झारखंड राज्य में पिछले दिनों विभिन्न मुद्दों को लेकर सड़कों पर संघर्ष हुए। प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों द्वारा जुलाई-अगस्त का आंदोलन तो राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में बना रहा। परंतु हाल में झारखंड में एक संघर्ष लगातार जोर पकड़ रहा है। यह राष्ट्रीय समाचार तक तो नहीं पहुंचा, पर इसने झारखंड के आदिवासियों के बीच एक बड़ी असुरक्षा को अभिव्यक्त किया। 30 अगस्त को झारखंड की राजधानी रांची में आदिवासी एकता महाजुटान का आयोजन किया गया जिसमे कांग्रेस एवं झामुमो के नेताओं ने शिरकत की। इसके बाद पूरे सितंबर माह में इन्हीं मुद्दों से जुड़े अलग-अलग कई आयोजन किए जा रहे है जिसमें आक्रामक तरीके से बीजेपी की राजनीति पर वार करते हुए आदिवासी प्रश्नों पर एकजुटता बनाने के प्रयास किए जा रहे है। प्रस्तुत लेख में ऐसे ही तीन प्रमुख मुद्दों को समझने की कोशिश की जा रही है।
परिसीमन एवं आदिवासियों के राजनैतिक प्रतिनिधित्व का सवाल
हम जानते है कि केंद्र सरकार द्वारा 2026-27 की जनगणना के बाद परिसीमन (delimitation) संबंधी कदम उठाए जाएंगे। परिसीमन के तहत संसद एवं विधान सभा में सदस्यों की संख्या एवं विभिमं क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व पर बड़ा प्रभाव किए जाने की संभावना है। झारखंड में इस परिसीमन प्रक्रिया का असर यहाँ के आदिवासियों के प्रतिनिधित्व पर पड़ने की शंका जतायी जा रही है। झारखंड से पिछले कई दशकों से जिस तेजी से आदिवासियों का रोजगार को लेकर पलायन हुआ है, उसने आदिवासियों की जनसंख्या को गंभीरता से प्रभावित किया है। ऐसी स्थिति में झारखंड के आदिवासियों के बीच यह असुरक्षा गहरी होती जा रही है कि कहीं परिसीमन की प्रक्रिया के दौरान झारखंड में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व पर कोई नकारात्मक प्रभाव तो नहीं पड़ेगा? असुरक्षा की यह भावना मात्र अनुमान अथवा व्यर्थ शंका से नहीं जुड़ी हुई है, बल्कि इसके ठोस आधार है – पहला, तो वर्तमान केन्द्रीय सरकार द्वारा लगातार आदिवासी अधिकारों का हनन, जो केंद्र-पूंजीपति के गहरे गठजोड़ में अभिव्यक्त होता है और जिसके तहत आदिवासियों की जमीन-जंगल तथा अन्य संसाधनों पर पूंजीवादी पकड़ लगातार मजबूत बनाई जा रही है। ऐसे में अगर आदिवासी सीटों घटती है, तो आदिवासी एक constituency के रूप में आदिवासी-विरोधी राजनीति को चुनौती देने में कमजोर पड़ सकते है। आदिवासियों की जनसंख्या में कमी सबसे ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों में आयी है। ऐसे में इन क्षेत्रों में आदिवासी प्रतिनिधित्व के साथ समझौते का अर्थ है कि चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों का कमजोर होना। झारखंड में चुनावी राजनीति का विश्लेषण यह बताता है कि शहरी इलाकों में बीजेपी मजबूत रही है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासी प्रतिनिधित्व में कटौती का अर्थ होगा पूंजीपति दोहन के लिए रास्ता आसान बनाना। इसके अलावा, आदिवासी सीटें घटाए जाने के प्रस्ताव पहले भी आ चुके है। 2002 में गठित परीसीमन समिति द्वारा जब 2007 में ड्राफ्ट प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए थे, उसके तहत झारखंड की 81 विधानसभा में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों को 28 से घटाकर 22 करने का प्रस्ताव लाया गया था। हालांकि इसे लागू नहीं किया गया था, परंतु इसने झारखंड के आदिवासी समुदायों में एक असुरक्षा जरूर पैदा कर दी कि प्रदेश में उनके घटती जनसंख्या को एक बहाना बनाते हुए उनके राजनैतिक प्रतिनिधित्व को नुकसान पहुंचाने के प्रयास भविष्य में किए जाएंगे। यह प्रश्न केवल आदिवासी अस्मिता का नहीं है बल्कि यह उनके भौतिक जीवन, उनके अस्तित्व से जुड़ा सवाल है। इस संदर्भ में यह याद रखना आवश्यक है कि झारखंड में आदिवासियों की घटती जनसंख्या के तार सीधे उनके बढ़ते बिखराव, जीविकोपार्जन पर गहराते संकट, और प्रदेश के संसाधनों से उनकी बेदखली की लंबी प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं। और इन सबके के लिए इस क्षेत्र में लगातार हो रही पूंजीवादी लूट सबसे बड़ी कारक है। ऐसे में परिसीमन के तहत अगर आदिवासी प्रतिनिधित्व घटता है तो बिखराव, पलायन, और शोषण का यह चक्र और तेज हो जाएगा।
