भयभीत मुल्क ही अच्छा था, भयमुक्त समाज ने डरा दिया;
उम्रदराज गुमसुम बैठे रहे, नौजवानों ने सिस्टम हिला दिया।
दिल्ली भ्रमण का स्वागत था, जंतर मंतर क्यों सारे चले गए;
सिर्फ छ: घंटे का धरना था, फिर छत्तीस दिन क्यों निकल गए।
क्या क्या न किया मजबूरी में, दिन छुपते छुपाते निकालने पड़े;
जवाब क्या देते बीस जुलाई का, आखिर हथियार डालने पड़े।
मुश्किल से झेले बड़े युवा, अब क्या करें आ गई नन्हों की फौज;
मीम बन रहा मजाक उड़ रहा, जाने कहाँ गई वो दशकों की मौज।
जब चारों तरफ से घिर ही गए, सोचा क्यों न फिर से कुछ नया गढ़ें;
कुछ न कुछ तो कहना ही था, सोचा कुछ भी कहके बस आगे बढ़ें।
आलोचना तेरे कितने नाम: टुकड़े टुकड़े, परजीवी, अर्बन नक्सल;
देशद्रोह, विदेशी साजिश, भटके हुए व फिलहाल दिमागी नक्सल।
