एक कवि को युद्ध करना सीखना चाहिए

एम के आजाद

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(हो ची मिन्ह की सीख पर)

जब देश जल रहा हो—

तो कविता सिर्फ़

फूलों, चाँदनी और प्रेम की

कहानियाँ नहीं कह सकती।

उस वक़्त हर शेर, हर मिसरा

एक इन्कलाब की नींव होना चाहिए।

एक कवि को

केवल भावनाओं की नहीं,

बारूद की गंध की भी

पहचान होनी चाहिए—

क्योंकि कभी-कभी

आग भी कविता माँगती है।

उसे रचने चाहिए शब्दों के संग्राम—

जहाँ बिंब

तलवारों की धार पर सजे हों,

जहाँ रूपक

राजसिंहासनों को ललकारते हों।

हो ची मिन्ह ने कहा था—

“एक कवि को युद्ध करना सीखना चाहिए।”

क्योंकि युद्ध

हमेशा बंदूकों से नहीं लड़े जाते—

कभी-कभी एक कविता

बग़ावत की पहली गोली होती है।

जब बस्तियाँ जलें

और अख़बार चुप हों,

तो कवि की कलम

भोंपू नहीं, तलवार बननी चाहिए—

जो झूठ की चट्टानों को चीर दे।

कविता अगर

तालियाँ बटोरने का सामान है,

तो वह समर्पण है।

अगर वह सत्ता से सवाल नहीं करती—

तो वह अपराध है।

कवि—

तू भी तो एक सिपाही है,

तेरे पास हथियार नहीं,

लेकिन तेरी कविता

हथियार उठा सकती है।

जब भी कोई कविसच की स्याही से

पूँजी की परछाइयाँ लिखता है,

तब फ़ासिज़्म उसकी ज़ुबान

बन्द कर देना चाहता है।

तख़्त-ओ-ताज के पीछे

जो पूँजीपति बैठे हैं—

वे ही तय करते हैं

कौन गाएगा,

और कौन गिरफ़्तार होगा।

फ़ासिज़्म कोई भ्रम नहीं—

वह पूँजी का चेहरा है

जब वह नकाब उतारकर

बूट पहनता है।

यह हुकूमत नहीं,

बाज़ार की चौकीदारी है—

जहाँ कवियों की आवाज़ें

शेयर बाज़ार के संकेतों से

ज़्यादा खतरनाक मानी जाती हैं।

और जब कविता

मज़दूर की थाली की बात करती है,

तब उसे

राजद्रोह कह दिया जाता है।

उठ!

लिख वो पंक्तियाँ

जो बंदूक की नाल से भी तेज़ हों,

जो सत्ता की नींद में

बिगुल बनकर गूँजें।

जब मज़दूर भूखा हो,

जब किसान फाँसी पर झूल जाए, जब औरतें

ईंटों के नीचे दफ़न कर दी जाएँ—

तो कविता सुंदर नहीं,

ग़ुस्से से भरी होनी चाहिए।

क्योंकि कविता अगर

हथियार नहीं है,

तो वह एक सेवा है—

सत्ता के लिए।

तू बुलेटिन नहीं है,

कवि,

तू क्रांति की एक पुकार है—

एक हुंकार,

जो उठे तो ज़मीन काँपे।

सीख युद्ध करना—

मतलब

सीख अन्याय से टकराना।

मतलब

सीख अपने शब्दों से

क़ातिलों की राजसिंहासन हिला देना।

क्योंकि अगर

तेरी कविता ने

किसी मज़दूर के आँसू पोंछे,

तो वह गोली से कम नहीं।

और अगर

तेरी कविता ने

एक बच्चे को

विद्रोह सिखा दिया, तो तू

युद्ध जीत गया।

"एक कवि को युद्ध करना सीखना चाहिए..."

क्योंकि कविता

सिर्फ़ एहसास नहीं,

इन्कलाब भी होती है।


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