जनगणना एवं सरना धर्म कोड
इस पहलु से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसे इस महजुटान में रेखांकित किया गया – आदिवासियों के लिए जनगणना में धर्म का अलग कोड : सरना धर्म कोड। पहले इसकी पृष्ठभूमि समझ लेते है। हम जानते है कि वर्तमान जनगणना की प्रक्रिया में छः धर्मों को रिकॉर्ड करने का प्रावधान है: हिन्दू, इस्लाम, इसाई, सिख, जैन एवं बौद्ध। वैसे समूह/ व्यक्ति जो इन छः धर्मों की श्रेणी में नहीं आते उनकी गणना ‘अन्य’ की श्रेणी में की जाती है। इस व्यवस्था ने आदिवासियों की गणना को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। ‘अन्य’ की श्रेणी जनगणना करने वाले कर्मचारियों एवं स्वयं आदिवासियों के लिए अस्पष्ट रही है। आदिवासियों के बीच प्रकृति पूजा की परंपरा के कारण कई बार उन्हें हिन्दू धर्म के नजदीक माना गया एवं उनकी गणना ‘हिन्दू’ की श्रेणी में कर दी जाती रही है। इसका असर जनगणना के आंकड़ों में दिखायी देता है। पिछले आठ दशकों में आदिवासी जनसंख्या 38.03% से वर्ष 2011 में 26.02% रह गयी है। अगर हम गैर-आदिवासियों से आदिवासी जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर की तुलना करें, तो पाते हैं कि जहां 1931-41 में आदिवासी व गैर-आदिवासी जनसंख्या की वृद्धि दर क्रमशः 13.76% व 11.13% थी, वहीं 1991-2001 में यह क्रमशः 17.19% व 26.65% रही। इस तरह तुलनात्मक दृष्टि से अगर हम देखें तो आदिवासी जनसंख्या की वृद्धि दर गैर-आदिवासियों के बनिस्पत घटने की दिशा में है। इस घटती दर के कई कारक हो सकते हैं, पर विशेषज्ञों का मानना है कि जनगणना की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है।
सरना धर्म कोड का जनगणना व्यवस्था में अलग श्रेणी का होना, इसलिए, मात्र धार्मिक पहचान से जुड़ा मामला नहीं है। यह उनके भौतिक उपस्थिति से जुड़ा है। और हम यह जानते है कि आरक्षण से लेकर अनुसूचित जनजातियों के लिए तमाम संवैधानिक प्रावधान एवं सुविधाएं संख्या पर आधारित है। ऐसे में सरना धर्म कोड का मामला एक भावनात्मक मांग नहीं बल्कि आदिवासियों के भौतिक अस्तित्व से जुड़ा मामला है।
इसी गंभीरता को ध्यान में रखते हुए नवंबर 2020 को झारखंड विधानसभा ने एक विशेष सत्र आयोजित कर सरना धर्म कोड बिल पारित किया। करीब 6 वर्ष बीत जाने के बावजूद यह बिल कानून नहीं बन पाया है, क्योंकि धार्मिक मामलों में कानून बनाने का अधिकार केंद्र का है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आदिवासियों की इस महत्वपूर्ण मांग की अनदेखी तब हो रही है, जब देश के सर्वोच्च पद पर एक आदिवासी आसीन है, जिनके हस्ताक्षर का यह बिल वर्षों से इंतज़ार कर रहा है। पिछले दिनों जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने के बाद सरना कोड का मामला फिर से झारखंड की राजनीति में सुर्खियों पर है, और हाल में सम्पन्न आदिवासी महजुटान एवं अन्य आदिवासी मंचों पर इस मांग को जोरदार तरीके से रखा जा रहा है।
