द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब सोवियत संघ के नेतृत्व में समाजवादी खेमे और अमेरिका के नेतृत्व में साम्राज्यवादी खेमे के बीच शीत युद्ध अपने चरम पर था, तब सोवियत संघ के अनेक मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारकों का मत था कि दुनिया में उस वक़्त सबसे भीषण और विस्फोटक अंतर्द्वंद्व साम्राज्यवादी और समाजवादी ख़ेमों के बीच है. उनका सोचना था कि इस द्वंद्व की वज़ह से अब साम्राज्यवादी लुटेरों के बीच कभी युद्ध नहीं होगा. युद्ध जब भी होगा साम्राज्यवादी और समाजवादी खेमों के बीच ही होगा. यह विचार स्टालिन तक भी पहुंचा.
स्टालिन ने तुरंत उत्तर दिया; यह सोच ग़लत है. साम्राज्यवादियों के बीच वाला द्वंद्व, साम्राज्यवादी खेमे और समाजवादी खेमे के बीच वाले द्वंद्व से भी ज्यादा तीक्ष्ण है. परिणामस्वरूप उनके बीच युद्ध अवश्यम्भावी है. 1952 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘सोवियत संघ में समाजवाद की आर्थिक समस्याएं’ में उक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए स्टालिन लिखते हैं कि विनाशकारी द्वितीय विश्व युद्ध भी साम्राज्यवादियों के बीच के द्वंद्व का ही परिणाम था, जिसमें साम्राज्यवादियों का एक गिरोह सोवियत संघ की मदद लेने को मज़बूर हुआ, हालांकि मदद लेते वक़्त भी उनके और हमारे बीच वाला द्वंद्व बदस्तूर मौजूद था. अब तो यह सच्चाई इतिहास ने ख़ुद ही रेखांकित कर दी है. आज जब समाजवादी ख़ेमा क्या, दुनिया में कोई भी समाजवादी देश मौजूद नहीं है, तब भी साम्राज्यवादी गिद्ध आपस में लड़ने-भिड़ने को ही नहीं एक दूसरे को कच्चा चबा जाने पर उतारू हैं.
साम्राज्यवादियों के बीच के जानलेवा द्वंद्व को देश की परिसीमा के अंदर रखकर देखा जाए तो समझ आता है चुनाव आयुक्तों के माध्यम से लड़ा जा रहा यह देसी युद्ध भी देश के प्रमुख कॉर्पोरेट लुटेरों अडानी, अंबानी, टाटा, आदि के बीच की, या इनके द्वारा कब्जाए जा रहे कॉर्पोरेट घरानों का टकराव जान पड़ता है. चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी की नियुक्ति इसी मोदी सरकार ने 2004-2005 में की. मोदी सरकार के बारे में एक तथ्य निर्विवाद है, कोई भी नियुक्ति ऐसे व्यक्ति की नहीं हुई जो ईमानदार हो, स्वाभिमानी हो, षडयंत्रों में शामिल होने में आना-कानी करे. सत्ता में मौजूद गिरोह बहुत खांटी अपराधी हैं, वे कच्ची गोलियां नहीं खेलते. अच्छी तरह टटोलकर कि बंदे में रीढ़ नाम की चीज़ नहीं है, उसकी नियुक्ति होती है. इनकी ग्रेजुएशन गुजरात में हो चुकी है.
वैसे भी कैबिनेट सेक्रेटरी वह व्यक्ति होता है जो सत्ता के हर अपराध में प्रत्यक्ष या परोक्ष हिस्सेदार होता है. फ़ासीवादी शासन का एक दिन भी किसी बड़े अपराध के बगैर नहीं गुजरता. उत्तराखंड में तो फ़ासीवाद का यू पी जैसा ही नंगा नाच हुआ है, हो रहा है. संधू साहब के कार्यकाल में ही वहां मुसलमानों की दुकानों पर नाज़ियों की तरह क्रॉस लगाकर ज़ुल्म ढाए गए, तब उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ा!! ‘नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया’ देश में सबसे ज्यादा पैसा उगाही वाला इदारा है. सुखबीर संधू उस ज़िम्मेदारी को भी निभा चुके हैं. विवेक जोशी भी हरियाणा सरकार के बहुत वफ़ादार सेवादार रहे हैं. उनकी तारीफ़ में और कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं!!!
