मेहनतकश की हड्डियों पर
पूंजी के पहाड़ खड़े किए गए,
और उन पर बैठकर
धन्नासेठों के ट्रस्टी बने गांधी।
“ट्रस्टीशिप” — लूट का नया नाम,
लुटेरों को दाता बताने की चाल।
सोना-चाँदी गिने धन्नासेठ, और कहलाए —
“जनता के लिए ट्रस्टी”।
कांग्रेस ने फंड लिया मिल-मालिकों से, ज़मींदारों से,
और कहा —
“यह राष्ट्रसेवा है, त्याग है, पवित्रता है!”
असल में वह सौदा था —
ख़ून-पसीने का मुनाफ़े और सत्ता के साथ।
आज भी वही होता है
— चुनावी बॉन्ड, कॉरपोरेट दान,
कभी कांग्रेस खरीदी जाती है, कभी भाजपा।
रंग बदलते हैं, पर मालिक वही रहते हैं —
तिजोरी वाले।
संसद चाहे कांग्रेस की हो,
या भाजपा की —
दोनों पूंजीपतियों की चौकीदारी है!
और जनता? बस वोट डालती है,
और अपनी ही ज़ंजीरों को
और कसती जाती है।
तो सवाल यही है —
कब तक मेहनतकश वर्ग
“ट्रस्टी” की गुलामी ढोएगा?
हमें ट्रस्टी नहीं चाहिए,
हमें अपनी सत्ता चाहिए!
सत्ता जहाँ उत्पादन, वितरण, निर्णय
जनता के हाथों में हों। जहाँ संसद नहीं —
मजदूरों की परिषद हो।
जब तक पूंजी की जड़ें नहीं उखाड़ेंगे,
हर गांधी, हर संसद, हर सरकार
धन्नासेठों की दलाली करती रहेगी।
