ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित लेखन में चर्चित नाम रहा है। वे आजीवन जाति-विरोधी लेख, कविताएं वगैरह लिखते हुए ब्राह्मणों, ब्राहमणवाद और मनुवाद को कोसते रहे और जाति उन्मूलन की बात भी करते रहे। लेकिन उन्होंने स्वयं अपनी जाति को कभी भी नहीं छोड़ा। इसीलिए उन्होंने अपने नाम के साथ वाल्मीकि को जोड़ा। वे आजीवन अपनी जाति के अस्तित्व और अपनी जातिगत पहचान को बनाए रखते हुए स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते रहे। वर्णव्यवस्था की व्यवस्था के अनुसार मेहतर, भंगी, चमार, महार, रैगर इत्यादि जैसे अनेकों जाति सूचक घृणित नाम ब्राह्मणवाद ने पेशों के आधार पर मेहनतकश लोगों को दिए थे। आज भी ये नाम प्रचलित हैं और देश और समाज में घृणा के पात्र बन हुए हैं। लेकिन लगता है कि अनेकों दलित बुद्धिजीवियों और उनके अनुयाईयों ने ब्राह्मणवाद द्वारा मेहनतकश वर्ग को दी गई जातियों को खुद ही मानसिक तौर पर स्वीकार कर लिया है और वे अपनी-अपनी जातियों और जातिगत मानसिकता से मुक्त होने की बजाय इन पर गर्व करते हुए दिखाई देते हैं। यही तो ब्राह्मणवाद चाहता है कि शूद्रवर्ण उनके द्वारा दिये गए जातिगत नामों और जातियों के अस्तित्व को स्वीकार कर लें, ताकि वर्णव्यवस्था, जाति और जातिवाद बना रहे। यह एक तरह से दलितों और दलित बुद्धिजीवियों द्वारा वर्णव्यवस्था और जातिवाद को स्वीकार कर लेने जैसा ही है।
शासक हो जाने की चाह, दूसरों का शोषक हो जाने की चाह है
मेहतर, भंगी, नाई, चमार,महार, रैगर, धोबी मनुवादियों द्वारा दिए गए बेहद अपमानजनक शब्द है। ये सभी नाम श्रम और श्रमिक वर्ग के प्रति घृणा के प्रतीक है। वर्णव्यवस्था और जातिवाद और है क्या? श्रम और श्रमिकों के प्रति घृणा के भाव को ही तो जातिवाद कहते हैं। वर्णव्यवस्था भी हज़ारों वर्षों तक इसी आधार पर अस्तित्व में रही। लेकिन ये कथित बुद्धिजीवी न तो इस तथ्य को समझना चाहते हैं और न ही अपनी जाति और जातिगत पहचान से मुक्त होना चाहते हैं। ये कथित बुद्धिजीवी जानते हैं कि ब्राहमणवाद द्वारा उन्हें दिए गए नाम घृणित और बेहद अपमानजनक हैं लेकिन फिर भी इन नामों से मुक्त होने और उनका व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से बहिष्कार करने की बजाए वे अपनी-अपनी जातियों के लिए नए और सम्मानजनक नाम खोज कर उनका गौरवगान करने में लगे हैं। इसी क्रम में दलित बुद्धिजीवियों द्वारा भंगी या मेहतर जैसे जातिसूचक शब्दों के स्थान पर वाल्मीकि नाम खोज निकाला गया, जबकि कथित ऋषि वाल्मीकि का मैला ढोने वाली मेहतर जाति से कभी कोई सम्बन्ध नहीं रहा है।
इसी तरह चमारों ने न जाने कहां से जाटव नाम खोज निकाला। वे तो चमार जाति को अतीत में हुई शासक जाति भी बताते हैं और उसपर गर्व करते हैं। उनका मानना है कि सत्ता परिवर्तन के माध्यम से एक दिन वे इस देश के पुनः शासक हो जाएंगे। याद रहे, प्रत्येक शासक चाहे वह दलित हो या व्राह्मण अनिवार्य रूप से शोषक भी होता है। इसीलिए शासक हो जाने की चाह भी दूसरों का शोषक हो जाने की ही चाह है। शासक और शोषक पर्यायवाची