किसी समाज का 99 प्रतिशत बुद्धिजीवी या पढ़ा-लिखा वर्ग आखिर अपने ही समाज के प्रति बेईमान, भ्रष्ट और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों से विमुख क्यों हो जाता है? यह होता है लेकिन यह कहना ही काफी नहीं है बल्कि इसकी पड़ताल करना भी बेहद ज़रूरी है। हमारा वर्तमान समाज मुख्य तौर पर पूंजीवादी व्यवस्था पर आधारित है जो असमान आर्थिक और सम्पत्तिगत संबंधों पर आधारित है। इस व्यवस्था में व्यक्ति तो किसी हद तक स्वतंत्र हो सकता है लेकिन वर्ग या जातियां सामूहिक रूप से कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकती हैं। इसीलिये इस व्यवस्था में आर्थिक समानता के बिना समानता, स्वतन्त्रता, न्याय और बंधुत्व जैसे शब्द खोखले आश्वासन ही साबित हुए हैं। उनका कोई भी मूल्य नहीं। समानता और स्वतन्त्रता के बिना बंधुता भी एक खोखला फ़िकरा ही है। ज़मीनी हकीक़त यह है कि आर्थिक रूप से समान या सबल होकर व्यक्ति के लिए सामाजिक रूप से भी समान और सबल होने की संभावनाओं के द्वार खुलते हैं, लेकिन धनहीन और सम्पत्तिहीन व्यक्ति के लिए सामाजिक समानता के द्वार हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं, फिर चाहे वह किसी भी वर्ण, जाति और धर्म से संबंधित क्यों न हो।
इस व्यवस्था में व्यक्ति पूँजी को नहीं बल्कि पूँजी व्यक्ति को नियंत्रित करती है
अतीत में कथित निम्न वर्ग के लोगों को सम्पत्तिगत के अधिकारों से वंचित करके ही उन्हें सामाजिक रूप से दीन हीन बनाया जा सका। दूसरे, इस व्यवस्था में व्यक्ति की स्वतन्त्रता की सीमा वहीँ तक जाती है जहां तक वह संपत्ति से जुड़ा है। इस पूंजीवादी व्यवस्था में व्यक्तियों, जातियों और वर्गों की सामाजिक हैसियतें उनकी आर्थिक स्थिति और समाज में मौजूद और प्रचलित सम्पत्तिगत संबंधों से तय होती है। यहां व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं पूँजी का मूल्य और महत्त्व है। यहां अगर व्यक्ति और समूहों का कोई महत्त्व और मूल्य है तो उसके पास जो पूंजी का स्वामित्व है उसी के कारण है। इसीलिए व्यक्ति येन केन प्रकारेण धन-संपत्ति या पूँजी के पीछे भागता है क्योंकि वही उसकी सामाजिक हैसियतों को तय करने का कारक बनता है। इस व्यवस्था में व्यक्ति पूँजी का मालिक नहीं है बल्कि पूँजी ही व्यक्ति और समाज को नियंत्रित करती है। व्यक्ति के ऊपर पूँजी के वर्चस्व, नियंत्रण और महत्त्व के कारण ही इस व्यवस्था को पूंजीवादी व्यवस्था कहा जाता है।
आप लाख लीपापोती करें लेकिन घोर भौतिक असमानताओं के चलते इस व्यवस्था में समानता स्वतन्त्रता और बंधुता संभव नहीं क्योंकि आर्थिक समानता के बिना सामाजिक समानता एक धोखा, आडंबर है। आज भारत में 1 प्रतिशत लोगों का अल्पसंख्यक कामचोर समूह देश की कुल धन संपदा के 72 प्रतिशत हिस्से पर क़ब्ज़ा करके बैठे है और यही पूंजीपति देश की शासन व्यवस्था को नियंत्रित और संचालित कर रहे हैं। अम्बानी-अडानी-टाटा-बिड़ला इत्यादि पूंजीपतियों की तुलना में सम्पत्तिहीन व्यक्तियों और समूहों की स्वतन्त्रता और समानता ज़्यादा दूर तक नहीं जा सकती और न ही स्वतन्त्रता, समानता जैसे शब्दों का उनके लिए कोई महत्त्व ही हो सकता है। इसीलिये इस व्यवस्था में सदियों से घोर असमानताओं का शिकार रहे दलित बुद्धिजीवियों और पढ़े लिखे लोगों को भी अपनी अस्मिता और सामाजिक पहचान और समानता की तलाश है और व्यवहार में कदम-कदम पर वे पाते हैं कि आर्थिक