इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में चुनाव आयोग के कामकाज संबंधी खुलासे पूरे देश को पहले से ही मालूम इस बात की पुष्टि ही करते हैं कि बीजेपी की फासीवादी सरकार ने पूंजीवादी जनतंत्र को पूरी तरह से खोखला कर चुनाव आयोग सहित इसकी सभी संस्थाओं को अपने अधीन कर लिया है और चुनाव आयोग पूरी तरह से चुनावों को बीजेपी के स्वार्थ में प्रबंध करने का औजार बन गया है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पहले फैसले और कल का फैसला भी एक बार फिर से जाहिर करते हैं कि वहां से भी ‘जनतंत्र की रक्षा’ का हर विचार बस ख़ामख्याली है। दरअसल पूंजीवादी जनतंत्र के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत नागरिकों के वोट देने के बुनियादी अधिकार को ही प्रभावी रूप से समाप्त किया जा चुका है। ऐसे में चुनाव आयोग के मुताबिक किसने कोई चुनाव जीता, इसकी वैधता भी पूरी तरह संदिग्ध बन चुकी है।
सही परिप्रेक्ष्य में देखें तो पहले भी चुनाव पूंजीपतियों की धनशक्ति, सांप्रदायिक-जातिगत प्रतिगामी सामाजिक वर्चस्व व संगठित अपराध की शक्ति से ही लड़े व जीते जाते रहे हैं। मेहनतकशों-उत्पीड़ितों के लिए तो इनमें अपने प्रतिनिधि चुनवा पाने के लिए कभी भी कोई निष्पक्ष अवसर जैसा कुछ नहीं था। किंतु इतना सच है कि शासक वर्ग की विभिन्न पार्टियों के बीच चुनाव में जीतकर सत्ता चलाने का मौक़ा पाने की होड़ का एक अखाड़ा जरूर उपलब्ध था। इस होड़ के बीच में मेहनतकश-उत्पीड़ित जनता को भी अपना पक्ष रखने का एक सीमित अवसर प्राप्त हो जाता था, इससे अधिक कतई नहीं।
अब पूंजीवाद द्वारा पैदा घोर आर्थिक संकट से यह हुआ है कि बड़े इजारेदार पूंजीपतियों ने विभिन्न पूंजीवादी दलों के बीच होड़ के इस मैदान में भी अपनी पूंजी की शक्ति के साथ ही चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट तथा नौकरशाही की मदद से रही सही तटस्थता को भी समाप्त कर दिया है। इस प्रकार उन्होंने केंद्र-राज्यों की सत्ता को अपने मुनाफों के नजरिये से पसंदीदा पार्टी बीजेपी के लिए लगभग पूरी तरह आरक्षित कर दिया है। पूंजी की इस नग्न तानाशाही का सर्वाधिक खामियाजा मजदूरों-मेहनतकशों तथा उत्पीड़ित समुदायों की जनता को उठाना पड़ रहा है और समाज में हर प्रकार का आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक शोषण-उत्पीड़न बढ़ता ही जा रहा है।
यह समझना भी आवश्यक है कि बीजेपी विरोधी विभिन्न विपक्षी दल सत्ता की होड़ में बराबरी का मौक़ा तो जरूर चाहते हैं किंतु उनके हित भी एक ओर बड़ी पूंजी तो दूसरी ओर प्रतिगामी सामाजिक वर्चस्व की ताकतों से जुड़े हैं और वे भी मजदूर वर्ग, मेहनतकश तथा उत्पीड़ित जनता के बड़ी तादाद में इस नग्न तानाशाही के खिलाफ मैदान में उतर आने से भय खाते हैं। अतः वे भी मीडियाई बयानबाजी और कोर्ट आदि में मुकदमों से आगे बढ़कर किसी वास्तविक जनसंघर्ष का आह्वान करने में रुचि नहीं रखते।
इस गंभीर घड़ी में मजदूर वर्ग, सभी मेहनतकशों एवं उत्पीड़ितों की राजनीतिक शक्तियों को ही एकजुट होकर न सिर्फ़ मौजूदा जनवादी अधिकारों को सुरक्षित करने बल्कि इनके विस्तार द्वारा एक शोषण-उत्पीड़न तथा सभी विशेषाधिकारों मुक्त वास्तविक जनतांत्रिक समाज के निर्माण के लिए संघर्ष की राह गढ़नी होगी। यही एकमात्र विकल्प है।
24 सितंबर 2026