शब्द हैं। आत्यंतिक रूप से दोनों का एक ही अर्थ है। इसीलिए सवाल शासक हो जाने का नहीं है बल्कि शोषक और शोषित, शासक और शासित, ब्राह्मण और शूद्र, अमीर और ग़रीब जैसे अमानवीय भेदों से सदा के लिए मुक्त हो जाने का है। लेकिन दलित बुद्धिजीवियों और दलितों द्वारा की जा रही उपर्युक्त सभी कवायदें जाने-अनजाने जातिवाद और वर्ण व्यवस्था स्वीकार करने और उसे स्थापित करने जैसी ही मालूम पड़ती है। लगता है हज़ारों वर्षों तक अस्तित्व में रहने के कारण वर्ण और जातिवाद, निम्न कही जाने वाली जातियों के अचेतन का हिस्सा बन चुकी हैं और ये जातियां और वर्ण उनकी मांस-मज्जा का हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन सामाजिक संबंधों के दौरान क़दम-क़दम पर ये जातिगत और वर्ण आधारित पहचान उन्हें अपमान और पीड़ा भी देती रहती हैं। इसके बावजूद अपनी जातियों और जातिगत पहचान से मोहग्रस्त होने के कारण उनसे मुक्त होने की बजाए, ये कथित बुद्धिजीवी जाने-अनजाने जाति और जातिवाद को स्थापित करने में ही लगे हैं।
याद रखिए, असली दुश्मन ब्राह्मण नहीं ब्राह्मणवाद, ब्राह्मणवादी, जातिवादी मानसिकता है और इनको संरक्षण देने वाली व्यवस्था पूंजीवाद है
सोचने और समझने की बात है कि वाल्मीकि, चमार, रैगर, महार इत्यादि रह कर आप जातिवाद के उन्मूलन की लड़ाई कैसे लड़ सकते हैं? लेकिन ये कथित बुद्धिजीवी वाल्मीकि या जाटव रहकर जातिवाद और वर्णव्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ते रहे हैं। आजीवन वर्ण व्यवस्था और जातिवाद की पीड़ा को भोगने के बावजूद ये कथित बुद्धिजीवी आज भी अपनी जातिगत चेतना के खोल से बाहर नहीं निकल सके हैं। लेकिन जातिगत चेतना से लैस होकर आप दूसरी जातियों के साथ संघर्ष करेंगे तो इससे जातिवाद और जातीय घृणा बढ़ेगी ही, कम या खत्म कभी भी नहीं हो सकेगी। याद रहे, इस पूंजीवादी व्यवस्था में असली दुश्मन ब्राह्मण नहीं है बल्कि असली दुश्मन है ब्राह्मणवाद, ब्राह्मणवादी और जातिवादी मानसिकता है और इनको संरक्षण देने वाली व्यवस्था पूंजीवाद है। इसीलिए दलितों का मुख्य दुश्मन ब्राह्मण जाति, हिन्दू धर्म या अन्य कोई धर्म या सम्प्रदाय नहीं है नहीं बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था है, जो ब्राह्मणवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, धार्मिक उत्पीड़न जैसी सामन्ती मानसिकताओं को संरक्षित किये हुए है।
आज इसी पूंजीवाद का सहयोग और संरक्षण पाकर वर्ण व्यवस्था, जातिवाद, साम्प्रदायिकता की पोशाक शक्तियां सत्ता पर क़ाबिज़ हो बैठी हैं और वह दलितों का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण श्रमिकवर्ग शोषण और दमन करने में लगी हुई है। लेकिन इसके विपरीत अधिकांश दलित बुद्धिजीवी खुद ही जाति चेतना की सघनता से लैस दिखाई पड़ते हैं। जाति चेतना की इसी सघनता के कारण और वर्ग चेतना के अभाव में अन्य स्वर्ण जातियों और अन्य धर्मों और उनके अनुयाइयों के साथ संघर्ष में उलझे हुए हैं। इससे जातिवाद ख़त्म होने की बजाए और बढ़ेगा, हिंसा, कलह क्लेश और सामाजिक वैमनस्यता बढ़ेगी और हल कुछ भी न होगा। मैं ऐसे अनेकों ब्राह्मण और सवर्ण जातियों में जन्मे मित्रों को जानता हूं जो जातिगत चेतना से मुक्त होकर वर्णव्यवस्था और जातिवाद के ख़िलाफ़ संघर्षरत हैं क्योंकि वे इस तथ्य को भलीभांति समझ गए हैं कि निम्न जातियों की ही तरह सवर्ण जातियों के अधिसंख्यक लोग भी आज इस पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण और दमन का समान रूप से शिकार हैं।
