फासीवादी भाजपा द्वारा देश में उभरते छात्र-युवा आंदोलन को भटकाने के लिए आरक्षण का मुद्दा उठाने की घृणित राजनीति

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फासीवादी भाजपा द्वारा देश में उभरते छात्र-युवा आंदोलन को भटकाने के लिए आरक्षण का मुद्दा उठाने की घृणित राजनीति पर ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ का बयान

शोषण, गैरबराबरी, जाति उत्पीड़न, पितृसत्ता, सांप्रदायिक वैमनस्य समस्या हैं, आरक्षण नहीं, इन्हें मिटाने व सभी के लिए समान मानवीय जीवन की व्यवस्था के लिए एकजुट संघर्ष करें

आज मजदूर मेहनतकश किसान छात्र नौजवान गरीब निम्न मध्य वर्गीय सभी लोग जिंदगी में बढ़ती असह्य तकलीफों के समाधान के लिए आवाज उठाने के अपने जनवादी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए आंदोलनों के रास्ते पर उतर रहे हैं। इससे समाज के इन सभी शोषित वंचित उत्पीड़ित लोगों में जाति धर्म समुदाय क्षेत्र भाषा के परे एक व्यापक एकता व एकजुटता भी तैयार हो रही है। इसीलिए एक बार फिर हमारे समाज में वर्चस्वकारी तबके का प्रभुत्व बचाने के लिए नफरती शक्तियां शासक बीजेपी के संरक्षण में ‘आरक्षण हटाओ’ का घातक नारा उछाल रही हैं।

लेकिन दरअसल आरक्षण सामाजिक समस्या है ही नहीं। वास्तविक समस्या है समाज का सामाजिक आर्थिक श्रेणियों में विभाजन जिससे एक छोटी संख्या समस्त सामाजिक संपदा की मालिक बनकर बहुसंख्या का शोषण उत्पीड़न कर रही है और सत्ता के सभी अंगों पर अपने प्रभुत्व तथा अपनी धन शक्ति से मीडिया, धर्म, शिक्षा आदि सभी वैचारिक प्रचार माध्यमों पर अपने वर्चस्व का प्रयोग कर समाज में हर किस्म की नफरत तथा वैमनस्य भी फैला रही है ताकि उसकी सत्ता व वर्चस्व को कोई खतरा नहीं हो।

साथियों, इस अल्पसंख्यक मालिक तबके के शोषण की वजह से ही समाज में अशिक्षा व कुशिक्षा है, भयंकर बेरोजगारी व महंगाई है, इलाज की व्यवस्था नहीं है, आवास, सफाई, यातायात सभी में भयावह दुर्व्यवस्था तथा भेदभाव है‌। इसमें भी समाज के जो हिस्से जाति के आधार पर हजारों साल वंचित रखे गए उनके उत्थान हेतु आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। किंतु सामाजिक व्यवस्था के मूलतः शोषण व भेदभाव आधारित होने से इसका लाभ भी मुश्किल से इनके 2 से 5% हिस्से को ही हुआ, अधिकांश आज भी गरीबी व कंगाली का जीवन बिताने को मजबूर हैं।

सच्चाई तो यह है कि आज समाज में शिक्षा, रोजगार, इलाज, आवास, यातायात, खेल, मनोरंजन हर क्षेत्र में पैसे के बल पर अमीरों का आरक्षण है - निजी महंगी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, निजी अस्पतालों, आवासीय भूमि तथा सभी सार्वजनिक संपत्ति तथा संस्थानों के निजीकरण ने हर चीज को चंद पूंजीपतियों अमीरों के लिए आरक्षित कर दिया है। जैसे नीट में शून्य अंक लाकर भी एक करोड़ रुपए खर्च करने वाला डॉक्टर बन जाता है, ऐसे ही हर जगह धनपतियों का आरक्षण है। पूंजीपतियों अमीरों अभिजात्यों का यह लगभग 100% आरक्षण ही असल में सबसे बड़ी सामाजिक समस्या है। यह आरक्षण समाप्त हो सभी के लिए बगैर भेदभाव सर्वसुलभ समान सार्वजनिक व्यवस्था हो तो ऐतिहासिक रूप से वंचितों का आरक्षण कोई मुद्दा या समस्या रहेगा ही नहीं, उसके खिलाफ कोई आवाज उठाना असल में अमीरों के आरक्षण को बचाने की साज़िश है।

आज सभी शोषितों मेहनतकशों वंचितों उत्पीड़ितों को एकजुट हो वंचितों गरीबों के खिलाफ नहीं, बल्कि अमीरों के इस आरक्षण के खिलाफ संघर्ष के मैदान में उतरना जरूरी है, जिसके लिए निम्न तथा ऐसी ही अन्य मांगों को उठा उन पर व्यापक एकता कायम करें।

1. सभी निजी शिक्षा व चिकित्सा संस्थानों का राष्ट्रीयकरण तथा सभी के लिए समान सर्वसुलभ सार्वजनिक शिक्षा व चिकित्सा की व्यवस्था

2. स्कूल कॉलेज की परीक्षाओं को ठीक ढंग से करा, आगे के दाखिलों में इनके अंकों को आधार बनाकर नीट, सीयूईटी, जेईई, आदि सभी प्रतियोगी परीक्षाओं तथा कोचिंग कारोबार का खात्मा

3. सारी आवासीय भूमि का राष्ट्रीयकरण तथा सार्वजनिक आवासों की व्यवस्था

4. सभी के लिए रोजगार गारंटी, मजदूरों के लिए अधिकतम 8 घंटे काम और न्यूनतम 30 हजार रूपए मासिक वेतन

5. जाति उत्पीड़न तथा यौन हिंसा के अपराधों पर फौरी सख्त सजा

साथियों, आइए शोषण व सभी प्रकार का भेदभाव मिटाकर बराबरी व इंसानी भाईचारा आधारित समाज बनाने के लिए एकजुट हों तथा इसके रास्ते में अड़चन सभी नफरती ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दें।

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