फासीवाद

रणवीर सिंह

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बीसवीं सदी का फासीवाद मानो पूर्व सूचना था कि यदि पूंजीवाद के अस्तित्व का संकट आया तो कौन कौन से कदम उठाए जाएंगे। उसका दायरा कुछ देशों तक सीमित था तथा उसे कुछ सिरफिरे व्यक्तियों के अहंकार और राज करने की महत्वाकांक्षा से जोड़कर देखा गया। ये भी मान लिया गया कि उन सिरफिरे व्यक्तियों के अंत के साथ ही उनके फासीवाद का भी हमेशा के लिए अंत हो गया है। यानि पूर्व सूचना को नज़रअंदाज कर दिया गया।

लगभग सौ साल बाद प्रकट हुए इक्कीसवीं सदी के फासीवाद का दायरा बहुत व्यापक है। इसे किसी या किन्ही व्यक्तियों का सिरफिरापन नहीं कहा जा सकता। इसका आगमन ऐसे समय में हुआ है जब पूंजीवाद अपना विकास तत्व खो चुका है। रोज़गार सृजन नगण्य है। पूंजीवाद आज न्यूनतम मज़दूरी देने में अक्षम है। जनता आग बबूला है। जिस जनतंत्र के बल पर पूंजीवाद ने कभी स्वीकार्यता पाई थी, आज उसी जनतंत्र को त्यागा जा रहा है। पूंजीवाद ने अपनी रक्षा के लिए अपने अंतिम हथियार फासीवाद को मैदान में उतार दिया है। फासीवाद को कोसना काफ़ी नहीं है। जैसे जैसे वक़्त गुजरेगा, ये साफ हो जाएगा कि समाज के सभी पीड़ित तबकों के एक साथ आए बिना, फासीवाद से मुकाबला नहीं किया जा सकता। ये भी हो सकता है कि फासीवाद से लड़ते लड़ते बात बहुत दूर तक चली जाए और ये संघर्ष, पूंजीवाद विरोधी मुहिम में बदल जाए। भिन्न भिन्न क्षेत्रों में फासीवाद के दुष्प्रभाव पर एक नज़र।

व्यापार - पूंजीवाद के रक्षक के रूप में, फासीवाद पूरे पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन, व्यावहारिक तौर पर, फासीवाद एकाधिकार पूंजी के साथ आत्मसात हो जाता है। फासीवाद ने अपने कारोबारी चुन लिए हैं। बंदरगाह, हवाई अड्डे, खदानें, राजमार्ग, बिजली, रक्षा वगैरह के ठेके दिए जा चुके हैं; बैंक, रेलवे और खेती वगैरह सौंपने का काम चल रहा है। बाकी कारोबारी, प्रगतिशील पूंजीवाद को याद कर रहे हैं जिसमें स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा थी और सभी भाग ले सकते थे। आज, इन कारोबारियों को प्रतियोगिता से निष्काषित कर दिया गया है। यदि वे अपनी नाराज़गी प्रकट करते हैं, तो उनपर छापे पड़ने लगते हैं। वे कुछ समझ नहीं पा रहे हैं। वित्त पूंजी और फासीवाद के गठबंधन तले, छोटे कारोबार लुप्त हो रहे हैं। दुकानें बंद पड़ी हैं और दुकानदार निराश होकर जगह खाली कर रहे हैं।

विपक्ष - फासीवाद खुद को निर्विरोध विजेता घोषित कर देता है तथा किसी भी विरोध को तत्काल खत्म करने की मंशा रखता है। विपक्ष, इसके निशाने पर रहता है तथा सिर्फ नेता ही नहीं, पूरी की पूरी पार्टियां निगल जाता है। यह, पहले रेफरी को रास्ते से हटाता है और फिर विरोधी को खेल के लिए ललकारता है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा को किताबों तक समेट देता है। विरोधियों को विकल्प दिया जाता है: साथ आ जाओ या बर्बाद हो जाओ। फासीवाद, किसी के मशविरे का मोहताज़ नहीं होता; इसे समझाया नहीं सिर्फ हराया जा सकता है। फासीवाद, जनवादी अधिकारों के लिए किए जाने वाले आंदोलनों पर मुस्कुरा देता है। राजनेतिक परिद्रश्य दो भागों में बँट जाता है: फासीवाद के मित्र या फासीवाद के शत्रु। फासीवाद का साथ देने में जोखिम रहित अपमान और फासीवाद का मुकाबला करने में जोखिम भरा सम्मान।