यह समझना बेहद ज़रूरी होगा कि पूंजीवादी व्यवस्था में कोई भी समूची जाति शोषक जाति नहीं होती और यह भी तथ्य है कि कोई भी पूरी जाति शोषित भी नहीं होती। इसीलिए आज सभी सवर्ण शोषक नहीं रह गए हैं और न ही सभी दलित शोषित रह गए हैं। पूंजीवादी व्यवस्था में सवर्ण और दलित दोनों जातियों के चंद लोग मिलकर सवर्ण और दलित जातियों की बहुसंख्यक मेहनतकश जनता का शोषण और दमन करने में संलग्न हैं, जबकि सामन्ती व्यवस्था में एक समूचा वर्ण या समूची जाति अन्य निम्न कही जाने वाली मेहनतकश जातियों का एकतरफ़ा शोषण और दमन करती रही थी। यही सामन्ती और पूंजीवादी व्यवस्था का फ़र्क़ रहा है। इसीलिए इस पूंजीवादी व्यवस्था में जातिवाद के उन्मूलन के लिए दलितों को भी जाति के आधार पर नहीं, बल्कि वर्ग के आधार पर स्वयं को समझना और संगठित करना होगा। लेकिन ओमप्रकाश वाल्मीकि आजीवन स्वयं को वाल्मीकि (जाति) स्वीकार करके जाति के ख़िलाफ़ लिखते और बोलते रहे। यह विरोधाभासपूर्ण है। आप चमार, भंगी, मेहतर, महार, रैगर या वाल्मीकि भी बने रहें और जातिवाद भी ख़त्म हो जाए, यह कैसे सम्भव है? जातिवाद और वर्णव्यवस्था का उन्मूलन करने के लिए के लिए सबसे पहले स्वयं को जाति चेतना की जंज़ीरों से मुक्त करना होगा, वरना आप कोल्हू के बैल की तरह चलेंगे तो दिन-रात लेकिन पहुंचेंगे कहीं भी नहीं।
मुनाफ़ा, बिना शोषण और दमन किए नहीं कमाया जाता
जातिवाद का उन्मूलन करने के लिए आज ज़रूरत है कि पेशों पर आधारित जाति और जातिगत नामों को नकारा जाए, जातियों का बहिष्कार किया जाए और स्वयं को शोषितवर्ग यानी एक कामगार या मेहनतकशवर्ग के रूप में समझा और जाना जाए, किसी जाति विशेष के रूप में नहीं। जातिसूचक घृणित नामों से व्यक्तिगत और संगठित तौर पर छुटकारा पाया जाए। पूंजीवाद ने सामंतवाद के भौतिक या आर्थिक आधार को तो नष्ट किया लेकिन उससे उपजे ब्राहमणवाद, जातिवाद और धार्मिक उत्पीड़न के रूप में वैचारिक और मानसिक तौर पर वह आज और भी सघन रूप में जिंदा है। यह सच है कि सामंती व्यवस्था की तुलना में पूंजीवादी व्यवस्था ज़्यादा खुली और प्रगतिशील व्यवस्था मानी जाती है। पूंजीवादी व्यवस्था के इसी खुलेपन के कारण भंगी जाति में जन्म लेने के बावजूद ओमप्रकाश वाल्मीकि स्वयं शिक्षित हुए और उन्होंने कभी भी मैला ढोने का परंपरागत काम नहीं किया बल्कि वे आजीवन लेखन का यानी बुद्धिगत काम ही करते रहे जो कि ब्राह्मणों का परंपरागत काम रहा है लेकिन आश्चर्य की बात है कि फिर भी वे स्वयं को वाल्मीकि ही मानते रहे। इस तरह से तो वे ब्राहमणवाद को ही पोषित करते मालूम पड़ते हैं और साथ-साथ अपने लेखन में ब्राह्मणों और ब्राहमणवाद को दिनरात कोसते भी रहे।
