उपरोक्त प्रश्न पर दो आलेख हमें प्राप्त हुए हैं. इन साथियों के व्यक्तिगत विचारों बतौर हम इन्हें प्रकाशित कर रहे हैं. आगे भी इस इस बहस में संक्षिप्त टिप्पणी के ज़रिए कोई हस्तक्षेप करना चाहे तो स्वागत है - संपादक मंडल भी इस पर अपनी राय समुचित समय पर रखेगा
कॉमरेड नन्हें लाल की टिप्पणी
आज मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA) के द्वारा आयोजित 10 वर्ष के सफ़र सम्मेलन में भाग लिया जो देश भर के मजदूर संगठनों का साझा मोर्चा है. आयोजकों के घोषणा के अनुसार मासा सिर्फ मजदूरों के आर्थिक संघर्षों का मंच नहीं है बल्कि एक वर्गविहीन समाज के लिए संघर्ष का राजनीतिक मंच भी है. लेकिन मासा और अन्य ज्यादातर मजदूर संगठन व्यवहार के जमीनी धरातल पर उनका संघर्ष अर्थवाद के करीब है. दरअसल सभी कम्युनिस्ट संगठन सैद्धांतिक तौर पर समाजवादी समाज के लिए राजनीतिक संघर्ष की घोषणा करते हैं. इसके लिए जरूरत पड़ने पर सशस्त्र संघर्ष के जरिए राजनीतिक सत्ता को मजदूर वर्ग के हाथों में सौंपने का लक्ष्य है. रूस और चीन की जनक्रांतियों से साबित हुआ है कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक क्रांतिकारी पार्टी को जन संघर्षों के सभी मोर्चों को जन क्रांति के लक्ष्य के अनुरुप साधना होता है ताकि शासक वर्ग को कमजोर किया जा सके और जनता की क्रांतिकारी जीत सुनिश्चित किया जा सके.
एक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी को सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में निम्न जन संघर्षों को साधना जरूरी है-
* जातिवाद विरोधी संघर्ष और राजनीति
* पितृसत्ता विरोधी नारीवादी संघर्ष और राजनीति
* सांप्रदायिकता विरोधी संघर्ष और राजनीति
* राष्ट्रीयता के लिए संघर्ष और राजनीति
* साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष और राजनीति
उपरोक्त संघर्षों को क्रांतिकारी राजनीति के पक्ष में साधे बिना क्रांतिकारी पार्टी जनता के व्यापक हिस्से को अपना समर्थक नहीं बना सकती है या कम से कम उन्हें न्यूट्रल नहीं कर सकती है. उपरोक्त में से सबसे विवादास्पद विषय जातिवाद विरोधी संघर्ष और राजनीति है.
जाति प्रश्न के दो आयाम हैं.
* अस्पृश्यता (छुआछूत)
* जाति व्यवस्था का उन्मूलन
अस्पृश्यता के प्रश्न को कम्युनिस्ट पार्टियां स्वीकार करती हैं. लेकिन जाति व्यवस्था का उन्मूलन अभी भी बहस का प्रश्न है. वे मानती हैं कि क्रांति होने बाद जाति व्यवस्था खत्म हो जाएगी. चुकी अस्पृश्यता के प्रश्न को कम्युनिस्ट पार्टियां स्वीकार करती हैं इसलिए हम अभी इसी प्रश्न को लेंगे. अस्पृश्यता के प्रश्न को एड्रेस करने के दो पहलू हैं.
* आर्थिक पहलू
* सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पहलू
दलित वर्ग का आर्थिक पहलू उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण और प्रतिनिधित्व है. लेकिन कम्युनिस्ट संगठनों और पार्टियों का रुख इस मामले में भी स्पष्ट नहीं है. इसलिए इस पहलू को भी फिलहाल छोड़ देते हैं. इसलिए अस्पृश्यता के दूसरे पहलू सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पहलू पर बात करना बेहतर रहेगा. मार्क्सवाद की भाषा में यह अधिरचना का प्रश्न है. जाति प्रश्न अधिरचना का प्रश्न है, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों में आम सहमति रही है. अब कुछ समूह जाति व्यवस्था को आधार का प्रश्न भी मानने लगे हैं. लेकिन वे अपने व्यवहार में अधिरचना के प्रश्न के तौर पर ही एड्रेस करते हैं क्योंकि जाति व्यवस्था का आर्थिक आधार कम्युनिस्ट खेमों में अभी भी स्पष्ट नहीं है.
