मैं, राहुल, अपनी टूटी हुई मूर्ति से बोल रहा हूँ - सुधीर ढवळे

Mashaal

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मेरी मूर्ति तोड़ी है तुमने
क्या मेरी यात्राएँ भी तोड़ दोगे?
मेरे पैरों की धूल में तिब्बत के रास्ते हैं
रूस की बर्फ है
श्रीलंका के विहार हैं
और किसान की पसीने से भीगी धरती है
पत्थर गिरा है
लेकिन विचार नहीं गिरते
हथौड़े की चोट
इतिहास की आख़िरी भाषा नहीं होती

मैं राहुल हूँ
जिसने धर्म को भी प्रश्न की कसौटी पर रखा
राष्ट्र को भी मनुष्य से बड़ा नहीं माना
और ज्ञान को
किसी एक जाति, एक मंदिर, एक किताब
या एक सिंहासन की जागीर नहीं बनने दिया

तुमने मेरी प्रतिमा गिराई
क्योंकि तुम्हें डर है कि कोई नौजवान
मेरी किताब खोलेगा और पूछ बैठेगा
"इतिहास किसका है?"
"धरती किसकी है?"
"मेहनत का फल किसका है?"

यह पहली बार नहीं है
त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा गिराई गई
बंगाल में भी लेनिन की मूर्तियाँ तोड़ी गईं
महाराष्ट्र में बुद्ध की मूर्ति तोड़ी गईं
आज रानीगंज में मेरी प्रतिमा गिराई गई है
यह महज़ संयोग नहीं
एक ही राजनीति की निरंतरता है

क्योंकि जो सत्ता
प्रश्नों से डरती है
वह सबसे पहले
मूर्तियाँ गिराती है
फिर किताबें जलाती है
फिर इतिहास बदलती है
और अंत में
इंसान की चेतना पर पहरा बिठा देती है

जो सत्ता विचार से डरती है
वह सबसे पहले विचार की मूर्तियाँ गिराती है
फिर किताबें जलाती है
फिर इतिहास बदलती है
और अंत में
इंसान की चेतना पर पहरा बिठा देती है
और जो सत्ता मज़दूर से डरती है
वह सबसे पहले
ट्रेड यूनियनों की कमर तोड़ती है

रानीगंज की यह टूटी प्रतिमा
सिर्फ़ एक मूर्ति का मलबा नहीं है
यह उस बड़ी साज़िश का हिस्सा है
जिसमें कोयला खदानों की लड़ाकू यूनियनों को कमज़ोर करना है
कोलफ़ील्ड्स की सामूहिक विरासत को
बड़े कॉरपोरेट घरानों के हवाले करना है
और मज़दूरों की स्मृति से
संघर्ष का इतिहास मिटाना है
इसलिए मेरी प्रतिमा पर चला हथौड़ा
पत्थर पर नहीं
मज़दूर आंदोलन पर चला है
मेरे चेहरे पर नहीं
उन लाखों मेहनतकशों की आवाज़ पर चला है
जिन्होंने अपने पसीने से इस देश की ऊर्जा बनाई

तुम चाहते हो कि
हर पुस्तकालय के दरवाज़े पर
एक ही कथा पहरा दे
हर स्मारक पर
एक ही चेहरा खड़ा रहे
हर विश्वविद्यालय में
एक ही विचार पढ़ाया जाए
और हर खदान के ऊपर
कॉरपोरेट का झंडा लहराए
लेकिन इतिहास
न बुलडोज़र से बदलता है, न हथौड़ों से

मैंने कहा था
चलो, दुनिया को अपनी आँखों से देखो
तुम कहते हो
सिर्फ़ हमारी आँखों से देखो
यही हमारा संघर्ष है
मेरी मूर्ति नहीं टूटी
तुम्हारी असहिष्णुता
सरेआम खड़ी हो गई है

जहाँ-जहाँ मनुष्य
डर से इंकार करेगा
वहाँ-वहाँ
लेनिन की वह टूटी प्रतिमा भी बोलेगी
और मेरी यह ध्वस्त मूर्ति भी
पत्थर गिर सकते हैं
लेकिन विचारों के पाँव
इतिहास की हर सड़क पर चलते रहते हैं

मैं फिर लौटूँगा
किसी पुस्तक के पन्ने में
किसी मज़दूर की मुट्ठी में
किसी छात्र के सवाल में
किसी स्त्री के प्रतिरोध में
किसी दलित की उठी हुई निगाह में
किसी आदिवासी के जंगल के अधिकार में

सुनो
पत्थर गिराने वालों!
इतिहास तुम्हारे हथौड़ों से नहीं
उन हाथों से लिखा जाएगा
जो किताब उठाते हैं
जो खेत जोतते हैं
जो कारखाने चलाते हैं
जो जेलों में भी
सपनों की मशाल बचाए रखते हैं

मैं राहुल सांकृत्यायन हूँ
मेरी प्रतिमा तोड़ सकते हो
बुद्ध लेनिन आंबेडकर की प्रतिमा गिरा सकते हो
किताबों पर धूल जमा सकते हो
लेकिन मनुष्य की मुक्ति
ज्ञान की स्वतंत्रता
और मेहनतकश की एकजुटता
ये तीनों हर बार तुम्हारे मलबे से उठेंगी
और पहले से अधिक ऊँची आवाज़ में कहेंगी
"विचार की कोई मूर्ति नहीं होती;
इसलिए उसे कभी गिराया नहीं जा सकता।"

( नोट : राहुल सांकृतायन के पुत्र प्रो जेता सांकृतायन के निवेदन के आधार पर लिखी कविता )
(18 जुलाई 2026)

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