चौतरफा घिरने पर बिल्ली भी हमलावर हो जाती है!
पृथ्वी निरंतर एक तरफ अपनी धुरी पर और दूसरी तरफ सूरज के चारों ओर घूम रही है, लेकिन भूकंप कभी कभार ही आते हैं। हालात निरंतर सक्रिय रहते हैं, लेकिन नतीजे एक अंतराल के बाद प्रकट होते हैं। कारणों को प्रभाव बनने में समय लगता है।
उदारीकरण का मतलब है मजदूरों को काम से निकालने के लिए उदार वातावरण। वैश्वीकरण का मतलब है विश्व बाजार से और अधिक मुनाफा कमाने के अवसर। दोनों नीतियाँ 1991 में समाजवादी खेमा गिरने के साथ ही अमल में लाई गईं । यह कहा गया की सभी आर्थिक समस्याओं का समाधान मिल गया है। तब से पूंजीवाद बेलगाम दौड़ रहा है। ट्रेड यूनियनें भी वातावरण के दबाव में “इंतज़ार करो और देखो” मुद्रा में चली गई थीं।
बाजार उठापटक ने छोटी खेती को घाटे का सौदा बना दिया। भारी कर्ज़ और मौसम की मार ने किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया। गांव से शहर की ओर पलायन बढ़ता चला गया। वास्तविक मजदूरी गिरती चली गई। आबादी के दबाव में शहरी मूल सुविधाएं चरमराती चली गईं और मज़दूर नर्क में रहने को मजबूर होते चले गए।
प्रतिस्पर्धा और बड़ी पूंजी के दबाव में छोटे कारखाने बंद होते चले गए। बड़ी संख्या में मजदूरों को कारखानों से निकाल दिया गया। सरकारी क्षेत्र जो नियमित रोजगार देता था, निजी हाथों में सौंपा जाने लगा। पूरा देश ठेका मजदूरी के सैलाब में डुबो दिया गया। पढ़े लिखे लोग किसी भी नौकरी के लिए हाथ पाँव मारने लगे।
शिक्षा और चिकित्सा व्यवसाय के द्वार पूँजीपतियों के लिए खोल दिए गए और सरकार पिछले दरवाजे से सामाजिक सेवा क्षेत्र से बाहर निकल गई। एक झटके में, शिक्षा और चिकित्सा, मध्य वर्ग के एक बड़े हिस्से के हाथ से भी हमेशा के लिए निकल गए।
बेरोज़गारी और महंगाई के खिलाफ़ लोगों के गुस्से को दबाने के लिए, पूंजीपति वर्ग ने फासीवाद का रास्ता चुना। एक एक करके सभी जनतान्त्रिक संस्थाएँ ध्वस्त कर दी गईं । मेहनतकश अवाम के लिए राहत का कोई विकल्प ही नहीं बचा। सारे सुरक्षा वाल्व जाम कर दिए गए लिहाज़ा गैस का दबाव बढ़ता चला गया।
जब लगा सब कुछ नियंत्रण में आ गया, तो फासीवाद ने एक लंबी छलांग लगाई। पूंजीपति वर्ग और इंतज़ार करने के लिए तैयार नहीं था और उसने एक ही झटके में पूरी खेती पर कब्ज़ा करने का फ़ैसला किया। आपदा में अवसर तलासते हुए, कोरोना महामारी के दौरान तीन नए कृषि कानून बना दिए गए। किसान बिलबिला उठे और दिल्ली को चारों ओर से घेर लिया। राजनैतिक दबाव में, पूंजीपति वर्ग को पीछे हटना पड़ा।
व्यापार की सुगमता के नाम पर, पूंजीपति वर्ग को मज़दूर निकालने की खुली छूट देने के उद्देश्य से, 44 श्रम कानूनों की जगह चार श्रम संहिताएं लाई गईं । निहत्थे मज़दूर वर्ग को भूखे पूंजीपति वर्ग के सामने डाल दिया गया। मज़दूरों ने विरोध किया लेकिन फासीवाद कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं था। मज़दूरी इतनी कम थी कि गुज़ारा संभव ही नहीं था इसलिए सबसे कम मज़दूरी पाने वाले ठेका मज़दूरों ने अपनी आवाज़ उठाने का फ़ैसला किया। फासीवाद ने ठेका मज़दूर बगावत को बेरहमी से कुचल दिया।
जनतान्त्रिक संस्थाओं के साथ साथ नैतिक ताना-बाना भी ध्वस्त हो गया है। भ्रस्टाचार, लालच और बेहूदा विचार आम हो गए हैं। पूरी परीक्षा प्रक्रिया दूषित हो चुकी है। परीक्षा पत्र बिक रहे हैं। फर्जी विद्यार्थी परीक्षा दे रहे हैं। परीक्षा पुस्तिका मूल्यांकन एक रहस्य बन चुका है। सालों से, परीक्षा पत्र लीक हो रहे हैं, परीक्षाएं रद्द हो रही हैं और परीक्षार्थी आत्महत्या कर रहे हैं। अब, युवा इस सारे षड्यन्त्र के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं। फासीवाद उन्हें कुचलने का हर संभव प्रयास कर रहा है।
डटो या मिटो के मायने?
