‘ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट’ - अन्यायी पूंजीवादी व्यवस्था में ही न्याय दिलाने की झूठी उम्मीद

मुकेश असीम

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जून 2026 में पेरिस में वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब द्वारा एक वैश्विक असमानता सम्मेलन आयोजित किया गया। आम एकेडमिक सत्रों के साथ-साथ इस सम्मेलन में कुछ ऐसे विषयों पर सत्र हुए, जिन पर अमूमन एकेडमिक अर्थशास्त्री बात नहीं करते – यूटोपिया/डिस्टोपिया, बराबरी और असमानता, सामाजिक न्याय, वगैरह। सम्मेलन का मुख्य मकसद 4 जून को "ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट: प्लान फॉर इक्वैलिटी एंड प्रॉस्पेरिटी विदइन प्लैनेटरी बाउंड्रीज" नामक रिपोर्ट जारी करना था। यह लैब सालों से ऐसी रिपोर्टें प्रकाशित करती आ रही है जिनके विषय का दायरा लगातार बढ़ रहा है। इसकी शुरूआत वर्ल्ड इनइक्वालिटी रिपोर्ट (2018) से हुई थी, जिसने आय और संपत्ति के समाज के शीर्ष और तली के हिस्सों में वैश्विक अंतर को सामने लाया था। लेकिन अब यह सिर्फ़ आर्थिक आंकड़ों की चर्चा से आगे बढ़कर असमानता, पर्यावरण, सामाजिक न्याय और बहुआयामी जनतंत्र से जुड़े कई मुद्दों को हल करने की योजना का दावा कर रहा है जिसकी वैश्विक मीडिया में चर्चा है।

यह रिपोर्ट पेरिस स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स में प्रोफेसर थॉमस पिकेटी एवं अनमोल सोमांची, लुकास चांसेल, आदि उनके सहयोगियों के ग्लोबल जस्टिस प्रॉजेक्ट (GJP) की नई रिसर्च का नतीजा है। इस रिसर्च का मुख्य उद्देश्य साल 2100 तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना दुनिया के सभी देशों में प्रति व्यक्ति 5,000 यूरो की मासिक आय का लक्ष्य हासिल करना बताया गया है। अतः इस पर एक आलोचनात्मक दृष्टि डालना जरूरी है।

पिकेटी के मुताबिक इस रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि क्या कुदरत को नुकसान पहुंचाए बगैर दुनिया में समृद्धि आ सकती है? मान लीजिए कि भविष्य में हर देश में एक जैसी समृद्धि आ जाती है, तो इसका मतलब क्या होगा और इस लक्ष्य तक कैसे पहुंचा जा सकता है। वे इसकी शुरुआत ग्लोबल साउथ (विकासशील और पिछड़े देशों), खासतौर पर भारत से करना चाहते हैं ताकि इन देशों में भी विकसित देशों जैसी समृद्धि आए। इस सोच को विकसित देशों को भी गंभीरता से लेना होगा। अगर दुनिया के ज्यादातर देश पिछड़े बने रहे तो शायद धरती का तापमान ज्यादा न बढ़े। मगर कोई देश पिछड़ा क्यों बना रहना चाहेगा?

इसलिए GJP रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया है कि दुनिया में एक जैसी समृद्धि कैसे हासिल की जा सकती है और ऐसा हुआ तो धरती कैसी होगी। आज पूर्वी अफ्रीका, केन्या और इथियोपिया जैसे उप-सहारा अफ्रीकी क्षेत्र में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (ग्रॉस नेशनल इनकम) हर महीने 300 यूरो है। यह दक्षिण एशियाई देशों में 700 और उत्तरी अमेरिका के देशों में 5,000 यूरो है। “क्या साल 2100 तक सभी देशों में इसे 5,000 यूरो के स्तर पर लाया जा सकता है, हम यही सवाल कर रहे हैं?” प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना यह काम कैसे किया जा सकता है? शोध बताती है कि तीन चीजें हो तो लक्ष्य हासिल हो सकता है।

