‘विश्वगुरु’ भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की हक़ीक़त
15 मई से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की क़ीमतें 4 बार बढ़ चुकी हैं. व्यवसायिक गैस की क़ीमतें तो 1 मई के बाद रु 95.50 (लगभग 27%) बढ़ चुकी हैं. यह मूल्य वृद्धि बेतहाशा बढ़ती मंहगाई और देश में तेज़ी से पसरती जा रही कंगाली को निश्चित रूप से तीव्र और भयावह बनाएगी. पहले ही देश के 80 करोड़ से ज्यादा लोग किसी तरह मुफ्त सरकारी राशन के सहारे जिंदा हैं. यूपीए सरकार के वक़्त आयातित कच्चे तेल की क़ीमतें बहुत अधिक $140 प्रति बैरल से भी ज्यादा हो गई थीं. लोगों पर कच्चे तेल की क़ीमतों के अनुरूप अत्याधिक, असहनीय दाम पर तेल और गैस ख़रीदने का बोझ ना पड़े पड़ें और तेल कंपनियों जैसे हिंदुस्तान पेट्रोलियम, इंडियन आयल को भी नुकसान ना हो, इसलिए इन तेल कंपनियों के नाम, मनमोहन सरकार ने ‘आयल बांड’ ज़ारी किए थे जिनका भुगतान सरकार को 15 से 20 साल की दीर्घ अवधि में करना था. उस पर बनने वाले ब्याज का भुगतान हर वर्ष कर दिया जाता था.
यूपीए सरकार द्वारा ज़ारी कुल ‘आयल बांड’ की रक़म 3.23 लाख करोड़ है, जबकि मोदी सरकार ने आम मेहनतक़श अवाम पर तरह-तरह के टैक्स और सेस लगाकर, तेल आयात कर तथा डीज़ल, पेट्रोल पर बेतहाशा टैक्स लगाकर कुल 43 लाख करोड़ से भी ज्यादा रक़म वसूल ली है. सारे आयल बांड का भुगतान होने के बाद भी जब सरकार के पास इतनी भारी रक़म मौजूद है और तेल कंपनियों की बैलेंस शीट के अनुसार, ये कंपनियां ख़ूब मुनाफ़ा कूट रही हैं तब कच्चे तेल की कीमतों में हुई हर वृद्धि का बोझ तुरंत उन लोगों पर क्यों डाला जा रहा है, जिनकी कमर अभूतपूर्व मंहगाई ने पहले से ही तोड़ रखी है?
रूस से सस्ते तेल आयात का लाभ अंबानी को क्यों दिया गया? डीज़ल, पेट्रोल की क़ीमतें कम कर मंहगाई घटाने में क्यों नहीं हुआ?
मोदी सरकार को अगर मंहगाई कम करने की थोड़ी भी इच्छा होती, तो डीज़ल, पेट्रोल आज आधे दामों पर बिक रहे होते. रूस-युक्रेन युद्ध के परिणामस्वरूप रूस ने, अपना तेल बहुत सस्ते दाम में बेचा. उस सस्ते तेल के, दुनिया के सबसे बड़े ख़रीदार इंडिया और चीन रहे. हर रोज़, 163 मिलियन बेरल रुसी क्रूड आयल, इंडिया ने ख़रीदा, लेकिन इसका 46% भाग, मुकेश अंबानी की कंपनी ‘रिलायंस पेट्रोलियम’, रुसी कंपनी ‘रोज़नेफ्ट’ तथा रहस्यात्मक रूप से ‘अज्ञात’ मालिकाने वाली, वाडीनार, गुजरात स्थित कंपनी, ‘नायारा’ को खरीदने दिया. वायर की रिपोर्ट के अनुसार रूस ने, इस तेल की ख़रीद पर, प्रति बेरल, $15-20 की छूट दी थी. इसका मतलब हुआ, कि प्रति बेरल छूट का औसत $17.5 भी लिया जाए, तो तेल की ख़रीद पर, हर रोज़ 285.25 करोड़ डॉलर, अर्थात 23,670 करोड़ रुपये छूट मिली. इसका 46%, मतलब अंबानी और नायरा कंपनी के ‘अज्ञात’ मालिकों तथा रुसी ठगों ने, हर रोज़, 10,888 करोड़ रुपये, तथा सरकारी कंपनियों ने 54% मतलब, 12,782 करोड़ रुपये, तो सिर्फ़ रुसी क्रूड आयल पर के आयात पर मिले डिस्काउंट से कमाए. इन्हीं ठग कॉर्पोरेट ने इस तेल का शुद्धिकरण कर, उसे यूरोप को निर्यात किया. इसी का नतीज़ा था कि इंडिया से यूरोप को होने वाले हवाई जहाज़ के तेल और डीज़ल का निर्यात 570% बढ़ गया, मतलब 5.7 गुना हो गया था. यूरोप को हुए इस निर्यात से भी आयात जितना पैसा, रिलायंस पेट्रोलियम और नायारा ने कमाया.
