विधानसभा चुनाव निपटते ही प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार जनता को देश के लिए बचत करने, डीजल-पेट्रोल कम खर्चने, सोना न खरीदने, विदेश यात्राएं कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने, आदि की सलाहें देनी शुरू कर दीं। पश्चिम एशिया युद्ध का जिक्र कर मोदी ने लोगों को कहा कि जैसे कोरोना के संकट का सामना किया था, वैसे ही मौजूदा संकट से भी निकल जाएंगे! इसके बाद तमाम केंद्रीय मंत्रियों ने अपील को दोहराते हुए लोगों से न घबराने की अपील की, और बीजेपी नेताओं-मंत्रियों द्वारा पूरे देश में बचत करते दिखने वाले बड़े-बड़े खर्चीले स्वांग भी आयोजित किए गए हैं। किंतु नोटबंदी, लॉकडाउन, आदि में जनता की तकलीफों पर इस सरकार के क्रूर रवैये के पुराने तजुर्बे से साफ जाहिर है कि संकट वास्तविक है और आम जनता की चिंता और घबराहट स्वाभाविक।
कॉर्पोरेट मीडिया में बैठे संघी-भाजपाई प्रचारक इसकी वजह पश्चिम एशिया में युद्ध को बता रहे हैं। याद रहे, फरवरी में जब इसी प्रधानमंत्री ने हत्यारे नेतन्याहू से गलबहियां कर इजराइल को अपना ‘फादरलैंड’ बनाकर आख़िर तक साथ देने का भरोसा दिलाते हुए युध्द के दुस्साहस को प्रोत्साहित किया था, तब यही मीडिया प्रचारक इसे मोदी का मास्टरस्ट्रोक और देश को मजबूत करना बता रहे थे। अब इन्हें ठीक उसी साम्राज्यवादी युद्ध का दुष्प्रभाव नजर आ रहा है और उसके सहारे ये मोदी सरकार और पूंजीपतियों द्वारा ‘आपदा में अवसर’ वाली लूट की सफाई दे रहे हैं।
संकट पर मोदी की चिंता एवं कई देशों की विदेश यात्रा पश्चात साढ़े चार घंटे मंत्रिपरिषद में आर्थिक संकट की स्थिति पर ‘मंथन’ से एक भी ऐसा झूठा, दिखावे का भी जनता को तकलीफ से राहत देने वाला फैसला नहीं निकला जिसका सार्वजनिक ऐलान किया जा सकता। साफ है कि देशी विदेशी पूंजी के हित में आपदा को अवसर में बदलने की, 'कारोबारी सुगमता' बढ़ाने की तैयारी है जो शुरू में गुप-चुप ही रखी जाती है। उधर अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत का सफर आरंभ करने के पहले ही बोल दिया था कि उनका इरादा भारत को अधिकतम अमरीकी व अमरीका नियंत्रित ऊर्जा बेचना है। उन्होंने ही साथ में यह भी सूचना दी कि वेनेजुएला की नवीन राष्ट्रपति भारत आ रही हैं ताकि भारत वहां से अधिक तेल-गैस ख़रीदने का सौदा करे। मोदी सरकार ने रूबियो को निराश भी नहीं किया और अमरीका से अगले सालों में 500 अरब डॉलर की खरीदारी का वचन दे दिया।
असल संकट क्या है?
वर्तमान में जारी आर्थिक संकट को हम संक्षेप में निम्न मौजूद व उभरते लक्षणों के जरिए समझ सकते हैं - पश्चिम एशिया में युद्ध की तात्कालिक वजह से कई जरूरी वस्तुओं के परिवहन में रुकावट से आयात में अड़चन तथा कीमतों में भारी वृद्धि; औद्योगिक एवं कृषि उत्पादन पर इसका नकारात्मक प्रभाव; भारत का पहले से ही बड़ा व्यापार घाटा, तिस पर पेट्रोलियम, गैस व अन्य आयातों की कीमतों में भारी वृद्धि; अन्य पूंजीवादी देशों में आर्थिक संकट की वजह से भारत से श्रमशक्ति के प्रत्यक्ष तथा आउटसोर्सिंग द्वारा अप्रत्यक्ष निर्यात और इससे मिलने वाले विदेशी मुद्रा में कमी; विदेशी पूंजी निवेश का घटना; देशी-विदेशी पूंजी का देश से बाहर जाना; सोने-चांदी के आयात में भारी वृद्धि; अंतर्राष्ट्रीय खाते में भुगतान असंतुलन का खतरा; रुपये के विनिमय मूल्य में गिरावट; रिजर्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी; आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तीव्र महंगाई तथा मुनाफाखोरी-जमाखोरी-चोरबाजारी; जीवन की लागत में भारी बढ़ोत्तरी के बावजूद न्यूनतम मजदूरी न बढ़ने से मजदूरों की जिंदगी में बढ़ती तकलीफ़ और उनका संघर्ष में उतरना तथा उन पर सख़्त राजकीय दमन; विदेश नीति पर इसका प्रभाव - ‘स्वायत्तता’ की भारतीय पूंजीवादी चाहत व स्थापित नीति के बावजूद विदेशी पूंजी को अधिकाधिक रियायत देने की मजबूरी तथा अमरीकी साम्राजयवादी खेमे में जाने की बढ़ती अनिवार्यता; आदि। इसे समझने हेतु हमें इन सबके विस्तार में जाने के बजाय इसके अहम पहलुओं के तात्कालिक व बुनियादी कारणों पर नजर डालनी होगी।