- अगर किसान फिर से और ज़ोरदार तरीके से नहीं उठे, तो वे खेती को हमेशा के लिए पूँजीपतियों के हाथों गवां देंगे। वित्त पूंजी और फासीवाद का गठजोड़ इतना खतरनाक है कि वो सीमांत, छोटे और मध्यम किसान वर्ग को हमेशा के लिए खेती से बेदखल कर सकता है। भारत अमेरिका व्यापार समझौता और उसके तहत आयात होने वाले कृषि उत्पाद, खेती ज़मीन को किसान से कॉर्पोरेट को स्थानांतरित करने के अग्रिम प्रस्ताव साबित हो सकते हैं!
- अगर मज़दूर, व्यापार की सुगमता, उदारवाद और श्रम संहिताओं के पूरे मंसूबे को समझकर, उसके खिलाफ़ आर पार की लड़ाई में नहीं उतरते, तो वे हमेशा के लिए पूंजी के मूक गुलाम बना दिए जाएंगे। पूंजीपति वर्ग, श्रम संहिताओं को एक निर्णायक कदम के रूप में लाया है ताकि मजदूरों से प्रतिदिन पंद्रह घंटे काम लिया जा सके। पूंजी के प्रवक्ता पहले ही नब्बे घंटे के काम सप्ताह के लिए वातावरण बनाना शुरू कर चुके हैं।
- यदि युवा अपनी लड़ाई छोड़ देते हैं, तो वे परीक्षा पत्र लीक, फर्जी विद्यार्थी, रहस्यमय मूल्यांकन के साथ-साथ फिरकापरस्त प्रबंधन और अवैज्ञानिक और दकियानूसी सोच निर्माण के लिए बनाए गए पाठयक्रम के आत्मघाती माहौल में फंसे रह जाएंगे। शिक्षा की बेहतरी दूर की कौड़ी बनकर रह जाएगी। चयन घोटालों के चलते, योग्य परीक्षार्थी रोज़गार पाने से वंचित रह जाएंगे।
- यदि महिला वर्ग अपने हक और सम्मान के लिए आगे नहीं आता, तो हो सकता है कि वे आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक तौर पर पीछे छूट जाएं। उन्हें हर दिन अपने सम्मान पर हो रहे हमले के खिलाफ आवाज़ उठानी पड़ेगी। महिला पहलवान रास्ता दिखा चुके हैं और अब भिन्न भिन्न क्षेत्र की महिलाओं जैसे शिक्षक, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, इत्यादि को आगे आकर उस मशाल को आगे ले जाना होगा।
- यदि वंचित समाज अपने मतभेद भुलाकर, एक मंच पर आकर एतिहासिक प्रतिरोध मुहिम नहीं चलाता, तो उसकी मुक्ति एक सपना ही बनकर रह जाएगी। वैसे भी, उन्हें विभाजित रखने के लिए पूंजीवाद निरंतर निवेश कर रहा है। फासीवाद, फिरकापरस्ती और पूजनीय महापुरुषों की आड़ में, वंचित समाज के एक बड़े हिस्से को अपने मंसूबों के लिए इस्तेमाल करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है।
- एक नवजागरण उभरने की परिस्थिति पैदा हो गई है। यदि ऐसा नहीं होता, तो हम कुंठित सोच, अवैज्ञानिक मानसिकता और सांप्रदायिक कट्टरता के कुंड में डूबते चले जाएंगे। सोचने की शक्ति को कुंठित करना और सामाजिक जासूसी संयंत्र साथ-साथ काम कर रहे हैं, ताकि मानवता को भयभीत करके नियंत्रित किया जा सके। नवजागरण की शुरुवात कहीं से भी हो सकती है, जैसे शिक्षा विदों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं या कम्युनिस्टों की तरफ से। अंधेरा स्थाई नहीं रह सकता और मानवता वापस पाषाण युग में नहीं लौट सकती।
उपरोक्त शुरू के तीन वर्ग, पहले से ही मैदान में हैं। आखिरी तीन वर्गों को भी देर सवेर मैदान में उतरना पड़ेगा। लेनिन ने कहा था कि साम्राज्यवाद, पूंजीवाद की चरम अवस्था है। आज दुनिया महसूस कर रही है कि फासीवाद, पूंजीवादी राज्य की चरम अवस्था है। फासीवाद किसी की नहीं सुनता और न ही सुनेगा। उसे अपनी शक्तियों पर बहुत ज़्यादा घमंड होता है। वह पूरी मानवता को गुलाम बनाने की हसरत रखता है। पिछली सदी में उसे पहले कामयाबी मिली और फिर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नष्ट कर दिया गया। वर्तमान सदी फिर से फासीवाद के दंश को झेल रही है। आज फासीवाद, एक दो देश तक सीमित नहीं है। वह धीरे धीरे पूरी दुनिया को अपनी गिरफ़्त में ले रहा है। वह मानवता को मुकाबले के लिए ललकार रहा है। पर्याप्त समय लेने के बाद, मानवता खुद को मुकाबले के लिए तैयार कर रही है और इस निर्णायक दौर के लिए अपने शस्त्रों को ठोक बजा कर देख रही है। मुकाबला आर पार का है क्योंकि समझौते की गुंजाइश नहीं है। यह एक नए युग की शुरुवात का समय है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से फासीवाद के साथ समन्वय का रास्ता बंद है।■
