!
ज्ञानेश के विरुद्ध जोशी और संधू को कांग्रेस द्वारा इस तरह अपना लिया जाना, मौजूदा बुर्जुआ संकट जनित कॉर्पोरेट पूंजी के आंतरिक द्वंद्व के तर्क को ही पुख्ता बनाता है. यह कॉर्पोरेट पूंजी के बीच की गलाकाट होड़ जनित अंदरूनी कलह है. श्रम के अत्यधिक शोषण से पूंजी के अति संचय ने उत्पादक निवेश की संभावनाओं को बेहद संकुचित कर दिया है और प्रति इकाई पूंजी पर मुनाफा दर का संकट बढ़ रहा है. अतः न सिर्फ श्रमिकों पर शोषण का शिकंजा और अधिक कसा जा रहा है, छोटे मालिकों व मध्य वर्ग की संपत्ति को लूटा जा रहा है बल्कि इस लूट का सबसे बड़ा हिस्सा कब्जाने वास्ते खुद इजारेदार कॉर्पोरेट पूंजीपति एक दूसरे से हिंसक होड़ में जुटे हुए हैं.
इस हकीकत से भी, हालांकि, इस लड़ाई का महत्त्व कम नहीं होता. सत्ताधारी वर्ग के सबसे वर्चस्वकारी कॉर्पोरेट के बीच लूट के बड़े हिस्से को हथियाने की इस लड़ाई को इसके इसी मूल स्वरूप में लिया जाना जरूरी है, जिससे सत्ताधारी पार्टी ही नहीं बल्कि सत्ताधारी वर्ग का असली घिनौना चेहरा लोगों के बीच जाए. जन क्रोध की लपटें जो अब तीव्रतर होती जा रही हैं, उसमें खुद को खुदा समझने वाला ज्ञानेश कुमार तो तबाह होने से नहीं बच पाएगा लेकिन इतने से ही यदि यह सुनामी शांत कर ली गई तो भी इससे राहत तो मिलेगी लेकिन वह अस्थाई और तात्कालिक राहत ही साबित होगी. कांग्रेस, सीजेपी, आदि पार्टी इस संघर्ष को उसी दिशा में ले जा रही है. सत्ता की कुर्सी थोड़ी और जोर से हिलते ही, उन्हें उम्मीद है कि भाजपा-संघ को छोड़ जो भी बुर्जुआ रेवड़ सत्ता और विपक्ष में है, उनके पीछे-पीछे चल पड़ने वाली है. भाकपा, माकपा और लिबरेशन भी संसद की चंद सीटों के ही भूखे हैं, वे भी इसे डेमोक्रसी बचाओ तथा सेक्युलर-कम्युनल की लड़ाई घोषित कर मंत्री पद पाकर धन्य हो जाएंगे.
जनवाद की लड़ाई मजदूर वर्ग की लड़ाई व जिम्मेदारी है
इतिहास इस बात का गवाह है कि वोट का अधिकार हो या अभिव्यक्ति, सभा करने, संगठित होने, विरोध करने, अखबार-पर्चा निकालने, आदि का, यह सभी अधिकार कभी शासक पूंजीपति वर्ग ने अपनी ओर से दिए नहीं. हालांकि शासक पूंजीपति वर्ग ने हमेशा इन अधिकारों की बात को नारे के रूप में उछाला, लेकिन बुर्जुआ वर्ग की लिबरल (उदारवादी) विचारधारा (जो निजी संपत्ति व पूंजी के संचय में सभी बाधाओं से मुक्ति की विचारधारा है) के मुताबिक ये सभी अधिकार संपत्ति के अधिकार पर आधारित थे, जिसके पास संपत्ति नहीं थी, वो इन जनतांत्रिक अधिकार का पात्र भी नहीं था. 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध तक भी सबसे पुराने पूंजीवादी जनतंत्र ब्रिटेन में संसद की सीटें अक्सर विरासत में मिलती थीं और बारहा खरीदी-बेचीं जाती थीं. तब यह मजदूर वर्ग ही था जिसने सार्वत्रिक मताधिकार, पहले पुरूषों और फिर महिलाओं सभी के लिए, की मांग उठाई, इसका विस्तार किया और 1917 की रूसी क्रांति पश्चात सार्वत्रिक मताधिकार की लड़ाई को यूरोप-अमरीका से एशिया-अफ़्रीका तक जीता.
लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में मजदूर आंदोलन के अपनी इंकलाबी दिशा से भ्रमित-विचलित हो जाने के बाद अपने नवउदारवादी अवतार में पूंजीवादी शासक वर्ग ने एक बार फिर इन अधिकारों-स्वतंत्रताओं का हनन करना, सीमित करना आरम्भ कर दिया और पिछले दो दशक के गहन पूंजीवादी संकट के दौर में आगे बढ़ाये गए फासीवाद ने इन अधिकारों में कटौती शुरू कर दी है. भारत में वोट का मूल अधिकार छीना जाना हो या अमरीका में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत के निर्वाचन आयोग की प्रशंसा और वैसा ही वहां करने की इच्छा व्यक्त करना, दिखाता है कि यह पूंजीवाद द्वारा मजदूरों, मेहनतकशों, उत्पीड़ितों, वंचितों, अल्पसंख्यकों के जनवादी अधिकार छीनने, सभी जनवादी मूल्यों को कुचलने के एक नए दौर का हिस्सा है.
भारत में भी यह प्रक्रिया 1980 के दशक में आरम्भ हुई और 2008 के आर्थिक संकट पश्चात बेहद तेज हो गई जब खास तौर पर बेंगलूरु के तकनीकी-वित्तीय पूंजीपतियों ने नंदन नीलेकणी आदि के नेतृत्व में एक ‘नए भारत’ का खाका पेश करना शुरू किया और मनमोहन सिंह की सरकार ने तुरंत उन्हें इसे लागू करने की जिम्मेदारी भी सौंप दी. अवैध नागरिकों/घुसपैठियों से देश को मुक्त करने के लिए पहचान सुनिश्चित करने वाला ‘आधार’, अवैध/अपात्र निवासियों पर खर्च की बर्बादी रोकने हेतु डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, फेसिअल आईडी या निगरानी वास्ते चेहरे पहचानने वाले सॉफ्टवेयर (जुलाई में जंतर-मंतर पर जिनका भरपूर इस्तेमाल किया गया), नगदी के बजाय डिजिटल भुगतान को बढ़ाने के लिए नोटबंदी/यूपीआई, अप्रत्यक्ष करों की सख्त उगाही के लिए जीएसटी, तकनीक आधारित केंद्रीकृत प्रशासनिक ढांचा, चुनाव आयोग आदि संस्थाओं में केंद्रीय नियंत्रण से लेकर वोटर लिस्ट के शुद्धिकरण के ये सैंकड़ों प्रोजेक्ट भारत के पूंजीपति वर्ग के द्वारा आगे बढ़ाये जा रहे फासीवादी सत्ता के ढांचे का आर्किटेक्चर कहे जा सकते हैं. संदर्भ के लिए पाठक फरवरी 2015 में प्रकाशित ‘रीबूटिंग इंडिया’ नामक पुस्तक को पढ़ सकते हैं जिसके लेखक नंदन नीलेकणी / विरल शाह हैं. वोटर लिस्ट के शुद्धिकरण का विचार तथा चुनाव आयोग का केंद्रीकृत ECINET वाला जो नया चेहरा हम सब के सामने है उसका आरंभिक नक्शा इस पुस्तक में देखा जा सकता है (देखें संलग्न स्क्रीनशॉट)।


इन सभी योजनाओं के उस राजनीतिक आर्किटेक्चर को समझना हो जिसका भारतीय पूंजीवाद ने मनमोहन सिंह के दौर से ही निर्माण शुरू कर दिया था और मोदी की फासिस्ट हुकूमत ने तेजी से आगे बढ़ाया है तो इसके पीछे भारत की वित्तीय एवं टेक्नोलॉजी क्षेत्र की पूंजी के हितों को समझना होगा। नंदन नीलेकणी इसके सबसे चर्चित उदाहरण जरूर हैं लेकिन अकेले नहीं हैं। यह पूरे पूंजीपति वर्ग के हित में है, टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री सबसे चर्चित बस इसलिए है क्योंकि इसके प्रत्यक्ष सरकारी कांट्रैक्टर के रूप में उन्हें मुनाफे के रूप में इसे लागू करने का प्रत्यक्ष लाभ भी मिलता है, संपूर्ण पूंजीवाद के हितों में उनकी अपनी भागीदारी तो शामिल है ही।