पहला, जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल-डीजल) पर प्रतिबंध लगाना होगा। इसके लिए अगले दो से तीन दशकों तक विंड टर्बाइन, सोलर पैनल आदि में बड़ा निवेश करना होगा। दूसरा, यह समझना होगा कि कितना उपभोग पर्याप्त है। भारत जैसे देश में इसमें बहुत बढ़ोतरी होगी, लेकिन विकसित देशों में एक व्यक्ति को 10 आईफोन रखने की जरूरत नहीं है। साथ ही, GDP का एक अच्छा-खासा हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर खर्च करना होगा। जैसे जैसे कोई देश समृद्ध होता है, उसे इस बदलाव से गुजरना होगा। फिर खाने की आदतों में बदलाव भी जरूरी है। तीसरा, संपत्ति के वितरण में जो असमानता है, उसे दूर करना होगा। आज नीचे की 50% आबादी के पास दुनिया की सिर्फ 2% दौलत है। इस असमानता को दूर करने के लिए अरबपतियों पर वेल्थ टैक्स को बढ़ाकर 20% करना होगा। इस पैसे को एक फंड में डाला जाए और उससे ये लक्ष्य पूरे किए जाएं।

जब पिकेटी से पूछा गया कि वैश्विक स्तर पर राजनेताओं को अरबपतियों का समर्थन मिला हुआ है या वे खुद अरबपति बनने में लगे हुए है। फिर वे अरबपतियों पर टैक्स लगाने के लिए क्यों मानेगे तो उनका जवाब था कि उन्हें कभी न कभी लोकतांत्रिक ताकतों के आगे झुकना होगा। आज दुनिया में ज्यादातर लोग अरबपतियों पर टैक्स लगाने का समर्थन करते हैं। एक समय आएगा, जब वे इसका प्रतिरोध नहीं कर पाएंगे। अगर विकसित देशों के नेताओं को भी नीचे की 90% आबादी का समर्थन चाहिए तो उन्हें उनकी आमदनी बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा। जिस तरह से 20वीं सदी में लोगों ने इनकम टैक्स को स्वीकार किया, उसी तरह से 21वीं सदी में वेल्थ टैक्स को भी स्वीकार करेंगे। जब इनकम टैक्स का विचार आया था, तब लोग इसके बारे में सुनना भी नहीं चाहते थे। वे कहते थे कि इससे अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी। तरक्की रुक जाएगी। इसके बावजूद हर जगह इनकम टैक्स लाया गया। यह डर भी गलत साबित हुआ कि इससे अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा। इनकम टैक्स लागू किए जाने के बाद आर्थिक वृद्धि व उत्पादकता बढ़ी, समृद्धि आई। पिकेटी कहते हैं -

“बेशक अरबपति पहले वेल्थ टैक्स का विरोध करेंगे, लेकिन उन्हें हार माननी होगी। वैसे, हमारी रिपोर्ट में माना गया है कि यह काम आसान नहीं है, लेकिन यह संभव है। रिपोर्ट में हमने काम करने के घंटों में कमी की ओर भी ध्यान दिलाया है। यह विकसित देशों में आज बड़ा मुद्दा है। भारत में अभी समृद्धि बढ़ाना प्राथमिकता है, लेकिन जैसे-जैसे समृद्धि बढ़ती है, लोग काम के घंटों में कमी की मांग करते हैं। वे अपने लिए ज्यादा वक्त चाहते है। साल 1900 में एक व्यक्ति साल में 3,000 घंटे काम करता था, आज यह वैश्विक स्तर पर 2,000 घंटे है। यूरोप में तो 1,500 घंटे ही है और साल 2100 तक इसे 1,000 घंटे तक लाने का लक्ष्य है।”

अति-उपभोग की प्रवृत्ति पर पिकेटी कहते हैं कि इस सवाल का जवाब अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग है। भारत में यूरोप और उत्तरी अमेरिका की तरह समृद्ध होने की चाहत है, जो बिल्कुल सही है। हम चाहते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों का हद में इस्तेमाल करते हुए यह हो। आज जो अरबपति हैं, खासतौर पर विकसित देशों में, उनकी ग्लोबल वॉर्मिंग और प्रदूषण बढ़ाने में बड़ी भूमिका है। इसलिए उनसे ग्लोबल जस्टिस फंड में योगदान की मांग बिल्कुल जायज है। इस रकम की मदद से ग्लोबल साउथ के देशों में समृद्धि बढ़ेगी। अरबपति इसके लिए क्यों मानेंगे? इन बदलावों से जलवायु परिवर्तन की आपदा को रोकने में मदद मिलेगी, जिससे अमीरों को भी फायदा होगा। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अगर वैश्विक प्रति व्यक्ति आय 10,000 यूरो मासिक हो जाए और लोग अभी जितना काम कर रहे हैं उतना करते रहें तो धरती का तापमान 4 सेल्सियस से अधिक बढ़ जाएगा। 5,000 यूरो मासिक आय और 1.80 तापमान वृद्धि इससे कहीं बेहतर है। धरती का तापमान 50 सेल्सियस हो जाए तो खासतौर पर भारत जैसे देश में पर्यावरण के लिहाज से तबाही आ जाएगी। इससे लोगों का जीना मुहाल हो जाएगा।

