पूंजीवादी मानसिकता से ग्रस्त अधिकांश दलित बुद्धिजीवियों द्वारा कम्युनिस्ट संगठनों में दलितों की भागीदारी और नेतृत्व को लेकर भी बहुत सवाल उठाए जाते रहे हैं। लेकिन याद रखना ज़रूरी है कि कम्युनिस्ट संगठनों में किसी बुर्जुआ राजनीतिक दलों की तरह, वर्ग विशेष या जाति विशेष के लिए आरक्षण जैसा कुछ नहीं होता क्योंकि जातिवाद के लिए वहां कोई स्थान नहीं होता तो जाति के आधार पर नेतृत्व कैसे दिया जा सकता है। इसीलिए ऐसा प्रश्न जातिचेतना की सघनता और वर्गचेतना के अभाव के कारण ही पैदा हो सकता है। वर्गचेतना हो तो इस तरह के सवाल पैदा नहीं हो सकते। कम्युनिस्ट संगठनों में ऐसे अनेकों दलित हैं जो अपनी जातियों के कारण नहीं बल्कि अपनी वर्गचेतना की गहरी समझ मार्क्सवादी मूल्यों में अपनी गहरी निष्ठा के कारण कम्युनिस्ट संगठनों में अपना विशिष्ट स्थान बनाए हुए हैं। कम्युनिस्ट संगठनों में दलित हों या सवर्ण, अपनी कठोर मेहनत और पीडितवर्ग के प्रति अपनी सघन प्रतिबद्धताओं और त्याग के बल पर संगठन में नेतृत्व पाते है, अपनी जाति के कारण नहीं। लेकिन यह प्रक्रिया एक लंबे समय और धीरज की मांग करती है ताकि पूर्ण रूप से परिपक्व होकर कोई भी साथी नेतृत्व पर क़ाबिज़ हो। बहरहाल मार्क्सवादी मूल्यों के प्रति समर्पण, त्याग और निष्ठा के बग़ैर और बिना कुछ किए-धरे मात्र दलित होने के कारण कम्युनिस्ट संगठनों में नेतृत्व की आकांक्षा करना अति महत्वकांक्षी चित्त और बुर्जुआ मानसिकता का परिचायक है, और कुछ नहीं।
कम्युनिस्ट पार्टी में नेता जाति के आधार पर नहीं सर्वहारा वर्ग के प्रति समर्पण से तय होते हैं
अभी हाल ही में सीपीआई में कम्युनिस्ट मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं के चलते ही डी राजा को नेतृत्व की बागडोर सौंपी गई है। यह जाति और धर्म खोज लेने में माहिर जातिवादी और सांप्रदायिक पूंजीवादी मीडिया के माध्यम से ही पता चला कि डी राजा दलितवर्ग से आते हैं। ऐसा भी कभी सुना नहीं गया कि उन्होंने लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टी में रहते हुए कभी मात्र दलित होने के कारण कभी अपनी पार्टी में नेतृत्व की मांग की हो या कोई असंतोष प्रकट किया हो। आज नेतृत्व की यह बागडोर कोई उनको दलित होने के कारण नहीं सौंपी गई है, बल्कि कम्युनिस्ट मूल्यों में उनकी प्रतिबद्धता और सर्वहारावर्ग के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण के कारण ही सौंपी गई है, जो उचित भी है। सच तो यह है कि डी राजा आज कोई दलित या सवर्ण नहीं रह गए हैं। वे वर्ण, जाति और धर्म जैसी अमानवीय धारणाओं का अतिक्रमण करके वर्षों पहले कम्युनिस्ट हुए थे। इसीलिए आज वे दलित होने के कारण कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव नहीं हुए हैं, बल्कि दशकों तक मार्क्सवादी सिद्धांतों और सर्वहारा वर्ग के प्रति अपनी निष्ठा और समर्पण के कारण महासचिव हुए हैं। इससे पहले भी और जितने लोग महासचिव हुए हैं वे भी कोई ब्राह्मण इत्यादि होने के कारण महासचिव नहीं हुए थे बल्कि कम्युनिस्ट मूल्यों और पीड़ित वर्ग के प्रति अपनी निष्ठा के कारण ही नेतृत्व पर क़ाबिज़ हो पाए थे। अगर डी राजा दलित होने के कारण महासचिव हुए हैं तो उनके महासचिव होने का कोई मूल्य नहीं हो सकता।