दरअसल इस संकट की बुनियादी वजह सिर्फ़ पश्चिम एशिया का हालिया युद्ध ही नहीं है। इसके पीछे पूंजीवादी आर्थिक प्रणाली में संकट पैदा करने वाले सामान्य नियमों के साथ ही भारत के लुटेरे, परजीवी पूंजीवाद की कुछ ऐतिहासिक चारित्रिक विशिष्टताएं और पूंजीपतियों द्वारा लाई गई नरेंद्र मोदी सरकार की घोर पूंजीपरस्त नीतियां जिन्होंने इन विशिष्टताओं के प्रभाव को कई गुना बढ़ा दिया है वास्तव में अधिक जिम्मेदार हैं।
भारत के स्वतंत्र व क्रांतिकारी पूंजीवादी विकास की संभावनाएं ईस्ट इंडिया कंपनी के आने से बाधित हो गईं। तत्पश्चात भारतीय पूंजी का विकास अधीन अवस्था में तमाम बंदिशों के बीच हुआ। इसमें सामंती जकड़न से मुक्ति के लिए संघर्षरत स्वतंत्र पूंजी के चरित्र में पाए जाने वाली साहसी उद्यमिता का स्वस्थ तत्व तुलनात्मक रूप से कम और तस्करी, दलाली, सूदखोरी, आदि के अस्वस्थ तत्व अधिक थे। इस गुलामी के प्रति जुझारू विद्रोह की चाहत भी इसके लिए मर्णांतक जोखिम थी क्योंकि इसे अपने पीछे-पीछे खड़े हो रहे मजदूर-किसानों के जुझारू संघर्षों का भय भी कंपा रहा था। अतः इसने कभी भी औपनिवेशिक-सामंती विशेषाधिकारों एवं मूल्यों के विरुद्ध जनवाद, समानता, स्वतंत्रता एवं हेतु कठोर संघर्ष करने के बजाय हमेशा उनसे समझौते, उन्हें बनाये रखने का रास्ता चुना। इसके लिए आधुनिक सेकुलर मूल्यों व ज्ञान-विज्ञान को प्रोत्साहन देने के बजाय उसने पितृसत्ता, जाति-धर्म के पश्चगामी मूल्यों, पुरातनपंथ, अंधता एवं अतार्किकता को स्थापित किया।
सत्ता पाने पर पूंजीपति वर्ग बॉम्बे प्लान या टाटा-बिड़ला प्लान के तहत राज्य संरक्षित पूंजीवादी विकास के रास्ते बढ़ा। सरकार ने उच्च पूंजी निवेश, सुदीर्घ अवधि एवं कम लाभ दर वाले प्राथमिक क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश का जिम्मा संभाला (तथाकथित नेहरूवी समाजवाद) और इसके लिए व्यापक जनता के शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य बुनियादी आवश्यकताओं पर कल्याणकारी खर्च के बजाय उसे कंगाल, बीमार, अशिक्षित-कुशिक्षित रखते हुए उच्च अप्रत्यक्ष करों तथा कृषि उत्पादों के दामों को औद्योगिक उत्पादों की तुलना में कम रख पूंजी जुटाई। उधर उच्च लाभ दर वाले क्षेत्रों को सरकार द्वारा लाइसेंस सिस्टम द्वारा चुने गए पूंजीपतियों को आबंटित किया गया ताकि वे परस्पर होड़ से बचे रहें, उन्हें सस्ती ब्याज दर पर पूंजी उपलब्ध कराई गई, विदेशी होड़ से बचाने के लिए आयात लाइसेंसिंग लागू की गई और विदेशी सामानों को महंगा रखने के लिए 1949 में 30% अवमूल्यन के वक्त से ही रुपए का अवमूल्यन सभी सरकारों की नीति रहा है। इस प्रकार विकास के निम्न स्तर पर भी भारतीय पूंजीपति एक ओर परस्पर होड़ से बचे रहकर बाजार में ऊंचे मोनोपॉली दाम पा सके तो वहीं भयंकर ग़रीबी द्वारा मजदूरी को अत्यंत निम्न स्तर पर रख सुपर मुनाफे प्राप्त कर सके और अत्यधिक पूंजी संचय करने में कामयाब हो इतने बड़े हुए कि 1980 के दशक में पब्लिक सेक्टर का निजीकरण उनका हित बन गया।
सामान्य मुक्त होड़ वाले पूंजीवादी विकास में सभी पूंजीपति अन्य पूंजियों को पछाड़कर आगे निकलने की होड़ में उत्पादकता व उत्पादन बढ़ाने के लिए हरमुमकिन प्रयास करते हैं ताकि उनके उत्पादित माल का मूल्य कम हो जाए जिसे वे दूसरे पूंजीपति से कुछ कम दाम पर बेच बाजार में प्रभुत्व कायम कर सकें। यही पूंजीवादी उद्यमिता उत्पादक शक्तियों के क्रांतिकारी विकास की बुनियाद है जिसके लिए पूंजीवादी युग में दुनिया ने विज्ञान एवं तकनीक में अभूतपूर्व छलांग लगाई। किंतु सरकारी/सार्वजनिक संरक्षण में होड़ से पूरी तरह सुरक्षित भारतीय पूंजीवाद को इस उद्यमिता एवं उत्पादक शक्तियों में तीव्र विकास की जरूरत नहीं थी। सो भारतीय पूंजीवाद की संविधान सभा ने ही सभी के लिए सार्वजनिक प्राथमिक शिक्षा तक से इंकार कर दिया, सभी के लिए पोषण एवं प्राथमिक स्वास्थ्य की तो बात ही क्या? किंतु शिक्षण, प्रशिक्षण, पोषण एवं बुनियादी स्वास्थ्य के बिना किसी समाज में उत्पादकता का विकास कैसे हो सकता है?