रूप से निम्न होने के कारण वह पढ़ा-लिखा और योग्य होने के बावजूद इस व्यवस्था के हर सोपान पर हीन है, प्रताड़ित है। इसीलिए वह पूँजी यानी सत्ता, संपत्ति और पद की तरफ भागता है और भटकता है क्योंकि सत्ता, संपत्ति और पद के माध्यम से ही वह इस व्यवस्था में अपना स्थान बना सकता है। उसके लिए और कोई रास्ता उसे दिखाई नहीं देता। इसीलिए पूँजी को प्राप्त करने के लिए उसे कदम-क़दम पर मौजूद भयंकर गला काट प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा से गुजरना पड़ता है।
इस व्यवस्था में प्रतियोगिता के ज़रिये दूसरों की स्वतंत्रता को रौंदकर ही आप अपनी स्वतन्त्रता को स्थापित कर सकते हैं और फिर उनपर शासन कर सकते हैं और यह कार्य दलित-शोषित श्रमिक वर्ग के श्रम के शोषण किए बगैर संपन्न नहीं हो सकता। यहां हर व्यक्ति की स्वतंत्रता एक सोपान क्रम में है जो निजी संपत्ति के अधिकार पर आधारित है। यही सोपान क्रम किसी व्यक्ति, किसी जाति या किसी वर्ग की सामाजिक स्थिति को निर्धारित करता है। इसीलिये जिस व्यक्ति या समूह की आर्थिक स्थिति जितनी निम्न स्तर पर रही है वह उतनी ही निम्न जाति से संबंधित रहा है। इसीलिये निम्न और पिछड़ी जातियों की सामाजिक स्थिति में भी फर्क़ पाया जाता है और कथित विभिन्न उच्च जातियों के अंदर भी यही सोपानक्रम देखा जा सकता है जो व्यक्तियों और जातियों की असमान सामाजिक स्थितियों को रेखांकित करता है। उनकी सामाजिक हैसियतें मुख्यतः इस बात से तय होती हैं कि उनका समाज में मौजूद सम्पत्तिगत संबंधों में उनका क्या स्थान है? इसीलिए एक ग़रीब सम्पत्तिहीन आदमी के लिए स्वतंत्रता, समानता और न्याय का कोई मूल्य नहीं हो सकता।
घोर व्यक्तिवाद पूंजीवाद का आवश्यक उत्पाद
परिवार में भी जो व्यक्ति आर्थिक रूप से ज्यादा संपन्न होता है उसी का परिवार पर नियंत्रण होता है और वही पारिवारिक नीति-नियमों का नियंता हो जाता है और परिवार में उसकी स्थिति वही होती है जो इस व्यवस्था में ब्राह्मण की होती है या एक शासक की होती है। दूसरी ओर, उसी परिवार में आर्थिक रूप से कमज़ोर सदस्य की में वही स्थिति होती है जो इस व्यवस्था में निम्न जातियों की होती है। यह इस व्यक्तिवादी समाज की एक ठोस सच्चाई है। इसीलिए इस व्यवस्था में व्यक्ति 'कुछ पाते' या*'कुछ बनते' ही शेष समाज से ऊपर हो जाता है और उसकी उपेक्षा करके स्वयं के बारे में ही सोचता है, समाज के बारे में नहीं। समाज तो ऊपर पहुँचने के लिए उसके लिए मात्र सीढियां ही होती हैं। यह इस पूंजीवादी व्यवस्था की ढांचागत खराबी है जिसके चलते व्यक्ति स्वयं को समाज से हमेशा ऊपर रखता है। इस व्यवस्था में संवैधानिक विधियों के माध्यम से बहन मायावती जी एक साधारण गरीब घर में जन्म लेकर अध्यापक बनीं और फिर मुख्यमंत्री के पद तक जा पहुंची और देखते ही देखते वह खाकपति से अरबपति बन बैठी। चलो, यह भी ठीक है लेकिन इससे न तो दलित शोषित श्रमिक वर्ग का ही कुछ भी उत्थान हुआ और न ही न ही जातिवाद और वर्ण व्यवस्था का ही बाल भी बांका हुआ। इस व्यवस्था में इतना 'कुछ पा' लेने के बाद आज वे दलित समाज ही नहीं वरन शेष समाज की भी विशिष्ट व्यक्ति बन बैठी हैं। आज उनकी हैसियत ऐसी है कि उनके ही दलित समाज का कोई व्यक्ति उनसे मिलना चाहे तो यह उसके लिए लोहे के चने चबाने जैसा काम होगा क्योंकि अब वह शासक वर्ग का हिस्सा बन चुकी हैं और इस व्यवस्था में शासक और शेष समाज की दूरी हमेशा उतनी ही बनी रहती है जितनी जमीन और आसमान के बीच होती है।
