फट चुकी -
झीनी चदरिया
"राम की"
पर छल रहा है -
"भेड़िया"
राष्ट्रवाद की ओट में
खून पीकर वतन का
साधू बना है।
धधकता है -
हृदय मेरा
"भूख" चिनगारी बनी है
खेत सड़कों पर उगे हैं
बीज बोएं खून से,
अब
भगत सिंह पैदा करेंगे।
दर्द सीने में छिपाकर
ढूंढ लो उन भेड़ियों को -
छिपे हैं जो -
"धर्म का चोगा पहन कर"
धर्मस्थलों की झाड़ियों में
साफ़ कर दो अब उन्हें -
लेकर कुदाली "हाथ में"
मज़दूर हैं, किसान हैं, दलित हैं और
हैं - "युवा"
पहचान ली है शक्ति हमने -
हमी करते अन्न पैदा,
हर माल हम पैदा करें
फिर कौन है जो
"लूटता "
"मेहनत हमारी?"
जान लो शैतान को -
करता है पैदा -"भेड़िये"
शोषितों पर करें हमले
नौचते हैं मांस उनका -
पुलिस उनकी, फौज उनकी,
कानून भी गूंगा हुआ है।
बस एक ही है अब "सहारा "
"संगठित" होकर चलें हम -
हाथ में परचम उठायें -
"लाल"
राख की ढेरी बनाएं -
"ज़ुल्म को ऐसे मिटाएँ -
सियासत को करें -
"चकनाचूर "
छीन लें "अधिकार "।