निम्न उत्पादकता के साथ नीची मजदूरी से उच्च लाभ के द्वारा पूंजी संचय की इस नीति का परिणाम निर्यात होड़ में पिछड़ना अनिवार्य था किंतु इससे पेट्रोलियम, गैस, मशीनों-तकनीक, जरूरी खाद्य पदार्थों-खनिजों, सोने-चांदी, आदि का जरूरी आयात तो कम नहीं किया जा सकता था। ध्यान रहे कि पूंजी संचय की तुलना में पूंजी निवेश की दर कम हो, जैसा उपरोक्त विकास नीति से स्पष्ट है, तो इस पूंजी संचय का एक हिस्सा सोने-चांदी आदि बहुमूल्य धातुओं आदि में जमा होता है और इसने भी आयात को लगातार बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। अतः व्यापार घाटा भारतीय पूंजीवाद की विकास नीति का अनिवार्य नतीजा था। इसे पाटने के लिए श्रम शक्ति के निर्यात को प्रोत्साहित कर विदेशी मुद्रा प्राप्त करना जरूरी था - पहले कुशल और बाद में अकुशल श्रमिकों का भी निर्यात इसीलिए जरूरी हो गया।
आरम्भ में आत्मनिर्भरता के नाम पर आयात को नियंत्रित करने हेतु आयात प्रतिस्थापन की नीतियां आजमाईं गईं किंतु पूंजी संचय जैसे-जैसे बढ़ा, पूंजीपतियों के साथ ही एक संपन्न उच्च व मध्य वर्ग की संख्या भी बढ़ी, तैसे ही उसके उच्च एवं ऐश्वर्य वाले उपभोग की आकांक्षा से भी विदेशी वस्तुओं का आयात बढ़ना अनिवार्य हो गया। 1970 के दशक में विदेशी सामानों तथा सोने की तस्करी के बढ़ने में यह सामने आया और अंततः पहले की कुछ हद तक आयात प्रतिस्थापन एवं आत्मनिर्भरता की नीतियों को छोड़कर आयात तथा तद्जनित घाटे के संतुलन हेतु विदेशी पूंजी निवेश को प्रात्साहन देना आवश्यक हो गया।
चालू खाते का घाटा और भुगतान असंतुलन
किंतु इतने से ही चालू खाते का घाटा पूरा नहीं हो सकता था। पारदेशीय विनिमय में असंतुलन की गुंजाइश नहीं होती - लेना एवं देना हमेशा बराबर होता है। अतः देशी पूंजीपतियों के पूंजी संचय की नीति से पैदा चालू खाते के घाटे की भरपाई हेतु विदेशी पूंजी निवेश को आमंत्रित करना आर्थिक नीति का जरूरी अंग बन गया - देशी पूंजीपतियों के आर्थिक हित विदेशी पूंजी को रियायतें देने का आधार बन गए, भारतीय पूंजी का राष्ट्रवाद और साम्राज्यवादी पूंजी के साथ उसके समझौतें, रियायतें और कई बार समर्पण एक ही नीति के दो अभिन्न पहलू बन गए। इन दोनों में कोई बुनियादी विरोध नहीं रहा।
1990 के भुगतान संकट पश्चात, जिसमें रिजर्व बैंक को सोना गिरवी रखना पड़ा था, विदेशी पूंजी निवेश को प्रोत्साहन अत्यंत आवश्यक हो गया। तब तक भारत में एक बड़ा, इजारेदार पूंजीपति वर्ग उभर चुका था। यह वर्ग कुछ हद तक होड़ का सामना करने के लिए तैयार था। इंदिरा गांधी के दौर में ही मोनोपॉली पूंजी पर से पाबंदियां हटाए जाने की शुरुआत हो चुकी थी। इन सबका मिला जुला नतीजा निजीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण की नीति थी। इसमें कुछ हद तक प्राथमिक क्षेत्रों में निजी पूंजी लगी, तकनीक का विकास हुआ और उत्पादकता बढ़ी अर्थात निजी पूंजी में थोड़ी सी उद्यमिता देखी गई।
किंतु 21वीं सदी के पहले दशक में जनवादी क्रांति पश्चात निर्मित एक स्वस्थ, शिक्षित, प्रशिक्षित, सांस्कृतिक रूप से उन्नत कार्यबल के आधार पर चीनी पूंजीवाद ने उत्पादकता में तीव्र वृद्धि की जिसका मुकाबला भारत के अल्पशिक्षित, कुपोषित, सांस्कृतिक रूप से पिछड़े श्रम बल आधारित पूंजीवाद की नीची उत्पादकता द्वारा करना नामुमकिन था। इस स्थिति में भारतीय पूंजीपतियों ने एक बार फिर उद्यमिता के स्थान पर लाभ दर को ऊंचा रखने का आसान विकल्प चुना अर्थात चीन से सस्ती स्थिर पूंजी - मशीनों, कल-पुर्जों, बेस केमिकल्स, इंटरमीडिएट गुड्स का आयात कर अंतिम असेम्बलिंग और पैकेजिंग कर उसे ऊंचे दाम बेचना। अतः लाभ दर को बनाये रखने के लिए चीन, एवं पूर्व एशिया, से आयात पर निर्भरता इतनी अधिक बढ़ गई कि कुछ सालों पहले जो उत्पादन देश में ही होता था वह भी अब आयात किया जा रहा है। अकेले चीन से सालाना आयात ही बढ़कर 120 अरब डॉलर जा पहुंचा है। इसके अतिरिक्त भी पूंजीपति वर्ग के हित में सार्वजनिक यातायात को बर्बाद कर निजी सड़क यातायात को बढ़ावा देकर कल-पुर्जों से लेकर आयातित तेल पर निर्भरता बढ़ाने, इथेनॉल उत्पादन करने वाले पूंजीपतियों को बढ़ावा देकर तिलहन, आदि की खेती को हतोत्साहित करने से खाद्य तेलों के आयात पर बढ़ती निर्भरता, आदि की तमाम ऐसी नीतियां शासक वर्ग ने ली हैं जिनसे व्यापार घाटा बढ़ता चला गया है।