इसी प्रकार, शासक वर्ग के सहयोग से 'कुछ पा लेने' के बाद आज उदित राज की स्थिति एक विशिष्ट व्यक्ति की है। इसीलिये आज वे अपने को 'शेष समाज' से ऊपर रखते हुए घोर जातिवादी, वर्ण व्यवस्था की पोषक और साम्प्रदायिक पार्टी में शामिल होकर उसकी जन-विरोधी और दलित-विरोधी नीतियों के साथ सहयोग और समर्थन कर रहे हैं। वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं की अब वे स्वयं को दलितों और शेष समाज से ऊपर एक विशिष्ट व्यक्ति समझते हैं। इस व्यवस्था में ऐसा ही संभव है और यह व्यवस्था व्यक्ति को ऐसा करने की इजाज़त देती है और ऐसा शोषक वर्ग के सहयोग और इस शोषणकारी व्यवस्था का समर्थन करने पर ही संभव है। लेकिन यह व्यक्ति के लिए तो संभव है लेकिन पूरे दलित-शोषित श्रमिक वर्ग के लिए संभव नहीं है। इसीलिये इस पूंजीवादी समाज व्यवस्था को व्यक्तिवादी समाज कहते हैं क्योंकि इस व्यवस्था में व्यक्ति हमेशा समाज से ऊपर बना रहता है।
श्रम के प्रति घृणा का भाव ही जातिवाद और वर्ण व्यवस्था का मूल आधार है; पूंजी के राज़ में जातिगत उत्पीड़न से मुक्ति कैसे संभव है?
इसीलिए दलित शोषित श्रमिक वर्ग की मुक्ति इस व्यवस्था में किसी भी सूरत में संभव नहीं हो सकती। उसकी मुक्ति तो इस व्यवस्था को उखाड़कर समानता पर आधारित नई समाज व्यवस्था की स्थापना करके ही हो सकती है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस व्यवस्था में एक व्यक्ति, एक दलित भी, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और पूंजीपति तक हो सकता है लेकिन कोई भी जाति या वर्ग कभी भी सामूहिक और सम्पूर्ण रूप से सामाजिक और आर्थिक रूप से मुक्त नहीं हो सकता। यह पूंजीवादी व्यवस्था कुछ हद तक कुछ व्यक्तियों का 'कल्याण' तो करती है लेकिन इस 'कल्याण' में वह उनको शेष समाज के प्रति संवेदनहीन, भ्रष्ट और स्वार्थी भी बना देती हैं। ऐसे में व्यक्ति तो कुछ हद तक ऊपर उठ जाता है लेकिन आत्मिक और नैतिक रूप से उसका पतन भी हो जाता है। लेकिन यह व्यक्ति का तथाकथित 'कल्याण' अनिवार्य रूप से शोषित और दमित जातियों और वर्गों को परतंत्र बनाये रखने की प्रक्रिया का ज़रूरी हिस्सा होता है। इसीलिए इस व्यवस्था में जाति और वर्गों की मुक्ति असंभव है। इस व्यवस्था में एक दलित भी पूंजीपति होकर क्या करेगा? अनिवार्यरूपेण वह अपने मुनाफ़े के बारे में ही सोचेगा न कि शेष दलितों और वंचितों के बारे में, और मुनाफ़े का अर्थ ही क्या होता है? श्रम का शोषण और श्रम का शोषण और श्रम के प्रति घृणा का भाव ही तो जातिवाद और वर्ण व्यवस्था का मूल आधार है। इस तरह से व्यक्ति जाने-अनजाने जाति और वर्ण पर आधारित व्यवस्था का समर्थक और वाहक हो जाता है और शेष समाज से अपना नाता तोड़ बैठता है।
यह व्यवस्था व्यक्ति और समाज, शासक और शोषित के बीच दूरी को बनाये रखने पर आधारित है। यह कोई जानबूझकर नहीं हो रहा है बल्कि इस व्यवस्था के नीति-नियमों और जाति चेतना की सघनता और वर्ग चेतना की समझ की कमी के तहत ही हो रहा है। इसी प्रकार इस व्यवस्था में अगर कोई दलित आईएएस बन जाता है तो वह अपने समाज की सेवा कैसे कर सकता है? आईएएस (नौकरशाह) बनकर वह शोषक वर्ग का हिस्सा होकर उसका जी-हुजूर हो जाता है और उसका प्रथम और अंतिम संवैधानिक कार्य तो श्रम के शोषण और जातीय और धार्मिक घृणा पर आधारित इस व्यवस्था और सत्ता पर क़ाबिज़ अपने आकाओं की सेवा करना हो जाता है न कि अपने समाज की सेवा करना।
