निश्चित ही अब पितृसत्तात्मक समाज अपने मूल रूप में अस्तित्व में नहीं है। अब मुख्य रूप से पूंजीसत्ता ही अस्तित्व में है, और इस पूंजीवादी व्यवस्था में पितृसत्तात्मक समाज के सड़े-गले अवशेष अभी भी बहुतायत में बाक़ी हैं। इस वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में स्त्री-पुरुष सहित अन्य सभी तरह के भेद और संबंध अब धन-संपत्ति, पद और सत्ता पर आधारित हो गए हैं। इसीलिए इस व्यवस्था में व्यक्तियों और समूहों की हैसियत अब संपत्ति, पद और सत्ता के द्वारा तय होने लगी है। इसीलिए अब स्त्री और पुरुष की परिभाषा भी बदलने लगी है। अब जिसके पास धन-संपत्ति, पद और सत्ता है, वही पुरुष है, और जो संपत्ति, सत्ता और पदविहीन है, वही 'स्त्री' है। इस 'स्त्री' के दायरे में ही दलित-शोषित मेहनतकश वर्ग भी आता है। अब लैंगिक रूप से स्त्री या पुरुष होने का बहुत ज़्यादा महत्व और मूल्य नहीं रह गया है। लेकिन इसका यह भी अर्थ नहीं है कि मनुष्य जाति के विकासक्रम के दौरान व्यवस्थागत रूप से उभरे स्त्री-पुरुष के बीच लैंगिक और सामाजिक भेद बिल्कुल मिट गए हैं। निश्चित ही, वे अभी भी मनुष्य के मानस पटल पर सघनता से मौजूद हैं, लेकिन पितृसत्तात्मक समाज के सड़े-गले अवशेषों के रूप में, और इन भेदों का मुख्य आधार अब इस पूंजीवादी व्यवस्था में धनसंपत्ति, पद और सत्ताविहीन होना हो गया लगता है।
प्रत्येक पीड़ित-शोषित स्त्री और पुरुष को व्यवस्था परिवर्तन के लिए मिलकर संघर्ष करना होगा
वर्ग विभक्त पूंजीवादी समाज के मौजूद रहते, स्त्री-पुरुष के ये लैंगिक और सामाजिक भेद रहेंगे ही, इनको पूर्ण रूप से कभी मिटाया नहीं जा सकता, क्योंकि कोई भी अगली व्यवस्था अपनी पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं (दास समाज और सामंती समाज) के उन्हीं अवशेषों को (मूलाधार यानी भौतिक आधार को) नष्ट करके अस्तित्व में आती हैं, जो उसके उदभव और विकास में बाधा पैदा करते हैं। इसीलिए पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं की अधिरचना के बचे-खुचे अवशेषों का इस्तेमाल शोषक वर्ग पीड़ित वर्ग को बांटने और वह स्वयं को स्थापित करने के लिए करता है। इसीलिए इस पूँजीवादी व्यवस्था में पुरुष भी स्त्री से कोई कम पीड़ित और शोषित नहीं है। इसीलिए पितृसत्ता के नाम पर स्त्री, पुरुष से लड़कर कभी भी मुक्त नहीं हो सकती। ऐसा होना असंभव ही नहीं है कि शेष समाज के परतंत्र होते हुए स्त्री अलग से गुलामी की जंजीरों से मुक्त हो जाए। स्त्री हो या पुरुष, दोनों की मुक्ति के द्वार वर्तमान सामंती सोच तथा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के विघटन और समाजवादी व्यवस्था के अंतर्गत आर्थिक जनतंत्र की स्थापना के साथ ही खुलेंगे। इसीलिए प्रत्येक पीड़ित और शोषित स्त्री और पुरुष को व्यवस्था परिवर्तन के लिए मिलकर संघर्ष करना होगा। स्त्री और पुरुष के आपस में टकराने, विरोध करने और संघर्ष करने मात्र से कोई समस्या हल होने वाली नहीं।
