जनवादी कविता-साहित्य
गिरते रहो, गिरते रहो, जब तक कि गिरने की प्रक्रिया निष्क्रिय ना हो जाए, गिरो, गिरो
हूबनाथ पांडे•
एक दिन तुम्हारी
ये आदमखोर सत्ता पलट दी जाएगी
इन्हीं दिमागी नक्सलों के द्वारा
साहित्य विजय •
हरिशंकर परसाईं जी को उनके जन्म दिवस और स्मृति दिवस पर सादर नमन, कृतज्ञता पूर्ण सलाम
सत्यवीर सिंह•
"संगठित" होकर चलें हम -
हाथ में परचम उठायें -
"लाल"
प्यारेलाल 'शकुन'•
जब चारों तरफ से घिर ही गए, सोचा क्यों न फिर से कुछ नया गढ़ें;
रणवीर सिंह•
हो ची मिन्ह की सीख पर
एम के आजाद•
गर सब मिलकर साथ लड़े तो,
समझो जीत लिया मुकाबला है।
रणवीर सिंह•
संसद चाहे कांग्रेस की हो,
या भाजपा की —
दोनों पूंजीपतियों की चौकीदारी है!
एम के आजाद•
तुम्हारे पास सेना और सशस्त्र बल हैं
तुम्हारी तानाशाही का प्रतिरोध जताने वाले लोगों को
Mashaal•
विचार की कोई मूर्ति नहीं होती;
इसलिए उसे कभी गिराया नहीं जा सकता
Mashaal•
अभियुक्त
वह व्यवस्था है
जो अपनी संसद को जलाकर
जनता को अपराधी घोषित करती है।
एम के आजाद•
मज़दूर, छात्र, किसान मिले—अब राह कोई दूर नहीं
एम के आजाद•
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