जब अदालत में
न्यायाधीश की कुर्सी पर
फासीवाद बैठा था,
और कानून की किताब में
हिटलर की साँस चल रही थी,
तब
एक आदमी खड़ा हुआ।
उसने कहा—
मैं अभियुक्त नहीं हूँ।
अभियुक्त
वह व्यवस्था है
जो अपनी संसद को जलाकर
जनता को अपराधी घोषित करती है।
और अचानक
लाइपज़िग की अदालत
अदालत नहीं रही।
वह
पूँजीवाद के खिलाफ
सर्वहारा वर्ग का मंच बन गई।
दिमित्रोव जानता था—
फासीवाद
आसमान से नहीं गिरता।
वह जन्म लेता है
जब मुनाफ़ा काँपने लगता है।
जब गोदाम भरे होते हैं
और पेट खाली।
जब मशीनें चलती हैं
और मजदूर बेरोज़गार होता है।
जब कारखाने का मालिक
मतपेटी पर भरोसा खो देता है,
और बैंक
लोकतंत्र को
अनावश्यक खर्च समझने लगता है।
तब
संविधान की जेब से
एक वर्दी निकलती है।
उसका नाम होता है—
फासीवाद।
उन्होंने कहा था—
फासीवाद
वित्तीय पूँजी के
सबसे प्रतिक्रियावादी,
सबसे राष्ट्रवादी,
सबसे साम्राज्यवादी हिस्से की
खुली आतंकवादी तानाशाही है।
यह कोई नारा नहीं था।
यह
पूँजीवाद का एक्स-रे था।
गोरिंग
सत्ता की भाषा बोल रहा था।
दिमित्रोव
इतिहास की।
गोरिंग के पीछे
पुलिस थी,
जेल थी,
बंदूक थी।
दिमित्रोव के पीछे
कारखानों की सीटी थी।
खदानों की कालिख थी।
बंदरगाहों की थकान थी।
और वह चुप्पी थी
जो पहली बार
अपने नाम से बोलना सीख रही थी।
उन्होंने अदालत से कहा—
तुम मुझे कैद कर सकते हो,
लेकिन उस वर्ग को नहीं
जो दुनिया चलाता है।
तुम अख़बार बंद कर सकते हो,
लेकिन भूख का मुँह
बंद नहीं कर सकते।
तुम पार्टी पर प्रतिबंध लगा सकते हो,
लेकिन इतिहास पर नहीं।
फिर दुनिया ने देखा—
एक आदमी नहीं छूटा था।
अदालत ने
अनजाने में
एक विचार को मुक्त कर दिया था।
बाद में
उन्होंने देखा—
फासीवाद की गोली
कम्युनिस्ट और समाजवादी में
फर्क नहीं करती।
वह किसान और मजदूर में
फर्क नहीं करती।
वह हर उस आदमी पर चलती है
जो सिर झुकाने से इनकार करता है।
तब उन्होंने कहा—
एकता बनाओ।
कारखाने से खेत तक।
शहर से गाँव तक।
मजदूर से किसान तक।
यह समर्पण नहीं था।
यह युद्ध की रणनीति थी।
क्योंकि
जब घर में आग लगी हो,
तो पहले
आग बुझाई जाती है।
फिर
दीवारों का हिसाब होता है।
जब वह
अपने देश लौटे,
उन्होंने देखा—
सिर्फ़ सरकार बदलना
काफ़ी नहीं।
यदि ज़मीन वही रहे,
यदि कारखाने वही रहें,
यदि संपत्ति वही रहे,
तो झंडे बदलते हैं,
समाज नहीं।
इसलिए
उन्होंने सत्ता को
रोटी से जोड़ना चाहा।
भूमि से।
शिक्षा से।
उत्पादन से।
आज
जब फिर से
झूठ
राष्ट्रवाद बनकर बिकता है,
जब घृणा
देशभक्ति कहलाती है,
जब मुनाफ़ा
सभ्यता का दूसरा नाम बन गया है,
तब
दिमित्रोव की आवाज़
फिर सुनाई देती है—
फासीवाद को
उसकी वर्दी से मत पहचानो।
उसकी जेब देखो।
देखो
उसके पीछे कौन-सा बैंक खड़ा है,
कौन-सा उद्योगपति,
कौन-सा साम्राज्य।
दिमित्रोव की असली जीत
अदालत में नहीं हुई थी।
वह हुई थी
उस दिन
जब किसी मजदूर ने
डर के खिलाफ बोलना सीखा।
जब किसी किसान ने
घुटने टेकने से इनकार किया।
जब किसी स्त्री ने
सत्ता की आँख में आँख डालकर कहा—
मैं इतिहास की दर्शक नहीं,
निर्माता हूँ।
इसलिए
दिमित्रोव
एक आदमी का नाम नहीं है।
वह
उस क्षण का नाम है
जब आतंक के सामने
संगठित जनता
पहली बार कहती है—
अब बहुत हुआ।
और इतिहास
दिशा बदलना शुरू कर देता है।