यहां यह उल्लेख करना ज़रूरी होगा कि यही कथित बुद्धिजीवी, इस बात का प्रचार करते रहे हैं कि दलितवर्ग की आज जो कुछ सुधरी हुई स्थिति दिखाई पड़ती है या उनको जो अधिकार प्राप्त हुए हैं वे अंबेडकर की ही देन हैं। यह आंशिक सच हो सकता है लेकिन पूर्ण सच नहीं है। सच तो यह है कि अंबेडकर स्वयं सामंती व्यवस्था की तुलना में पूंजीवादी व्यवस्था के खुलेपन के कारण ही पढ़-लिख पाए थे, वरना उनका शिक्षित हो पाना लगभग असंभव ही था। भारत में पूंजीवादी व्यवस्था को अंग्रेज़ लेकर आये थे इसीलिए कुछ दलित बुद्धिजीवी अंग्रेजों को दलितों का मसीहा मानते हैं। जबकि हकीकत यह है कि अंग्रेज़ यहां भारत या दलितों का उद्धार करने के लिए नहीं आये थे बल्कि मुनाफ़ा कमाने के लिए ही आए थे और मुनाफा बिना शोषण और दमन किए नहीं कमाया जा सकता। जो हो, यह कहना गलत नहीं होगा कि आज दलितवर्ग को जो अधिकार मिले हुए हैं वे अकेले अंबेडकर या किसी अन्य महापुरुष के प्रयासों का फल नहीं है बल्कि समस्त दलित वर्ग और श्रमिक वर्ग द्वारा पूंजीवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ निरंतर किए गए अथक, त्यागपूर्ण सामूहिक संघर्षों और सामंती व्यवस्था की तुलना में पूंजीवादी व्यवस्था के खुलेपन का ही परिणाम रहे हैं।
पूंजीवादी व्यवस्था का एक नंगा सच यह भी है कि इस व्यवस्था में आप लेखक, बुद्धिजीवी, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री इत्यादि कुछ भी हो जाये, आप रहेंगे दलित ही। दूसरी महत्वपूर्ण बात, इस पूंजीवादी व्यवस्था में दलितवर्ग के कुछ लोगों की मुक्ति तो सम्भव है लेकिन पूरा दलित-शोषित और श्रमिकवर्ग कभी भी पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो सकता। लेकिन सवाल चंद व्यक्तियों की मुक्ति का नहीं बल्कि समस्त दलित-शोषित श्रमिकवर्ग की मुक्ति का है। ऐसे में इस पूंजीवादी व्यवस्था में वर्णव्यवस्था, जातिवाद के ख़िलाफ़ कुछ भी लिखें, आप कितना ही साहित्य रचें, कितनी ही कविताएं लिखें, कितने ही बड़े लेखक हो जाएं, आपकी पहचान रहेगी एक दलित के ही रूप में। इसीलिए ओमप्रकाश वाल्मीकि शिक्षित होने के बाजूद रहेंगे दलित ही। इस पूंजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति का वर्ग परिवर्तन तो हो सकता है लेकिन वर्ण या जाति परिवर्तन किसी भी सूरत में संभव नहीं हो सकता। इस स्थिति के लिए व्यवस्था के साथ-साथ स्वयं ओमप्रकाश वाल्मीकि भी समान रूप से जिम्मेदार हैं क्योंकि जब आप स्वयं ही अपनी जाति को मान्यता देते हैं और अपनी जाति के नाम से ही स्वयं को समझते और पहचानते हैं तो स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती है। अंबेडकर भी उच्च शिक्षित होते हुए भी स्वयं को दलितों का ही नेता मानते रहे। ऐसे में, दूसरे भी (ब्राह्मण भी) अगर आपको जातिगत आधार पर पहचानते हैं तो फिर तकलीफ़ क्या है? इससे जातिवाद बढ़ेगा या कम होगा? आप अपनी जाति को स्वीकार कर लें और उस पर गर्व करें, यही तो ब्राह्मणवाद चाहता है और यही ब्राह्मणवाद का लक्ष्य भी है।