कुछ दिन तक अख़बारों में ये ज़रूर आया कि सस्ते रुसी तेल के आयात-निर्यात से कुछ कंपनियां, ‘छप्पर-फाड़ मुनाफ़ा’ (windfall profit) कूट रही हैं, इन पर टैक्स लगाओ. मोदी सरकार की ओर से जवाब भी आया, ‘हाँ, देखेंगे..करेंगे..’ लेकिन गटर गंगा जिस दिशा में बह रही थी, उसी दिशा में बहती रही!! भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात और यूरोप को निर्यात, अमेरिका के लाख मना करने, धमकाने के बावजूद किया. औद्योगिक कॉर्पोरेट के मुनाफ़े का सवाल आए, तो अमेरिका की धमकियों को नज़रंदाज़ किया जा सकता है. कृषि पूंजी के हित को भले उतनी तवज्जो ना मिले जैसा मौजूदा ट्रेड डील से समझ आ रहा है.
पेट्रोल में एथेनॉल की सरकारी मिलावट का खेल
पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का खेल, भाजपा सरकार के पहले संस्करण अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 2003 में ‘एथेनोल मिलावट वाले पेट्रोल का कार्यक्रम (Ethanol Blended Petrol Program, EBP) नाम से शुरू किया था. यह सरकारी मिलावट शुरू में एथेनोल 5%, पेट्रोल 95% अनुपात में होती थी. यह एथेनॉल गन्ने के रस से चीनी बनने के बाद बचे शीरे से शुरू हुआ था. 1918 में मोदी सरकार ने ‘जैविक-इंधन की राष्ट्रीय नीति (National Policy on Bio-fuel)’ बनाई, जिसके तहत इस मिलावट को बहुत व्यापक बना दिया गया. ‘व्यापक’ का अर्थ है, एथेनॉल को गन्ने के शीरे के अलावा, अन्य पदार्थों से भी बनाए जाना और उसकी मिलावट की सीमा को 5% से बढ़ाते जाना, दोनों शामिल हैं. 2023 में ‘जैविक इंधन की राष्ट्रीय नीति’ को बदलकर आधुनिक नाम दे दिया गया; ‘ई 20 रोल आउट (E20 Rollout)’. इस विश्वगुरु टाइप नाम में इसका मक़सद भी स्पष्ट हो रहा है; एथेनोल को 20% तक मिलाने की छूट!!
आज जो पेट्रोल आप ख़रीद रहे हैं, जिसके दाम हर रोज़ बढ़ रहे हैं, उसमें 20% एथेनॉल और 80% पेट्रोल है. 20% मिलावट हांसिल करने का लक्ष्य 2030 रखा गया था लेकिन भारत को जल्दी से विकसित राष्ट्र बनाना है इसलिए उस लक्ष्य को काफ़ी पहले ही प्राप्त कर लिया गया है! मोदी सरकार ने देख लिया कि लोग 20% एथेनॉल मिलावट को झेल गए, कहीं कोई हल्ला नहीं मचा, सभी ‘रामराज’ की खुमारी में टुन्न हैं, इसलिए एथेनॉल मिलावट वाली आकर्षक योजना E 20 को, पहले E22 अर्थात 22% मिलावट, उसके बाद E25 अर्थात 25% मिलावट तथा अंत में E30 का नाम देकर एथेनॉल मिलावट के लक्ष्य को 30% तक ले जाना कर दिया गया है. इस ख़तरनाक मिलावट पर चूंकि आज भी कोई चर्चा नहीं हो रही इसलिए बहुत मुमकिन है कि 30% मिलावट के लक्ष्य को अगले साल ही पूरा कर लिया जाए. एथेनोल का बाज़ार भाव 71/ प्रति लीटर है जिसकी मिलावट से वह पेट्रोल के भाव हो जाता है, जो आज (30 मई) को 103.28 प्रति लीटर है. 1 लीटर पेट्रोल में 20 मिली एथेनॉल है, जिसकी कीमत हुई 14/. इसका मतलब, 80 मिली पेट्रोल की क़ीमत हुई 89.28. इस गणना से पेट्रोल की वास्तविक रु 111.60 हो जाती है.