यही वजह है कि खास तौर पर 2011 के बाद से भारतीय पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में जड़ या फिक्स्ड पूंजी निर्माण में निवेश की दर ऐसी गिरी कि आज तक नहीं उठी। अपने ऊंचे मुनाफों से संचित पूंजी को उद्योगों में निवेश करने के बजाय इन पूंजीपतियों ने शेयर बाजार, रियल एस्टेट तथा बहुमूल्य धातुओं में लगाना आरंभ किया। पहले दोनों में भी पिछले वित्तीय वर्ष के आते-आते एक सीमा आ गई तो सोने का आयात तेजी से बढ़ा। गत 10 सालों में सोने का आयात 27 अरब से बढ़कर 72 अरब डॉलर हो गया। मोदी सरकार ने सोने पर आयात शुल्क भी 16% से घटाकर 5-6% कर दिया। सोना पेट्रोलियम के बाद दूसरा सबसे बड़ा आयात बन गया है।
इस बढ़ते व्यापार घाटे को पाटने हेतु भारतीय पूंजीवाद ने श्रम शक्ति के प्रत्यक्ष (कुशल-अकुशल उत्प्रवासी श्रमिक) व अप्रत्यक्ष (सेवाओं का निर्यात जैसे आईटी आउटसोर्सिंग) का सहारा लिया। उत्प्रवासी श्रमिकों द्वारा भेजी गई विदेशी मुद्रा की सालाना रकम 130 अरब डॉलर जा पहुंची। इसीलिए मोदी सरकार विभिन्न देशों से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स में आयात को रियायत देने के बदले भारतीय श्रमिकों के लिए अधिक वीजा की सौदेबाजी करने की कोशिश कर रही है। उधर सेवाएं अब भारत का मुख्य निर्यात हैं, रिलायंस-नायरा द्वारा आयातित क्रूड आयल को रिफ़ाइन कर डीजल-पेट्रोल के भारी निर्यात के बावजूद। गत वर्ष वस्तुओं का निर्यात में 1% की वृद्धि होकर यह 441 अरब डॉलर हुआ तो 8.7% बढ़कर सेवा निर्यात 421 अरब डॉलर। जनवरी 2026 में तो सेवा निर्यात 43.90 अरब डॉलर थे जबकि वस्तु निर्यात मात्र 36.56 अरब डॉलर।
भारतीय वस्तु निर्यात बढ़ती टैरिफ दरों का भी सामना कर रहे हैं। अतः श्रम शक्ति के निर्यात पर निर्भरता स्पष्ट है। किंतु इससे भी चालू या करेंट खाते का घाटा पाटना नामुमकिन है। इसके अतिरिक्त विकसित पूंजीवादी देशों की अर्थव्यवस्थाएं स्वयं संकट में हैं और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। इन देशों में दक्षिणपंथी राजनीति ने अप्रवास विरोध को अपना मुख्य नफ़रती एजेंडा बना लिया है। इससे भारत के उत्प्रवासी श्रमिकों की संख्या बढ़ना मुश्किल होता जा रहा है। उधर आईटी सर्विसेज निर्यात के लिए एआई बड़ा खतरा बन गया है। चुनांचे चालू खाते के घाटे में वृद्धि का खतरा बढ़ता जा रहा है।
रुपए का अवमूल्यन
भारत में शेयर बाजार ने वित्तीय सट्टेबाजी की वजह से जिस अभूतपूर्व अतार्किक ऊंचाई को छुआ उसने भी भुगतान संतुलन के लिए नकारात्मक स्थिति पैदा की क्योंकि इसने विदेशी पूंजी को प्रोत्साहित किया कि वह इन अतार्किक ऊंची कीमतों पर शेयर बेचकर अपने नोशनल लाभ को वास्तविक लाभ में बदल ले। रुपए के तीव्र अवमूल्यन ने डॉलर में इस लाभ के क्षरित होने का जोखिम भी बढ़ गया तो इस पूंजी को देश से बाहर निकालना भी उसके लिए जरूरी हो गया। इससे रुपये का अवमूल्यन और भी तेज हो गया तथा रिजर्व बैंक को स्पॉट व फ्यूचर सौदों में बड़ी तादाद में डॉलर बेचने को विवश होना पड़ा जिससे विदेशी मुद्रा भंडार भी गिरने लगा जिसे संचित रखने हेतु सोना बेचने की भी खबर है। इससे भुगतान संतुलन का भावी खतरा खड़ा हो गया है।
संकट की तात्कालिक स्थिति पर आने से पहले रुपये के अवमूल्यन पर कुछ बात जरूरी है। व्यापार घाटा जनित डॉलर की स्थाई मांग अवमूल्यन को तेज करती है। साथ ही श्रम शक्ति के निर्यातक जैसे आईटी क्षेत्र डॉलर में मजदूरी को कम रखकर भी अधिक रुपए प्राप्त करने के लिए रुपए का अवमूल्यन चाहते हैं। इसके अतिरिक्त भारत की उच्च वास्तविक महंगाई दर (आधिकारिक आंकड़े जो भी बताते रहें) और इसकी तुलना में जमा करने वालों के लिए निम्न ब्याज दर ताकि पूंजीपतियों को सस्ती ऋण पूंजी उपलब्ध हो रुपये के मूल्य को निरंतर गिराती है। किंतु कई जरूरी वस्तुओं के आयात पर निर्भर देश में रुपए का अवमूल्यन महंगाई को और भी अधिक बढ़ाता है। अतः भारतीय पूंजीवाद में उद्यमिता के अभाव ने इसे एक पतनशील (vicious) चक्र में डाल दिया है। इसीलिए हर दल विपक्ष में होते हुए रुपये के अवमूल्यन को राष्ट्रीय गौरव का विषय बनाता है किंतु सत्ता में पहुंचते ही मुद्रा अवमूल्यन को अनिवार्य जरूरत मानता है।
