विकसित भारत 2047

रणवीर सिंह

· 9 min read
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विकसित भारत 2047 के छः प्रमुख लक्ष्य

  1. तीस ट्रिलियन डालर अर्थव्यवस्था:

फिलहाल की स्थिति पर नज़र डालते हैं।

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पिछले दस सालों में भारत की जी डी पी औसतन 6.1% प्रति वर्ष के हिसाब से बढ़ी है।

पिछले तीन वर्षों में देखें:

2024-25: 7.1%

2025-26: 7.7%

2026-27: 6.6% (बी एम आई – फिच कंपनी द्वारा अनुमानित और उनके अनुसार, गिरावट के तीन कारण:

  1. जी एस टी घटने का असर खत्म
  2. बढ़ती मुद्रास्फीति (5.3% अनुमानित)
  3. पश्चिम एशिया संकट

2047 तक तीस ट्रिलियन अर्थव्यवस्था होने के लिए अगले बीस वर्ष के दौरान, जी डी पी की औसतन वृद्धि लगभग 9.95% प्रति वर्ष रहनी चाहिए। यह अति आत्मविश्वासी और अति महत्वाकांक्षी लक्ष्य प्रतीत होता है। कहीं, अच्छे दिन, अर्थव्यवस्था के रास्ते तो नहीं आ रहे? द्वितीय विश्वयुद्ध में लाल सेना द्वारा, फासीवाद को दफ्न करने के बाद, साम्राज्य वादियों ने समाजवाद आ जाने के डर से जो युद्ध स्थगित किए थे, वो टकराव अब सामने आ रहे हैं। यदि, अर्थव्यवस्था का सामाजिक वातावरण से कोई संबंध है तो आज जब किसान, मज़दूर और युवा आक्रोशित हैं, तो अर्थव्यवस्था कैसे छलाँग मार सकती है?

2. सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा:

निजीकरण, शिक्षा को निगल चुका है। बड़ी तादाद में स्कूल बंद किए जा रहे हैं। सर्वहारा को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है। यह, शिक्षित बेरोज़गारी दर घटाने का एक आपराधिक प्रयास है। दूसरी तरफ, शिक्षा के भव्य नमूने पेश किए जा रहे हैं। जिसकी छमता हो, वो शिक्षा ले और जिसकी छमता ना हो, वो पकौड़े तल सकता है। तथाकथित उच्च शिक्षा अब मध्यवर्ग के हाथ से भी निकल रही है। तीसरा, शिक्षा को मात्र जीविका का साधन बनाया जा रहा है। उद्योग को जो चाहिए, वही पढ़ना है। शिक्षा, अब चरित्र निर्माण का ज़रिया नहीं रह गया है। लालच और लूट-खसोट का वातावरण तैयार हो चुका है। शिक्षा आज, प्रेमचंद के बजाय, पूंजीवाद के प्रवक्ता पैदा कर रही है।

निजीकरण का दूसरा शिकार, स्वास्थ्य व्यवस्था है। सरकारी अस्पतालों में ना डाक्टर हैं, ना दवाइयाँ और ना चिकित्सा उपकरण। अब तो, भवन भी जर्जर होकर गिरने लगे हैं। ई एस आई योजना भी धन व नीयत के अभाव में दम तोड़ रही है। सर्वहारा इलाज के सारे श्रोत सूख रहे हैं। दूसरी ओर, पांच सितारा स्वास्थ्य सेवाओं के विशाल विज्ञापनों से मीडिया भरा पड़ा है। जिसके पास, पैसा है वो इलाज कराये। जिसके पास, पैसा नहीं है वो मोक्ष पाने के लिए स्वतंत्र है।