गाड़ियों पर एथेनोल मिलावट के दुष्परिणाम
- पेट्रोल की ज्यादा खपत/ एवरेज कम आना: एथेनोल पतला होता है. उसका ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से कम होता है. यही वज़ह है कि 20% एथेनॉल मिलावट के बाद गाड़ियों की माइलेज 10-15% कम हो जाती है. कोई गाड़ी एक लीटर पेट्रोल में अगर 20 किमी जाती थी, तो अब वह 17 किमी ही जाएगी. इस तरह पेट्रोल की पहली गणना को आगे बढ़ाया जाए तो पेट्रोल का वास्तविक दाम रु 117 प्रति लीटर हो जाता है.
- गाड़ी के इंजन की लाइफ भी कम हो जाती है: 2023 के बाद से तो गाड़ियों के उत्पादन के वक़्त ही उनके इंजन में एथेनॉल मिलावट वाले पेट्रोल के अनुरूप कुछ बदलाव किए जा रहे हैं, लेकिन एथेनोल मिलावट की वज़ह से, उससे पहले बनी गाड़ियों के इंजनों की लाइफ 20% तक कम हो जाती है.
- पेट्रोल टैंक का सड़ जाना: एथेनोल नमी सोखने वाला हाय्ग्रोस्कोपिक रसायन है. पेट्रोल में इसकी मिलावट के बाद पेट्रोल में नमी बढ़ती जाती है, जिससे तेल की टंकी और नली में तेज़ी से जंग लगता है, जिससे टंकी और फ्यूल पंप जल्दी ख़राब हो जाते हैं.
- गाड़ियों में आग लगना: एथेनोल एक साल्वेंट है, मतलब उसमें घोल लेने की प्रवृत्ति मौजूद रहती है. यही वज़ह है कि गाड़ी में पेट्रोल के संपर्क में आने वाले रबड़ और प्लास्टिक के पार्ट फूलने लगते हैं, कड़े हो जाते हैं और फट जाते हैं. उन्हें जल्दी बदलना पड़ता है वर्ना तेल लीक होने लगता है जिसके परिणाम आर्थिक ही नहीं भयानक हादसे भी हो सकते हैं. गाड़ियों में आग लगने की घटनाओं में एथेनोल की अप्रत्यक्ष की भूमिका कपोल कल्पना नहीं, तथ्यों पर आधारित हक़ीक़त है.
- गाड़ियों के स्टार्ट होने में दिक्क़त: टंकी में पेट्रोल अगर ज्यादा भरा है और गाड़ी कम चलती है, तो पेट्रोल में एथेनॉल की वज़ह से आई नमी, टंकी में नीचे बैठने लगती है जिससे गाड़ी स्टार्ट होने में भी दिक्कत देती है और इंजन की क्षमता भी गंभीर रूप से प्रभावित होती है.
