युवा शक्ति - संभावनाएं

रणवीर सिंह

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स्रोत

युवा शक्ति लंबे समय से निष्क्रिय थी। लगभग तीस साल पहले नकल विरोधी उपायों के नाम पर छात्र यूनियन रहित वातावरण तैयार कर दिया गया था। कई छात्र नेता चुनावी राजनीति में चले गए और कुछ खासे कामयाब भी हो गए। छात्र यूनियनों की सक्रियता कुछ बड़े शहरों तक सिमट कर रह गई वो भी किसी न किसी राजनीतिक दल के घटक के रूप में। लंबे समय तक, देश बिना किसी खास छात्र अथवा युवा हलचल के बिना चलता रहा।

2026 में सवाल उठा – इतने सारे युवा कहाँ से निकल आए? स्रोत सब को दिख रहा है और किसी को भी नहीं। एक खबर पर गौर करें:

03 जुलाई, 2026 फोर्ब्स इंडिया

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि 2036 तक कुल उपभोक्ता खर्च का 93 प्रतिशत मध्य और अमीर वर्गों से आने का अनुमान है। भारत का मध्य वर्ग 1995 से 2021 के बीच लगभग 6.3 प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ा है, और आज देश की 31 प्रतिशत आबादी मध्य वर्ग है।

वर्ग संरचना

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मध्य वर्ग, औसतन 42000 से 2.5 लाख रुपये महीना कमाता है। निश्चित रूप से यह सुनहरे सपने देखने वाला वर्ग है। एक अच्छी ज़िंदगी, अच्छा घर, अच्छी कार, आरामदायक छुट्टी, तथा अपने बच्चों को और ज़्यादा खुशहाल होते देखना चाहता है। लेकिन इसके सपने, भयंकर बेरोज़गारी, चढ़ती महंगाई, महंगी पढ़ाई और महंगे इलाज की वजह से टूट रहे हैं। समाज में तनाव और अपराध भी चिंतित करते हैं। अपने बच्चों को डॉक्टर या इंजीनियर बनाने का सपना है। इस काम में सब कुछ झोंका जा रहा है। यहाँ तक कि अपने गहने भी गिरवी रखकर कर्ज लिए जा रहे हैं। जब बच्चा, नौकरी पाने की कोशिश करता है, तो परीक्षा पत्र लीक हो जाता है और परीक्षा रद्द कर दी जाती है। तनाव में कुछ बच्चे अपनी जीवनलीला ही समाप्त कर देते हैं।

मध्य वर्ग बीमार भी पड़ता है। सरकारी अस्पताल खस्ता हालत में हैं। वह, चमचमाते निजी अस्पताल का रुख करता है। इलाज कराने के बाद वह पाता है कि उसकी बीमा पॉलिसी की सीमा पूरी होने के साथ साथ उसकी जेब भी खाली हो चुकी है।

मध्य वर्ग, ज़रूरी चीज़ों की कीमतों में हो रही लगातार बढ़ोतरी से भी परेशान है, उसके परिवार का बजट बिगड़ रहा है। वह, शांति और अच्छे माहौल में रहना चाहता है।

मध्य वर्ग को सोशल मीडिया के जरिए खूब बरगलाया गया और उसके अंदर धार्मिक नफरत पैदा की गई। इसी मध्य वर्ग ने, उदारवाद के दौरान जिस पीढ़ी को पैदा किया, उसी को आज जेन ज़ी कहा जा रहा है। उनकी प्राथमिक शिक्षा पूरी होते होते, सरकारी क्षेत्र को निजी क्षेत्र में बदल दिया गया और उन्हें नियमित रोजगार तथा सम्मानजनक वेतन से महरूम कर दिया गया। माता-पिता तो खून के आँसू पी गए, लेकिन युवाओं को आंदोलन करने और नारे लगाने से रोका नहीं जा सका।

लोग हैरान हैं, जेन ज़ी का श्रोत जानकार सकते में हैं – चारों ओर शांति थी, अचानक आंदोलन स्थल पर युवाओं की इतनी भीड़ कहाँ से आ गई और उनमें इतनी हिम्मत कहाँ से आ गई। युवा, आसमान से नहीं टपके। युवा, गुफाओं से नहीं निकले। वे, इसी समाज से निकले हैं। व्यवस्था की बेरुखी ने उन्हें फौलादी बना दिया है। उनके बैनरों पर भगत सिंह और चे ग्वेरा की तस्वीरें इत्तफाक नहीं है, सत्ता के लिए एक संदेश है।