अस्पृश्यता का एक मामला अभी प्रकाश में आया है. यह मामला कांग्रेस पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से जुड़ा है. मल्लिकार्जुन खड़गे दलित समुदाय से आते हैं. 8 अगस्त 2026 को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने हल्द्वानी के रामलीला मैदान में एक जनसभा को संबोधित किया था। इसके दो दिन बाद (10 अगस्त को) 'श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास' नामक दक्षिणपंथी संगठन के लोगों ने उसी मंच और स्थल पर हवन और शुद्धिकरण अनुष्ठान किया. मल्लिकार्जुन खड़गे का बयान: संसद (राज्यसभा) में खड़गे ने इस घटना पर दुख और रोष व्यक्त किया। उन्होंने इसे अपना और दलित समाज का अपमान बताते हुए कहा कि उन्हें 'अछूत' मानकर यह कृत्य किया गया। ऐसा ही शुद्धिकरण का वाकया लखनऊ मुख्यमंत्री आवास का भी हो चुका है जब अखिलेश यादव चुनाव हारते हैं और मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का कार्यभार संभालते हैं. दोनों ही मामला अस्पृश्यता का है. लेकिन अखिलेश यादव शूद्र हैं जबकि मल्लिकार्जुन खड़गे अतिशूद्र हैं. यह दोनों ही मसले राजनीति का नहीं है बल्कि मानव गरिमा और इंसान के जन्मजात बराबरी पर सीधा हमला है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का मामला अभी बिल्कुल लेटेस्ट है. मल्लिकार्जुन खड़गे के मानवीय गरिमा पर हमला उनके कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष होने के कारण नहीं है बल्कि दलित होने के कारण है.
मासा के आयोजकों से मेरा सवाल है कि इस मोर्चे में शामिल कम्युनिस्ट संगठन क्या जातिवाद विरोधी दृष्टि रखते हैं? यदि रखते हैं तो मासा के मंच से इस जातिवादी जघन्य अपराध की निंदा क्यों नहीं की गई? यह मामला तो अधिरचना का है. यह कैसी मजदूर वर्गीय क्रांतिकारी राजनीति है?
(नोट: यह तीखा प्रश्न मैं अपने को कम्युनिस्ट क्रांतिकारी राजनीति का हिस्सा मानते हुए कर रहा हूं)
कॉमरेड अशोक कुमार की टिप्पणी
वर्ग संघर्षों का अर्थ ही होता है वर्ण, जाति, सांप्रदायिकता, पितृसत्ता, लैंगिक भेद, राष्ट्रवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद जैसी शोषणकारी शक्तियों के पूर्ण उन्मूलन के लक्ष्य का आंदोलन । इन सबके विरुद्ध संघर्ष साथ-साथ ही चलते हैं । वर्ग संघर्ष मूलाधार और अधिरचना से संबंधित सभी समस्याओं और सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध निरंतर चलने वाले संघर्षों का नाम है, क्योंकि दोनों काफी हद तक एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं । लेकिन समस्त वर्गसंघर्षों का आत्यंतिक लक्ष्य शोषणकारी मूलाधार को नष्ट करना है क्योंकि मूलाधार को नष्ट किए बगैर अधिरचना के प्रश्नों को हल नहीं किया जा सकता । चूंकि वर्ण और जाति के प्रश्न मूलतः अधिरचना से संबंधित प्रश्न रहे हैं इसीलिए वर्गसंघर्षों की मुख्य और आत्यंतिक विषयवस्तु मौजूदा मूलाधार को नष्ट करना ही रहेगा क्योंकि सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से मूलाधार ही वर्ण और जाति का मुख्य और प्राथमिक कारक रहा है और अधिरचना दोयम । अधिरचना मूलाधार की ही उप-उत्पत्ति (by product) होती है । मूलाधार के दो मुख्य कारक रहे हैं - श्रम का शोषण और निजी संपत्ति । इसीलिए वर्गसंघर्षों का मुख्य