बेतहाशा बढ़ता एथेनोल उत्पादन भयानक जल संकट को जन्म देने वाला है
बिना उससे होने वाले दुष्परिणामों का वैज्ञानिक आकलन किए, मोदी सरकार और सरकारी तेल कंपनियां एथेनोल के उत्पादन पर बहुत ज़ोर लगा रहे हैं. 2014 में जब ‘ऐतिहासिक’ मोदी काल की शुरुआत हुई थी, तब देश में एथेनॉल का उतपादन मात्र 38 करोड़ लीटर था जो 2025-26 में बढ़कर 515 करोड़ लीटर हो गया है. एथेनोल के उत्पादन की शुरुआत चीनी मिलों के बचे हुए पदार्थ, शीरे (molasses) से हुई थी, लेकिन मोदी काल में पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट 3% से बढ़कर 20% तक पहुँच चुकी है और जल्दी ही 30% तक पहुंचनी है. इतनी भारी मात्रा में शीरा मिलना असंभव है. इसलिए अनेक फसलों जैसे मक्का, चावल की भुस्सी, बांस आदि से बायो-एथेनॉल बनाया जा रहा है. कुल उत्पादन में बायो-एथेनोल उत्पादन का हिस्सा, चीनी मिलों के शीरे से पैदा होने वाले एथेनोल से भी अधिक, 60% तक हो गया है. सरकार एथेनॉल उत्पादन में कच्चे माल की तरह प्रयोग हो रहीं फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए भी अनेक प्रोत्साहन दे रही है. एथेनॉल पर जीएसटी 18% से घटाकर 5% कर दिया गया है. एथेनॉल उत्पादन अंधाधुंध बढ़ाए जाने के गंभीर परिणाम होने निश्चित हैं:
- गंभीर जल संकट को न्यौता: 1 लीटर एथेनोल उत्पादन में लगभग 12 लीटर पानी लगता है. देश में एथेनोल का कुल वार्षिक उत्पादन 515 करोड़ लीटर है. इसमें हर साल कुल 6,180 करोड़ लीटर पानी लगेगा. पेट्रोल में एथेनोल मिलावट का सरकारी लक्ष्य अब 20% से बढ़कर 30% हो गया है, जिसके लिए 800 करोड़ लीटर से भी ज्यादा एथेनोल चाहिए, जिसे बनाने के लिए 10,000 करोड़ लीटर से भी ज्यादा पानी की
हनुमान गढ़ राजस्थान में एथेनोल प्लांट का विरोध
हर साल ज़रूरत होगी!! कहां से आएगा इतना पानी? पहले ही ज़मीन में जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है. तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में जहां बायो-एथेनोल के उत्पादन पर ज़ोर दिया जा रहा है, पहले से ही भयंकर जल संकट मौजूद है जो लगातार गंभीर होता जा रहा है. पीने के पानी, फसलों के लिए पानी की पहले से ही भयानक किल्लत है. एथेनोल उत्पादन अगर उपलब्ध पानी को सोख लेगा, तो लोग, जानवर और फसलों को पानी कहाँ से आएगा. इस बारे में कोई चिंता मोदी सरकार को नज़र नहीं आती. उसके एजेंडे पर लोगों के जीवन-मरण के मुद्दे क्यों नहीं आते?
- भयंकर पर्यावरण प्रदूषण का ख़तरा: एथेनॉल की उत्पादन प्रक्रिया में ‘विनास्से’ नाम का ज़हरीला तरल पदार्थ निकलता है जो ज़मीन की महज़ सतह को ही नहीं, बारिश के पानी के साथ ज़मीन में जाकर समूचे पानी भंडार को गंभीर रूप से दूषित कर डालता है जिससे कैंसर, मस्तिष्क रोग जैसे गंभीर रोगों का ख़तरा बहुत बढ़ जाता है. साथ ही इस उत्पादन प्रक्रिया में ख़तरनाक ज़हरीली गैस भी निकलती हैं. एथेनॉल प्लांट से पर्यावरण बहुत गंभीर रूप से दूषित होता है.
- इंसानों को अन्न कहां से आएगा: मक्का, धान, गन्ना एवं अन्य स्रोत जिनसे बायो-एथेनोल बनता है, आगे और भी ज्यादा मात्रा में बनाने की योजना है, उनका कुल उत्पादन लोगों की कुल खाद्य आवश्यकता से ज्यादा नहीं है ऐसे में लोगों का पेट काटकर, जीवनावश्यक अन्न को एथेनॉल की भेंट चढ़ाया जाना घोर अन्यायपूर्ण और जन विरोधी क़दम है, जिसका पुरज़ोर विरोध होना चाहिए, हो रहा है.