यह भी समझना जरूरी है कि सुप्रीम व हाई कोर्ट न्याय करने के लिए नहीं है, बल्कि पूंजीवादी राज्य व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं, उसके संचालन में इनकी एक निश्चित भूमिका है। एसआईआर के मकसद की सच्चाई तो सुप्रीम कोर्ट को आरंभ से ही मालूम है और उसके संरक्षण में ही सारा काम हुआ है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने तो पश्चिम बंगाल के चुनाव के पहले ही कह दिया था कि वोट कट गया तो क्या, इस बार वोट नहीं दे पाए तो क्या। अभी फिर से बंगाल के उपचुनाव पर उसने यही कहा, उपचुनाव ही तो है, वोट नहीं दे पाए तो क्या। दरअसल सुप्रीम कोर्ट का काम है जब पूंजीवादी व्यवस्था में कोई राजनीतिक संकट हो तब कुछ बयानबाजी द्वारा न्याय का भ्रम पैदा कर जनांदोलनों की गर्मी को ठंडा कर दे, जिसके बाद शासक वर्ग का काम फिर बदस्तूर जारी रहता है। बुनियादी अधिकारों के मामले कोर्ट में नहीं जनता की अदालत में अर्थात जनसंघर्षों को मजबूत करने से उनके दबाव में ही तय हो सकते हैं। इन सुप्रीम व हाई कोर्टों से उम्मीद का भ्रम पैदा करना जनता के संघर्षों की धार को भोथरा करना है।
अतः आज मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी शक्तियों की जिम्मेदारी है कि वोट के अधिकार पर हमले से लेकर जनवादी अधिकारों पर फासीवादी हमले के सभी पहलुओं के खिलाफ खड़े हो रहे संघर्ष में अपनी नेतृत्वकारी वैचारिक-राजनीतिक भूमिका निभाने हेतु सन्नद्ध हों। बुर्जुआ विपक्ष के विरोध के विपरीत केंद्र में सरकार-पलट इन संघर्षों की आखिरी मंजिल नहीं, बल्कि पहला पड़ाव हो, इस बिंदु पर फोकस करते हुए देश स्तर पर शोषित-पीड़ित समाज की गोलबंदी की जाए. व्यवस्था के मूल आर्थिक संकट - बेरोजगारी, मंहगाई, अत्यल्प/अपर्याप्त वेतन, छात्रों-युवाओं का अंधकारमय भविष्य, महिलाओं पर बढ़ते जुल्म, जाति नफरत के जुल्मों की भयावहता, अल्पसंख्यकों को लगातार हाशिये पर धकेलते हुए उन्हें प्रतिहिंसा के लिए उकसाना-भड़काना आदि को इस राजनीतिक संकट से जोड़ने का गंभीर प्रयास करने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी की ओर बढ़ा जाए. इसी परिप्रेक्ष्य में वोट चोरी विरोधी संघर्ष को भी ज्ञानेश कुमार की बर्खास्तगी/गिरफ्तारी तक सीमित करने के चुनावी दलों के प्रयास के उलट उन पर वोट के अधिकार की बहाली तक इन चुनावों में शामिल न होने का दबाव बनाया जाना चाहिए. साथ ही हमारी विनम्र राय में इस आंदोलन में निम्न मांगों को उठाना चाहिए -
- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को बर्खास्त व गिरफ्तार करो. चुनाव आयुक्तों सहित सभी संवैधानिक पदों पर नियुक्ति तथा इनके काम करने की प्रक्रिया को जनतांत्रिक, पारदर्शी, सरकार से तटस्थ तथा जनता के प्रति जवाबदेह बनाओ.
- हर पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची में शामिल करना चुनाव आयोग की बुनियादी व प्राथमिक जिम्मेदारी है. इसके लिए मताधिकार से वंचित करने वाले मौजूदा SIR को तुरंत रद्द कर सभी पात्र मतदाताओं के नाम वाली सही मतदाता सूची बनाओ.
- फर्जी मतदाता सूची से हुए सभी चुनाव रद्द कर, इन्हें सही मतदाता सूची के आधार पर दोबारा कराओ.
- फर्जी मतदाता सूची के आधार पर बनीं अवैध सरकारों को तुरंत इस्तीफा देने के लिए मजबूर करो
- मतदाता सूची में नाम न होने की वजह से किसी भी पात्र व्यक्ति को नागरिक अधिकारों एवं राशन कार्ड आदि सार्वजनिक योजनाओं के लाभ से वंचित करना तुरंत बंद करो.
साथियों, इस गंभीर घड़ी में मजदूर वर्ग, सभी मेहनतकशों एवं उत्पीड़ितों की राजनीतिक शक्तियों को ही एकजुट होकर न सिर्फ मौजूदा जनवादी अधिकारों को सुरक्षित करने बल्कि इनके विस्तार द्वारा एक शोषण-उत्पीड़न तथा सभी विशेषाधिकारों मुक्त वास्तविक जनतांत्रिक समाज के निर्माण के लिए संघर्ष की राह गढ़नी होगी। यही एकमात्र विकल्प है।
