जब कोरोना दहशत थी,
चुपके से कानून बनाए थे;
अन्नदाता यूं कर भड़के थे,
दिल्ली होली पर जलाए थे।
फिर मंडी मसौदा आया था,
चारों ओर ढोल पिटवाया था;
अन्नदाता फिर से गुरयाया था,
मंसूबा आगे ना बढ़ पाया था।
फेंका अब तीसरा पत्ता है,
नाम अमरीका समझौता है;
शुद्ध अंग्रेजी में बनवाया है,
ढोल फिर से पिटवाया है।
किसान ने भी करवट बदली है,
सोचा संकट वाकई असली है;
दरबारी तारीफ यह नकली है,
सेठजी ने बस भाषा बदली है।
आई ट्रेक्टर राशन की बारी है,
राजधानी कूच की तैयारी है;
विकास तो सिर्फ एक नारा है,
खेती लेने की पुख्ता तैयारी है।
गुस्से से आज मज़दूर उबला है,
और युवा भी बाहर निकला है;
गर सब मिलकर साथ लड़े तो,
समझो जीत लिया मुकाबला है।