पीठ पर बस्ता था, हाथों में कोई शमशीर नहीं,
सच के सिवा उसके पास कोई तदबीर नहीं।
लाठी लेकर दौड़ी सत्ता, डर का था व्यापार,
ज्ञान की उस बेटी ने डर को माना तक़दीर नहीं।
जो किताबों से उठे थे, वे सवाल बन बैठे,
हर आवाज़ बिक जाए, ये दस्तूर नहीं।
बस्ता था कंधों पर, हौसला इतिहास का,
झुक गई लाठी मगर, झुका कभी ज़मीर नहीं।
डर के पहरेदार समझे, भीड़ बिखर जाएगी,
जनता की चेतना कोई मिटती तस्वीर नहीं।
हर प्रहार ने जन्म दिया प्रतिरोध की ललकार को,
ख़ून से सींची ज़मीं फिर कभी बंजर नहीं।
कल जो लड़की अकेली थी, आज कारवाँ बनकर,
मज़दूर, छात्र, किसान मिले—अब राह कोई दूर नहीं।
"आज़ाद" जब इल्म और श्रम एक सफ़ में आ जाएँ,
तब ज़ालिम की सत्ता भी रहती स्थिर नहीं।