सामाजिक सुरक्षा की हालत सर्व विदित है। सार्वजनिक क्षेत्र को नष्ट किया जा रहा है। निजी क्षेत्र का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा है। सरकारी नौकरी की जगह संविदा रोजगार दिया जा रहा है। कंपनियां, नियमित भर्ती बन्द करके, ठेका मज़दूरों से काम करा रही हैं। नये लेबर कोड लागू होने से पहले ही बारह घंटे की पाली शुरु हो चुकी थी। बारह चौदह घंटे काम और कोई अवकाश नहीं, कोई ढंग की कैंटीन नहीं, साफ पानी और शौचालय नहीं। और, मज़दूरी, वही दस बारह हज़ार रुपए, वो भी दस साल से। 2026 की देशव्यापी मज़दूर आंदोलन लहर हवा में पैदा नहीं हुई। बढ़ी हुई न्यूनतम मज़दूरी भी अपर्याप्त है और मज़दूर आक्रोश रोकने में असमर्थ है। युवा, गिग मज़दूर बनकर, दर दर भटक रहे हैं। पसीने में सराबोर, बिना रुके, एक मशीन के पुर्जे की तरह पूरा दिन चलायमान। सांस लिया तो आई डी बन्द किए जाने का डर। जवानी, सचमुच धुआँ धुआँ होकर प्रतिदिन नष्ट हो रही है। इन, दुर्गम हालात में, सभी को सामाजिक सुरक्षा, सुनने में कितना अच्छा लगता है। कंपनियां, फंड का पैसा, मज़दूर की मज़दूरी से हर महीने काटकर, सरकारी खाते में जमा नहीं करतीं। मज़दूर को, ग्रेच्युटी पाने के लिए वर्षों इन्तज़ार के बाद, दावा तक दाखिल करना पड़ता है। औद्योगिक दुर्घटनाओं में मरने वाले मज़दूर के आश्रित, मुआवजा पाने के लिए बिलखते हैं। इन हालात के मद्देनज़र, सभी को सामाजिक सुरक्षा देने के लक्ष्य में कितनी सार्थकता है, जल्दी ही पता चल जाएगा।

3. विश्वगुरू:

भारत, अपने को विश्वगुरू या कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र है। गाँव में भी कई लोग, अपने आप को मुखिया कहलाना पसंद करते हैं। भारत के तथाकथित विश्वगुरू बनने के प्रयासों को निम्नलिखित झटके पहले ही लग चुके हैं।

• आधी आबादी का सरकारी खैरात पर निर्भर होना;

• अमेरिका द्वारा बेड़ियाँ डालकर भारतीयों को वापस भेजना;

• आपरेशन सिंदूर के दौरान अमेरिका द्वारा भारत-पाकिस्तान युद्ध विराम की घोषणा;

• भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर सिर्फ अमेरिका का बयान देना;

• हमारे ईरानी मेहमानों की अमेरिका द्वारा हत्या;

• होरमूज खाड़ी में हमारे तीन नाविकों की अमेरिका द्वारा हत्या।

सिर्फ, गोदी मीडिया के आलाप से भारत विश्वगुरू नहीं बन सकता। वियतनाम ने अमेरिका को हराने तथा सोवियत संघ ने जर्मनी को हराने के बाद भी, विश्वगुरू होने का दावा नहीं किया। लचर विदेश नीति और ढचर अर्थ नीति, किसी देश को सिर्फ हास्य का पात्र बना सकती हैं।

4. शोध व तकनीक महा केंद्र:

इसका ताजा उदाहरण, हमने भारत मंडपम में देखा। कई देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे। हमारे एक चर्चित विश्वविद्यालय ने चीन के एक रोबोटिक कुत्ते को अपना बहुत बड़ा शोध बताकर पेश किया। तरह तरह के करतब करवाए और खूब वाह-वाही लूटी। चीन ने कुछी घन्टों में भंडाफोड कर दिया और सारी दुनिया को बता दिया कि ये रोबोटिक कुत्ता उन्होंने बनाया है और इतने में आनलाईन खरीदा जा सकता है। ये हाल है हमारे शोध व तकनीक का। हम नकली घी, मावा और पनीर बना सकते हैं। हम चीन के माल पर अपना लेबल लगा सकते हैं। शोध व तकनीक का महा केंद्र बनने के लिए, हमें वैज्ञानिक सोच विकसित करनी पड़ेगी और विज्ञान अनुसंधान केंद्रों को स्वतंत्र व समृद्ध करना पड़ेगा। आज के दूषित वातावरण में ये सब सम्भव ही नहीं है।

5. सभी को उच्च जीवन स्तर:

भयंकर बेरोजगारी और कमरतोड़ महंगाई के चलते, दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो रहा है। किसान को उसकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिल रहा। मज़दूर को उसकी श्रम शक्ति के अनुसार, मज़दूरी नहीं मिल रही। युवा को उसकी योग्यता अनुसार नौकरी पाने के लिए हो रही चयन परीक्षा रद्द की जा रही है। पर्चे और नौकरियाँ, धड़ल्ले से बिक रही हैं। अन्धकारमय जीवन से हताश होकर लोग आत्महत्या कर रहे हैं। धर्म और जाति विभाजन को और चौड़ा किया जा रहा है। नफ़रत, द्वेष और हिंसा का आभामंडल तैयार हो चुका है। ऐसे में, सभी को उच्च जीवन स्तर प्रदान करने का लक्ष्य, मात्र एक छलावा लगता है। सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मान दिए बिना, उच्च जीवन स्तर असम्भव है।