केंद्र ने इस मामले में चुप्पी बनाई हुई है। केंद्र पर काबिज भारतीय जनता पार्टी और उनके वैचारिक गुरु, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दशकों से इस प्रयास में है कि आदिवासियों को ‘हिन्दू’ की श्रेणी में लाया जाए। इस उद्देश्य से देश के आदिवासी बहुल इलाकों में वनवासी कल्याण आश्रम जमीनी स्तर पर लगातार काम कर रही है। यहाँ यह रेखांकित करना आवश्यक होगा कि यह प्रयास पिछले एक डेढ़ दशक पुराना नहीं, बल्कि आजादी के पहले से अबाध चल रहा है। पिछले दशक से जब से बीजेपी की सरकार केंद्र में है, यह प्रक्रिया तेज हुई है, और आदिवासियों को धार्मिक आधार पर बांटने के प्रयास गहरे और गंभीर हुए है। जनगणना में सरना धर्म कोड आदिवासियों को मुख्यधारा के प्रभावशाली धर्मों से परे एक नई पहचान देने का एक प्रभावशाली प्रयास है, जिसमें आरएसएस के षड्यन्त्र को तोड़ने की मजबूत संभावना है। यहाँ फिर से यह याद रखना आवश्यक है कि यह षड्यन्त्र मात्र धार्मिक पहचान संबंधी वैचारिक/ भावनात्मक मुद्दा नहीं। यह आरएसएस और पूँजीपतियों के गहरे रिश्ते से जुड़ा मामला है और आदिवासियों के संसाधनों की कॉर्पोरेट लूट को सुविधाजनक बनाना इसका मुख्य उद्देश्य है। सरना धर्म कोड के आने से आदिवासी अपनी एक विशिष्ट पहचान के साथ एक सशक्त constituency के रूप में उभर सकेंगे और आदिवासी अस्तित्व पर गहराते संकट को चुनौती दे पाएंगे। यही कारण है कि केंद्र पर काबिज़ सरकार इस बिल को कानूनी रूप देने से इनकार कर रही है।
खनन संबंधी राज्यों के अधिकार, केंद्र-कॉर्पोरेट का गठजोड़ और झारखंड पर इसका प्रभाव
तीसरा मुद्दा जो झारखंड के आदिवासी मंचों पर उठाया जा रहा है, वह है संसद द्वारा लाया गया हालिया Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Act (MMDR), 2026. सरकार के अनुसार इसका मुख्य उद्देश्य देश में खनन से जुड़े taxes और levies की व्यवस्था में एकरूपता लाना, खनन कंपनियों के लिए अनिश्चितता कम करना और खनिजों की कीमत को नियंत्रित रखना है। संशोधन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि राज्यों द्वारा खनन अधिकार और खनिज युक्त भूमि पर लगाए जाने वाले tax और cess पर अब अधिक सीमाएं होंगी। केन्द्र का तर्क है कि यदि अलग-अलग राज्य खनिज कंपनियों पर अलग-अलग प्रकार के taxes और cess लगाते हैं, तो खनन की लागत बढ़ जाती है। इससे निवेश प्रभावित हो सकता है और कोयले तथा दूसरे खनिज की कीमत भी बढ़ सकती है।
इस संशोधन की पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय का जुलाई 2024 का महत्वपूर्ण फैसला है जिसके तहत नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्यों को खनन से मिलने वाली royalty कर (tax) नहीं है। इसके अलावा फैसले ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यों को संविधान की राज्य सूची की Entry 50 के तहत खनिज युक्त भूमि पर tax लगाने की शक्ति प्राप्त है। 2026 का MMDR संशोधन इसी शक्ति पर नई सीमाएं लगाता है।
इस संशोधन का सबसे अधिक प्रभाव झारखंड जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों पर पड़ सकता है। केन्द्र सरकार का कहना है कि राज्यों को खनिज से मिलने वाली royalty, auction premium, District Mineral Foundation (DMF) और दूसरे statutory payments मिलते रहेंगे। परंतु यहाँ यह देखना जरूरी है कि राज्य अपने खनिज संसाधनों पर कितना अतिरिक्त कर लगा सकता है। झारखंड इसका अच्छा उदाहरण है। राज्य ने 2024 में Jharkhand Mineral Bearing Land Cess Act बनाया था। इसके माध्यम से खनिज युक्त भूमि पर cess लगाने का प्रावधान किया गया था। इससे प्राप्त राशि का उपयोग स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, ग्रामीण बुनियादी ढांचा (infrastructure), पानी और सफाई जैसी आवश्यक सेवाओं पर किया जा सकता है। 2026–27 के बजट में झारखंड ने खनिज युक्त भूमि cess से लगभग ₹14,656 करोड़ प्राप्त होने का अनुमान लगाया था। इसलिए यदि राज्य की इस प्रकार की कर संबंधी शक्ति सीमित होती है, तो राज्य की अपनी आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत कम हो सकता है। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खनिज से होने वाले लाभ और खनन से होने वाले नुकसान समान रूप से वितरित नहीं होते। कोयला, लोहा और दूसरे खनिज से बनने वाले सामान का उपयोग पूरे देश में होता है और उनसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है। लेकिन खनन के कारण होने वाले कई तत्काल नुकसान उसी राज्य में होते हैं जहां खनन होती है। जमीन का नुकसान, जंगल और पानी पर दबाव, प्रदूषण, विस्थापन, सड़कों और दूसरी सार्वजनिक infrastructure पर अतिरिक्त दबाव तथा खनन से प्रभावित लोगों के पुनर्वास पर होने वाला खर्च राज्य को उठाना पड़ता है। इसलिए खनिज युक्त राज्यों के लिए खनिज संबंधी कर केवल अतिरिक्त पैसा जुटाने का साधन नहीं है। यह उन सामाजिक, पर्यावरणीय और infrastructural costs को पूरा करने का साधन भी हो सकता है जो खनन के कारण पैदा होते हैं।
एक और पक्ष जिसे रेखांकित करना आवश्यक है वह यह कि इस संशोधन ने फिर से बीजेपी और पूंजीपति गठजोड़ को उजागर कर दिया है। यह समझने के लिए बहुत सारे तथ्य या आँकड़े जरूरी नहीं। बस दो उदाहरण काफी होंगे। झारखंड में खनन के कारोबार पर दो कंपनियों की प्रभावशाली उपस्थिति है – वेदांता एवं रुंगता माइंस (Rungta Mines)। इन दोनों कंपनियों की बीजेपी से घनिष्ठ नजदीकी रही है, जो उनके द्वारा दिए गए राजनीतिक दान में नजर आता है। जहां 2024-25 में वेदांता ने बीजेपी को 97 करोड़ डोनेशन (donation) दिया था, वहीं रुंगता ने इसी दौरान 95 करोड़ दिया था। ऐसी कई छोटी- बड़ी पूंजीपति इकाइयां जो झारखंड एवं अन्य खनिज सम्पन्न राज्यों में काम कर रही है, बीजेपी से इसी प्रकार जुड़ी हुई है। यह दो उदाहरण स्पष्ट संकेत देते है कि MMDR कानून में लाया गया यह संशोधन ऐसे ही पूँजीपतियों से मिली कमाई के बदले में की गई है। परंतु इससे जो नुकसान राज्य की कमाई को होगा उसका सीधा प्रभाव झारखंड की गरीब, सर्वहारा जनता, जिनमें अधिकांश आदिवासी है, पर पड़ेगा। यह वही लोग है जो खनन कार्य में मजदूरी करते है, जिनकी जमीन बेदखल कर ली गई, जिनके खेतों में खनन-प्रदूषण के कारण उत्पादकता घट गई है, और जिनके खुद का स्वास्थ्य खनन की वजह से बूरी तरह प्रभावित है।
निष्कर्ष
खनिज संसाधनों में संपन्नता झारखंड राज्य के लिए एक अभिशाप बन कर उभरी है। बीजेपी-आरएसएस के नेतृत्व में पूँजीपतियों की लूट जारी है और सर्वहारा वर्ग चौतरफा मार झेल रहा है। जनगणना से लेकर परिसीमन की प्रक्रिया में जहां आदिवासियों के अस्तित्व और प्रतिनिधित्व को खत्म करने का षड्यन्त्र रचा जा रहा है, वहीं साथ ही कानूनी संशोधनों द्वारा खनिज संसाधनों के पूंजीवादी दोहन को सुविधाजनक और लाभकारी बनाने की प्रक्रिया भी बदस्तूर जारी है। सर्वहारा-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग इस राजनीति और बीजेपी-कॉर्पोरेट गठजोड़ को समझ तो रहा है, पर उसके खिलाफ एकजुट होने के उनके प्रयास की राह में कई बाधाएं भी है। सबसे बड़ी बाधा है इस वर्ग के भीतर का आपसी विरोधाभास जो अस्मिता के आधार पर इन्हें बांटती है – आदिवासी-गैर आदिवासी, सरना-ईसाई आदिवासी, या फिर जातिगत श्रेणीबद्धत्ता के भेद। इन कई पहचानों के आधार पर कई क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरण भी है, जिनका एक दूसरे से गहरा मतभेद और प्रतिस्पर्धा है। इन कई पहचानों के पीछे जो इस वर्ग की सबसे बड़ी पहचान है – उनका सर्वहारा होना, शोषित और दमित होना, संसाधनहीन और बरसों से छला हुआ होना – कहीं छिप जाता है। हाल के आदिवासी महाजुटान तथा अन्य मंचों पर की जा रही चर्चाएं और संघर्ष इस छिपे हुए पहचान को केंद्र में लाने का एक सकारात्मक प्रयास है। इसकी सबसे बड़ी खूबी इस बात में है कि यह अस्मिता के भावनात्मक प्रश्न से परे, जनता के भौतिक अस्तित्व के मुद्दों से जुड़ी है। इस मंच पर हर शोषित वर्ग को अपने पहचान से ऊपर उठकर एकजुट होने की जरूरत है।