और आत्यंतिक लक्ष्य श्रम के शोषण और निजी संपत्ति पर आधारित समाजव्यवस्था का जड़मूल से उन्मूलन करते हुए नई वर्गहीन और जातिविहीन समाज की रचना करना है । याद रहे, श्रम का शोषण और निजी संपत्ति दो ऐसे कारक है जो अतीत से आज तक वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था का मूल आधार रहे हैं, निश्चित ही अन्य कारण भी रहे हैं लेकिन वे दोयम रहे हैं । इसीलिए वर्गसंघर्षों केंद्रीय विषयवस्तु केवल जाति या वर्ण को नहीं बनाया जा सकता क्योंकि इससे वर्गसंघर्षों के जाति संघर्षों में बदलने की स्थिति पैदा होकर आंदोलन के मूल लक्ष्य से भटकने का ख़तरा पैदा होने की संभावनाएं बलवती हो जाती हैं और जाति का प्रश्न पार्श्व में चला जाता है । वर्गचेतना के अभाव के कारण अभी तक अधिरचना के के प्रश्नों को मुख्य और प्राथमिक तथा मूलाधार के प्रश्नों को उपेक्षित या दोयम माना जाता रहा है । अंबेडकरवाद इसी भित्ति पर खड़ा हुआ आंदोलन रहा है । अंबेडकर के अनुयायियों और दलित बुद्धिजीवियों की यही उलझन और पीड़ा रही है जिसके कारण दलित उन्मूलन का प्रश्न सुलझने कि बजाये और भी ज़्यादा उलझता गया है । ऐसा ही होता रहा है । मासा सम्मेलन में इन्हीं मुद्दों पर इसी ढंग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से चर्चा की गई । यदि व्यक्ति या समूह वर्गचेतन न हो तो वर्णभेद और जातिभेद के उन्मूलन की उपेक्षा का भ्रम पैदा होना लाजिमी है । लेकिन ऐसा है नहीं । जाति उन्मूलन का प्रश्न उपरोक्त सभी समस्याओं के उन्मूलन के साथ गहरे से अंतर्संबंधित प्रश्न रहा है इसीलिए वर्ण और जाति के उन्मूलन का प्रश्न भी आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक व अन्य सभी समस्याओं का हल एक साथ ही संभव हो सकता है । वर्गचेतना का अभाव स्वाभाविक रूप से जाति और वर्ण के उन्मूलन के प्रश्न को अलग से और प्राथमिक रूप से हल करने की मांग करने का आकांक्षी होगा ही । इस व्यवस्था में व्यक्ति राष्ट्रपति जो जय, प्रधानमंत्री हो जाए, मुख्य न्यायधीश, मंत्री सांसद, विधायक या नौकरशाह हो जाए लेकिन वह वर्णभेद और जातिभेद का शिकार रहेगा ही रहेगा ही क्योंकि वह दलित होने की योग्यता के कारण ही उपरोक्त पदों पर पहुंचा है । इन पदों पर पहुंचने के लिए जाति एक योग्यता हो गई है । इसीलिए जातिभेद के शिकार होने के बावजूद जाति उत्पीड़ित लोग दलित बने रहने को ही फ़ायदे का सौदा समझते हैं, इसीलिए अधिकांश दलित और दलित बुद्धिजीवी अब अपनी-अपनी जातियों पर गर्व भी करने लगे हैं । लेकिन जाति उत्पीड़ित होने पर जाति का रोना भी रोते हैं । आरक्षण की मांग पर अत्यधिक ज़ोर देना भी दलित बने रहने की आकांक्षा की ही अभिव्यक्ति है । खड़गे साहब का प्रकरण कोई नई बात नहीं है । इस तरह की घटनाएं आगे भी होती ही रहेंगी । खड़गे साहब ख़ुद दलित होने की योग्यता के कारण ही शासकवर्ग की राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष बने हुए हैं । निश्चित ही ऐसी घटनाओं की ज़रूर निंदा की जानी चाहिए लेकिन उपरोक्त तमाम तथ्यों को भी ध्यान में रखना चाहिए ताकि सही क्रांतिकारी आंदोलन के साथ सही दिशा की ओर बढ़ा जा सके । मैं कोई मासा का सदस्य या उसका प्रतिनिधि नहीं हूं बल्कि सम्मेलन में मौजूद एक साधारण श्रोता की हैसियत से अपनी बात रख रहा हूं ।