परिवारों में भी स्त्री की दुर्दशा का मूल कारण उसका आर्थिक रूप से आसमान होना ही रहा है। परिवारों में स्त्री और पुरुष के बीच संबंधों में आर्थिक असमानता के रूप में आज भी सामंती सोच-पूंजीवादी व्यवस्था कायम है। उसी व्यवस्था से उत्पन्न आर्थिक परतंत्रता ही स्त्री के लैंगिक और फिर सामाजिक उत्पीड़न का एक बड़ा कारण रही है। इसी आर्थिक असमानता के चलते, स्त्री का अस्तित्व पूर्ण रूप से पुरुषों के ऊपर निर्भर होना संभव हुआ। स्त्री की यही परतंत्रता और परनिर्भरता, स्त्री और पुरुष के बीच दास और स्वामी, शोषक और शोषित, नौकर और मालिक जैसे संबंधों को पैदा करती रही है। इसीलिए इन संबंधों में, स्त्री के मनस में कुंठा का पैदा हो जाना स्वाभाविक ही है। यही कुंठा तीव्र होकर, पुरुष के प्रति क्रोध, ईर्ष्या, आक्रोश, संघर्ष और पारिवारिक कलह-क्लेश की परिस्थितियों को पैदा करती रही है। ध्यान रहे, दास और स्वामी, नौकर और मालिक, मजदूर और मालिक के बीच कभी भी शांति, सौहार्द और मित्रवत संबंध पैदा नहीं हो सकते। मित्रवत और सौहार्दपूर्ण संबंध तो समान तल ही पैदा हो सकते हैं। असमान तल पर तो कलह-क्लेश, संघर्ष और शत्रुतापूर्ण संबंध ही पनप सकते हैं।
महिला सशक्तिकरण भजन-कीर्तन से नहीं आर्थिक असमानता को मिटाकर ही संभव होगा
भजन-कीर्तन, बुजुर्गों द्वारा समझाने-बुझाने, कथा-कहानियों, धार्मिक उपदेशों, धार्मिक शिक्षाओं, ध्यान-समाधि और शास्त्रोक्त प्रवचनों के माध्यम से स्त्री और पुरुष के बीच सदियों से चले आ रहे इन दुश्मनीपूर्ण अंतर्विरोधों को कदापि हल नहीं किया जा सकता, क्योंकि स्त्री और पुरुष के बीच मौजूद तमाम तरह के कलह-क्लेश और आपसी संघर्ष कोई किसी धर्म विशेष के मार्ग पर चलने या न चलने का परिणाम नहीं है। उनका आधार मूलतः उनके बीच सदियों से चली आ रही भौतिक असमानता ही रहा है। स्त्री-पुरुष के बीच तमाम तरह के कलह क्लेशों का आधार व्यवस्थागत ही है और व्यवस्थागत स्तर पर ही उनका निपटारा स्वभाव है। निश्चित ही, और भी कारण रहे हो सकते हैं, लेकिन वे दोयम रहे हैं। प्राथमिक और मूल कारण तो व्यवस्थागत भौतिक असमानता ही रहा है। इसीलिए स्त्री और पुरुष के बीच सुख, शांति, सौहार्द और मित्रवत संबंधों के लिए उनके बीच सबसे पहले भौतिक तल पर साम्य का स्थापित होना निहायत ही ज़रूरी होगा, इससे इतर अन्य कोई भी टोना-टोटका काम आने वाला नहीं।
समाज और परिवार में स्त्री और पुरुष के बीच साम्य अर्थात साम्यवाद की शुरुआत आर्थिक जनतंत्र की स्थापना के बाद ही संभव हो सकती है। इसीलिए क्षय न स्त्री का होना चाहिए और न ही पुरुष का, क्योंकि पुरुष के बगैर न स्त्री कभी पूर्ण हो सकती है, और न स्त्री के बगैर पुरुष ही कभी पूर्ण हो सकता है। दोनों ही समाज के अति आवश्यक और अति महत्वपूर्ण घटक हैं, और इन दोनों के बीच मौजूद असमानताओं के कारण ही पारिवारिक और सामाजिक असंतुलन पैदा होता रहा है, और यही असंतुलन स्त्री और पुरुष के बीच मौजूद तमाम फसादों की जड़ रहा है। यह सही है, कि स्त्री और पुरुष के बीच जो लैंगिक भेद है, वह पुरुषों ने नहीं बनाया। यह भेद प्राकृतिक है। यह प्राकृतिक का भेद एक अस्तित्वगत सच्चाई है, और यह नैसर्गिक भेद होना ही चाहिए, क्योंकि स्त्री और पुरुष के बीच यही लैंगिक भेद जितना सघन होगा, उतना ही यह भेद दोनों को आकर्षित करने और निरंतर जोड़े रखने का सूत्र और आधार भी बना रहेगा। क्षय होना चाहिए स्त्री-पुरुष के बीच, मनुष्य और मनुष्य के बीच और समूहों के बीच तमाम तरह के आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक और सामाजिक भेद पैदा करने वाली सामंती सोच-पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था और उसकी विचारधारा का, तभी स्त्री और पुरुष के बीच सुख, शांति, मैत्री और सौहार्द का वातावरण पैदा होने की संभावनाओं के द्वार खुल सकेंगे।