पश्चिम एशिया में युद्ध का तात्कालिक संकट
किंतु अभी अचानक से यह संकट क्यों इतना बड़ा हुआ? क्योंकि ठीक इस स्थिति में पश्चिम एशिया में युद्ध ने पेट्रोलियम, गैस, खाद, आदि तमाम जरूरी वस्तुओं के परिवहन को बाधित कर दामों में तीव्र वृद्धि की है। कई साल से पेट्रोलियम के दाम नीचे थे तो मोदी सरकार ने दाम घटाने के बजाय जनता को खूब लूटा। अंबानी और नायरा जैसी रिफाइनिंग कंपनियों ने सस्ता रूसी तेल खरीद महंगे दामों पर डीजल-पेट्रोल निर्यात कर सुपर प्रॉफिट बनाये। आज जब सरकार तेल संकट की वजह से बचत की बात कर रही है, तब भी इनका डीजल-पेट्रोल निर्यात जारी है। असल में तो अब भी देश में डीजल-पेट्रोल बेचने पर जितना घाटा बताया जा रहा है वह सच नहीं है। अमरीका-यूरोप में महंगे दाम पर निर्यात करने से अधिक दाम पर अधिक लाभ हो सकता है, उसके मुक़ाबले देश में वर्तमान दामों बेचने पर ‘नॉमिनल’ नुकसान है यह, वास्तविक नुकसान नहीं। फिर भी सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम फिर से बार-बार बढ़ा रही है जिससे हर क्षेत्र में महंगाई एवं जीने की लागत बढ़ रही है और अधिकांश मेहनतकश व निम्न आय वर्गीय जनता की जिंदगी तकलीफ़ों में घिरती जा रही है।
बड़े ‘राष्ट्रवादी’ मोदी ने खुद को सत्ता में लाने वाले अदानी अंबानी टाटा आदि सरमायेदारों के हित में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धींगामश्ती के सामने जो बुजदिली दिखाई है उसका भी एक नतीजा है यह। इस वक्त दुनिया भर में महंगे दामों पर सर्वाधिक तेल-गैस निर्यात करने वाले अमरीकी शासन ने मोदी सरकार की विनती पर उसे कुछ महीने सस्ते में उपलब्ध प्रतिबंधित रूसी तेल-गैस खरीदने की ढील दी थी, लेकिन आगे के लिए यह ढील देने से वह कभी मना कर सकता है। खबर है कि रूसी बंदरगाह से चला एक बड़ा गैस टैंकर भारत आते-आते सिंगापुर के पास रुक गया है। चुनांचे अमरीका-वेनेजुएला का महंगा तेल-गैस खरीदना मजबूरी बन सकता है, इसीलिए डेल्सी रोड्रिग्ज यात्रा पर आई है। इससे विदेशी मुद्रा का संकट बड़ा हो जाएगा। भारतीय पूंजीवाद पहले से ही भारी आर्थिक संकट का शिकार है। विदेशी वित्तीय पूंजीपति साल भर पहले से ही अपनी पूंजी बाहर निकाल रहे हैं क्योंकि इस वक्त कई और देशों में उन्हें इससे अधिक लाभ मिलने का मौका है। भारत में उन्हें तुलनात्मक रूप से कम लाभ मिल रहा है तो उन्हें मोदी के साथ गलबहियाँ कर उसे महत्व देने में भी कोई रुचि फ़िलहाल नहीं है क्योंकि पूंजी सिर्फ मुनाफे की यार होती है। सिर्फ़ विदेशी ही क्यों कई देशी पूंजीपति भी अपनी पूंजी को विदेश भेज रहे हैं।
मोदी सत्ता ने मैन्युफ़ैक्यूरिंग निर्यात के बजाय श्रम शक्ति के निर्यात के सहारे अर्थव्यवस्था को 5 से 25 ट्रिलियन डॉलर करने के सपने खूब दिखाए थे। किंतु अब भारत से आउटसोर्स सर्विसेज के निर्यात पर भी जोखिम है और सीधे भारतीय कामगारों के विदेश में निर्यात से उनके द्वारा भेजी जाने वाली बड़ी रकम पर भी खतरा पैदा हो गया है। इसके और शेयर बाजार में विदेशी पूंजी निवेश के जरिए ही भारतीय पूंजीवाद वस्तुओं के व्यापार में घाटे को संतुलित करता रहा है। एक तो पहले ही अब वह नहीं हो पा रहा, उधर अगर सस्ता तेल भी मिलना बंद हो जाए तो तीव्र आर्थिक संकट पैदा हो सकता है। अनुमानतः यह अंतर 65 से 85 अरब डॉलर सालाना का है। इसी वजह से मोदी सरकार को विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए बड़ी रियायतें देना मजबूरी बन गया है जैसे शेयर बाजार व कॉर्पोरेट बांड्स बाजार ही नहीं सर्वोच्च ऋण साख वाले जी-सेक या सरकारी बांड्स तक में भी कैपिटल गेंस टैक्स से पूरी छूट, एवं अन्य कई रियायतें।