समाज - फासीवाद यह सुनिश्चित करता है कि सभी नागरिक, जिसमें बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, समाज सुधारक, पर्यावरणविद वगैरह शामिल हैं, पूरी तरह और बिना शर्त आत्मसमर्पण करें। फासीवाद, किसी भी असहमति या मतभेद का गला घोंटने में सक्षम होता है। अपील, दलील और विनती का फासीवाद पर कोई असर नहीं पड़ता। नागरिक समाज के पास सिर्फ दो विकल्प बचते हैं। यातो फासीवाद का गुणगान करें और उचित इनाम पाएं या विरोध करें और लंबे समय के लिए काल कोठरियों में चले जाएं। लोग दोनों ही रास्तों पर चल रहे हैं। फासीवाद में बुद्धिजीवी को बुद्धिहीन बनाने की क्षमता है।

सार्वजनिक क्षेत्र - न्यूनतम मजदूरी और अधिकतम मुनाफे का विरोधाभास अपने चरम पर पहुँच चुका है और पूंजीवाद अपनी रोज़गार उत्पन्न करने की क्षमता खो चुका है। तंत्र इसे भली भांति जानता है लेकिन कबूल नहीं कर सकता, वरना लोग पूंजीवाद के विकल्प खोजना शुरू कर देंगे। सार्वजनिक क्षेत्र को समाप्त करके, पूंजीपति वर्ग के लिए न्यूनतम मजदूरी और अधिकतम मुनाफे के नए रास्ते खोले जा रहे हैं। फासीवाद, रोज़गार घटने जैसे मुद्दों पर वक़्त जाया नहीं करता।

शिक्षा - पेपर लीक, परीक्षा रद्द और तनाव के कारण, कई छात्रों द्वारा आत्महत्या। इसके विरोध में, छात्रों और युवाओं ने संसद चलो का आव्हान किया और जवाबदेही की मांग की। फासीवाद ने सुधार करने के बजाय सीधे दमन का सहारा लिया। अब, युवाओं ने “स्कूल ठीक करो” मुहिम शुरू की है। युवाओं की टोलियाँ स्कूलों का दौरा कर रही हैं। तस्वीरों और वीडियो के ज़रिए कड़वी सच्चाई सामने आ रही है। स्कूलों में बिल्डिंग, छत, टीचर और आने-जाने के सही रास्ते नहीं हैं। मिड-डे भोजन खाने लायक नहीं है। दिक्कतों को ठीक करने के बजाय, फासीवाद ने बाहरी लोगों के प्रवेश और फोटो लेने व वीडियो बनाने पर रोक लगा दी। इसके अलावा, गुंडे आने वाली टीमों पर हमला कर रहे हैं और पुलिस तमाशा देख रही है।

न्यायविद - फासीवाद, किसी भी तरह के सवाल या असहमति की आवाज़ पर बेचैन हो जाता है। जजों ने छात्रों और युवाओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणी कीं। छात्रों ने ऐसे जजों से डिग्री प्रमाणपत्र लेने से मना कर दिया। फासीवाद ने ऐसे छात्रों को वकील के तौर पर पंजीकृत न करने का फतवा जारी कर दिया, ताकि उनके रोजी-रोटी कमाने के रास्ते बंद हो जाएं और दुबारा विरोध करने की जुर्रत ना कर सकें। लोगों के गुस्से ने फासीवाद को पीछे हटने पर मजबूर किया।