जाति, वर्ण या धर्म के आधार पर चुनाव तो बुर्जुआ पार्टियों में ही होता रहा है और होता रहेगा। आज कोविंद जी एक साम्प्रदायिक और घोर जातिवादी राजनीतिक दल की ओर से दलित के तौर पर राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर आसीन हैं। लेकिन इससे दलितों को रत्तीभर भी कोई लाभ हुआ हो ऐसा कुछ भी कहीं दिखाई नहीं पड़ता। स्वयं कोविंद जी को राष्ट्रपति हो जाने के इलावा अन्य कोई भी विशेष लाभ हुआ हो, ऐसा नहीं लगता । उनको राष्ट्रपति उनकी योग्यता के कारण नहीं बल्कि दलित होने के कारण ही बनाया गया था, जैसे कि दलित होना कोई विशेष गौरव, योग्यता और सम्मान की बात हो । देश के सर्वोच्च पद पर क़ाबिज़ होने के बावजूद वे आज भी माने तो दलित ही जाते हैं और हमेशा दलित ही रहेंगे। जाति और जातिवाद से तो वे भी मुक्त नहीं हो पाए हैं। जातिवाद इस पूंजीवादी व्यवस्था का अभिन्न अंग है और जब तक यह व्यवस्था रहेगी तब तक रहेगा। इसीलिए बुर्जुआ राजनीतिक पार्टियां अगर किसी दलित को कोई भी पद दे देती हैं तो जातिचेतना की सघनता और वर्गचेतना के अभाव के कारण दलित वर्ग इससे खुश होता रहा है। इससे केवल बुर्जुआ राजनीतिक दलों का वोट बैंक ही मज़बूत होता रहा है लेकिन दलित वर्ग की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कोई फ़र्क़ आता नहीं देखा गया है।
अभी हाल में कांग्रेस द्वारा सिर्फ़ दलित होने के नाते ही चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का मुख्यमंत्री घोषित किया गया है ताकि अपने पक्ष में दलित वोटों का धुर्वीकरण किया जा सके। इस पूंजीवादी व्यवस्था में दलितों की स्थिति एक वोट से ज़्यादा नहीं होती है जिसे शासकवर्ग प्रत्येक पांच वर्ष में एक बार टिश्यू पेपर की तरह इस्तेमाल करके कूड़े के डिब्बे में डाल देता है। इस तरह से जातिगत धुर्वीकरण बुर्जुआ राजनीति का अभिन्न हिस्सा रहा है। इसीलिए प्रत्येक बुर्जुआ राजनीतिक पार्टी में जाति, वर्ण, लिंग और धर्म के आधार पर आरक्षण की नीति काम करती है। इस स्थिति का बुर्जुआ दलों के साथ-साथ दलित बुद्धिजीवी भी फ़ायदा उठाते रहे हैं। इस तरह से जातिवाद और दलित बने रहना दलित बुद्धिजीवियों के लिए एक तरह से बुर्जुआ राजनीति में फ़ायदे का सौदा रहता है, लेकिन साथ ही उनका जातिवाद का रोना-धोना भी जारी रहता है।
कम्युनिस्टों पर जातिवादी होने का आरोप लगाना एक पाखंड है