पिकेटी कहते है कि IMF और वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थानो के जरिये यह बदलाव नही लाया जा सकता। हमें वैश्विक धनतंत्र से वैश्विक जनतंत्र की ओर बढ़ना होगा। IMF और वर्ल्ड बैंक में यूरोप और उत्तरी अमेरिका के वोटिंग अधिकार उनकी आबादी की तुलना में चार गुना अधिक है, जबकि सहाराई अफ्रीका और दक्षिण एशिया के चार गुना कम। इसे दुरुस्त करना होगा।

इसके साथ ही 10 जून को लंदन के अख़बार ‘द गार्डियन’ में पिकेटी के साथ ही जोसफ स्टिग्लिट्ज़, जेसन हिकल, जयति घोष, ज्यां द्रीज जैसे 350 प्रोफेसरों-विशेषज्ञों के हस्ताक्षर से एक मिलती-जुलती अपील प्रकाशित हुई जो ग़रीबी मिटाने, असमानता दूर करने, मानवाधिकार स्थापित करने और पर्यावरण बचाने का एक आर्थिक रोडमैप पेश करती है। ये लोग इस आर्थिक रोडमैप को लागू करने की उम्मीद किससे कर रहे हैं, इस अपील से समझा जा सकता है -

“हम जीरो से शुरू नहीं कर रहे हैं। दुनिया भर में, आदिवासी संघर्ष, नारीवादी संगठन, ट्रेड यूनियन और पर्यावरण न्याय आंदोलन सामूहिक देखभाल और स्थानीय अधिकारों पर आधारित वैकल्पिक भविष्य की रक्षा और निर्माण कर रहे हैं। देशों के नए गठजोड़ वैश्विक आर्थिक प्रशासन की नवीन दृष्टि को आगे बढ़ा रहे हैं, और सरकारें अधिकार आधारित ग़रीबी विरोधी रणनीति, नागरिक सभाओं और सामुदायिक संपदा निर्माण के साथ प्रयोग कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र और कई पार्टनर इस बदलाव को समझने में मदद के लिए “GDP से आगे” संकेतों और नए संस्थानों जैसे कि असमानता पर एक अंतर्राष्ट्रीय पैनल की खोज कर रहे हैं।”

कुल मिलाकर एजेंडा साफ हो जाता है कि मौजूदा पूंजीवादी सरकारों, उनके द्वारा बनाये गए संयुक्त राष्ट्र व ऐसे ही अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों तथा उनके/पूंजीपतियों के दिए गए कोष से चलने वाले कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) का गठजोड़ मिलकर एक गरीबी रहित, सबके लिए समानता तथा मानवाधिकारों सहित, स्वच्छ पर्यावरण वाली भविष्य की हसीन दुनिया का निर्माण करेंगे, ऐसा सपना विश्व की गरीब जनता को दिखाया जा रहा है। पिकेटी ऐसा बताते प्रतीत होते हैं कि ऐसा अब तक संभवतः बस इसीलिए नहीं हो पाया कि अब तक किसी महान भविष्यदृष्टा ने ऐसी कोई योजना बनायी ही नहीं थी, इसलिए ही अब तक ये सब मिलकर ऐसी एक स्वर्गिक दुनिया का निर्माण नहीं कर पा रहे थे। अब उन्होंने भविष्य की समान दुनिया का एक रोडमैप बना दिया है, चुनांचे अब इसका निर्माण हुआ ही समझिए।