सूचना प्रवाह - फासीवाद, बेरोज़गारी, महंगाई और अव्यवस्था के खिलाफ़ लोगों में व्याप्त भयंकर रोष से अनजान नहीं है। इसीलिए फासीवाद ने सूचना प्रवाह रोकने का निर्णय लिया है। मुख्य धारा के मीडिया पर पूरा अंकुश लगा दिया गया है। गोदी मीडिया आज दोहरी भूमिका निभा रहा है। एक तरफ, अर्थव्यवस्था, बेरोज़गारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटाले और स्कूल, अस्पताल, पुल, हाईवे वगैरह की खराब हालत को जनता से छिपा रहा है। दूसरी तरफ, फर्जी बहसें कराकर, फर्जी खबरें और फर्जी वीडियो चलाकर फासीवाद का गुणगान कर रहा है।

सोशल मीडिया - फासीवाद ने विज्ञापनों का लालच देकर और छापों का डर दिखाकर, मुख्य धारा के मीडिया को अपने पंजों में जकड़ लिया है तथा बोलने वाली आवाजों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। फासीवाद को फिलहाल सोशल मीडिया से दिक्कत हो रही है क्योंकि उसके जरिए सच बाहर आ रहा है। फासीवाद ने इलाज स्वरूप बड़े पैमाने पर अपने सोशल मीडिया पोर्टल खोल दिए हैं जिनपर फर्जी खबरें चलाई जा रही हैं और फासीवाद का गुणगान किया जा रहा है। साथ साथ, आलोचनात्मक सामग्री सोशल मीडिया से हटाने के लिए निरंतर आदेश जारी किए जा रहे हैं। स्थाई समाधान के लिए, फासीवाद, सोशल मीडिया का गला घोंटने की मंशा से एक सख्त कानून बनाने की फ़िराक़ में है।

सोच का संचालन - फासीवाद ने फर्जी खबर निर्माण के लिए एक कारखाना खोला है, जिसमें हजारों अंधभक्त चौबीस घंटे काम कर रहे हैं। लाखों लोगों को सुबह-सुबह फर्जी खबरों की एक खेप परोसी जाती है जिसे करोड़ों लोगों तक फैलाना होता है। वो करोड़ों लोग उन फर्जी खबरों से लैस होकर घर से निकलते हैं और पूरा दिन चौक चौराहे पर, पार्कों में और शाम को अपनी सोसाइटी के फव्वारे पर बेतुकी चर्चा करते हैं। रात होते होते, ये फर्जी खबरें अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत, अवैज्ञानिक सोच और बेहूदा विचार रूपी पक्का माल तैयार कर देती हैं। अगले दिन से ज़हरीले दिमाग वाले लंपटों की भावनाएं आहत होने लगती हैं और वे मस्जिदों के सामने नाचने-गाने लगते हैं और गिरजाघरों में तोड़फोड़ करने लगते हैं। फासीवाद खुश होता है।

प्रतिक्रिया - जन विरोध को झेलना, फासीवाद की नियति है। पहली चोट किसानों ने पहुंचाई जब कृषि कानून रद्द किए गए, हालांकि उसकी बड़ी कीमत चुकाई गई। दूसरी चोट मज़दूरों ने पहुंचाई जब एक दशक बाद न्यूनतम मजदूरी बढ़ी। तीसरी चोट युवाओं ने पहुंचाई जब मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। अब, प्राइमरी छात्र भी स्कूलों में कमरे, अध्यापक, पीने का पानी, बाथरूम और आने-जाने के रास्ते सुधारने की मांग करके फासीवाद को एक तरह से चिढ़ा रहे हैं।

फासीवाद के सभी पीड़ितों के एक होने का समय आ गया है। एक-एक करके फासीवाद का सामना नहीं किया जा सकता। सभी पीड़ितों को आगे बढ़ना होगा। याद रहे – फासीवाद को सुधारा नहीं जा सकता; सिर्फ़ हराया जा सकता है। इतिहास सदियों पहले यह साबित कर चुका है और शायद बार-बार साबित करेगा।

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