6. पारदर्शी व जनमुखी सरकार:

मीडिया का गोदी मीडिया में परिवर्तन। बेरोजगारी और महंगाई पर चुप्पी। सूचना अधिकार कानून को लगातार बेअसर बनाना। भ्रष्टाचार उजागर करने वाले पत्रकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न। बुलडोज़र न्याय को मूक मान्यता। प्रायोजित मुठभेड़ों का सिलसिला। ऐसे कानून कि किसी को भी बिना कारण बताए उठा लेना और सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दिन छोड़ देना। असुविधाजनक यूट्यूब चैनलों को बन्द करा देना और न्यायालय में किरकिरी के डर से खोल देना। कुछ भी हो जाने पर किसी भी मंत्री को बर्खास्त न करना। जन प्रतिनिधि खरीदकर बहुमत का जुगाड़ करना। जनता के मताधिकार को मूल्यहीन बना देना। ये सब, किसी भी आधार पर, एक पारदर्शी व जनमुखी सरकार के लक्षण नहीं हो सकते।

भारतीय उद्योग महासंघ (सी आई आई) द्वारा विकसित भारत 2047 के लिए सुझाए गए सुधारों के कुछ अंश

भारत, दुनिया का सबसे बड़ा युवा श्रम शक्ति भंडार है, जिसमें पचास करोड़ से ज़्यादा कार्मिक उम्र के लोग रहते हैं, लेकिन सख्त श्रम कानून, बेमेल कुशलता और नियमों का पालन करने में आने वाली दिक्कतों की वजह से औद्योगिक प्रगति धीमी है। सच मेंविश्व कारख़ानाबनने के लिए, भारत को ऐसे आधुनिक श्रम सुधारों की ज़रूरत है जो मज़दूरों के अधिकार और व्यापार प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बना सकें। एक चुनौती: कार्मिकों में महिलाओं की हिस्सेदारी पच्चीस प्रतिशत से भी कम है। आधी आबादी के पूरे योगदान के बिना, भारत सात ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था नहीं बन सकता। मज़दूरों में महिलाओं की हिस्सेदारी को अभी के पच्चीस प्रतिशत से बढ़ाकर कम से कम चालीस प्रतिशत करने से 2030 तक भारत की जी डी पी में सात सौ बिलियन डालर की वृद्धि हो सकती है (मैकिन्से विश्व संस्थान की रिपोर्ट)

सरकार ने उनतीस लेबर कानूनों को मिलाकर चार लेबर कोड बना दिए हैं। इन सुधारों का मकसद नौकरी से निकालने के आसान नियमों के साथ भर्ती में लचीलेपन को बढ़ावा देना है। एक बार पूरी तरह लागू होने के बाद, ये कोड भारत में व्यापार की सुगमता को काफी बेहतर बना सकते हैं और ज्यादा विदेशी निवेश ला सकते हैं। निवेशक, अक्सर भारत के निर्माण उद्योग में श्रम कानून सख्ती को एक बड़ी रुकावट बताते हैं। उदाहरण के लिए: 300 से ज़्यादा मज़दूरों वाली कंपनियों को छँटनी के लिए (मौजूदा कानूनों के तहत) सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है। कुछ राज्यों में ठेका मज़दूरी पर रोक है, जिससे व्यापार को तेज़ी से बढ़ाने में दिक्कत आती है। भारतीय उद्योग महासंघ, एक ऐसे लचीले मज़दूर मॉडल की सलाह देता है, जहां कंपनियां, बाज़ार में मांग के हिसाब से मज़दूरों की संख्या में फेरबदल कर सकें।

स्वतंत्र भारत के लिए टाटा बिड़ला योजना बनी थी। विकसित भारत के लिए उद्योग महासंघ योजना बनी है। तब भी पूंजीपति वर्ग सत्ता में था, आज भी पूंजीपति वर्ग सत्ता में है। फर्क सिर्फ इतना है, तब इंसान बोलते थे, अब संस्थान बोलते हैं।


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