पूरी रिपोर्ट मौजूदा सामाजिक व्यवस्था में गरीबी और असमानता की बुनियादी वजहों की कोई सतही पड़ताल तक नहीं करती। इस बात की कोई खोजबीन नहीं करती कि एक व्यक्ति एक वोट वाले इस चुनावी जनतंत्र के पहले से मौजूद होते हुए भी यह भारी असमानता क्यों पैदा हुई? समस्त संपदा उत्पादन में श्रम करने वाले मेहनतकशों के बजाय चंद पूंजीपतियों, अमीरों के मालिकाने में इकट्ठा ही क्यों हुई कि अब उन पर वेल्थ टैक्स से उसे वापस लाने की जरूरत पड़ रही है? क्या वास्तव में इस ‘जनतंत्र’ में वोट का अधिकार समान अधिकार है? क्या यह सामाजिक व्यवस्था के संचालन में सभी मतदाताओं को समान अधिकार प्रदान करता है? आखिर इस दुनिया में यह अन्याय है ही क्यों जिसे वो अपने ग्लोबल जस्टिस प्रोजेक्ट से वेल्थ टैक्स लगाकर दूर करना चाहते हैं? ग्लोबल इनजस्टिस के इन कारणों पर चुप्पी साधकर रिपोर्ट बस वेल्थ टैक्स से संपत्ति के पुनर्वितरण से असमानता की समस्या के समाधान का रामबाण उपाय प्रस्तुत कर देती है?

यह सवाल पूछा जाना जरूरी है कि अगर चुनाव में जनता के समर्थन के दबाव में धनतंत्र को लोकतंत्र के सामने झुकना जरूरी है तो ऐसा क्यों होता है कि डोनाल्ड ट्रंप युद्धों को समाप्त करने का वादा कर सत्ता में आता है और दुनिया को युद्ध में झोंक देता है। नरेंद्र मोदी दस करोड़ रोजगार और अच्छे दिन के वादे दिखाकर सत्ता में आता है और रोजगारों का चौतरफा ध्वंस कर देता है। अच्छे दिनों का हाल तो यह है कि इसी मई में जारी स्वास्थ्य मंत्रालय के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के 6ठे राउंड के आंकड़े बता रहे हैं कि देश में 6 महीने से दो वर्ष उम्र वाले बच्चों में से सिर्फ 15.3% को पर्याप्त भोजन प्राप्त होता है। और ये सिर्फ दो उदाहरण नहीं, यही स्थाई सच है। दरअसल पिकेटी इस मात्र वोट के जनतंत्र की उतनी सच्चाई भी नहीं देख पाते जो 23 सदी पहले इसके ठीक आरम्भ में ही अरस्तू देखने में सफल हो गए थे, जिन्होंने तभी कहा था कि जब तक समाज में असमानता है तब तक मात्र वोट का अधिकार जनतंत्र (अर्थात् गरीबों, मेहनतशों का शासन) को धनतंत्र में बदल जाने से नहीं रोक सकता। उधर इतने लंबे अरसे के तजुर्बे के बाद भी इसके धुर उलट पिकेटी कह रहे हैं कि वोट के दबाव से धनतंत्र को जनतंत्र में बदलकर सामाजिक असमानता दूर की जा सकती है। उनकी प्रतिभा तो सचमुच कमाल की है!