इसलिए अब मोदी को बचत याद आई है हालांकि वो खुद और बीजेपी नेता कलकत्ता से गुवाहाटी तक चुनाव के जश्न में सैंकड़ों हवाई जहाज और हजारों सड़क यात्राओं में रत्ती भर बचत नहीं कर रहे हैं। ऊपर से वो किसानों से खाद का इस्तेमाल कम करने को कह रहे हैं जिससे कृषि उपज में कमी हो खाद्य वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं खास तौर पर इसलिए कि इस सरकार के करीबी पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने हेतु पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण की नीति के अंतर्गत सरकार सार्वजनिक खाद्यान्न भंडार से सस्ते दामों पर दसियों लाख टन चावल इथेनॉल उत्पादन हेतु बेच रही है।
विदेश नीति पर आर्थिक संकट का प्रभाव
वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था में इसकी अवस्थिति पर गौर करें तो भारतीय पूंजीवाद की बुनियादी नीति विभिन्न खेमों, पहले साम्राज्यवादी एवं समाजवादी, बाद में परस्पर होड़रत विभिन्न साम्राज्यवादी खेमों के बीच अंतर्विरोधों का इस्तेमाल करते हुए इनसे सौदेबाजी तथा समझौतों द्वारा अपने पूंजी संचय में विस्तार की रही है। यह कभी विदेशी पूंजी को भारतीय बाजार में सीमित करने की कोशिशें करता रहा है तो कभी रियायतें देता, और इसके समक्ष समर्पण तक करता रहा है ताकि बदले में अपनी पूंजी के लिए कुछ रियायतें हासिल कर सके।
किंतु उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर में पूंजी के जैविक संघटन में स्थिर पूंजी के बढ़ते अनुपात से भारतीय पूंजीवाद ने ख़ुद को लाभ की दर के गिरने के संकट से दो-चार पाया। खास तौर पर 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट को टालने के लिए सार्वजनिक बैंकों के कर्ज से किए भारी पूंजी निवेश के बाद आए अति उत्पादन के संकट ने इसकी लाभ दर को घोर संकट में डाल दिया, जिससे भारतीय पूंजीवाद उस घोर वित्तीय संकट में जा फंसा जिसकी वजह से अंततः उसने फासीवाद को सत्ता में लाने का विकल्प चुना।
भारतीय पूंजीपतियों ने लाभ की दर को गिरने से बचाने के लिए सस्ती स्थिर पूंजी के आयात की राह चुनी और मशीनों एवं कच्चे माल के साथ ही उन सस्ती माध्यमिक या इंटरमीडिएट गुड्स (इलेक्ट्रिकल व इलेक्ट्रॉनिक्स पुर्जे तथा बेस केमिकल्स, आदि) का आयात तेजी से बढ़ा जिन्हें फिनिश्ड गुड्स में बदलकर भारत के ऊंचे औसत मूल्य से कुछ नीचे पर बेच मुनाफा बढ़ाना संभव था। चीन एवं पूर्व एशियाई देशों से तेजी से बढ़ते आयात पर उच्च निर्भरता की वजह यही है। दूसरी ओर निर्यात बढ़ाने के लिए यह श्रम शक्ति के प्रत्यक्ष निर्यात और इन श्रमिकों द्वारा भेजे गए विदेशी मुद्रा रेमिटेंसेज एवं आईटी आदि आउटसोर्स सर्विसेज के जरिए तुलनात्मक रूप से कम मजदूरी वाली कुशल श्रम शक्ति के अप्रत्यक्ष निर्यात से प्राप्त विदेशी मुद्रा पर अधिकाधिक निर्भर होता गया है। इस निर्यात का बड़ा हिस्सा अमरीका-पश्चिमी साम्राज्यवाद पर निर्भर है। आयात की अधिकता के अंतर से होने वाले व्यापार घाटे को इसने पूंजी खाते अर्थात वित्तीय बाजारों में विदेशी पूंजी के निवेश के जरिए पूरा करने की नीति अपनाई है। इंटरमीडिएट गुड्स से फिनिश्ड गुड्स बनाने में औद्योगिक पूंजी निवेश की कम जरूरत से संचित पूंजी का तेजी से वित्तीयकरण हुआ है अर्थात संचित पूंजी के सूदखोर परजीवी बनने की प्रक्रिया तेज हुई है। कई पूंजीवादी विश्लेषकों और उदय कोटक जैसे बड़े वित्तीय पूंजीपति ने इस प्रवृत्ति को नोट करते हुए बताया है कि पुराने औद्योगिक पूंजीपति घरानों की नई पीढ़ियां उद्योग चलाने के बजाय ‘फैमिली ऑफिस’ खोलकर संचित धन के वित्तीय निवेश का प्रबंध करने में ही अधिक रुचि रखती हैं। पार्ले से लेकर वीआईपी इंडस्ट्रीज तक कई कॉर्पोरेट घरानों ने अपने मुनाफे में चलते कारोबार इसीलिए वित्तीय पूंजी निवेशकों को बेच दिए क्योंकि उनमें उद्यमिता के प्रति अरुचि है।
जब तक वैश्विक अंतर्विरोध तुलनात्मक रूप से कम तीक्ष्ण थे और वैश्वीकरण वाला उदारवाद पूंजीवाद का मुख्य चरित्र था, तब तक इस नीति ने भारतीय पूंजीवाद की वृद्धि में मदद की। किंतु 2008 के संकट के बाद से ही जैसे जैसे वैश्वीकृत उदारवाद की जगह द्वि- व बहु-पक्षीय व्यापार संधियों की मर्केंटाइलिस्ट नीति के द्वारा ‘राष्ट्रवादी उदारवाद’ ने लेनी शुरू की और पूंजीवाद के असमान विकास के नियम से नए उभरते पूंजीवादी देशों ने स्थापित अमरीकी-पश्चिमी साम्राज्यवाद को चुनौती देनी आरंभ की, दुनिया के बाजारों व संसाधनों के नए साम्राज्यवादी बंटवारे की होड़ जैसे ही तीखी होती गई, वैसे ही