डीज़ल में भी सरकारी मिलावट की परियोजना
एथेनॉल की मिलावट डीज़ल में करने के भी प्रयोग हुए हैं, लेकिन क़ामयाब नहीं हुए. उसके बावजूद मोदी सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं. पेट्रोल इंजन तो 20% एथेनॉल मिलावट से धीरे-धीरे बैठता है, डीज़ल इंजन इस मिलावट को बिलकुल ही नहीं झेल पाता. डीज़ल में मिलावट के लिए एथेनॉल की जगह, एथेनॉल और अल्कोहल के मिश्रण से बनने वाले दूसरे केमिकल, ‘इसोब्युटानोल’ को ढूंढ लिया गया है. अभी भी ‘ग्रीन डीज़ल’ नाम से बिक रहे डीज़ल में पौधों और जानवरों से प्राप्त होने वाली फैट की 7% मिलावट होती है. जल्दी ही शुरुआत में डीज़ल में 10% ‘इसोब्युटानोल’ मिलाकर बेचे जाने की सरकारी योजना है. उसके बाद धीरे-धीरे ‘इसोब्युटानोल’ का प्रतिशत कैसे बढ़ाना है, मोदी सरकार से बेहतर कोई नहीं जानता.
पब्लिक ट्रांसपोर्ट ख़ासतौर पर बस परिवहन सुदृढ़ होने से ही तेल की बचत होगी
लगातार डीज़ल पेट्रोल गैस के दाम बढ़ने पर जन आक्रोश प्रदर्शन, मधेपुरा, बिहार
मेट्रो ट्रांसपोर्ट महानगरों में बहुत ही क़ामयाब परियोजना साबित हुई. रक्षा बंधन, 8 अगस्त 2025 को दिल्ली मेट्रो ने 81,87,674 मुसाफ़िरों का अविश्वसनीय रिकॉर्ड बनाया. दिल्ली मेट्रो इतनी क़ामयाब ना हुई होती तो डीज़ल, पेट्रोल, गैस प्रदूषण के राजधानी दिल्ली में ऐसे हाल हो गए होते कि यह खूबसूरत ऐतिहासिक महानगर उजड़ गया होता. इसके बावजूद सरकारी विद्वानों को यह समझ नहीं आया कि राज्य परिवहन को इसी तरह सुदृढ़ बनाकर डीज़ल, पेट्रोल, गैस की वास्तविक बचत की जा सकती है, पर्यावरण को ज़हरीला होने से भी बचाया जा सकता है, एथेनोल का उत्पादन लगातार बढ़ाते जाने से नहीं, आम आदमी द्वारा इस्तेमाल होने वाले परिवहन विभाग को सुदृढ़, सुविधाजनक और बस भाड़ा कम करने से तेल की बचत होगी, भले एक माननीय मंत्री के साहबज़ादे एथेनोल व्यवसाय से हर महीने 200 करोड़ ही क्यों ना कूट रहे हों!
राज्यों के परिवहन विभागों का दिवाला निकला पड़ा है. बसें खटारा हो चुकीं और इमारतें जर्जर. बहुत भारी तादाद में सरकारी नोकरी देने बाले परिवहन विभागों में सरकारी कर्मचारी आज ढूँडे से नहीं मिलते. सारी बसें और सारे रूट निजी व्यवसायियों या ‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप’ नाम की घोर जन विरोधी परियोजना की बलि चढ़ चुके हैं. यात्रियों की सुविधाएं, सहूलियतें बस मालिकों की अंतिम प्राथमिकता होते हैं. कितना भी किराया बढ़ाने की छूट मिली हुई है.
मोदी सरकार, तन मन धन से पूरी तरह चंद कॉर्पोरेट के हितों को समर्पित हो चुकी है. उसमें बदलाव होने की अब कोई गुंजाईश नहीं बची. पूंजीवादी विकास की यही नैसर्गिक परिणति होनी थी. जन मानस के जीवन मरण के मुद्दों पर संगठित अनुशासित संयुक्त जन आंदोलन चलाना ही एक मात्र रास्ता है.