याद रहे, हर शासक अनिवार्यरूपेण शोषक भी होता है और वह समाज से ऊपर एक विशिष्ट व्यक्ति भी होता है इसीलिए आम आदमी से उसका नाता स्वतः ही टूट जाता है। इस प्रक्रिया में उसका स्वार्थी, भ्रष्ट और पतित होना लाजिमी है। हम स्पष्ट देखते हैं कि इस व्यवस्था में नौकरशाही का जनता से कोई भी नाता नहीं होता और न ही जनता के प्रति उसकी कोई जवाबदेही होती है। वह तो शोषक वर्ग और उसकी दलित-शोषित श्रमिक वर्ग विरोधी नीतियों के प्रति ही जवाबदेह होता है। वह शोषण और दमन पर आधारित मौजूदा शासन व्यवस्था को संचालित और अक्षुण्ण रखने के लिए संवैधानिक रूप से प्रतिबद्ध होता है। एक दलित भी, नौकरशाह होकर शोषक वर्ग का हिस्सा हो जाता है और अनिवार्य रूपेण वह जनविरोधी और दलित-विरोधी कार्य करेगा ही। वह संवैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर दलितों और वंचितों के लिए कोई काम कैसे कर सकता? हाँ व्यक्तिगत तौर पर वह एकाध अपने ख़ास लोगों के छोटे-मोटे काम ज़रूर कर सकता है। ऐसे में, दलित बुद्धिजीवी ही नहीं गैर-दलित बुद्धिजीवी भी या तो असमानता और शोषण पर आधारित व्यवस्था के लिए काम करने लगते है और साथ ही साथ वह व्यक्तिवादी होकर स्वयं के लिए ही काम करने लगें तो क्या आश्चर्य!! इसीलिये आज दलित बुद्धिजीवी ही क्यों सारा समाज ही भ्रष्ट और बेईमान हो गया है और हर व्यक्ति शेष समाज की क़ीमत पर अपने स्वार्थों को पूरा करने में लगा है।
क्रांति द्वारा व्यवस्था परिवर्तन किए बगैर सामाजिक सड़न को नहीं रोका जा सकता
अतः यह समझना जरूरी है कि दलित वर्ग के कुछेक व्यक्तियों के सफ़ल होने से या एकाध व्यक्ति के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विधायक, उद्योगपति या आईएएस बन जाने मात्र से कोई समाज की व्यवस्था नहीं बदल जाती वह वैसी की वैसी ही अक्षुण्ण बनी रहती है। फलस्वरूप, वंचित वर्ग की मुसीबतें भी वैसी की वैसी ही बनी रहती हैं। यह पूंजीवादी व्यवस्था, दलित और वंचित वर्ग के पढे-लिखे और बुद्धिजीवियों को खरीदने में पूर्णतः सक्षम है और दलित बुद्धिजीवी यहां बिकने को तैयार है क्योंकि समाज में मौजूद संपत्तिगत संबंधों के सोपान क्रम में वह स्वयं को सबसे नीचे और असहाय पाता है। और जब यह पूंजीवादी व्यवस्था उसे कुछ 'ऊपर उठने का' मौक़ा देती है तो अपनी पिछड़ी भौतिक और सामाजिक परिस्थितियों के मद्देनजर इस मौके को छोड़ना उसके लिए बहुत ही कठिन साबित होता है। उसके पास एक दुर्लभ मौका होता है अपनी निम्न सामाजिक हैसियत को ऊपर उठाने का और अपने को ऊंचा उठाने के लिए उसे शेष समाज के हितों को छोड़ना उसकी विवशता होती है क्योंकि अगर वह शेष समाज के हितों को पूरा करने में लगे तो उसे अपने हितों को तिलांजलि देनी ही होगी। ऐसे कठिन चुनाव में व्यक्ति 99 प्रतिशत मौकों पर अपने व्यक्तिगत हितों को ही तरज़ीह देता पाया जाता है इसीलिये उसे अगर इस व्यवस्था से कुछ पाना है तो इस व्यवस्था के नीति-नियमों से देर सवेर समझौता करना ही पड़ेगा या फिर व्यवस्था परिवर्तन के कठिन काम में संलग्न होना पड़ेगा जो कि उसे ज़रा कठिन और लंबा रास्ता मालूम पड़ता है। यही असमान भौतिक परिस्थितियां उसके बिकाऊ, लालची और भ्रष्ट होने का सबब बन जाती हैं।