भारतीय पूंजीवाद की सौदेबाजी की क्षमता कमजोर हुई है। तीक्ष्ण होते साम्राज्यवादी द्वंद्व एक ओर उसे इन खेमों में से पक्ष चुनने के लिए मजबूर कर रहे हैं, वहीं उसकी आयात-निर्यात की जटिल निर्भरता उसे ऐसा करने से रोकती है। हालिया घटनाक्रम को देखें तो कह सकते हैं कि बड़े पूंजीवादी देशों के बीच भारत एक कमजोर कड़ी के रूप में उभरा है। यही वजह है कि कई सालों से औद्योगिक पूंजी निवेश की दर बेहद नीची रही है और संचित पूंजी का वित्तीय सट्टेबाजी एवं सोने-चांदी खरीदने में इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। विदेशी ही नहीं देशी पूंजी भी भारत से बड़े पैमाने पर पलायन कर रही है। ऑपरेशन सिंदूर एवं पश्चिम एशिया में युद्ध ने भारतीय पूंजीवाद की इस कमजोरी को साफ जाहिर कर दिया है। इसी का असर मोदी सरकार की विदेश नीति में साफ़ नजर आता है क्योंकि उसे भारतीय पूंजीवाद के हितों के लिए साम्राज्यवादी पूंजी को और बड़ी रियायतें देने के लिए विवश होना पड़ रहा है।
मजदूरों की बढ़ती तकलीफों से फूटा आक्रोश
पहले ही खाद्य सामग्री से लेकर सभी जरूरी चीजों के दामों में महंगाई आसमान पर थे। मकान भाड़ा, स्कूली फीस, इलाज, आदि पर महंगाई औसत 10% से भी ऊपर है। तब भी 12-16 घंटे और रविवार तक को काम कर मजदूरों को 9 से 12 हज़ार रू औसत मजदूरी मिल रही है, सैलरी स्लिप तक नहीं दी जाती। 10-15 साल काम करने पर भी पक्की नौकरी नहीं की जाती। काटा गया पीएफ-ईएसआई तक का पैसा सेठ चोरी कर लेते हैं। कैंटीन सुविधा नहीं दी जाती, कहीं मिलती है तो मैनेजरों को मिलने वाले अच्छे खाने के बजाय सड़ा खाना दिया जाता है। मजदूरों के साथ जानवर की तरह व्यवहार किया जाता है। जरूरी सुरक्षा इंतजामों के अभाव में देश में हर साल औसत 48 हज़ार कामगार कार्यस्थल के ‘हादसों’ में जान गंवाते हैं और किसी पूंजीपति को इस हिंसा-अपराध में सजा नहीं होती।
जंग शुरू होते ही मजदूरों-मेहनतकशों, गरीबों के लिए तो एलपीजी के दाम तुरंत आसमान छूने लगे। गरीब मजदूरों के इस्तेमाल वाले 5 किलो के गैस सिलेंडर को 261 रुपए महंगा कर दिया गया। लेकिन सरकारी संरक्षण में मुनाफाखोर पूंजीपति 60 रू किलो वाली कुकिंग गैस के लिए प्रवासी मजदूरों से 400-500 रुपए प्रति किलो तक वसूलने लगे। उन्हें खाना पकाना मुश्किल हो गया। डीजल-पेट्रोल और खाद्य वस्तुओं के दामों में और भी वृद्धि उनके सामने भुखमरी के हालात पैदा कर देगी। दरअसल महंगाई में हर वृद्धि मजदूरों-मेहनतकशों की मजदूरी-वेतन में कटौती होती है। पहले ही मजदूरी एक दशक से बढ़ी नहीं है, जबकि दाम बढ़ते गए हैं। इसीलिए मजदूर न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के लिए हड़तालें कर रहे हैं। लेकिन सरकार इसके पीछे पाकिस्तान का हाथ बता रही है। सरकारों ने मजदूरी में जो मामूली वृद्धि की है वह भी कारखाना मालिक भुगतान नहीं कर रहे हैं, हर ओर से ऐसी खबरें हैं। अब महंगाई और बढ़ी तो मजदूरों-मेहनतकशों, समझें सभी वेतनभोगियों पर आफत का पहाड़ टूट पड़ने वाला है। और इसके लिए एकमात्र जिम्मेदार है देशी-विदेशी पूंजीपतियों की मुनाफाखोरी-जमाखोरी-चोरबाजारी, जिसे बड़े इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा सत्ता में बिठाई गई मोदी सरकार का पूरा संरक्षण हासिल है।
पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ाने के लिए सरकारी तर्क है कि अमरीका में पेट्रोल का भाव 130 डॉलर तथा डीजल का 150 डॉलर प्रति बैरल हो गया है इसलिए भारत में भी तदनुसार बढ़ना चाहिए, हालांकि भारत पेट्रोल डीजल का आयातक नहीं निर्यातक है तो अंतरराष्ट्रीय दामों के बजाय देश में मिलने वाली मजदूरी के आधार पर इसकी लागत को स्टैंडर्ड होना चाहिए। सच्चाई है कि पेट्रोलियम कंपनियों को इस वक्त भी भारी मुनाफा हो रहा है और घाटे की बात फर्जी है। लेकिन अगर हम अमरीकी दामों से जोड़ने का यह सरकारी तर्क मान लें तो भारत में श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी भी अमरीकी स्टैंडर्ड से क्यों नहीं होनी चाहिए? अगर अमरीका ही आदर्श है तो न्यूनतम मजदूरी भी बढ़ाकर उतनी करनी चाहिए। भारत में तो अधिकांश मजदूर 12 घंटे रोजाना काम कर सिर्फ 10-15 हजार रुपए महीना मजदूरी पाते हैं। इन्हें भी अमरीकी स्टैंडर्ड से मजदूरी दो। 99% श्रमिकों की मजदूरी भी तो इससे कम है, उन्हें भी तो घाटा हो रहा है अर्थात मालिक उनका शोषण कर रहे हैं। सरकारी श्रम सम्मेलन, वेतन आयोग, सुप्रीम कोर्ट सभी ने माना है कि परिवार का उपभोग खर्च मजदूरी तय करने का आधार होना चाहिए। अगर उपभोग व्यय अमरीकी दामों पर होना है तो मजदूरी भी उसी मानक पर क्यों नहीं? लेकिन ये मजदूर न्यूनतम मजदूरी बढ़वाने के लिए मांग उठाते हैं तो इन्हें राष्ट्र विरोधी और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया जाता है।