कुछ लोग कह सकते हैं कि चलो और कुछ भी नहीं तो रिपोर्ट में एक यूटोपिया तो है, एक न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था का काल्पनिक आदर्श तो है, जो सामाजिक यथार्थ के परिवर्तन की प्रेरणा देता है, इसकी भी आलोचना क्यों करना? किंतु जो काल्पनिक आदर्श यथार्थ की निर्मम आलोचना पर आधारित न हो क्या वह वास्तव में सामाजिक यथार्थ को बदलने के संघर्ष की प्रेरणा देता है? दो सदी पूर्व इसी पेरिस में महान काल्पनिक समाजवादी चार्ल्स फूरिये ने सामाजिक यथार्थ की आलोचना करते हुए कहा था, “सभ्यता में दरिद्रता अति प्रचुरता से ही पैदा होती है।” फूरिये अपने काल्पनिक समाजवाद में इसका वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत करने में असमर्थ थे। किंतु उनके द्वारा प्रस्तुत आलोचना को कार्ल मार्क्स ने आगे बढ़ाया जिन्होंने एक ओर संपत्तिहीन उजरती श्रम करने वालों के सामाजिक श्रम तो दूसरी ओर उत्पादन के साधनों के मालिक पूंजीपतियों द्वारा इस सामाजिक श्रम के उत्पाद के हस्तगतकरण वाले पूंजीवादी उत्पादन संबंधों में उस बुनियादी कारण को ढूंढ़ निकाला जो अति प्रचुरता वाली सभ्यता में भी चहुंओर दरिद्रता को पैदा करने का मूल कारण हैं। इस बुनियादी कारण को तलाशकर मार्क्स ने सामाजिक श्रम द्वारा उत्पादन और इस उत्पादन के निजी हस्तगतकरण के मूल अंतर्विरोध को मिटाने से इस दरिद्रता की समाप्ति का वैज्ञानिक समाजवाद का सिद्धांत खोज निकाला था और बताया कि ये संपत्तिहीन सर्वहारा ही इस दरिद्रता से अपनी और समस्त समाज की मुक्ति के अग्रदूत हैं, उन्हें इस मुक्ति के लिए किसी और की दया पर निर्भरता की मजबूरी नहीं है। यह सामाजिक यथार्थ की आलोचना आधारित काल्पनिक आदर्श से प्रेरणा लेकर सामाजिक यथार्थ में अमूल बदलाव के सिद्धांत पर पहुंचने का सटीक उदाहरण है।

किंतु पिकेटी का काल्पनिक आदर्श ऐसी प्रेरणा देने के बजाय मौजूदा अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के शासक वर्ग द्वारा पिकेटी की न्यायपूर्ण शिक्षा से प्रभावित होकर श्रम करने वालों के शोषण द्वारा हासिल अपनी आय-संपदा पर टैक्स लगाकर अपनी संपदा को सामाजिक न्याय के लिए दे देने का शेखचिल्ली वाला दिवास्वप्न प्रस्तुत करती है। यह सपना वर्तमान व्यवस्था के अन्याय के पीड़ितों को अपने यथार्थ को बदल डालने के मकसद से लैस करने के बजाय उन्हें अपने वोट से अच्छे दिन लाने वाले नेता चुनने और उनके जुमलों के भरोसे भविष्य में एक विकसित समान समाज की झूठी उम्मीद दिखाता है। जैसे सभी धर्म इस लोक के दुखों को मिटाने के संघर्ष के बजाय स्वर्गिक परलोक में दुख रहित जीवन का सपना दिखा कष्टों को सहने की शक्ति देते हैं, वैसे ही सामाजिक यथार्थ की आलोचना रहित यह काल्पनिक आदर्श भी श्रम के शोषण से उत्पादित सामाजिक मूल्य के पूंजीपति की तिजोरी में पहुंचने, फिर वहां से वेल्थ टैक्स के जरिए सामाजिक कल्याण व न्याय के लिए वापस आने से बने भविष्य के आदर्श समाज के मुंगेरीलाल के हसीन सपने दिखाकर श्रमिकों को वर्तमान कष्ट सहने की तात्कालिक शक्ति देता है ताकि वे असहनीय तकलीफ़ों भरे जीवन से ऐसे ही विद्रोह न कर दें जैसे उन्होंने हाल में ही बरौनी-पानीपत से शुरू होकर दिल्ली एनसीआर और फिर पूरे उत्तर भारत में कर सत्ता को कुछ समय के लिए ही सही हिला दिया, और भविष्य में पूरी तरह हिला डालने की संभावना वाली अपनी शक्ति भी दिखा दी।

इस नजरिये से देखें तो ये ग्लोबल जस्टिस रिपोर्ट जैसे समानता व न्याय आधारित समाज वाले समाधान भी पुराने धर्मों की तरह एक आधुनिक रासायनिक नुस्खे वाली अफ़ीम ही हैं जिनका असल मकसद मजदूरों को स्वयं अपने शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति के संघर्ष से विमुख करना है। इसीलिए भविष्य के वेल्थ टैक्स से सामाजिक कल्याण व न्याय के लिए कोष मिले या नहीं, इन बड़े-बड़े थिंक टैंकों को पूंजीपति वर्ग द्वारा कोष की कमी कभी नहीं होती।


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