जोशी और संधू को कांग्रेस द्वारा अपना लिया जाना भी, मौजूदा बुर्जुआ संकट को कॉर्पोरेट युद्ध वाले तर्क को पुख्ता बनाता है. यह कॉर्पोरेट पूंजी के बीच की गलाकाट होड़ जनित अंदरूनी कलह है. श्रम के अत्यधिक शोषण से पूंजी के अति संचय ने उत्पादक निवेश की संभावनाओं को बेहद संकुचित कर दिया है और प्रति इकाई पूंजी पर मुनाफा दर का संकट बढ़ रहा है. अतः न सिर्फ श्रमिकों पर शोषण का शिकंजा और अधिक कसा जा रहा है, छोटे मालिकों व मध्य वर्ग की संपत्ति को लूटा जा रहा है बल्कि इस लूट का सबसे बड़ा हिस्सा कब्जाने वास्ते खुद इजारेदार कॉर्पोरेट पूंजीपति एक दूसरे से हिंसक होड़ में जुटे हुए हैं.
इस हक़ीक़त से भी, हालांकि, इस लड़ाई का महत्त्व कम नहीं होता. सत्ताधारी वर्ग के सबसे वर्चस्वकारी कॉर्पोरेट के बीच लूट के बड़े हिस्से को हथियाने की इस लड़ाई को इसके इसी मूल स्वरूप में लिया जाना ज़रूरी है, जिससे सत्ताधारी पार्टी ही नहीं बल्कि सत्ताधारी वर्ग का असली घिनौना चेहरा लोगों के बीच जाए. जन क्रोध की लपटें जो अब तीव्रतर होती जा रही हैं, उसमें ख़ुद को ख़ुदा समझने वाला ज्ञानेश कुमार तो तबाह होने से नहीं बच पाएगा लेकिन इतने से ही यदि यह सुनामी शांत कर ली गई तो भी इससे राहत तो मिलेगी लेकिन वह अस्थाई और तात्कालिक राहत ही साबित होगी. कांग्रेस, सीजेपी, आदि पार्टी इस संघर्ष को उसी दिशा में ले जा रही है. सत्ता की कुर्सी थोड़ी और ज़ोर से हिलते ही, उन्हें उम्मीद है कि भाजपा-संघ को छोड़ जो भी बुर्जुआ रेवड़ सत्ता और विपक्ष में है, उनके पीछे-पीछे चल पड़ने वाली है. भाकपा, माकपा और लिबरेशन भी संसद की चंद सीटों के ही भूखे हैं, वे भी इसे सेक्युलर-कम्युनल की लड़ाई घोषित कर मंत्री पद पाकर धन्य हो जाएँगे.
क्रांतिकारी शक्तियों की ज़िम्मेदारी है कि केंद्र में सरकार-पलट इसकी आखिरी मंज़िल नहीं, बल्कि पहला पड़ाव हो. इस बिंदु पर फोकस करते हुए देश स्तर पर शोषित-पीड़ित समाज की गोलबंदी की जाए. व्यवस्था के मूल आर्थिक संकट - बेरोज़गारी, मंहगाई, अत्यल्प/अपर्याप्त वेतन, छात्रों-युवाओं का अंधकारमय भविष्य, महिलाओं पर बढ़ते ज़ुल्म, जाति नफरत के ज़ुल्मों की भयावहता, अल्पसंख्यकों को लगातार हाशिये पर धकेलते हुए उन्हें प्रतिहिंसा के लिए उकसाना-भड़काना आदि को इस राजनीतिक संकट से जोड़ने का गंभीर प्रयास करने की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी की ओर बढ़ा जाए.
28 सितंबर 2026