यही वह स्थिति जिसमें पहले से ही परेशान श्रमिकों का लंबे अरसे से कायम धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने न्यूनतम मजदूरी सहित अपने वाजिब हक-हकूक के लिए हड़तालों का रास्ता चुना जो सुखी घास के मैदान में चिंगारी की तरह पूरे दिल्ली एनसीआर क्षेत्र सहित कई राज्यों में दूर दूर तक फ़ैल गईं। हरियाणा सरकार ने 10 साल बाद इस आंदोलन के दबाव में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर 15,220 रू की है। उप्र सरकार ने इसे बढ़ाकर मात्र 13,690 रु किया है। यह जीवन चलाने के लिए पूरी तरह नाकाफ़ी है। सरकार के अपने वेतन आयोगों के बनाये गए न्यूनतम जीवन के आधारों से हिसाब लगायें तो आज 30 हज़ार रू न्यूनतम मजदूरी की मांग पूरी तरह वाजिब है। मजदूरों की मांग में नावाजिब जैसा कुछ भी नहीं है क्योंकि अपने ख़ून पसीने की मेहनत से सब कुछ पैदा करने वाले मजदूरों को इतनी कम मजदूरी देकर ही चंद पूंजीपतियों ने इतने ऊंचे सुपर मुनाफे लूटे हैं कि आज वे पूरे देश की 80% से अधिक संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं। उधर अपने श्रम से सारा उत्पादन करने वाले श्रमिक कंगाली और भुखमरी की स्थिति में पहुंच गए है। श्रमिक आंदोलन की यह लहर भौतिक जीवन के असाध्य कष्टों से उपजी है। आर्थिक संकट की भवंर में फंसा भारतीय पूंजीवाद इन तकलीफ़ों को घटाने के बजाय और अधिक बढ़ाने वाला है। अतः दमन से भी इस लहर को समाप्त नहीं किया जा सकेगा। इसका बार बार अधिक दूर तक एवं और ऊंचा उठना अनिवार्य है।
भावी राजनीतिक संकट और मजदूर वर्ग
पूंजी और श्रम के मध्य तीक्ष्ण होते इस अंतर्विरोध के साथ ही पूंजीवाद का आर्थिक संकट अन्य तमाम मंझले वर्गों जैसे मेहनतकश किसानों, छोटे काम धंधे करने वालों, मध्य वर्ग, छोटे व्यवसायियों, आदि के जीवन में भी संकट पैदा कर रहा है। स्कूली से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, बेरोजगारी, हर ओर असुरक्षा, बढ़ते हिंसक एवं यौन अपराध, चौतरफ़ा भ्रष्टाचार-दुराचार, माध्यमिक वर्गों की संपत्ति पर बेदखली का बढ़ता खतरा, आदि मिलकर सम्पूर्ण समाज में बेचैनी व राजनीतिक हलचल पैदा कर रहे हैं। स्वयं शासक वर्ग के लिए साधारण तरीके से शासन चलाना मुश्किल हो रहा है। चुनावों को जिस तरह मैनेज किया गया है उससे चुनावों द्वारा परिवर्तन का भ्रम टूट रहा है। न्यायपालिका से न्याय की आशा का भ्रमजाल मिट रहा है। मौजूदा व्यवस्था के अंगों-संस्थाओं से उम्मीदें खत्म होने की ओर हैं। जीवन में सुधार की संभावनाएं पूरी तरह से चकनाचूर हो रही हैं।समाज और राजनीति के भविष्य पर बहस जोरों पर है। यह समाज में एक भावी राजनीतिक संकट का संकेत है। बुर्जुआ विपक्षी दल भी आशा नहीं जगा पा रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग नवीन राजनीति चाहते हैं, हालांकि लिबरल बुर्जुआ राजनीति उन्हें इस बार ‘आम आदमी’ भी नहीं, ‘कॉकरोच पार्टी’ ही दे पा रही है! फिर भी यह एक भावी संकट और बदलाव की बढ़ती चाहत का इंगित तो है ही।
सवाल है कि क्या इतिहास का सबसे उन्नत वर्ग, शोषणमुक्ति के संघर्ष का अगुआ, और समाज का भावी शासक वर्ग, सर्वहारा और उसकी राजनीतिक शक्तियां इस संकट में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं, क्या वे मौजूदा समाज में सभी विकृतियों के मूल पूंजीवादी व्यवस्था के आमूल चूल परिवर्तन का एक ऐसा वास्तविक कार्यक्रम पेश करने के लिए पूरी तरह तैयार होंगी जो सभी शोषित-पीड़ित जनता को इस संघर्ष में दिशा एवं नेतृत्व देने में कामयाब होगा? यही आज का यक्ष प्रश्न है।