इतना ही नहीं इस तरह की राजनीति करते हुए वे मार्क्सवाद का विरोध करने के लिए, कम्युनिस्ट संगठनों में दलितों के नेतृत्व का सवाल भी उठाते हुए कम्युनिस्टों पर जातिवादी होने और दलितों के प्रश्न पर उपेक्षा का आरोप भी लगाते रहते हैं। यह राजनीतिक पाखंड नहीं तो और क्या है ? यही उनकी राजनीति का सारसूत्र रहा है। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टियों में इस तरह के जातिगत आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं होता, और होना भी नहीं चाहिए। दूसरी ओर, आज भी अधिकांश दलित बुद्धिजीवी जाने-अनजाने जाति, वर्ण और धार्मिक संकीर्णताओं के शिकार हैं और उन्होंने अचेतन ढंग से वर्ण, जाति, और धार्मिक उत्पीडन पर आधारित व्यवस्था को स्वीकार किया हुआ है। इसीलिए कम्युनिस्ट संगठनों में दलित नेतृत्व के अभाव से संबंधित सवाल उनकी इसी मानसिक स्थिति से आते हैं। और विरोधाभासपूर्ण बात यह है कि वे जाति, वर्ण और धार्मिक उत्पीडन का रोना रोते हुए भी पाए जाते हैं।
असल में, कम्युनिस्ट पार्टी में डी राजा का महासचिव बनना उनके सर्वहारावर्ग के प्रति समर्पण, त्याग और निष्ठा का ही परिणाम है। उनके दलित होने या ना होने का उसमें किंचित भी हाथ नहीं हो सकता। दूसरी ओर, कोविंद जी और चरनजीत सिंह चन्नी मात्र दलित होने के कारण ही राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री चुने गए हैं। यही मार्क्सवादी और बुर्जुआ राजनीति का मौलिक फ़र्क़ रहा है। इसीलिए जो भी दलित या ग़ैर-दलित साथी, कम्युनिस्ट संगठनों में दलितों के नेतृत्व की उपेक्षा पर सवाल उठाते है, वे सिर्फ़ बहानेबाजी ही करते हैं या तथ्यों को जाने और समझे बग़ैर सिर्फ़ सवाल उठाने के लिए ही सवाल उठाते रहे हैं। अतः केवल दलित या सवर्ण होने के कारण ही किसी को सीधे संगठन का नेतृत्व सौंप दिया जाए, यह हास्यास्पद और बुर्जुआ क़िस्म की मांग है, क्योंकि यह जातिवाद और जातिवादी मानसिकता को स्वीकार करने जैसा ही कृत्य होगा जिसका मार्क्सवाद में कोई भी स्थान नहीं हो सकता। केवल पूंजीवादी मानसिकता के दलित बुद्धिजीवी ही ऐसे सवाल उठाते देखे गए हैं।
मार्क्सवाद किसी जाति विशेष, वर्ग विशेष या किसी देश विशेष की बपौती नहीं है, न हो हो सकता है। मार्क्सवाद तो दुनिया के तमाम दलितों, शोषितों और पीड़ितों की मुक्ति का दर्शन है। अगर किसी की मार्क्सवादी सिद्धांतों और मूल्यों में आस्था है, और नेतृत्व को लेकर उसमें कोई असंतोष है तो उसे संगठन के भीतर निरंतर वैचारिक संघर्ष के माध्यम से अभिव्यक्त करना चाहिए। संगठन से बाहर रहकर इस तरह के सवाल उठाना खुद उन्हीं की नीयत पर सवाल खड़े करता है। ऐसे बुद्धिजीवियों को अगर नेतृत्व ही चाहिए तो फिर उनको खुद पहलक़दमी लेते हुए मार्क्सवादी पार्टी बनाकर उसका नेतृत्व करना चाहिए। लेकिन अधिकांश दलित बुद्धिजीवी काम तो पूंजीवादी संगठनों में शासकवर्ग के साथ और उनके सहयोग से अपने निजी हितों को साधने और पूंजीवादी व्यवस्था को स्थापित और उसे मज़बूत करने के लिए करते हैं, और पूंजीवादी मूल्यों में विश्वास करते हुए व्यवस्था परिवर्तन के स्थान पर सत्ता परिवर्तन की राजनीति करते हैं ताकि शासन सत्ता में वे भी हिस्सा पा सकें, लेकिन कम्युनिस्ट संगठनों में दलितों की भागीदारी पर सवाल खड़े करते हुए कम्युनिस्टों की नीयत पर सवाल खड़े करते हुए पाए जाते हैं। यह हास्यास्पद और विरोधाभासपूर्ण मनःस्थिति का प्रकटीकरण है और कुछ नहीं।