इन्हीं व्यवस्थागत परिस्थितियों के चलते आज सैंकडों दलित-चिंतक, लेखक, प्रशासक, सांसद, मंत्री इत्यादि शोषक वर्ग की विभिन्न पांतों में घुसकर दलित-शोषित श्रमिक वर्ग विरोधी नीतियों को लागू करवाने में शासक वर्ग को अपना समर्थन और सहयोग दे रहे हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य असमानता और शोषण पर आधारित इस समाज व्यवस्था को बदलना नहीं बल्कि चुनाव के ज़रिये सत्ता परिवर्तन ही रह गया लगता है और इस प्रक्रिया में उनके बिकने की, भ्रष्ट होने की और शोषक वर्ग के साथ मिलकर शोषण की इस व्यवस्था में सहभागी होने की और सत्ता सुख भोगने की आकांक्षा साफ़ दिखाई पड़ती है। सत्ता परिवर्तन की यह चुनावी प्रक्रिया शोषक वर्ग के विभिन्न गुटों द्वारा मिल-बाँटकर खाने की व्यवस्था का अंग है और शोषक वर्ग यह जानता है कि दलितों का पढ़ा लिखा, बुद्धिजीवी और प्रतिभाशाली तबक़ा शोषकों की इस पूंजीवादी व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकता है इसीलिए शोषक वर्ग शासन-सत्ता में हिस्सेदारी का लालच देकर उसे शासन-सत्ता में शामिल कर लेता है। यह चुनावी प्रक्रिया मिल-बाँटकर खाने की व्यवस्था है और दलित वर्ग के पढे-लिखे और प्रतिभाशाली बुद्धिजीवी भी इस लूट खसोट में शामिल हों यह शोषक वर्ग को स्वीकार है। यही कारण है कि देर-सवेर दलितों का पढ़ा लिखा तबक़ा शोषक वर्ग के प्रलोभनों में आकर शोषकों की विभिन्न पांतों में समाहित हो जाता है और अपने समाज के हितों की उपेक्षा करके वह अपने व्यक्तिगत हितों का पोषण करने लगता है। इस प्रक्रिया में मेहनतकश दलित तबक़ा वैसा का वैसा ही रह जाता है।
दूसरी ओर वह मेहनतकश दलित-शोषित श्रमिक वर्ग को आरक्षण जैसी कुछ सुविधाएं भी देता रहता है ताकि उनका आक्रोश और गुस्सा कोई विध्वंसकारी या क्रांतिकारी रूप न ले ले। इसीलिये इस भ्रष्ट और व्यक्तिवादी व्यवस्था में शोषकों की ही तरह दलितों के पढ़े लिखे तबके में भी करोड़पति और फिर अरबपति बनने की आकांक्षा जोर मारने लगती है ताकि वह समाज में अपना वर्चस्व क़ायम करके शेष समाज से ऊपर उठ सके। ऐसे में न समाज दिखाई पड़ता है, न देश, न धर्म, न संस्कृति और न कोई अपना दिखाई पड़ता है न पराया। इन परिस्थितियों में एक ओर सड़ी-गली सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था का समर्थन तथा दूसरी ओर अपने समाज के बुद्धिजीवियों और पढ़े-लिखे लोगों के बेईमान, भ्रष्ट और धोखेबाज होने का रोना-धोना बेमानी और विरोधाभासपूर्ण व्यवहार ही कहा जाएगा है। दलित वर्ग के पढे-लिखे तबके का बेईमान और भ्रष्ट हो जाने को इस सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था की ढांचागत खराबी के संदर्भ में देखा जाना चाहिए जहां कदम कदम पर मनुष्य के भ्रष्ट और दिशाहीन हो जाने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
इस व्यक्तिवादी समाज में व्यक्ति अपने बारे में ही सोचता है शेष समाज के बारे में नहीं। यह इस व्यवस्था का मूल आधार है। इसीलिये आज सत्ता परिवर्तन की नहीं व्यवस्था परिवर्तन की दरकार है लेकिन इसके विपरीत समस्त पढ़ा-लिखा दलित तबक़ा सत्ता परिवर्तन के लिए ललायित है जिसमें उसके पथभ्रष्ट हो जाने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। एक बात गाँठ बांध लेने जैसी है कि जब तक समाज में घोर आर्थिक असमानताएं मौजूद हैं जब तक न तो मनुष्य द्वारा मनुष्य के दमन शोषण को रोका जा सकता है और न ही पढे-लिखे दलितों और बुद्धिजीवियों को पथभ्रष्ट होने से ही रोका जा सकता है। इन तथ्यों पर गंभीरतापूर्वक विचार किये जाने की दरकार है।