जेन ज़ी के श्रोत का संशय तो दूर हुआ। अब, इस उभरती युवा शक्ति के चर्चे आम हैं और चारों तरफ उनकी मांग है।

  1. सत्ता वर्ग में हलचल:

सत्ता वर्ग के पास धन शक्ति, भाप शक्ति, पवन शक्ति और सूर्य शक्ति, सब हैं। जाहिर है, वे अब युवा शक्ति कबजाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने अपनी प्रबंध समिति को सक्रिय कर दिया है। पहले दमन फिर संवाद का ये खेल बड़ा रोचक है। जेन ज़ी ने पूरे तंत्र को झकझोर दिया है। प्रबंध समिति को अंदाजा है कि जेन ज़ी में सिर्फ़ विरोध करने की नहीं बल्कि बहुत कुछ करने की क्षमता है। वे पूरे वातावरण की फिजा बदल सकते हैं और राजनीतिक ज़मीन में कंपन पैदा कर सकते हैं। प्रबंध समिति ने अपने मुख्यालय को भी हालात की गंभीरता से अवगत करा दिया है।

  1. मेहनतकश वर्ग की उम्मीदें:

मज़दूर और किसान दोनों ही वर्ग, युवा शक्ति के उफान को देख रहे हैं। मज़दूर मायूस हैं। पूंजी आक्रामक है। यूनियनें कमज़ोर हो गई हैं। मज़दूरों ने अपनी मोल भाव करने की शक्ति काफी हद तक गंवा दी है। श्रम शक्ति, कौड़ियों के भाव बिक रही है। मज़दूर, भुखमरी के कगार पर हैं। श्रम कानून रद्द कर दिए गए हैं और उनकी जगह मज़दूर विरोधी कोड लागू कर दिए गए हैं। मज़दूरों को असरदार तरीके से दखल देने के लिए अतिरिक्त समर्थन की ज़रूरत है। किसान भी असमंजस की स्थिति में हैं। साल भर चले आंदोलन के बाद भी सिर्फ वायदे ही मिले, उपज का सही दाम नहीं। जले पर नमक छिड़कने वाली बात यह है कि प्रस्तावित भारत अमेरिका व्यापार समझौते के तहत अमेरिकी उत्पादों के लिए भारतीय बाज़ार खोलने का प्रावधान है। भारी सब्सिडी वाले अमेरिकी उत्पादों के सामने, भारतीय खेती उत्पाद टिक ही नहीं पाएंगे। हमारी खेती तबाह हो जाएगी और कर्ज़ में डूबे तथा संघर्ष कर रहे भारतीय किसान टूट जाएंगे। हालात धीरे धीरे उन्हें अपनी ज़मीन से बेदखल होने पर मजबूर कर देंगे और पीढ़ियों से चला आ रहा रोज़ी-रोटी का ज़रिया खत्म हो जाएगा। परेशान किसानों ने भी अपने भविष्य के लिए जेन ज़ी की ओर देखना शुरू कर दिया है।

युवा, सोच विचार कर रहा है। उन्हें किसी भी राजनीतिक दल पर भरोसा नहीं है क्योंकि सत्ता में आजमाए जाने के बाद सभी की पोल खुल चुकी है। युवा, अपना रास्ता चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। वे फिलहाल, खुद को खराब शिक्षा व्यवस्था और नौकरी के भ्रष्ट माहौल तक सीमित रख रहे हैं। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें फासीवादी तंत्र का सामना करना पड़ रहा है। अनुभव के आधार पर, वे बहुत कुछ सीख रहे हैं जैसे – सभी आंदोलनों में राजनीतिक तत्व मौजूद रहता है, सभी के लिए शिक्षा, इलाज तथा रहने लायक ठिकाना, और भ्रष्टाचार व अपराध जैसे मुद्दे भी उठाने होंगे, और सभी फासीवाद विरोधी ताकतों के साथ एकजुटता कायम करनी होगी। हालात, मज़दूरों, किसानों और युवाओं को एक साथ आने और फासीवाद और उससे जुड़ी सभी बुराइयों जैसे क्रूर प्रशासन, भ्रष्ट नुमाइंदे, न्याय पर दबाव, और बिके हुए मीडिया के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन छेड़ने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

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