छीन लो अधिकार

प्यारेलाल 'शकुन'

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फट चुकी -

झीनी चदरिया

"राम की"

पर छल रहा है -

"भेड़िया"

राष्ट्रवाद की ओट में

खून पीकर वतन का

साधू बना है।

धधकता है -

हृदय मेरा

"भूख" चिनगारी बनी है

खेत सड़कों पर उगे हैं

बीज बोएं खून से,

अब

भगत सिंह पैदा करेंगे।

दर्द सीने में छिपाकर

ढूंढ लो उन भेड़ियों को -

छिपे हैं जो -

"धर्म का चोगा पहन कर"

धर्मस्थलों की झाड़ियों में

साफ़ कर दो अब उन्हें -

लेकर कुदाली "हाथ में"

मज़दूर हैं, किसान हैं, दलित हैं और

हैं - "युवा"

पहचान ली है शक्ति हमने -

हमी करते अन्न पैदा,

हर माल हम पैदा करें

फिर कौन है जो

"लूटता "

"मेहनत हमारी?"

जान लो शैतान को -

करता है पैदा -"भेड़िये"

शोषितों पर करें हमले

नौचते हैं मांस उनका -

पुलिस उनकी, फौज उनकी,

कानून भी गूंगा हुआ है।

बस एक ही है अब "सहारा "

"संगठित" होकर चलें हम -

हाथ में परचम उठायें -

"लाल"

राख की ढेरी बनाएं -

"ज़ुल्म को ऐसे मिटाएँ -

सियासत को करें -

"चकनाचूर "

छीन लें "अधिकार "।



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